गुरुवार, 25 सितंबर 2014

ऋग्वेद के पथ - 3: आवाहनं देवी

पुरुष तत्त्व इन्द्र का वर्षाकाल समाप्त होने के पश्चात शरद ऋतु आती है। शरद विषुव (23 सितम्बर) से लेकर वसंत विषुव (22 मार्च) तक का काल स्त्रीकाल है। दिनमान के इन दो संतुलन बिन्दुओं के पास दो नवरात्र पर्व पड़ते हैं। पितर श्रद्धाञ्जलि पर्व के पश्चात नवसंतति के हितार्थ शारदीय नवरात्र पर्व जननी का उपासना पर्व है।
शरद स्त्री है, गहिमणी हो पर्जन्य से प्राप्त को भूमा में सँजोती है। स्त्री परिवर्तनों की सीमा भी है और ऋतुमती आवृत्ति भी। वह सनातन सत्य अर्थात ऋत को धारण करने वाली ऋतावरी है। संख्या नौ अपनी अद्भुत अपरिवर्तनीयता के कारण ऋतावरी माँ का प्रतीक है। सृजन और सृष्टि का अनुशासन स्त्री में निहित है। वह वत्सल माता प्रिया है, सरस है।
rg_2_41_18ऋतस्वरूपा, व्रती और व्रतरक्षक के रूप में वह आवाहनीया है।
rg_3_4_7वैदिक श्रौत सत्रों के आह्वान मंत्रों में ऋषियों ने स्त्री तत्त्व को स्थान दिया। तिस्रो देवी नाम से जिन तीन रूपों को अपने आह्वान में दश ऋषिकुलों ने स्थान दिया, वे हैं – भारती (भूमा, मही, पृथ्वी), इळा (मानवीय प्रज्ञा) सरस्वती (वाणी, विद्या)। भारती अस्तित्त्व अर्थात मातृ पक्ष हैं, इळा हैं मेधा, सुसंग्रहण और विवेक शक्ति और सरस्वती हैं चेतन जीवन अभिव्यक्ति।
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विश्वरूपा विराट विराज जगज्जननी भवानी के ये त्रिनेत्र हैं। नवरात्र पर्व के प्रथम दिवस इनका आह्वान है। मंगल हो!
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