सोमवार, 5 सितंबर 2016

देवी कौशल्या का स्वस्तिवाचन

वनयात्रा के पूर्व कौशल्या देवी का पुत्र श्रीराम के लिए स्वस्तिवाचन: 
(वाल्मीकीय रामायण, अयोध्याकाण्ड, 25) 
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(1) सताम् क्रमे - तुम सत्पुरुषों के मार्ग पर स्थिर रहो।
(2) धर्मं तव प्रीत्या च नियमेन .... त्वामभिरक्षतु - जो धर्म तुम्हें इतना प्रिय है, जिसका नियमपूर्वक प्रसन्नता के साथ पालन करते हो, वह तुम्हारी रक्षा करे।
(3) महर्षियों के साथ देवायतनों के पूज्य देव तुम्हारी वन में रक्षा करें।
(4) तुम सद्गुणों से प्रकाशित हो, विश्वामित्र के दिये अस्त्र तुम्हारी रक्षा करें।
(5) माता पिता की सेवा के पुण्य और सत्य पालन से सुरक्षित हो तुम चिरंजीवी बने रहो।
(6) समिधा, कुश, पवित्री, वेदियाँ, मंदिर, देवपूजन स्थान, पर्वत, वृक्ष, क्षुप्र, जलाशय, पक्षी, सर्प और सिंह वन में तुम्हारी रक्षा करें।
(7) साध्य, विश्वेदेव, मरुत, धाता, विधाता मंगलकारी हों। पूषा, भग और अर्यमा तुम्हारा कल्याण करें।
(8) लोकपाल, वसुप्रमुख, ऋतुयें, महीने, संवत्सर, रात, दिन, मुहूर्त तुम्हारा मंगल करें। श्रुति, स्मृति और धर्म तुम्हारी रक्षा करें।
(9) मेरी स्तुति से प्रसन्न दिक्पाल, दिशाएँ और सिद्ध जन वन में तुम्हारी रक्षा करें।
(10) शैल, समुद्र, राजा वरुण, द्यौ, अंतरिक्ष, पृथ्वी, वायु, चराचर, नक्षत्र, ग्रहों के साथ देवता, अहोरात्र, संध्या वन में तुम्हारी रक्षा करें।
(11) कला, काष्ठा और दिशाएँ तुम्हें कल्याण प्रदान करें।
(12) देवता और दैत्य सुखदायी हों।
(13) राक्षस, पिशाच और मांसभक्षियों से तुम्हें कभी भय न हो।
(14) प्लवग, बिच्छू, डांस, मच्छर, पहाड़ी सर्प, सरीसृप, कीड़े फतिंगे तुम्हारे लिए हिंसक न हों।
(15) हाथी, सिंह, बाघ, ऋक्ष, महिष, सींग वाले जन्तु, रौद्र प्राणी तुमसे द्रोह न करें।
(16) मेरे द्वारा यहाँ संपूजित सबसे भयंकर नरमांसभोजी प्राणी वन में तुमसे हिंसा न करें।
(17) मार्ग मंगलकारी हों, पराक्रम सफल हों, संपत्तियाँ प्राप्त हों और तुम सकुशल यात्रा पूर्ण करो।
(18) पुन: पुन: आकाशचारी जीवों, भूतल के प्राणियों, देवताओं से और जो तुम्हारे शत्रु हैं उनसे भी तुम्हें कल्याण प्राप्ति होती रहे।
(19) मेरे द्वारा यहाँ पूजित हो शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर और यम दण्डकारण्य में तुम्हारी रक्षा करें।
(20) स्नान और आचमन के समय अग्नि, वायु, धूम और ऋषियों के मुख से निकले मंत्र तुम्हारी रक्षा करें।
(21) ब्रह्मा, परम ब्रह्म, बचे रह गए जो भी देवता हैं, वनवास में तुम्हारी रक्षा करें।
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वृत्र का नाश करने हेतु इन्द्र को जो आशीर्वाद प्राप्त हुआ था वह तुम्हें प्राप्त हो।
विनता ने अमृत लाने के इच्छुक अपने पुत्र के लिए जो मंगलकृत्य किए थे, वे तुम्हें प्राप्त हों।
अमृत उत्पत्ति के समय दैत्यों के विनाश के लिए वज्रधारी को जो आशीर्वाद माता अदिति ने दिये थे, वे तुम्हें प्राप्त हों।
त्रिविक्रम विष्णु के लिए जो मंगलाशंसा की गई, वह तुम्हें प्राप्त हो।
ऋषि, सागर, द्वीप, वेद, लोक, दिशाएँ तुम्हें मंगल प्रदान करें।
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पूर्णकाम हो रोगरहित जब अयोध्या लौटोगे तो तुम्हें राजमार्ग पर देख मैं सुखी होऊंगी।
दु:खपूर्ण संकल्प मिट जाएँगे, मुख पर हर्ष होगा और मैं तुम्हें पूरन के चंद्र सा देखूंगी।
पिता की प्रतिज्ञा को पूर्ण कर जब सिंहासन पर बैठोगे तो मैं पुन: तुम्हारा प्रसन्नता पूर्वक दर्शन करूंगी।
तुम सदा मेरी बहू सीता की समस्त कामनाएँ पूरी करते रहना।
मैंने जिन्हें सदा पूजा और सम्मान दिया वे शिवादि देवगण, महर्षि, भूतगण, देवोपम, नाग और दिशाएँ चिर काल तक वन में तुम्हारे हित साधन की कामना करते रहें। 

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सोचता हूँ क्या रह गया? माँ से क्या बच गया?? विदुषी पर अथर्वण परंपरा का प्रभाव स्पष्ट है और साथ ही सामान्य माता का ममत्त्व भी उफान पर है।
वर्षा के समय वन में भीगते राम, सीता और लक्ष्मण के प्रति माता के भावों का जो चित्रण लोक गीतों में मिलता है, एक राजरानी क्षत्राणी के ओज से निखरा वह यहाँ भी उपलब्ध है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. यह पोस्ट और आगे आने वाली श्रृंखला पर कमेन्ट करने की योग्यता नहीं है मेरी. उपस्थिति अंकित करने हेतु यह कमेन्ट कर रहा हूँ और सीख रहा हूँ.

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