शनिवार, 12 सितंबर 2015

कहनी कहानी

कहानियों का मेल कहने से बैठता है लेकिन हर कहा हुआ कहानी नहीं हो पाता। होने भर और हो पाने का विभेद कहानियाँ मिटा देती हैं।  जब मैं कहानी शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ तो मेरा कहनाम न तो संस्मरण से है और न ही उन ऐतिहासिक व्यक्तियों या घटनाओं से जो महाकाव्य और अतिशयोक्ति बन देवताओं और देवियों को अमरत्त्व और सौन्दर्य प्रदान करते हैं। कहानियाँ घटनाओं की निर्जीव समुच्चय नहीं, उनकी जीवित देह होती हैं जिसमें रक्त के स्थान पर अमृत बहता है और साँसों के स्थान पर शाश्वत भावनायें। कहानियाँ सबकी होती हैं और किसी की भी नहीं! मूर्खता वश ही सही या सही कहें तो उत्सुकता भर मैं प्राय: स्वयं से पूछता रहा हूँ कि पहली कहानी किसने रची होगी? यह प्रश्न अपने आप में एक कथ्थक की प्रस्तावना है, उस कथ्थक की जो कहते हुये थकता नहीं।

अपने सृजन में एक कहानी नितांत वैयक्तिक होती है लेकिन ओठ से मुक्त होते ही या यूँ कहें कि मन में उठान पाते ही सबकी हो जाती है, कह जो दी जाती है! यह वह चादर होती है जिसे किसी ठिठुरती रात में समय को उसका सही स्थान बताने और पीड़ा को विश्राम देने के लिये कोई माँ बच्चों के साथ ओढ़ती है और ऊषा की ऊष्मा छिटकते ही पंछियों के साथ आकाश की और छोड़ देती है कि जाओ, पूस की रातों से कुछ बच्चों को बचाओ! कड़कती धूप भरे दिन में दुपहरिया छुट्टी की छाँव होती है कहानी। तब जब कि श्रम सीकर सूखते हैं और भीतर की उमस थकान से बातें करती है कि देखो न! हाथों की झुर्रियाँ रेखाओं से उलझ नियति की लेखनी बन गई हैं, तो ऊँघते सपनों के नीरस भोजपृष्ठ रंगीन होने लगते हैं, काले, नीले, लाल, पीले। थके प्रकाश वाली साँझ को जब गमछा चिंताओं को खोलता बिछता है तो ओठ पर वे रंग सजने लगते हैं जिन्हें उकेरना किसी के वश का नहीं, कथ्थक के भी नहीं। कहानियाँ अनकही कहन होती हैं, कह भर देने से अपराधबोध टूटता है कि अब तक क्या जिये और एक नया दिन सामने आ खड़ा होता है, चलो, जीने को समय की किल्लत कभी नहीं!

कहानियाँ अच्छी या बुरी नहीं, बस होती हैं, वैसे ही जैसे रामसिंह किसान होता है और उसके बैल होते हैं। वैसे ही जैसे सचिव मीरा और उसकी कोई बॉस होती है, वैसे ही जैसे किसी भाष्कर की कोई लीलावती होती है। इन सबकी तरह ही मुझे आज तक कोई भी अच्छी या बुरी कहानी नहीं मिली। अनजान, पास होते हुये भी किसी दूसरे लोक सम दूर जन में अच्छा क्या, बुरा क्या? पहचान भरा अचीन्हापन कहानियों को शाश्वत बनाता है। भीतर का सारा दुःख सुख हम उनमें उड़ेल उन्हें शून्य पी एच का बना देते हैं। उसके बाद कोई अच्छाई, कोई बुराई हमें भिगोती सताती नहीं। एकदम सहज भराव के साथ हम प्रारम्भ करते हैं – एक अच्छी परी थी और एक बुरा राक्षस... विश्वास करो, कहानियाँ अपने आप में अच्छी बुरी नहीं होतीं, वे प्रार्थना भरी होती हैं। मनुष्य की पहली ऋचा ‘अग्निमीळे’ से नहीं, उससे पहले, बहुत पहले ‘एक’ से प्रारम्भ हुई – एक था बच्चा, एक थी गइया... आश्चर्य नहीं कि मनुष्य की सबसे विवादास्पद खोज ईश्वर भी ‘एक’ ही है!

प्राणवायु के पश्चात जो सबसे आवश्यक उपादान है वह कहानी है। मनुष्य भूखे प्यासे रह सकता है लेकिन कहानी के बिना नहीं। यह कथन बहुत विचित्र गल्प सा लग सकता है लेकिन इस पर ध्यान देने से कि बात मनुष्य की हो रही है, स्पष्ट होने लगता है। क्षुधा और तृप्ति के बीच जो कुछ भी घटित होता है वह कहानी नहीं तो और क्या है? वायुमंडल का प्रदूषण यदि अब भी पराजित है तो वह इसलिये कि उसमें अरबो खरबो वर्षों की कहानियाँ घुली हुई हैं। कहानियाँ न मरती हैं और न हमें मरने देती हैं। अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है कि हम जब तक जीते रहेंगे, कहानियाँ कहते रहेंगे और जब तक कहानियाँ घटती रहेंगी, हम जीते रहेंगे। तुम कहोगी कि ऐसे तो प्रलय कभी होगा ही नहीं? जी, प्रलय जैसा कुछ होता ही नहीं। लय भर होता है। उसमें अनकही कहानियों के आवर्त होते हैं, आवर्त से अनुनाद और अनुनाद राग भर किसी स्तनाग्र से दुग्ध धार फूट पड़ती है। मनुष्य के बच्चे पहली रुलाई रोने लगते हैं – केहाँ, केहाँ ...

... ठहरो, ठहरो! तुम्हारी बात में दोष है, उलट पलट है।

धुत्त! तुम इस समय ‘व्यस्त’ हो इसलिये ऐसा कह रही हो। आज छुट्टी के समय किसी छाँव में बैठ विराम लेना, तुम्हें पहली कहानी सुनाई देगी, एक था मनु, एक थी शतरूपा और एक थी इड़ा। उस समय कान में कहते समीर से कहना - ठहरो, ठहरो! तुम्हारी बात में दोष है, उलट पलट है। वह हँसेगा, खूब हँसेगा। तुम भी मुस्कुरा नहीं दी तो कहना ...        

5 टिप्‍पणियां:

  1. निस्सार में सार निकालने, व्यर्थ में से अर्थ निकालने, उलझतते को सुलझाने की कला है कहानी। अच्छी कहानी उस उलझट्टे को पूरा सुलझाए बिना इतना सरल कर देने की कला है कि पाठक खुद सुलझा सके। सर्वश्रेष्ठ कहानी ऐसा उलझट्टा प्रदान करने की कला है जिसे पाठक जितनी बार चाहे नए तरीके से सुलझा सके। मैं भी किसे बताने लगा, अरे पाठक तो यहाँ भी हैं, उन्हीं को।

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  2. " पहचान भरा अचीन्हापन कहानियों को शाश्वत बनाता है। "

    वाह!
    सारगर्भित आलेख!

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  3. आप जहाँ जीते हैं वहाँ इन्द्रधनुष में कितने रंग होते हैं?

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  4. "माँ बच्चों के साथ ओढ़ती है और ऊषा की ऊष्मा छिटकते ही पंछियों के साथ आकाश की और छोड़ देती है कि जाओ, पूस की रातों से कुछ बच्चों को बचाओ! कड़कती धूप".......कहानी की कविता में परिभाषा......

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  5. गिरिजेश जी,
    नमस्कार!!
    आपका ब्लॉग (http://girijeshrao.blogspot.in) देखा । आपको हिंदी के एक सशक्त मंच के सृजन एवं कुशल संचालन हेतु बहुत-बहुत बधाई !!!
    इन्टरनेट पर अभी भी कृषि से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ अंग्रेज़ी भाषा में ही हैं । जिसके कारण आम हिंदीभाषी लोग इनसे जुड़े संदेशों या बातों जिनसे उनके जीवन में वास्तव में बदलाव हो सकता है, से वंचित रह जाते हैं । ऐसे हिन्दीभाषी यूजर्स के लिए ही हम आपके अमूल्य सहयोग की अपेक्षा रखते हैं । इस संबंध में आपसे विस्तार से बात करने हेतु आपसे निवेदन है की आप हमसे अपना कोई कांटैक्ट नंबर शेयर करें ताकि आपके रचना प्रकाशन से संबन्धित कुछ अन्य लाभ या जानकारी भी हम आपसे साझा कर सकें ।

    उम्मीद है हमारी इस छोटी सी कोशिश में आप हमारा साथ अवश्य देंगे ।
    आपके उत्तर की प्रतीक्षा है ...

    धन्यवाद,
    संजना पाण्डेय
    शब्दनगरी संगठन
    फोन : 0512-6795382


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