रविवार, 21 दिसंबर 2014

उत्तरायण के दिन अब मकर संक्रांति नहीं होती!

कल के सूर्योदय के साथ उदया तिथि में 22 दिसम्बर को सूर्य उत्तरायण होंगे अर्थात दक्षिण की ओर के अपने अधिकतम झुकाव से उत्तर की ओर पहला पग लेंगे। उस समय सूर्य मूल नक्षत्र पर होंगे अर्थात आकाश में जिस अयन क्षेत्र में सूर्योदय होगा, वह मूल नक्षत्र (वृश्चिक राशि के डंक का अंतिम बिन्दु) वाला होगा। 

उत्तर दिशा को शून्य मान कर यदि दक्षिणावर्त चलें तो पूरब दिशा 90 अंश पर आती है। अपने अधिकतम दक्षिणी झुकाव में सूर्योदय लगभग 116 अंश पर होता है और वहाँ से पुन: धीरे धीरे घटाव प्रारम्भ होता है - 115, 114, 113 ...। महाविषुव अर्थात 21 मार्च के आसपास मधुमास में सूर्योदय पुन: 90 अंश अर्थात ठीक पूरब दिशा में होगा।

हिन्दुओं में उत्तरायण को मकरसंक्रांति अर्थात सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण तिथि 14/15 जनवरी से जोड़ कर माना जाता है। कभी ऐसा था किंतु आज ऐसा नहीं है। 

अब 14 जनवरी को सूर्य उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर होते हैं। उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर उत्तरायण सूर्योदय लगभग छठी सदी में होता था जब कि आर्यभट आदि ने अंतिम बार पंचांग का मानकीकरण किया। तब मकर संक्रांति और उत्तरायण सम्पाती थे। लगभग 25920 वर्षों की आवृत्ति के साथ धरती के घूर्णन अक्ष के शीर्ष बिन्दु की वृत्तीय गति के कारण यह खिसकन होती है।


 अयनवृत्त पर सूर्य का वार्षिक संचरण अथर्ववेद (19.7) अनुसार 28 नक्षत्रों में विभाजित है (संभवत: महाभारत काल में व्यासपीठ के संशोधनों में अभिजित को हटा कर यह विभाजन 27 नक्षत्रों में कर दिया गया)। 
वैदिक युग में यह विभाजन समान नहीं था। समान विभाजन पश्चिम के 12 राशि तंत्र को अपनाने और उसके भीतर नक्षत्र आधारित काल गणना को समायोजित करने के साथ प्रारम्भ हुआ। 
 आधुनिक विद्वानों ने वैदिक समय की मान्यता के अनुसार 25920 वर्ष के समय अंतराल को महाविषुव के दिन सूर्य के किसी नक्षत्र पर होने से इन अवधियों में बाँटा है:

मृगशिरा - 363, आर्द्रा 1761, पुनर्वसु 1116, पुष्य 354, अश्लेषा 1164, मघा 828, पूर्व फाल्गुनी 741, उत्तर फाल्गुनी 1572, हस्त 748, चित्रा 30, स्वाति 1500, विशाखा 1257, अनुराधा 519, ज्येष्ठा 1068, मूल 720, पूर्वाषाढ़ 561, उत्तराषाढ़ 213, अभिजित 1185, श्रावण 1047, धनिष्ठा 1818, शतभिषा 858, पूर्व भाद्रपद 1128, उत्तर भाद्रपद 771, रेवती 1017, अश्वायुज 1026, भरणी 849, कृत्तिका 705, रोहिणी 1002।


इस समय महाविषुव पूर्वभाद्रपद नक्षत्र पर है जिसके 455 वर्ष बीत चुके हैं। महाविषुव की खिसकन के कारण पर्वों को मनाने में अब 23 दिनों का अंतर आ चुका है, पर्व पंचांग में संशोधन होने चाहिये।

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

शत शरद जियो

कुहरे भरी कुनकुनी प्रातधूपों के प्रारम्भिक दिन। इन दिनों जब कि गोरखपुर आँखें फाड़ कुहरे को भेदने के प्रयास कर रहा होता है, मँड़ुवाडीह स्टेशन पर बनारसी लोग लुगाइयाँ नारंगी धूप गंगा में नहा रहे होते हैं। 

आने वाला दिल्ली से आ रहा था, उसे रिसीव करना था सो प्रात:काले शिवगंगा दर्शन को मँड़ुवाडीह स्टेशन जाना पड़ा। एक स्टेशन पहले या आउटर सिगनल पर समय से चलती ट्रेन को भी खड़ा कर डिले कर देने की भारतीय रेलवे की उज्जवल परम्परा का निर्वाह उस दिन भी हुआ था, शिवगंगा जी अगवानी द्वार पर पवना घंटे से खड़ी आरती थाल को अगोर रही थीं जब कि नरायन गेरुआये चमक रहे थे। मैं प्लेटफार्म पर भटकने और लोगों को परखने लगा। पूर्वी उत्तरप्रदेश में साफ सुथरा स्टेशन मिलना यूँ ही आप को भौंचक कर देता है, भीड़ भी कम हो तो दोषदर्शी के लिये कुछ देखने को रहता ही नहीं, इसलिये बहुत शीघ्र ही बोर हो कर एक बेंच पर बैठ गया।

कुछ पल में ही पीछे से एक बालक स्वर उभरा – अंकल जी, अंकल जी! बच्चे का स्वर इतना संभ्रांत और पॉलिश्ड!!  आश्चर्य में मैंने दृष्टि फेरी –केश करीने से कढ़े हुये, साधारण सी स्कूल यूनिफॉर्म में आत्मविश्वास से भरा मन्द स्मित साँवला सलोना बौद्धिक और गरिमामय तीखे नैन नक्श वाला चेहरा। नाटा सा मासूम लड़का, अधिक से अधिक छ्ठी कक्षा में पढ़ता होगा। उसने पूछा – अंकल, यह जो सामने ट्रेन खड़ी है, एक्सप्रेस है न?  मैंने इधर उधर चेहरा घुमाया कि कोई अभिभावक साथ में है या नहीं? कोई नहीं था। बच्चे के हाथ में एक पॉलीथीन बैग था जिसमें टिफिन रखा हुआ था। मैं सतर्क हो गया – क्या मामला हो सकता है?
चौरीचौरा एक्सप्रेस को देखते मैंने उत्तर दिया – हाँ, एक्सप्रेस ही है।
बच्चे ने उत्तर दिया – भाई जी को छोड़ने आया था। उन्हें पैसेंजर ट्रेन से एक स्टेशन आगे जाना है, यह तो वहाँ शायद रुके भी नहीं। किसी वयस्क पुरुष की तरह उसने अपनी चिंता जताई और मुस्कुराते हुये थैंक यू बोल कर आगे बढ़ गया। 
 मेरे मन में बवंडर उठने लगे – क्या इसके घर कोई अभिभावक नहीं है? सातवीं में पढ़ते अपने बालक को हमें बस स्टॉप तक छोड़ कर आना पड़ता है कि कहीं इतने समय में ही कुछ ऐसा वैसा न घट जाय! जब कि यह बच्चा अकेले,  भाई को ट्रेन पर चढ़ाने आया है! मैं धीरे धीरे उसके पीछे चल पड़ा। दूर दिखा कि वह एक विकलांग से बच्चे को छोड़ने आया था जो रह रह अपनी लाठी के सहारे उठ खड़ा होता और अपने सलोने भाई के कुछ कहने पर पुन: बैठ जाता।

 शिवगंगा आ पहुँची थी, मैं यात्री को साथ ले वापस घर की और चल पड़ा। मन के कुहरे में किरणें फूट रही थीं। संसार ऐसे ही छोटे छोटे अच्छे जन से रहने लायक बना हुआ है। हो सकता है कि बच्चे का पिता न हो या ग़रीबी के कारण कहीं उस समय भी बझा हो या नालायक हो। उसकी माँ के साथ भी ऐसा ही कुछ हो लेकिन वह बच्चा अपने साथ कितनी ऊष्मा, ऊर्जा और प्रकाश लिये जी रहा है! 

माथे पर सूरज देव की तौंक पड़ी। उसमें से बच्चे के लिये किरण भर मौन आशीर्वाद ले कर मैं बुदबुदाया – शत शरद जियो पुत्र! स्टेशन से घर तक की यात्रा टाइम मशीन की यात्रा से कम नहीं थी, मैं एक आयाम से दूसरे आयाम तक जो पहुँच गया था।