रविवार, 1 नवंबर 2015

बँटवारे के खिलाफ

सीजन शुरू नहीं हुआ था। छोटी लाइन के उस पार पंजाब चीनी मिल की ऊँची चिमनी से वह सम्मोहक धुँआ नहीं निकल रहा था जो स्कूल पर राख बिखेर हमारे श्वेतवसन साँझ तक काले कर देता था। इसके बावजूद उसके ऊपर की छतरी मुझे बहुत कलात्मक लगती थी।  फैक्ट्री में आग नहीं थी लेकिन 'हिन्दू' इन्दिरा की हत्या से उपजी घृणा हम जैसे मासूमों के भी भीतर सुलग रही थी। बाज़ार सहित तीनों प्रमुख चौराहे अफवाहों से गर्म थे।

घृणा के बाद भी मुझे मिल के क़्वार्टर में रहने वाले हैप्पी बन्धुओं के बारे में चिंता थी। विद्यालय के शिविर आयोजन की रात जब वे दोनों गाते, मुझे पंजाबी शब्द ठीक ठीक याद नहीं - परमै पिताजी तन कुर्बाणी, देश को .... तो रोंगटे खड़े हो जाते, लगता कि गुर गोविन्द सिंह के दोनों लाल गा रहे हैं!

सरदारों की दुकानों के लूटे जाने की खबरें आने लगीं और यह भी कि केश दाढ़ी कट रहे थे। आँखों को पढ़ने में तब भी सक्षम था। सूचना देने वालों की आँखों की नफरत आज भी भीतर कहीं गजबजा रही है - उन मेहनती सरदारों की समृद्धि से जलते देसवालियों की कुंठा ने अलग रूप ले लिया था। पिताजी बेचैन थे, इन्दिरा की हत्या से उन्हें भी बहुत दुख था लेकिन उससे भी गहरे कुछ था जो उन्हें असहज किये हुये था - जो हो रहा है, ठीक नहीं है। क़स्बे की नेकनियती पर उन्हें भरोसा भी था, लूट पाट के अलावा कुछ और नहीं हो सकता! पंजाब मिल किसानों को रोटी देता है... ।

शाम को हमलोग साथ ही तरकारी खरीदने गये। लौटना गोश्तमंडी से ही होता था। कुछ सुन कर पिताजी ठिठक गये। कसाई अपनी वीरता सुना रहा था - बड़ी मरली हँई सरऊ सरदारा के। उस गन्दे दुर्गन्धित स्थान पर ठीहे के पास ही झोले में लूट के नये सामान दिख रहे थे। श्रोताओं में लगभग सभी हिन्दू ही थे जिनकी आँखों में हसरतें मचल रही थीं।  मैं उनमें प्रशंसा भाव भी देख सन्न था।
घर पहुँचने पर पिताजी दुआर पड़ी खटिया पर घस्स से बैठ गये। उनकी बुदबुदाहट में मैं बस यही सुन पाया - बँटवारा।
उस रात उन्हों ने भोजन नहीं किया। हम सबने समझा कि इन्दिरा जी की हत्या से दुखी हैं, जनता लहर में भी गाँव के विरुद्ध जा कर कांग्रेस को वोट देने वाले एकमात्र मतदाता जो थे! 
 
इतने वर्षों के पश्चात आज उनका एकरतिया अनशन समझ पा रहा हूँ - वह बँटवारे के खिलाफ था।

6 टिप्‍पणियां:

  1. उस नरसंहार ने हिंदुओं के रक्षा सूत्र को तोड़ दिया। पता नहीं इसकी भरपाई कब तक हो पाएगी। :(

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  2. देवेन्द्र पाण्डेयरविवार, 1 नवंबर 2015 को 11:25:00 am IST

    मार्मिक संस्मरण। जमीन बंटने से पहले दिल टूटते हैं।

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  3. सेकुलर तो कभी थे ही नहीं आप, अब इस पोस्ट के बाद से घोर कम्युनल जाने जाएंगे!

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  4. रामकोला के पंजाब मिल में हमारे साथ पढने वाले अनेक जूड़ा धारी मित्र रहते थे। जुलाई -८४ में मैं रामकोला छोड़कर सोहसा मठिया चला गया था। ३१ अक्तूबर के बाद रामकोला से आने वाली खबरों ने मुझे भी बहुत व्यथित किया था। अपने दोस्तों का हाल चाल लेने भी आया था मैं।

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