रविवार, 6 मई 2018

महाभारत : द्रौपदी स्वयम्वर एवं विवाह - 1

[हिडिम्बा प्रकरण से आगे] 
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बहुधा आख्यानों में विचित्र यौन सम्‍बंधों के वर्णन मिलते हैं। मनुष्य का पक्षी से, किसी मृग से आदि आदि। ऐसे प्रकरणों को गल्प कह कर निरस्त भी कर दिया जाता है किन्‍तु ऐसा करना भूसे के साथ साथ चावल फेंक देने भाँति ही होता है। इन प्रकरणों में आप बहुधा या तो किसी ऋषि को पायेंगे या प्रतापी राजा को। कृषि सभ्यता स्थापित होने पर भी समान्‍तर समाज बने रहे। दुर्गम वन एवं पर्वत प्रान्‍तरों के कारण एक दूसरे से कटे अपने आप में विकसित पल्लवित होते रहे। वेदों में नवग्व एवं दशग्व के उल्लेख मिलते हैं। एक अनुमान यह भी है कि ये वे ऋषि थे जो वर्षा के दो या तीन कठिन माह तज शेष समय भौतिक उपादानों, नयी सम्भावनाओं, समाजों इत्यादि के अनुसन्‍धान में निरन्‍तर भ्रमणशील रहते थे। प्रतापी राजा भी कृषि योग्य भूमि विस्तार एवं राज्य में कराधान की वृद्धि के उद्देश्य से जन विस्तार हेतु दुर्गम क्षेत्रों में कभी नितान्‍त अकेले, कभी सेना के साथ अभियान के दुस्साहस किया करते थे। ऐसे में नये समाजों के साथ उनके साक्षात्कार होते रहते थे। समायोजन हेतु किये गये अनूठे उद्योग कवियों की वाणी में अद्भुत रससिक्त हो अतिशयोक्तियों के माध्यम से जन सामान्य तक पहुँचते थे।
स्त्री पुरुष आकर्षण, विवाह एवं संयोग भी होते। विविध टोटेम (गण चिह्न) यथा पक्षी, मृगशिर मुकुट, नागचिह्न आदि धारण करने वाले समूहों को कौतुक वश पक्षी, मृग आदि कहा गया। कभी समय की मार के कारण अपने समाज में स्त्री न मिली तो इन समाजों में सम्बन्‍ध कर लिये। ये लोग अनूठे थे क्योंकि नितान्‍त अपरिचित समूह से मैत्री स्थापित करना सरल नहीं होता। अस्तु। 

द्रौपदी स्वयम्वर के पूर्व गंधर्व चित्ररथ से युद्ध का प्रकरण आता है। उसने एक अनूठी बात कही कि आप लोग अग्नि से रहित हैं, आहुति नहीं देते एवं आप के आगे कोई विप्र (पुरोहित) भी नहीं है।मैंने इस कारण ही आप पर आक्रमण किया। 
अनग्नयोऽनाहुतयो न च विप्रपुरस्कृताः
यूयं ततो धर्षिताः स्थ मया पाण्डवनन्दन
पाण्डव स्नातक हो चुके थे अत: वटुक अपेक्षित अग्नि अनुष्ठान नहीं करते थे, अविवाहित थे अत: त्रिविध अग्नि आहुति नहीं करते थे, पुरोहित नहीं थे अत: अन्य कर्म भी नहीं होते थे जोकि राजन्य वर्ग से अपेक्षित थे। यह हिडिम्बा प्रकरण हो जाने के पश्चात की घटना है। यह द्वितीयक प्रमाण है कि भीम एवं हिडिम्‍बा का संयोग विवाह संस्कार के बिना हुआ था। 
गंधर्व ने ही उन्हें अच्छा पुरोहित कैसा हो, यह बताने के लिये वसिष्ठ की कथा सुनाई। उसी की प्रेरणा से पाण्डवों ने धौम्य को पुरोहित बनाने के पश्चात ही पाञ्चाल देश स्वयम्वर में भाग लेने को प्रस्थान किया। 
गंधर्व ने अर्जुन को तपतीनंदन, तापत्य आदि सम्‍बोधनों से पुकारा था। अर्जुन के पूछने पर उसने बताया कि आप के कुल में राजा ऋक्ष के पुत्र संवरण का सूर्यपुत्री तपती से विवाह वसिष्ठ की सहायता से हुआ था, इस कारण आप लोग तापत्य हुये। देखें तो यहाँ ऋषि एवं राजा का सम्मिलित उद्योग सूर्यपूजक समाज की अद्भुत तेजस्विनी रूपवती कन्या के साथ संवरण के विवाह के रूप में फलीभूत होता है। संवरण तो आसक्त थे ही, तपती भी उन पर आसक्त थी किन्‍तु राजा द्वारा गन्‍धर्व विवाह के अनुरोध पर उसने स्पष्ट कहा था कि मेरे पिता जीवित हैं। यह देह मेरी नहीं, उनकी है, आप मुझे उनसे माँग लें। आप जैसे को कौन पिता अपनी पुत्री नहीं देना चाहेगा? 
गंधर्व ने अर्जुन को उनके कुल के विविध नाम बताये - तपती से तापत्य, कुरु से कौरव, पुरु से पौरव, अजमीढ से आजमीढ, भरत से भारत; इतने नामों से आप लोग प्रसिद्ध हैं। 
गन्‍धर्व द्वारा तपती के नाम को महत्व दिये जाने से स्पष्ट है कि कभी वह प्रभावशाली समाज रहा होगा जिसकी स्मृति गंधर्व को थी, गंधर्व भी तो मनुष्य समाज से भिन्न ही माने जाते थे। 

द्रुपद का एक नाम यज्ञसेन था, उनकी पुत्री होने के कारण द्रौपदी याज्ञसेनी भी कहलाई। स्वयंवर में पहुँचने से पूर्व पाण्डवों ने वेदार्थ तत्वज्ञ धौम्य को अपना पुरोहित बनाया जिन्होंने प्रस्थान से पूर्व उनके लिये स्वस्तिवाचन किया। नीलोत्पलसम देह गंध वाली याज्ञसेनी के स्वयंवर में आये विविध राजाओं से दान प्राप्त करने, उत्सव एवं स्वयंवर देखने के लिये ब्राह्मणों का एक दल दक्षिणपञ्चाल जा रहा था, पाण्डव उसके साथ हो लिये। मार्ग में उन्हें कृष्ण द्वैपायन व्यास भी मिले जिनकी आवभगत कर एवं आवश्यक वार्त्तालाप कर पाण्डव उनसे अनुमति ले कर आगे बढ़ गये।
द्रुपद की इच्छा कृष्णा का हाथ किरीटी अर्जुन के हाथ देने की थी। अर्जुन के अन्‍वेषण के उद्देश्य से उन्होंने ऐसा दृढ़ धनुष बनवाया था जिसे कोई अन्य नवा न सके। 
यज्ञसेनस्य कामस्तु पाण्डवाय किरीटिने
कृष्णां दद्यामिति सदा न चैतद्विवृणोति सः
सोऽन्वेषमाणः कौन्तेयान्पाञ्चाल्यो जनमेजय
दृढं धनुरनायम्यं कारयामास भारत
एक कृत्रिम आकाश यंत्र भी बनवाया। उस धनुष एवं दिये गये 5 बाणों के प्रयोग से यंत्र के छिद्र से हो कर लक्ष्यभेद करने वाला विजयी कृष्णा को प्राप्त करने वाला था। स्वयंवर में कौरवों के साथ कर्ण एवं अश्वत्थामा भी पहुँचे थे। कृष्ण समस्त वृष्णि वंश के साथ दर्शक के रूप में पहुँचे थे। कृष्ण ने भस्म से सम्पूर्ण शरीर छिपाये पाण्डवों को बलराम को दिखाया: 
भस्मावृताङ्गानिव हव्यवाहा;न्पार्थान्प्रदध्यौ स यदुप्रवीरः
शशंस रामाय युधिष्ठिरं च; भीमं च जिष्णुं च यमौ च वीरौ
शनैः शनैस्तांश्च निरीक्ष्य रामो; जनार्दनं प्रीतमना ददर्श
राजा लोग धनुष चढ़ाने के प्रयास किये, असफल हो अपने अपने स्थान बैठ गये। 
... 
यहाँ वह क्षेपक प्रसङ्ग है जिसमें कर्ण द्वारा लक्ष्यभेदन हेतु प्रत्यञ्चा चढ़ाना एवं द्रौपदी का यह कहना कि सूतपुत्र का वरण नहीं करूँगी वर्णित है। 
दाक्षिणात्य पाठ में यह प्रसंग नहीं है, नीलकण्ठी पाठ में भी नहीं है एवं निम्नतर आलोचना द्वारा शोधित भण्डारकर पाठ में भी नहीं है। नीलकण्ठी पाठ में उल्लेख है कि कर्ण धनुष पर प्रत्यञ्चा एवं बाण नहीं चढ़ा पाया था।
इस तथ्य की पुष्टि तब हो जाती है जब ब्राह्मणों के दल से अर्जुन संधान को उठते हैं। उस समय ब्राह्मण हर्ष एवं शङ्का से भर परस्पर बात करते हैं कि जिसे कर्ण शल्य समेत लोकप्रसिद्ध बड़े बड़े धनुर्धर नहीं नवा पाये उसे यह दुर्बल दिखता बटुक कैसे साध पायेगा? 
यत्कर्णशल्यप्रमुखैः पार्थिवैर्लोकविश्रुतैः
नानतं बलवद्भिर्हि धनुर्वेदपरायणैः
तत्कथं त्वकृतास्त्रेण प्राणतो दुर्बलीयसा
बटुमात्रेण शक्यं हि सज्यं कर्तुं धनुर्द्विजाः
क्षेपक ने सम्पूर्ण प्रकरण को अंतर्विरोधी बना दिया है। 
आन्तरिक प्रमाणों से ही स्पष्ट है कि न तो कर्ण धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ा पाया था, न ही द्रौपदी ने ऐसा कुछ कहा था कि सूतपुत्र से विवाह नहीं करेगी।
... 
अर्जुन आये, धनुष के पास अचल पर्वत की भाँति खड़े हो गये। उन्होंने धनुष की दक्षिणावर्त परिक्रमा की। उसे प्रणाम किया एवं पलक झपकते ही प्रत्यञ्चा चढ़ा दी। बाण हाथ में लिये एवं बात ही बात में लक्ष्य को भेद दिया।
अर्जुनो धनुषोऽभ्याशे तस्थौ गिरिरिवाचलः
स तद्धनुः परिक्रम्य प्रदक्षिणमथाकरोत्
प्रणम्य शिरसा हृष्टो जगृहे च परंतपः
सज्यं च चक्रे निमिषान्तरेण; शरांश्च जग्राह दशार्धसंख्यान्
विव्याध लक्ष्यं निपपात तच्च; छिद्रेण भूमौ सहसातिविद्धम्
अन्तरिक्ष में निनाद हुआ, उपस्थित समाज में महान आनंद कोलाहल छा गया। 
ततोऽन्तरिक्षे च बभूव नादः; समाजमध्ये च महान्निनादः
कोलाहल बढ़ने लगा तो वरिष्ठ युधिष्ठिर नकुल एवं सहदेव के साथ आवास पर चले गये: 
तस्मिंस्तु शब्दे महति प्रवृत्ते; युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः
आवासमेवोपजगाम शीघ्रं; सार्धं यमाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्याम्
द्रुपद ने (उपद्रव की स्थिति में) अर्जुन को अपनी सेना द्वारा सहायता का निश्चय किया।
लक्ष्य को भेदा हुआ जान इन्‍द्र समान अर्जुन को देखती श्वेत वरमाला हाथ में लिये कृष्णा मंद मंद मुस्कुराती उनके पास पहुँची। 
अद्भुत कर्म कर स्वयंवर में विजयी हुये अर्जुन पत्नी को साथ ले बाहर निकले जो उनका अनुसरण कर रही थी। ब्राह्मणों ने उनका बड़ा सत्कार किया। 
विद्धं तु लक्ष्यं प्रसमीक्ष्य कृष्णा; पार्थं च शक्रप्रतिमं निरीक्ष्य
आदाय शुक्लं वरमाल्यदाम; जगाम कुन्तीसुतमुत्स्मयन्ती
स तामुपादाय विजित्य रङ्गे; द्विजातिभिस्तैरभिपूज्यमानः
रङ्गान्निरक्रामदचिन्त्यकर्मा; पत्न्या तया चाप्यनुगम्यमानः

स्वयम्‍वर विजयी अर्जुन को राजाओं ने ब्राह्मण समझा, ब्राह्मणों ने हर्षध्वनि एवं उत्साह वर्धन किया ही था। ईर्ष्या एवं अमर्ष से भरे पराजित राजाओं ने स्वयम्वर में कन्या प्राप्त करने का अधिकार ब्राह्मणों को नहीं है, यह मर्यादा उल्लंघन है, ऐसा कहते हुये द्रुपद एवं द्रौपदी का वध करने के उद्देश्य से आक्रमण किया ताकि दण्ड मिले एवं भविष्य में स्वयम्वर की मर्यादा न भङ्ग हो, धर्म की रक्षा हो: 
न च विप्रेष्वधीकारो विद्यते वरणं प्रति
स्वयंवरः क्षत्रियाणामितीयं प्रथिता श्रुतिः
... 
अवमानभयादेतत्स्वधर्मस्य च रक्षणात्
स्वयंवराणां चान्येषां मा भूदेवंविधा गतिः

ब्राह्मण अवध्य होता है, इस कारण अर्जुन के प्रति कोई ऐसा भाव नहीं आया - विप्रियं पार्थिवेन्द्राणां नैष वध्यः कथंचन। द्रुपद ब्राह्मणों की शरण में गये, भीम अर्जुन उनकी रक्षा को आगे आ गये। दोनों की ओर सङ्केत कर कृष्ण ने बलराम से कहा - ये निश्चित ही भीम अर्जुन हैं तथा जो गौरवर्ण ज्येष्ठ दो अश्विनीकुमारों सम भाइयों के साथ कुछ समय पहले बाहर गये, वे युधिष्ठिर थे। मैंने सुना है कि लाक्षागृह की आग से कुन्‍ती सहित पाण्डव बच गये थे - मुक्ता हि तस्माज्जतुवेश्मदाहा;न्मया श्रुताः पाण्डुसुताः पृथा च। बुआ पृथा सहित कुरुकुल के इन वीरों को सुरक्षित देख मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है - प्रीतोऽस्मि दिष्ट्या हि पितृष्वसा नः; पृथा विमुक्ता सह कौरवाग्र्यैः। 
कर्ण अर्जुन से युद्ध करने लगा। अर्जुन के लाघव से विस्मित हुआ - आप या तो साक्षात धनुर्वेद हैं, या भार्गव राम - किं त्वं साक्षाद्धनुर्वेदो रामो वा विप्रसत्तम। साक्षात विष्णु हैं या इंद्र - अथ साक्षाद्धरिहयः साक्षाद्वा विष्णुरच्युतः। 
युद्ध में मेरे कुपित होने पर सामना या तो साक्षात इंद्र कर सकते हैं या किरीटी अर्जुन: 
न हि मामाहवे क्रुद्धमन्यः साक्षाच्छचीपतेः
पुमान्योधयितुं शक्तः पाण्डवाद्वा किरीटिनः
अर्जुन ने कहा कि मैं ब्राह्मण ही हूँ, युद्धकला में श्रेष्ठ, सर्वशस्त्र ज्ञाता हूँ। गुरुकृपा से ब्रह्मास्त्र एवं ऐंद्रास्त्र भी मुझे सिद्ध हैं। वीर! रण में तुमसे जीतने के लिये यहाँ खड़ा हूँ। तुम भी स्थिरतापूर्वक खड़े रहो। 
ब्राह्मणोऽस्मि युधां श्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां वरः
ब्राह्मे पौरंदरे चास्त्रे निष्ठितो गुरुशासनात्
स्थितोऽस्म्यद्य रणे जेतुं त्वां वीराविचलो भव
अर्जुन के मुँह से यह बात सुन कर यह मानते हुये कि ब्रह्मतेज अजेय होता है, कर्ण पीछे हट गया। 
एवमुक्तस्तु राधेयो युद्धात्कर्णो न्यवर्तत
ब्राह्मं तेजस्तदाजय्यं मन्यमानो महारथः
भीम ने शल्य को पटक कर रगड़ दिया। उन दोनों को घेरे सभी आश्चर्यचकित हो अनुमान लगाने लगे। कृष्ण को पक्का विश्वास हो गया कि ये दोनों भीम एवं अर्जुन ही हैं। उन्होंने यह कहते हुये कि इन ब्राह्मणों ने द्रौपदी को धर्मानुसार ही प्राप्त किया है, सबको लड़ाई समाप्त करने को समझाया। सभी मान गये। 
तत्कर्म भीमस्य समीक्ष्य कृष्णः; कुन्तीसुतौ तौ परिशङ्कमानः
निवारयामास महीपतींस्ता;न्धर्मेण लब्धेत्यनुनीय सर्वान्
दोनों वीर द्रौपदी को लेकर चल दिये। 
उधर भिक्षाकाल हो जाने पर भी पुत्रों के न लौटने से माता कुंती के मन में विविध विनाश आशंकायें उठने लगीं। मेरे कुरुवीरों को पहचान कर धृतराष्ट्र के पुत्रों ने मार तो नहीं डाला? कहीं मायावी राक्षसों ने तो वैर नहीं निकाल लिया! 
तेषां माता बहुविधं विनाशं पर्यचिन्तयत्
अनागच्छत्सु पुत्रेषु भैक्षकालेऽतिगच्छति
धार्तराष्ट्रैर्हता न स्युर्विज्ञाय कुरुपुंगवाः
मायान्वितैर्वा रक्षोभिः सुघोरैर्दृढवैरिभिः
क्या महात्मा व्यास की वाणी असत्य हो जायेगी? विपरीतं मतं जातं व्यासस्यापि महात्मनः। 
कुंती का मन विविध चिन्ताओं में डूबने उतराने लगा। तभी अपराह्न में मेघों से घिरे सूर्य की भाँति ब्राह्मणों से घिरे अर्जुन ने उन्हें आगे कर घर में प्रवेश किया: 
महत्यथापराह्णे तु घनैः सूर्य इवावृतः
ब्राह्मणैः प्राविशत्तत्र जिष्णुर्ब्रह्मपुरस्कृतः
कुम्हार के कर्मशाला में प्रवेश कर उन दो महानुभावों भीम एवं अर्जुन ने माता को जोकि कुटी में भीतर थीं, पुकारा:
गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां; पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ
.... 
[कुम्हार के लिये भार्गव शब्द का प्रयोग चिह्नित कर लें, आगे कभी काम आ सकता है।] 
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(क्रमश:) 

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