सोमवार, 5 दिसंबर 2016

रामायण : अतिथि का आश्वासन

विराध वध के पश्चात श्रीराम ने सीता जी को हृदय से लगा कर आश्वस्त किया - परिष्वज्य समाश्वास्य और लक्ष्मण से कहा कि यह वन दुर्गम कष्ट भरा है और हम लोग भी अभ्यस्त वनचारी नहीं हैं, शीघ्र ही तपोधन शरभङ्ग के पास पहुँचना होगा।
कष्टम् वनम् इदम् दुर्गम् न च स्मो वन गोचराः
अभिगच्छामहे शीघ्रम् शरभङ्गम् तपो धनम्

अरण्यकाण्ड को पढ़ेंगे तो साफ लगेगा कि जैसे किसी योजना के अंतर्गत राम कड़ी से कड़ी जोड़ते बढ़ रहे हैं! शरभङ्ग के यहाँ पहुँचने से पहले ही दूर से दिव्य इन्द्र समस्त देवताओं के साथ दिखते हैं। विचित्र घटित होता है, इन्द्र खिसक लेते हैं!
इह उपयाति असौ रामो यावन् माम् न अभिभाषते
निष्ठाम् नयत तावत् तु ततो मा द्रष्टुम् अर्हति
जितवन्तम् कृतार्थम् हि तदा अहम् अचिराद् इमम्
कर्म हि अनेन कर्तव्यम् महत् अन्यैः सुदुष्करम्
 देखो, राम आ रहे हैं। इससे पहले कि वह मुझसे संवादित हों उन्हें आप उनके कर्तव्य की ओर प्रेरित करें। उनके ऊपर एक दुष्कर और महान कार्य का दायित्त्व है, जब पूरा कर लेंगे तब मैं उनसे मिलूँगा।
राम शरभङ्ग से पूछते हैं - शक्र अर्थात इन्द्र के आने का क्या प्रयोजन था? शरभङ्ग उत्तर देते हैं - मुझे मेरा तपस्या का फल दे ब्रह्मलोक ले जाने के लिये आये थे लेकिन मैंने आप का आगमन जान स्थगित कर दिया कि बिना आप जैसे 'प्रिय अतिथि' के दर्शन के मैं प्रस्थान नहीं करूँगा!
 इसके पश्चात वह घटता है जिसे फल समर्पण कहा गया। जिसे लोक में ऐसे कहते हैं कि देवता आराधक द्वारा पुष्ट होते हैं। जिसे आधुनिक समझ से यह कहा जाता है - मनुष्य ईश्वर का विधाता है। आप के देव की शक्ति आप की शक्ति के अनुक्रमानुपाती होती हैशरभङ्ग कहते हैं:
अक्षया नरशार्दूल जिता लोका मया शुभा:
ब्राह्मयाः च नाक पृष्ठ्याः च प्रतिगृह्णीष्व मामकान्
हे पुरुषसिंह! मैंने अक्षय और शुभ लोक जीत लिये हैं। वे ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक (नाक - हाथी, पृष्ठ - पीठ अर्थात उसका लोक जो हाथी की पीठ पर बैठता है अर्थात इन्द्र का स्वर्ग लोक) मुझसे आप स्वीकृत करें।
रामकथा दर्शाती है कि कैसे विश्वामित्र, जामदग्नेय राम, अगस्त्य, शरभङ्ग आदि उस युग के बुद्धिजीवियों ने अपने समस्त तप का अर्पण मानवता के योद्धा श्रीराम को कर दिया था। सभी भौतिक योद्धा नहीं होते, बहुत बड़ी पात्रता चाहिये होती है किंतु योद्धा पहचान में आ गया तो उसे बली तो कर ही सकते हैं, उसे उत्प्रेरित कर सकते हैं और मनस्वी तो तैयार भी कर सकते हैं। इस युग के बुद्धिजीवी कहाँ लिप्त हैं, ध्यान दीजिये, समझ में आ जायेगा कि समस्या की जड़ कहाँ है!
 राम विचित्र उत्तर देते हैं:
अहम् एव आहरिष्यामि सर्वान् लोकान् महामुने
आवासम् तु अहम् इच्छामि प्रदिष्टम् इह कानने

महामुनि! मैं ही आप को उन सभी लोकों की प्राप्ति कराऊँगा या महामुनि! केवल मैं ही उन लोकों को ग्रहण करूँगा लेकिन अभी तो इस कानन में आवास निर्माण करना है, मुझे निर्दिष्ट कीजिये।
वह सब तो ठीक है लेकिन हमलोग रहें कहाँ, यह तो बताइये? शरभङ्ग क्या करते हैं? राम को सुतीक्ष्ण मुनि की राह बता हैं जैसे कोई अनूठी छड़ी दौड़ हो, धावक एक, कई ठाँव। दौड़ो राम!
तत्पश्चात कहते हैं - मुहुर्त भर, दो घड़ी मुझे देखो राम! जब तक कि मैं इस जीर्ण देह का त्याग न कर लूँ!

 मुनि अग्नि की स्थापना कर अग्नि में प्रवेश कर गये। वाल्मीकि जी ने लिखा - समाधाय हुत्वा मंत्रवत। देह नहीं समिधा है, जैसे मंत्र पढ़ कर  हवन कर दी गयी हो।  कितनी गहरी प्रतीक्षा रही होगी, कितनी पीड़ा, कितने कष्टों और अत्याचारों को सहते शरभङ्ग तपे होंगे कि अवतार को उसकी प्रतिज्ञा के प्रति सुदृढ़ करने के लिये आत्मदाह से अधिक कोई युक्ति सूझी ही नहीं!
इस अग्निमय प्रस्तावना के साथ राम की दीक्षा का पाठ प्रारम्भ होता है, रक्षा हेतु प्रार्थना के बहाने राम से आश्वासन ले लिया जाता है:
मेsयं वने वासो भविष्यतो महाफल:,
तपस्विनां रणे शत्रुन् हंतुमिच्छामि राक्षसान्
(निशिचर हीन करौं मही)।

कितने प्रकार के तपस्वियों ने यह आश्वासन लिया?
वैखानसा वालखिल्याः संप्रक्षाला मरीचिपाः
अश्म कुट्टाः च बहवः पत्र आहाराः च तापसाः
दन्त उलूखलिनः च एव तथा एव उन्मज्जकाः परे
गात्र शय्या अशय्याः च तथा एव अनवकाशिकाः
मुनयः सलिल आहारा वायु भक्षाः तथा अपरे
आकाश निलयाः च एव तथा स्थण्डिल शायिनः
तथा ऊर्ध्व वासिनः दान्ताः तथा आर्द्र पट वाससः
स जपाः च तपो नित्याः तथा पंच तपोऽन्विताः
जैसे वाल्मीकि वनस्पतियों को बताते हैं, जैसे ऋतुवर्णन में वर्णन की झड़ी लगा देते हैं वैसे ही इन श्लोकों में जितने तरह के तापस हो सकते हैं, समेट दिये हैं - वैदिक वैखानस और वालखिल्य, अगले समय के आहार के लिये कुछ भी सहेज कर न रखने वाले, सूर्य किरणों का पान करने वाले, अन्न को बस पत्थर से कूट खा जीने वाले, पत्ते खा कर रहने वाले, दाँतों से ही ऊखल का काम लेने वाले अर्थात बिना कूटे ही अन्न ग्रहण करने वाले, कंठ तक पानी में निमग्न रह तप करने वाले, देह को ही बिछौना मानने वाले अर्थात धरा पर बिना आभरण के सोने वाले, बिना शय्या के रहने वाले अर्थात न सोने वाले, सत्कर्म में निरंतर लगे रह कभी अवकाश न लेने वाले, जल पीकर रहने वाले, वायु पी कर रहने वाले, आकाश के नीचे खुले में विचरने वाले, वेदी पर सोने वाले, पर्वतों पर रमने वाले, सदा भीगे वस्त्र धारण करने वाले, जपी, नित्य तपी और पंचाग्नि अर्थात चार ओर से अग्नि और ऊपर से धूप का सेवन करने वाले।

... ऋग्वेद में भी ढेर सारे भिन्न चर्या वालों के उल्लेख हैं। मतभिन्नता के साथ साहचर्य यहाँ की विशेषता रही है। चूँकि लेखन, काव्य और श्रुति परम्परा सबके पास नहीं थी या सभी उस ओर ध्यान भी नहीं देते थे इसलिये भिन्न धारा द्वारा वर्णन में सूचना का अभाव साफ दिखता है। नाम गिना कर काम चला लिया जाता है। ध्यान से देखें तो इनमें चेतना और कर्म की भिन्न भिन्न स्थितियों के संकेत भी मिलते हैं।
यह धारा अक्षुण्ण चली आ रही है। उपनिषदों ने वर्णित किया, बुद्ध ने बताया, जैनियों ने जिया, अलक्षेन्द्र को भी बैखानस तापस मिले, गुप्त काल, वर्धन काल, राजपूत काल ...
... हर काल में यह प्रवाहित है और उसके साथ यह आदर्श भी कि इनकी और प्रजा की रक्षा क्षात्र धर्म है।

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