शनिवार, 7 मार्च 2015

अकेली जरा का पर्व

नीम झरे दुअरा पर सूखी, चौकी पर है धूर। 
शमी गाछ की छाँह कँटीली, स्वामी घर से दूर॥
सोने के पिजड़े में सुगना, ना दाना ना ठोर। 
रामनाम की टेर लगी है, जाना है उस छोर॥
गइया सब को कौरा पहुँचे, चिरई सब को नीर। 
मनपूओं की बात अधूरी, ज्यों स्मृतियों की खीर॥
सूगर फ्री में बनी तस्मई, देवकुर पाकड़ घाट। 
गदबेरा अबीर में सुत की, मइया जोहे बाट॥
सन्नाटा है घर के आँगन, सिमटा सकल वितान। 
भीगी आँखों बुढ़िया देखे, बासी सब पकवान॥  

3 टिप्‍पणियां:

  1. Budhi aankhon ki niyati hi hai bhigi rahna. Agrarian society lakh darze achchi thi aaj ke digital yug se,kam se kam budhape main aankhon ka taara paas to rahta tha.bahut bhayavah hai aaz ka daur.
    ......Bau ka deewana.

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  2. सन्नाटा है घर के आँगन, सिमटा सकल वितान।
    भीगी आँखों बुढ़िया देखे, बासी सब पकवान॥ ...
    दिल को छूते हुए भाव ...

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  3. वृद्धों को भी साथ बुलाना, शाम-सवेरे आशीष पाना :)

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