शनिवार, 28 जनवरी 2017

रानी पद्मिनी, पद्मावत और रामचरितमानस

वैचारिक और सांस्कृतिक प्रभुत्त्व योजनायें बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर काम करती हैं। केन्द्र में रहना महत्त्वपूर्ण होता है और बहुत बार पक्ष और विपक्ष दोनों एक ही होते हैं। काल की गति को नये आयाम देने वाले यह खूब समझते हैं और तदनुसार कार्य करते हैं।
 मलिक मुहम्मद जायसी अवधी सूफी कवि था जिसने 'पद्मावत' की रचना 1597 वि. में की। वह समय सूरों के राजनीतिक प्रभुत्त्व का था लेकिन मुग़ल चुप नहीं बैठे थे। राजनैतिक स्तर पर इस्लाम और इस्लाम आमने सामने थे। सांस्कृतिक स्तर पर सूफियों के माध्यम से इस्लाम का जय अभियान चरम पर था। जायसी ने अपने महाकाव्य के लिये ऐसा कथानक चुना जिसके मूल में हिन्दुत्त्व का वह सत्त्व था जिसने आक्रांताओं की लिप्सा के आगे ढाल की तरह काम किया था। 'सती' स्त्री और उसके सम्मान के लिये मर मिटने वाले 'पुरुष'। यह एक ऐसा आदर्श था जो अपने आप में अनूठा है। 
 सतीत्त्व की प्रशंसा और महिमामण्डन के साथ ही भाषा काव्य के माध्यम से आम जन के मन में इस्लाम के छद्म रूप की पैठ बनाने के अपने प्रयास में उसने वही किया जिसकी नींव अमीर खुसरो ने डाली थी। लोकछन्द दोहा और चौपाई में सांगीतिक काव्य के माध्यम से उसने पद्मावती की यश गाथा का वर्णन किया लेकिन अपने इस्लाम को नहीं भूला जिसका आभासी रूप निखार कर उसकी सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्यता सुनिश्चित करनी थी - होंगे चित्तौड़ के रणबाँकुरे वीर बहादुर, सहस्रों सुलक्षणा और सुमतिशील नारियों सहित होंगी नागमती और पद्मावती जैसी जौहर आत्मायें किंतु हिन्दुओं! यह सब होने पर भी, तुम्हारा पराभव हुआ और होना ही है। 
 हिन्दू सनातनी प्रतिरोध के रूप में चित्तौड़ की प्रतिष्ठा समूचे उत्तर में थी। सुदूर पूरब में वहाँ की भाषा में जायसी ने जब लिखा कि 'बादसाह गढ़ चूरा, चितउर भा इसलाम' तो उसने भली भाँति अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया। 

गीत, संगीत, काव्य सुमधुर होंगे, कर्णप्रिय होंगे, अभिनय उत्कृष्ट होगा, सेट उत्तम होंगे किंतु इनके साथ छिपे विष अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। नये भारत में जब 'मुग़ल-ए-आज़म' के समांतर 'अनारकली' बनायी जाती है तो बात वही होती है - 'पक्ष विपक्ष दोनों हम होंगे, हम ही केन्द्र में होंगे। विषय हमारा होगा क्यों कि हमारा सांस्कृतिक प्रभुत्त्व है।' स्पर्धा में 'नल दमयंती' पर फिल्म नहीं बनी न? 

उस समय से वे अब यहाँ तक पहुँच चुके हैं जहाँ सांस्कृतिक पराभव पूर्ण है और कलात्मक छूट के नाम पर कुत्सा स्वीकार्य हो चली है। ये नये समय के सूफी हैं। उनका विषय चयन ही बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। 
 प्रश्न यह है कि समाधान क्या हो? समाधान भी भारत के इतिहास में ही है। पद्मावत के मात्र 36 वर्ष पश्चात ही उसी अवध क्षेत्र के एक अकिञ्चन कवि ने पुरुषार्थ प्रतीक महाबली मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और परम सती प्रात: स्मरणीया भगवती सीता की गाथा को उसी भाषा अवधी और उन्हीं दोहा चौपाई छन्दों में ऐसा उकेरा कि वह कृति जन जन की मानस हो गई। जायसी के मधु-विष का मधु-अमृत से उपचार करता रामबोला एक पग आगे बढ़ गया। जायसी गाँव गाँव अपना काव्य सुनाता था लेकिन रामबोला तुलसीदास ने तो पूरी काशी को रामलीला का क्षेत्र बना दिया! 
 नाट्य और मंचन तब के सिनेमा थे, जन जन का मनोरञ्जन करते थे। तुलसी ने उनका प्रयोग कर सूफियाने को पटकनी दे दी। आज पद्मावत केवल अकादमिक स्तर पर पढ़ी जा रही है जब कि रामचरितमानस जन जन की कण्ठहार है। 

सामान्य जनता को तो मनोरञ्जन चाहिये, वह तो दंगल या रईस देखने जायेगी ही। करना प्रबुद्ध जन को है कि केन्द्र में उसे ले आयें जो वरेण्य है जो विष का एण्टीडोट ही नहीं, उसका नाशक भी है। जनता अपनायेगी। यक्ष प्रश्न यही है कि सूफी भंसाली के समान्तर सनातन समृद्धि क्यों नहीं खड़ी हो पा रही? किसने रोका है पटकथा लिखने से? किसने रोका है प्रचुर धन लगा कर समान्तर चित्तौड़ महागाथा को सेल्युलाइड पर उतारने से? 

 प्रश्न यह है कि आज तक विराट भव्यता के साथ सनातन गौरव विषय सेल्युलाइड पर क्यों नहीं उतारे जा सके? क्या मुग़ल समय से भी स्थिति बुरी है?
 रूदन छोड़ उठिये, कुछ कीजिये। विषाणु तो सर्वदा रहेंगे, आप का आयुर्वेद ज्ञान कहाँ छिपा है? देखना चाहते हैं कि 'मलिक' 'मोहम्मद' ने सती प्रसंग को कैसे रचा है? पढ़िये और सराहिये। सराहने योग्य है लेकिन इसमें छिपे विष का कुछ कीजिये। 


रविवार, 22 जनवरी 2017

चलिये पापा!



बैडमिण्टन कोर्ट पर भीतर सुपुत्र अभ्यासरत हैं और मैं बाहर डूब उतरा रहा हूँ।
 
...प्रशांत गौरी हैं, यही कोई छ: सात में पढ़ती होंगी। एक बार दीठ मिली तो बस समय ठहर गया,”किसने तुम्हारे नयनों में काजल लगाया माँ? तुमने स्वयं? महामाया हो क्या?”
इतने वर्षों के पश्चात जब कि आस तक ओस सी उड़ चुकी थी, इस अचीन्हे से क्षेत्र में ऐसे अवसर तुम मिल जाओगी, कभी नहीं सोचा था। इतने दिन कहाँ थी?
सम्मोहन टूटा है, कहीं कुछ भी नहीं। मन चीत्कार कर उठा है। सूनी आँखों में प्रवेश करते औपचारिक चेहरे सहमा देते हैं, पगलेट हो क्या? माँ क्रीड़ा को गईं! मैं देखता हूँ सभी पर मणिकर्णिका की भस्म पुती है। मङ्गला गौरी सब को लूट गयीं?
न रे, इन्हें तो उनके होने का पता ही नहीं। जिन्हें पता नहीं होता, वे जीते हैं। जिन्हें पता चल जाता है, वे मर जाते हैं। जाने कितने आँसू सूख गये हैं, मैं रहा ही नहीं। शरीर समाप्त हो चला है।
स्वयं को धन्य मान पगले! तब शरीर बचा हुआ था। आज पता चला कि नहीं रहा... 

यह कौन है शिखा और धोती बाँधे? कोई युवा है जो मुझे घूर रहा है। माँ बाहर आ गयीं क्या? मैंने मुँह फेर लिया है, नहीं जानना मुझे जगत बन्धन, तुम्हें क्या पता कि तुम्हारे घर कौन पल रही है? तुम्हारी आँखों पर माया का पट्टर पड़ा है।
“चलिये पापा!” 
मैंने च को छ सुना है।       

रविवार, 1 जनवरी 2017

सबरीमाला, शीत अयनांत, मकर संक्रांति और वाम-इस्लाम-ख्रिस्तान आक्रमण


[सोशल मीडिया पर वर्ष भर पुराने अपने एक लेख की पुनर्प्रस्तुति] 
सबरीमाला (अक्षांश 9.44 उ., देशांतर 77.08 पू., ऊँ.468 मी.), केरल में बचा रह गया हिन्दू आस्था का अंतिम सशक्त केन्द्र, वामी-इस्लामी-इसाई दुरभिसन्धि द्वारा ध्वंस हेतु चिह्नित है। कुछ दिनों पहले एक मित्र केरल गये थे तो उनके एक लेख पर मैंने पूछा था - वहाँ के 54% हिन्दू कहाँ हैं? उत्तर यह है कि apartheid अर्थात जातिभेद के केरलीय संस्करण के शिकार हो दोयम श्रेणी के नागरिक बन चुके हैं। 
हिन्दुओं की जनसंख्या में 20% पिछड़े समुदाय से आने वाले एझावा हैं जिनसे कसाई-इसाई युति के सत्ताधारी इसलिये नाराज हैं कि 'पिछड़े' मोदी के उदय के साथ ही यह वर्ग राजनीतिक निष्ठा बदलने लगा। अस्तु।
 
वहाँ सबरीमाला एकमात्र स्थान है जो वर्ष में एक करोड़ श्रद्धालु आकृष्ट करता है। अन्य कई तीर्थों की तरह यह तीर्थ भी हिन्दू एकता को पुष्ट करने वाला केन्द्र है और इसीलिये अयोध्या-काशी-मथुरा-प्रयाग की तरह ही अब्राहमियों की आँखों में खटकता रहा है। आधुनिक समय में धावा बोल मन्दिर तोड़ा तो नहीं जा सकता (तभी तक जब तक भारत में वे 1:2 अनुपाती अर्थात 33% नहीं हो जाते!) इसलिये पहले से जाँची परखी वामी रीति से कथित कुरीति गढ़ कर आक्रमण की नीति अपनायी गयी।

सबरीमाला ऐरण, उज्जयिनी आदि प्राचीन हिन्दू स्थानों की तरह ही नाक्षत्रिक प्रेक्षण का भी केन्द्र था। कारण थे इसकी स्थिति, अक्षांश और ऊँचाई। हिन्दू धर्म में नाक्षत्रिक घटनाओं को धार्मिक रूपक के साथ सुरक्षित कर दिया जाता है, यहाँ भी वही हुआ।
शीत अयनांत अर्थात 22 दिसम्बर के आसपास प्राची में उष:काल के समय अभिजित (Vega) नक्षत्र उदित होना प्रारम्भ करता जिसका कि उस ऊँचाई से प्रेक्षण आसान होता। मकर संक्रांति तक आते आते एक घटना और होती, हमारे रुद्र देवता (मृगव्याध) अर्थात लुब्धक नक्षत्र (Sirius) ब्रह्ममुहुर्त में पश्चिम में अस्त होते और विष्णु स्वरूप अभिजित नक्षत्र प्राची में उसी समय उदित होते। इन दो का दर्शन 'मकरज्योति' का दर्शन कहा जाता और इस तरह सबरीमाला वैष्णव और शैव दोनों का समन्वय स्थान हो हिन्दू आस्था के विराट केन्द्र के रूप में उभरा।
केरल बहुत पहले से गणित ज्योतिष का केन्द्र रहा है, यहाँ तक कि कुछ विद्वान आर्यभट को भी केरल से जोड़ते हैं क्यों कि ऐसे प्रमाण हैं। जैसा कि शेष भारत में हुआ, सैद्धांतिक ज्योतिष के प्रभाव में हमलोग आकाश निहारना भूलते गये और सबरीमाला में भी मकरज्योति मनुष्यों द्वारा दूर ऊँचे स्थान पर जला कर दिखाई जाने लगी। 2011 में इस पर विवाद भी हुआ था।

अब आते हैं रजस्वला स्त्रियों के इस मन्दिर में प्रवेश प्रतिबन्ध पर। विग्रह स्पर्श की भी बात है। विग्रह स्पर्श के बारे में बता दूँ कि उत्तरभारत पूर्णत: भ्रष्ट हो चुका है। गर्भगृह में प्रवेश और विग्रहस्पर्श केवल सेवक पुजारियों के लिये ही अनुमन्य है क्यों कि विग्रह में देव देवी की 'प्राणप्रतिष्ठा' होती है। विशिष्ट जन के साथ भी व्यवहार और स्पर्श के विधि निषेध हैं तो वे तो देवी देवता हैं! तमिळनाडु के लगभग समस्त मन्दिरों में आप न तो गर्भगृह में प्रवेश कर सकते हैं और न ही प्रतिमा का स्पर्श। उत्तर में इस्लामी अत्याचार और भक्तिधारा के प्रभाव में सख्य भाव ने अपना स्थान बनाया, बड़े मन्दिर नष्ट कर दिये गये, नयों में वह धाक नहीं रही, परम्परा तनु हुई - अनेक कारण हैं। शास्त्र यही कहते हैं कि गर्भगृह में जाना नहीं, प्रतिमा छूना नहीं! 'गर्भ' गोपन होता है, है कि नहीं?

रजस्वला निषेध पर एक बात घूम रही है जिसका सम्बन्ध शाक्त-तांत्रिक मत से है। दूर असम के कामाख्या मन्दिर में वर्ष में एक बार देवी भी पाँच दिनों के लिये रजस्वला होती हैं जो कि साधना और विधि निषेधों का चरम होता है। रज:स्राव जननी की उस शक्ति का प्रत्यक्ष संकेत है जिससे वह नवसृजन करती है। उस समय स्त्री साक्षात देवी होती है। सबरीमाला पर शाक्त मत का भी प्रभाव है। सबसे बड़ी बात यह कि आज भी यदि आप उन दिनों में किसी स्त्री से किसी सामान्य से मन्दिर में भी जाने की बात कहेंगे तो वह भरसक नहीं जाना चाहेगी जिसके कई कारण हैं। प्रश्न यह है कि जो न्यायी और जो कथित प्रगतिशील इसे संवैधानिक अधिकार से जोड़ देख रहे हैं उन्हें अब्राहमी पंथों का ढपोरपना क्यों नहीं दिखता? गिनाऊँ क्या?

नेपथ्य में स्त्री अधिकार नहीं, धर्मपरिवर्तन करा केरल को दारुल इस्लाम या मसीही प्रांत बनाने की राह में जो आखिरी पहाड़ खड़ा है उसे कैसे ध्वस्त किया जाय, यह षड़यंत्र काम कर रहा है। सबरीमाला में यदि शाक्त प्रभाव के कारण निषेध हैं तो क्या और मन्दिर नहीं हैं? उनके द्वार तो सबके लिये खुले हैं, हैं कि नहीं? कथित प्रगतिशीलों के आक्रमण को समझने की आवश्यकता है, अनावश्यक रूप से सुरक्षात्मक हो अल्ल बल्ल बकने की नहीं!