एक अपरिपक्व, ठग, तमाशेबाज, कायर ..... आदि आदि का समर्थन मैं क्यों कर रहा हूँ? मेरा समर्थन व्यक्ति को नहीं इस मुद्दे को है कि काला धन वापस लाया जाय और दोषियों को दंडित किया जाय। यदि कोई परिपक्व, सज्जन, निष्कामी, वीर इस मुद्दे को लेकर इतने व्यापक तरीके से सामने आयेगा और लोगों की आँखों में अंगुली डालेगा तो मेरा समर्थन उस पर शिफ्ट हो जायेगा। लेकिन कोई सामने आये तो सही!
इतना बड़ा मुद्दा किसी ठग उठाईगीर के लिये क्यों छोड़ रखा है? मैं उन सब के विरोध में हूँ जो बाबा पर प्रहार कर इस मुद्दे को तनु कर लबड़धोंधे खाते के कबाड़ में डाल देने को उद्यत धनदोहनी भांडों और लिजलिजे हरामखोरों का जाने अनजाने प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन कर रहे हैं।
काले धन का मुद्दा इन इन से जुड़ता है(बहुत कुछ छूट भी गया है):
- बेड के अभाव में हॉस्पिटल के फर्श पर कुत्तों के बीच सोये मरीजों से
- सरकारी हस्पतालों में दवा बिना टाँग रगड़ रगड़ यातना झेलती आत्माओं से
- प्रसव के लिये सुविधाओं के अभाव में फुटपाथ पर बच्चा जनती माताओं से
- बजबजाते सीवर और गढ्ढों वाली सड़कों से
- बाबुओं के टेबल टेबल फाइल शिफ्ट करवाते बरबाद होते ज़िन्दगी के अनमोल लम्हों से
- उस आतंक से जो शाम को बहू बेटियों को घर से बाहर नहीं निकलने देता
- उन किसानों से जो आत्महत्या को आत्मीय मानने लगे हैं
- सब्जबागों के भ्रम में जवानी के अनूठे वर्ष बरबाद करते जवानों से
- शहरों की झुग्गियों में जिन्दगी के नरक को जीते मर्द, औरत और बच्चों से
- रात में फुटपाथ पर सोने के जुर्म में चूतड़ पर पुलिस के प्यार प्रसाद पाते रिक्शावालों से
- हर इंसान के भीतर चौबीसो घंटे छाये रहने वाले अनजाने आक्रोश से
- उन औरतों से जिनकी जवानी अज्ञान और प्रदर रोग में ही खत्म हो जाती है
- उन मर्दों से जिनके लिये ज़िन्दगी गुटका खा कर थूक देने के बराबर है
- उन बच्चों से जिनके करिअर विकल्प ये हैं - भीख माँगो, पॉकेट काटो, बिस्तर गर्म करो या विकलांग बनो
- रेलवे का कोई क्लास हो - काकरोचों से , काटते हुये अनजान कीड़ों से
- आम जन की क़्वालिटी ऑफ लाइफ से ...
...काले धन का मुद्दा कोई गिरहकट भी इतने व्यापक स्तर पर उठायेगा कि सरकार दहल जाय तो मैं उसे समर्थन दूँगा। आप शुचिता की बात करते हैं तो ले आइये देवदूतों को या स्वयं बन जाइये लेकिन अपने भगवान के लिये इस मुद्दे को यूँ उठाइये तो सही!
आप के बकवासी तर्क आप की सुविधाभोगी ज़िन्दगी के ऊपर मँडरा रहे खतरों से उपजे हैं। आप को कहीं भीतरखाने डर है कि लिहाफ उठा तो आप स्वयं भी किसी के साथ नंगे सोये मिलेंगे। अपना आचरण सुधारिये और इस मुद्दे का समर्थन नहीं कर सकते तो प्लीज शट अप!
निर्दयी और कुत्सित विचारों और कर्मों को हमने अपने चारों ओर इतनी सहिष्णुता से पनपने दिया है कि हम इंसान नहीं रहे। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हर किसी के साथ मेरी अंतरात्मा की आवाज़ भी है।
जवाब देंहटाएंआपने इस विषय पर इतनी सही राय रखी है कि इससे असहमत हुआ ही नहीं जा सकता।
जवाब देंहटाएंकल तक जो श्रद्धेय थे आज जब काले धन की बात करने लगे तो आंख की किरकिरी बन गए हैं।
आप के बकवासी तर्क आप की सुविधाभोगी ज़िन्दगी के ऊपर मँडरा रहे खतरों से उपजे हैं। आप को कहीं भीतरखाने डर है कि लिहाफ उठा तो आप स्वयं भी किसी के साथ नंगे सोये मिलेंगे। अपना आचरण सुधारिये और इस मुद्दे का समर्थन नहीं कर सकते तो प्लीज शट अप!..
जवाब देंहटाएंवाह धांसू है जी धांसू अंदाज़ और तेवर तो बगावती हईये है आपका । आपको देखते ही अनुसरक ओईसे ही थोडी बन गए थे , अईसे ही शट अप कराते रहिए । इसे लिए जा रहे हैं फ़ेसबुक ,ट्विट्टर और बज़ पर साझा करने के लिए ताकि ये आग और फ़ैले ।
"लिहाफ उठा तो आप स्वयं भी किसी के साथ नंगे सोये मिलेंगे।"
जवाब देंहटाएंयही तो ....यही पापी हैं जो मुद्दे को डायलूट कर दे रहे हैं ...
साले हड्डी चबाने और शाम को पौआ-पाउच के लिए का इंतजाम इस देश की 'कहाँ जाई का करी ' जनता को कर दिए और खुद
जन्नत अपने लिए ले बैठे हैं !
मैं बाबा रामदेव के साथ हूं... केवल भ्रष्टाचार के विरोध में ही नहीं उनके योग आंदोलन में भी... एक जुदा पोस्ट___ पूरी एक दो दिन में... :)
जवाब देंहटाएंकायरता भी एक बीमारी है, उसका भी इलाज आवश्यक है।
जवाब देंहटाएंसही प्रश्न उठाने वाले को गलत साबित करना उस देश में बहुत आसान होता है जहां लोग धर्म और जातियों में बंटे होते हैं। भ्रष्टाचार के अनियंत्रित होने की संभावना वहीं रहती है। धर्म गुरू और राजनीतिज्ञ दोनो के हित इसी में हैं कि लोग आपस में बंटे रहें।
जवाब देंहटाएंभाव अच्छे हैं आपके लेकिन जिस तरह का मुद्दा उठाया जा रहा हो,इसे उठाने वाला भी असंदिग्ध,संयमित व अपने आचरण में वैसा ही हो जैसा कहने या प्रेरित करने के लिए वह कहता हो.सर्वमान्य तथ्य है कि आप जो कहें पहले उस पर स्वयं खरे उतरें.
जवाब देंहटाएंतुलसीदास बाबा ने भी कहा है,'पर उपदेश कुशल बहुतेरे...'
बंधु,प्रेरणा उसी से मिलती है जो आदर्श और प्रेरक हो !
काला धन वापिस आना चाहीये! सहमत लेकिन कैसे ? कोई विद्वान/बुद्धीजीवी मेरी जिज्ञासा को शांत करेगा ?
जवाब देंहटाएंबाबा कहते है कि राष्ट्रीय संपत्ती घोषीत कर दो! क्या होगा ?
संसद मे प्रस्ताव पास कर दो!(कश्मीर के पाक/चीन अधिकृत हिस्से के लीए भी तो किया था क्या हुआ ?)
स्वीटजर लैण्ड पर आर्थिक दबाव बनाओ!(बना लो जी, कितना व्यापार है वैसे ?)
स्वीटजर लैण्ड पर हमला कर दो !(दम है क्या ?)
क्या इससे ज्यादा आवश्यक यह नही है कि भ्रष्टाचार रोका जाये? जो घर मे है उसे सम्हाला जाये ?
बाबा/अन्ना के अनशन से क्या होगा जब व्यवस्था ना बदले, हम ना बदले!
क्या हम यह प्रतिज्ञा नही कर सकते कि आज से मै रिश्वत नही दूंगा किसी यातायात पोलिस वाले से लेकर रेल्वे टीसी तक, हर खरीदी वस्तु का बील लूंगा, हर सरकारी टैक्स का भूगतान करुंगा!
हम सुधरेंगे जग सुधरेगा।
अब हम शट-अप हो जाते है, और कुछ नही बोलेंगे! भले ही हमे देशद्रोही, सेक्युलर, कांग्रेसी कहा जाए!
बक-अप बाऊ:)
जवाब देंहटाएंकहां से लाओगे यह मुद्दा उठाने वाला ऐसा असंदिग्ध,संयमित व शुद्ध आचरण युक्त सर्वगुण सम्पन्न देवदूत?
जवाब देंहटाएंतुम लोग तो भगवान को भी संदिग्ध सिद्ध करते नहीं लज़ाते। जब राम पर सीता के प्रति अन्यायी चित्रित करते हो,कृष्ण को हर बात में। ऐसे कृपण किसी भी नेतृत्व को क्या छोडेंगे?
भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए कुटिल शर्तें रखनें के पिछे की मंशा विवेकवान लोगों को स्पष्ठ नजर आती है। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी।
स्वार्थलोलुप,सुविधाभोगी, ट्कड़ाखोर जो इस मुद्दे को हताश करनें में लगे हुए है, इनकी धनदोहन की भांड़वृति सफल हुई तो मौका सदैव के लिए गया। न भूतो न भविष्यति। यह अटल इतिहास लिख देना। और कभी भूल नहीं पाओगे कि एक मौका आया था।
आशीष श्रीवास्तव जी,
जवाब देंहटाएंहमें नहीं पता था देशद्रोही के समान ही सेक्युलर, कांग्रेसी कहना गाली समान है। अस्तु क्यों अंधे को अंधा कहना,सुरदास कहना चाहिए। कुछ सम्भावनाएं हमेशा शेष रहती है।
हम सुधरेंगे जग सुधरेगा।
तो अब तक यह आसान रास्ता हमनें लागू क्यों न किया। क्या रूकावट थी। जब किसी अन्य के द्वारा लाया गया मुद्दा भी प्रेरित नहीं कर रहा तो बुरे लोग स्वेच्छा सुधर जाएंगे? महापुरूषों को जरूरत क्या है वे प्रेरणा देते है। जबकि लोग स्वयं सुधरने की कुवत रखते हों?
कुछ कर बाबा नहीं तो यह कमीने जीने नहीं देंगे अब नहीं तो कुछ दिन बाद यह सरकार या तो बाबा को मरवा देगी नहीं तो बाबा को भगवा आतंकवादी घोषित कर देगी .......वह तो बाबा की किस्मत अच्छी थी जो उस काली रात को बच गया अतः बाबा बोल कम और काम जयादा कर
जवाब देंहटाएंjai baba banaras
मैं आपके विचारों से सहमत हूँ .
जवाब देंहटाएंआपका दिल से धन्यवाद गिरिजेश जी - किसी ने वह कहा जो नहीं कह पा रही थी - मन में हो कर भी - इस पर पोस्ट लिख ही नहीं पा रही - आखिर आपकी तरह हिम्मत भी तो चाहिए ना ...
जवाब देंहटाएंभ्रष्टाचार को रोज़ दौड़ते देखती हूँ यहाँ की सड़कों पर - मना है कि शहर के अन्दर माय्न्स की लोरी नहीं आ सकती - लेकिन चार पैसे खिला कर उन्हें दौड़ते देखती हूँ - अभी पिछले हफ्ते ही मेरे अपने डीपार्टमेन्ट की एक लेक्चरर का एक्सीडेंट हुआ |
डरती हूँ - जी हाँ - बहुत वीर बनते हैं हम ऊपर से, लेकिन डरते हैं अन्दर - तो कुछ कहने में डरती हूँ | आपकी जो शिकायत है - मैं अपने पर भी लागू देखती हूँ - "उस आतंक से जो शाम को बहू बेटियों को घर से बाहर नहीं निकलने देता " यह आतंक सिर्फ बाहर निकलने तक ही सीमित नहीं - यह महिला और पुरुष दोनों ही के लिए - अपनी बात को अपने मन से बाहर व्यक्त करने पर भी तो लागू होता है ना !!
जब आधी रात को पुलिसिया डंडे चले - अगले दिन सब ब्लोगों पर यही बात थी | और अब - सरकार द्वारा प्रायोजित दुष्प्रचार ने और बिके हुए मीडिया ने सब पढ़े लिखों को कन्फ्यूज़ कर दिया है - बाबा ४ तारीख से भूखे हैं - आज १० तारीख है - और 'बेईमान सरकार' के 'इमानदार' प्रधान मंत्री आँखें मूंदे बैठे हैं?
यदि यह कहा जाता है "बाबा नीबू शहद लेने को राजी हैं" तो स्टार न्यूज़ पर मज़ाक उड़ाया जाता है "खट्टा मीठा अनशन" - तो क्या यह एक साजिश है - कि आदमी के अनशन को नज़रंदाज़ कर दो कि वह खुद ही मर जाए भूख से - तो फिर दो शब्द शोंक के कह देंगे - और बात फिर आई गयी हो जायेगी????
@ प्रवीण जी - बिल्कुल ठीक - पहले भ्रष्टाचार का इलाज हो - कायरता के इलाज के लिए जो धन चाहिए - भ्रष्टों की तिजोरियों से बाहर आये - तब हमारी कायरता के इलाज के लिए कुछ हो पायेगा - नहीं तो - अगर आधी रात को पुलिस फ़ोर्स - ५०० की संख्या में - गोली मरने आये - तोमैं भी भेष बदल कर छुप जाऊंगी - | जो बाबा के छुपने को कायरता कह रहे हैं (आप नहीं - कई लोग ) वे शहीद भगत सिंह के बाल कटा कर सरदार से मोना बनने को भी कायरता कहते हैं ? - नहीं - उसे वे ही लोग देशभक्ति कहते हैं ....
जवाब देंहटाएं@ संतोष जी - खरा उतरे? तो फिर तो कोई किसी चीज़ के बारे में खरा उतरेगा ही नहीं - और दुनिया आगे बढ़ ही नहीं सकती - किसे खरा कहेंगे आप? कि इस इंसानी इतिहास में क्या एक भी व्यक्ति हुआ ऐसा जिस को "परफेक्ट केरेक्टर सर्टिफिकेट" इतिहास ने दिया? कोई एक भी? राम? कृष्ण? गांधी? यीशु? मुहम्मद???? किसे "खरा" मानते हैं आप - कि जिस पर किसी ने इलज़ाम ना लगाये हों कभी?? चोइस आपकी यह नहीं कि परफेक्ट और रोंग - ब्लेक या वायट - चोइस है कि आप ब्लेक चुनते हैं या ग्रे? जब तक आपका कानून साबित कर पाए कि रामदेव ने कुछ गलत किया या नहीं - वे इन्नोसेंट हैं कानून की नज़र में - लेकिन कोंग्रेस के दुष्प्रचार ने उन्हें पढ़े लिखों की नज़र में पहले ही चोर बना दिया है - कि उनकी अपनी चोरी छुपी रहे ...
@ आशीष जी - "कैसे हो" - यह बाद में डीसाय्ड हो सकता है - पहले कानून तो बने - मेथड्स कम लेटर !! भारत स्वतंत्र हुआ १९४७ में, संविधान ३ साल बाद बना !! .... और .... हम सुधरेंगे जग सुधरेगा .... आपको सचमुच ऐसा लगता है -?? तो फिर - यदि आप चोरी नहीं करते - तो क्या आपके हिसाब से चोरों को पकड़ने के लिए पुलिस, जज या जेल आदि की कोई ज़रुरत ही नहीं? कोई कुछ भी घोटाले करे - उसे अपने आप सुधरने देना है - किसी कानून की ज़रुरत ही नहीं - थीअरी ऑफ़ केओस से ही यह दुनिया अपने आप चल जायेगी??
AACHARYA......AISA,'HAAMMAAMM' DIKHAYENGE TO.....
जवाब देंहटाएंB A L A K..... 'TRAHIMAM'....'TRAHIMAM' KAREGA...
PRANAM.
मुसीबत को देखते ही अपने जीवन की रक्षा पर हमारा ध्यान जाना स्वाभाविक है .. अपने जीवन को बचाना मनुष्य की पहली जरूरत भी है .. जीवन ही नहीं रहेगा तो हम अपने लक्ष्य पर आगे कैसे बढेंगे ??
जवाब देंहटाएंआप से सहमत....
जवाब देंहटाएं@ संतोष त्रिवेदी:
जवाब देंहटाएंलक्षणा बोध को नई दिशा देते हुये यही कहूँगा - रुकते रुकते रुकेंगे आँसू, ये रोना है, हँसी खेल नहीं।
जब रुकेंगे तो जाने क्या होगा।
@ आशीष श्रीवास्तव:
बहुत सी ऐसी पाक घोषणायें हैं, इरादे हैं अपने संविधान में जिनका अक्षर मात्र भी पालन नहीं होता लेकिन मैं आप की तरह यह नहीं कह सकता कि उनसे क्या होगा?
घर सँभालने की ही तो बात हो रही है - पगड़ी सँभाल जट्टा, लुट गया माल वै!
रही बात काला धन वापस लाने की तो एक देश, वह भी भारत जैसे, में इच्छाशक्ति हो तो हजार रास्ते हैं। डिप्लोमेसी की कुटिल चाल से बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है - इच्छाशक्ति चाहिये न कि धनदोहनी हवस... थोड़ा सा सर्च कीजिये और जान जायेंगे कि किन किन विधियों से दूसरे देशों ने अपनी पूँज्री वापस पाई!
@ देशद्रोही, सेक्युलर, कांग्रेसी - यह सब यहाँ अप्रासंगिक है और उस कंफ्यूजन को दर्शाता है जिसे सत्ताधीशों ने जान बूझ कर फैलाया है ताकि उलझाव बढ़े और मुख्य मुद्दा आँखों से ओझल हो जाय।
विमर्श में विरोध को स्थान है। यदि आप मेरी बात समझ नहीं पा रहे हैं तो वह मेरी प्रस्तुति का दोष है, मुद्दे का नहीं। वैसे मैं कांग्रेसी, भाजपाई, कौमनिस्ट, कम्युनिस्ट, क्षेत्रीय वगैरा वगैरा कुछ नहीं हूँ और सिक तो हरगिज नहीं ;) मुझे तो बस एक बात दिखती है और सभी अनुमान भी लगा लेंगे कि सबसे अधिक काला धन किन लोगों का जमा है! बाबा ने तीर एकदम निशाने पर मारा है। आगे आगे देखिये होता है क्या?
आप से सहमत...
जवाब देंहटाएंराव साहब आपने बहुत बढ़िया तरीके से अपने मन का गुस्सा निकाल बाहर किया है. ऐसा बहुत बार होता है की हम सामने वाले को नहीं समझ पाते और सामने वाला हमें नहीं समझ पाता. ऐसे में खीज होना स्वाभाविक ही है. मैं इस विषय में अपने विचार तो पहले ही ज़ाहिर कर चुका का हूँ अतः दोहराना ठीक नहीं समझता. अब तो बस बाबा रामदेव के अनशन का परिणाम जानने की इच्छा है. अपने छोटे से जीवन में बाल हठ और त्रिया हठ के बहुत से उदहारण देखें हैं पर तीसरे हठ को पहली बार देख रहा हूँ. देखे आगे क्या होता है.
जवाब देंहटाएंधन्यवाद गिरिजेश राव जी!!! बहुत ही सटीक ढ़ग से बात रखी है??? बाबा रामदेव जी ने जो मुद्दे उठाएँ हैं,वह हर कोई नहीं उठा सकता...मुद्दे न केवल सार्थक हैं बल्कि आम भारतीय नागरिक के लिए हितकारी हैं। आज जरूरत है इस आन्दोलन को तब तक जिन्दा रखने की जब तक कि देश का धन देश में नहीं आ जाता और काला धन जमा खोरों को देश की राजनीति से बाहर नहीं कर दिया जाता। बाबा रामदेव के इस आन्दोलन के साथ देश के हर नागरिक,हर बुद्धिजीवी, हर उस व्यक्ति को जुड़ना चाहिए जो देश हित के लिए सोचता है।
जवाब देंहटाएंआपका ये विचार एक जमीर वाले इंसान को सोयी नींद से जगाकर आन्दोलन के लिए खड़े होने को प्रेरित करता है....
जवाब देंहटाएंलेखनी में ऐसी धार कम दिखती है आज-कल ... आपकी अनुमति बिना ही मैंने आपके ब्लॉग को अपने फेसबुक में share किया है, आशा है आप बुरा नहीं मानेंगे ..
धन्यवाद !
गिरिजेश जी,
जवाब देंहटाएंमुद्दे कितने भी अच्छे हो, कुशल कार्ययोजना के अभाव में दम तोड़ देते है ! ये अंदोलन दूध के उफान की तरह है,कुछ दिनों में दम तोड़ देंगे. दोनों के पीछे एक कार्य योजना दिखाई नहीं देती है. बाबा का आन्दोलन तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह चाहते क्या है ? कभी बाबा कहते है कि सरकार ९९% मान गयी है, जब ९९% मान गयी है तो आन्दोलन जारी रखने में तुक क्या है? यदि नहीं मानी है तो घोषणा क्यों कर रहे है?
अन्ना के आन्दोलन में पता चल रहा था कि उन्हें एक लोकपाल बील चाहीये, जिसमे फलां फलां मुद्दे हो.
माफ कीजीये, काला धन वापिस आना चाहिए, मेरा पूरा समर्थन, लेकिन यह अनशन से नहीं आएगा. इसके लिए व्यवस्था/सरकार बदलनी होगी, जो भारत में चुनाव से होता है. यदि चुनावो में हम इमानदार उम्मीदवार नहीं चुन सकते तो क्षमा किजीये हम लोकतंत्र के लायक नहीं है, इस देश का भविष्य अँधेरे में है.
मुझे थीयेनान्मन चौक याद है, २० वर्ष हो गए!
शिल्पा जी,
आपको उत्तर नहीं दूंगा, आप मेरे दो अलग अलग मुद्दों पर के विचारो एक साथ मिलाकर मेरा मजाक उड़ा रही है.
दीप जी,
जवाब देंहटाएंएक तरह का क्रोध भीतर सीझता है, उसे निकाल बाहर नहीं किया जा सकता। आप वाली खीझ मेरी नहीं है ;) समझ वाली बात में आगे जोड़ लें बहुत बार हम समझते हुये भी समझना नहीं चाहते। आप ने बात दुहराई नहीं पर दुबारा आये तो सही। धन्यवाद।
कमाल है कि आप ने पुरुष हठ नहीं देखा, कोई बात नहीं इतिहास मदद करेगा - चाणक्य हठ, हमीर हठ, गान्धी हठ ... आप छोटी लहर को देखिये, मैं तो कुछ और ही देख रहा हूँ।
हाँ, मैं बाबा को चाणक्य और गान्धी के पासंग नहीं रख रहा(बताना पड़ता है नहीं तो बात कहीं से कहीं पहुँच जाती है :))
जवाब देंहटाएंआशीष जी,
कुशल कार्ययोजना वाली बात से सहमत लेकिन क्या है कि देशों की भाग्य रेखायें समय के उन आयामों तक पसरती हैं जिनके लिये एक मनुष्य़ का जीवन अपर्याप्त होता है। ऐसे में कार्ययोजनायें मुद्दों की तुलना में कुछ अधिक ही गौण होती हैं। मामले से जुड़ी इसके पहले वाली पोस्ट पर कहीं लिखा था - आज भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास को सम्पूर्णता और मनन के साथ पढ़ने की आवश्यकता है। वहाँ बहुत से उत्तर हैं। बाबा तो बस एक लहर है।
हम लोकतंत्र के लायक हैं, भविष्य़ आसपरक है और चुनावों से ऐसे परिवर्तन नहीं आने वाले। तंत्र को जोर के झटके देने होते हैं और परिवर्तन के प्लेटफॉर्म तंत्र ही मुहैया कराता है। स्वतंत्र भारत के कुछ उदाहरण - जे पी की सम्पूर्ण क्रांति, नक्सलबारी, रामजन्मभूमि आन्दोलन, वी पी सिंह का मंडल कमीशन, कांशीराम का दलित आन्दोलन आदि। इनसे और इनकी परिणतियों से सहमति/असहमति अपनी जगह हैं लेकिन जो दूरगामी परिणाम ये लेकर आये उनसे इनकार नहीं किया जा सकता। मतलब कि बाबू जी जरा हट के अप्रोच...
रही बात थियेनान्मन चौक की तो अपने देश में भी वैसे तो नहीं लेकिन दमन के बहुतेरे उदाहरण हैं। दीप जी ने पिछली टिप्पणियों में रामपुर तिराहा कांड की बात की थी। हमलोग भाग्यशाली हैं कि एक परिवार के राजनीतिक वर्चस्व के बावजूद भी चीन जैसा अधिनायकवाद यहाँ नहीं। पारिवारिक वर्चस्व बेकाबू होकर आपातकाल या चरम दमन का रूप न ले ले इसलिये भी ऐसे आन्दोलनों की आवश्यकता है। आज विपक्ष श्रीहत है और ऐसे में सत्तापक्ष को मनमानी करने को खुल्ला मैदान मिला हुआ है। चेक ऐंड बैलेंस के कारक चरमरा रहे हैं। जाने कितने घोटालों को पचा चुके सत्तापक्ष की खीझ यही है कि विपक्ष के बजाय चुनौती नागरिक आन्दोलनों की ओर से आ रही है। अण्णा या रामदेव यहीं बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं...
सभी टिप्पणियों का सम्मान करते हुए मैं बताना कहूँगा कि 'खरे' और 'देवदूत' हम नहीं ढूंढ रहे,मगर जिनके बारे में लगातार आरोप लाग रहे हों ,वे दागी नेताओं की तरह ही हैं क्योंकि नेता भी यही कहते हैं कि उन पर आरोप सिद्ध नहीं हुआ है.
जवाब देंहटाएंअन्ना,केजरीवाल,किरण बेदी से इसीलिए लोगों का स्वाभाविक जुडाव हो रहा है कि उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएं अभी दिखती नहीं हैं,पहले का रिकार्ड भी बेदाग है.बाबा और महात्मा में फर्क यह है कि बाबा कभी भी अपने हितों के खातिर 'सौदा' कर सकते हैं और हालिया दिनों में यह उनके आचरण से जाहिर हुआ है.
क्या भ्रष्टाचार का नेतृत्व यदि येदिरप्पा करेंगे तो भी आप उनके साथ होंगे?कर्नाटक का भ्रष्टाचार और केंद्र का भ्रष्टाचार अलग कैसे है? जो लोग यहाँ आगे हो रहे हैं,वहाँ क्यों नहीं कुछ करते ?
बहरहाल,भ्रष्टाचार की लड़ाई हमें आज स्वयं से लड़नी है.हर कार्यालय में हम-आप जैसे लोग बैठे हैं ,खुद लूट रहे हैं और नेताओं को गरिया रहे हैं !
संतोष जी,
जवाब देंहटाएंनहीं, अण्णा या किरण बेदी के रिकार्ड बेदाग नहीं हैं। इस मामले से जुड़ी पहली पोस्ट पर मैंने लिंक दिये हैं। आप स्वयं भी सर्च कर सकते हैं। पहले भी कहा है, दुहरा रहा हूँ - नेतृत्त्व का चरित्र हनन करने की मंशा नहीं मेरी। मेरे लिये हर वह बात त्याज्य है जो मुद्दे की उठान को कमजोर करती हो।
कर्नाटक बनाम केन्द्र की बात तो उसी बात से जुड़ती है न जो कहती है कि सब आर एस एस प्रायोजित है? प्रश्न अभी भी वही है/वहीं है-इतना बड़ा मुद्दा किसी ठग उठाईगीर के लिये क्यों छोड़ रखा है? तर्क अपनी जगह हैं, इस तरह की बातें सत्तापक्ष की ओर से लोगों को कंफ्यूज करने और मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिये की जा रही हैं। एक बहुत पुरानी तरकीब है यह - आँच अपनी ओर हो तो लुकाठा दूसरी ओर सरका दो या हल्ला काटो कि मेरी ही ओर क्यों?
हम-आप की ईमानदारी की बात करना भी उसी स्ट्रेटेजी का अंग है। कार्यालयों के हम-आप में ऐसे जन भी हैं जो लूट नहीं रहे। अत्यल्प हैं लेकिन छोटे छोटे सूरजों जैसे - न भ्रष्ट होते हैं और न अपने अधिकार क्षेत्र में किसी को भ्रष्टाचार करने देते हैं। दाल, रोटी, परिवार के चक्कर में उससे आगे नहीं जा सकते लेकिन कोई अण्णा या कोई रामदेव व्यापक स्तर पर मुद्दा उठाता है तो उसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं। ऐसे ही जाने कितने विविध जनसमूह हैं जो मुद्दे से जुड़ाव महसूस कर रहे हैं। लहरें ऐसे ही बनती हैं। कोई कोई तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष जैसी हो जाती हैं।
@ आशीष जी, सादर कह रही हूँ - मज़ाक तो मैं खैर बिल्कुल नहीं उड़ा रही थी - और थीअरी ऑफ़ केओस आपका या मेरा या हम में से किसी भी एक का मुद्दा है ही नहीं | सिर्फ उदहारण दे रही थी - आपको मज़ाक उड़ाना लगा तो माफ़ी चाहती हूँ |
जवाब देंहटाएंमैं यह कह रही थी / हूँ कि हम सुधरेंगे देश सुधरेगा जैसा - मेरी समझ से - यदि ऐसा हो सकता - तो फिर कहीं भी किसी भी तरह की कानून प्रणाली की ज़रुरत ही नहीं थी | यदि चीज़ों का सुधरना या बिगड़ना इंडीविजुअल इच्छा और चोइस पर छोड़ दिया जाय - तो फिर समाज तो क्या - यह इन्टरनेट पर जो हम लोग बात कर रहे हैं - वह भी नहीं हो सकता | किसी को तो आगे आ कर प्रोटोकॉल बनाने ही पड़ते हैं - नहीं तो कुछ होने से रहा ... यदि गांधी और भगतसिंह जैसे लोग यही सोचते कि सब खुद ही ठीक हो जाएगा - तो आज आप और मैं यह मुद्दा डिस्कस करने का शायद अधिकार ही ना पा सके होते ... मुद्दा मेरा और आपका संवाद नहीं है - मुद्दा कोंग्रेस या रामदेव भी नहीं है - मुद्दा काला धन है .... और उसे वापस लाने का उपाय ढूँढने की बारी तब ही आ सकती है - जब पहले कानून बने कि उसे वापस लाया जाए ....
गिरिजेश जी मैं कभी भी लम्बी बहसों में भाग नहीं लेता पर भ्रष्टाचार का मुद्दा कुछ ऐसा है की शांत रहा नहीं जाता. मैं सरकारी "नौकर" हूँ (बहुत बार बताते हुए भी डर लगता है क्योंकि हम लोग अभी भी अपनी नौकरी में बहुत से खतरनाक ब्रिटिश कानूनों से बंधे हैं.) प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को बहुत नजदीक से देखा है. अपनी नौकरी मैंने महसूस किया भ्रष्टाचार हमेश ऊपर से शुरू होता है. इसे रोकने के लिए नियम कानून सब हैं पर जब ऊपर वाला अधिकारी इन नियमों को तोड़ता है तो निचला कर्मचारी विरोध नहीं कर पाता क्योंकि कहीं न कहीं उसे ये लालच होता है की अगर वो ऊपर वाले अधिकारी की सहायता करेगा तो हो सकता है की उसे भी उसका हिस्सा मिल जाय. मुझे मेरे भाग्य ने हमेशा ही मलाई दार जगहों पर पोस्टिंग दिलवाई और मैंने हमेशा ही उच्च अधिकारीयों की मनमानी का विरोध किया पर साथी अधिकारीयों और कर्मचारियों के असहयोग की वजह से लतिया कर हमेशा ही चुतिया की बहुमूल्य उपाधि के साथ गड्ढा पोस्टिंग में फैंक दिया गया.
जवाब देंहटाएंमुझे हमेशा ही लगता रहा की बेशक एक अधिकारी/नेता भ्रष्ट हो पर यदि निचली भेड़ें एक हो जाएँ तो उन्हें आसानी से हराया जा सकता है. पर क्या करें भ्रष्टाचार आम आदमी की नसों में गहरे तक पैठ गया है. हमारे देश में सभी भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं.पर सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार यहीं है. क्यों? क्योंकि हम सिर्फ अच्छी अच्छी बातें बनाना जानते हैं पर जब भी उन पर अमल करने की बात आती है तो दूसरों की ओर देखते हैं. हम लोग विश्वास करते हैं की कोई नेता आयेगा और भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाएगा (बेशक वो खुद कैसा ही हो) और ये बुराई दूर हो जाएगी. जब हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडाई में एक भ्रष्ट के नेतृत्व स्वीकारते हैं तो हम कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के एक मिनिमम लेवल को अपनी जिंदगी में स्वीकार रहे होते हैं की साहब इतना भ्रष्टाचार तो चलेगा. ऐसा क्यों?
इस मामले में मैं आशीष जी की बात हम सुधरेंगे तो देश सुधरेगा से सहमत हूँ और यही सोचता हूँ की जब तक आम जनता भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को स्वीकारना बंद नहीं करेगी तब तक हमें इस बुराई से निजात नहीं मिल सकती.
गिरिजेश जी ये टिप्पणी शिल्पा मेहता जी के लिए थी पर डरता हूँ की कहीं वो भविष्य में आप पर आरोप न जड़ दें की वो आपके ब्लॉग पर आपसे मुखातिब थी पर उनसे जवाब सवाल कोई और कर रहा था.इसलिए सीधे सीधे नहीं कहा :))
Girjesh Ji bahut bahut dhyanvaad .
जवाब देंहटाएंkam se kam , kisi ne to sahi tarike se , sahi baat ko likha .
aapki ye post padkar thoda sukun mila , chalo kuch log to sahi disha me sonch rahe hain .
Thanks for this post .
Regards--
Gaurav Srivastava
अब एक ठो बात और कह दूँ . तरह तरह के विचारों से समागम करने के उपरांत मेरे भीतर ये धारणा जन्म ले रही है की भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कठोर नियम कानूनों का शिकंजा तो उपरी लोगों पर कसा जाना चाहिए क्योंकि कहीं न कहीं वो बेलगाम हैं और आम आदमी में भ्रटाचार को स्वीकारने की मानसिकता में सुधार के लिए प्रयास किया जाना चाहिए. ये उपाय बेशक बचकाने दिवास्वप्न लगें पर मैं तो पैदायशी मुंगेरी लाल हूँ :))
जवाब देंहटाएंरा समर्थन व्यक्ति को नहीं इस मुद्दे को है कि काला धन वापस लाया जाय और दोषियों को दंडित किया जाय।
जवाब देंहटाएं.....
दि कोई परिपक्व, सज्जन, निष्कामी, वीर इस मुद्दे को लेकर इतने व्यापक तरीके से सामने आयेगा और लोगों की आँखों में अंगुली डालेगा तो मेरा समर्थन उस पर शिफ्ट हो जायेगा। लेकिन कोई सामने आये तो सही!
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मैं उन सब के विरोध में हूँ जो बाबा पर प्रहार कर इस मुद्दे को तनु कर लबड़धोंधे खाते के कबाड़ में डाल देने को उद्यत धनदोहनी भांडों और लिजलिजे हरामखोरों का जाने अनजाने प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन कर रहे हैं।
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काले धन का मुद्दा कोई गिरहकट भी इतने व्यापक स्तर पर उठायेगा कि सरकार दहल जाय तो मैं उसे समर्थन दूँगा। आप शुचिता की बात करते हैं तो ले आइये देवदूतों को या स्वयं बन जाइये लेकिन अपने भगवान के लिये इस मुद्दे को यूँ उठाइये तो सही!
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Girijesh Jiaap ne bahut sahi kaha hai .
काश मेरे पास गौरव अग्रवाल जैसी अपनी बात को इस माध्यम से व्यक्त करने की क्षमता होती.....मैं तो वर्तनी सही करने के चक्कर में ही उलझा रह जाता हूँ....कल मेरी अपनी एक मित्र से बाबा रामदेव के नेतृत्व के विषय में ही बात हो रही थी. उन्होंने मुझ से कहा की श्रद्धा पत्थर को भी भगवन बना देती है. उन्हें लग रहा था की असंख्य श्र्ध्लुओं का विश्वाश रामदेव जी को भविष्य में सही रह पर रखेगा. उस वक्त मुझे गाँधी बाबा और नेहरू जी याद ए. हमारे देश के लोगों ने आजादी प्राप्त करने के लिए उन पर और उनकी कमियों पर भी अंधश्रद्धा रखी थी पर उन्होंने इस देश को क्या दिया? एक ऐसा पारिवारिक शासन जो देश को आज छः दशकों के बाद भी चूस रहा है और उसकी वर्तमान पीढियां भी भविष्य के लिए तैयार हो रही हैं.
जवाब देंहटाएंक्या एक स्थापित नेता को बदलना आसन होता है?
क्या वास्तव में ये धरा इमानदारों से खाली हो चुकी है ? (रामलीला का रजा जनक वाला संवाद याद करें)
(खुला प्रश्न है कोई भी जवाब दे सकता है)
हे भगवान - मुझसे डरते हैं ??? ....... :(
जवाब देंहटाएं........ चलो कोई ना ....:)
वैसे मुझसे तो मेरे विद्यार्थी भी डरते नहीं - खुल कर संवाद - वाद - विवाद करते हैं - एक नहीं , कई मुद्दों पर ....
लेकिन, अब आप भी यह कह दें कि आप मुझे कोई जवाब नहीं देंगे, कि मैं आपका मज़ाक उड़ा रही हूँ , इसलिए कह रही हूँ - यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर कोई भी शायद चुप ना रह पाए - ऊपर मैंने कहा भी है कि मैं भी डरती हूँ - ना मैं रामदेव हूँ, ना अन्ना , और ना ही गिरिजेश राव | अब तो यहाँ टिप्पणी लिखने में भी डर लगने लगा है ... :)
लेकिन हाँ - मुझे यह बिल्कुल विश्वास नहीं कि हम सुधरेंगे तो देश सुधर जाएगा |समाज में हमेशा ही सही लोग, गलत लोग और न्यूट्रल लोग रहे हैं, और रहेंगे | बहुत से सही लोग हों भी तो "सब" नहीं सुधर सकते | मैं फिर यही पूछूंगी - क्या हम खुद चोर नहीं हों , तो कोई भी चोर नहीं होगा और चोरों के लिए पुलिस, जेल, अदालत - किसी कानून व्यवस्था की कोई ज़रुरत नहीं होगी ? क्या सब कुछ केओस थीअरी (माफ़ कीजियेगा - यह केओस थीअरी किसी एक व्यक्ति की विशिष्ट नहीं है - इस पर मैंने पहले भी बहुत पढ़ा है ) से अपने आप होगा?
जब महाभारत के युद्ध से पहले विदुर ने कृष्ण से कहा कि मेरा हस्तिनापुर - राजा की अंधी महत्वाकांक्षा की सजा - क्यों भोगे - तो कृष्ण ने कहा - क्योंकि राजा की सभा में जो द्यूत के समय हुआ - तब हस्तिनापुर चुप रहा | तो चुप रहना भी एक तरह से अपरोक्ष समर्थन देना है, कहीं ना कहीं सारा हस्तिनापुर दोषी था कि वह चुप चाप अधर्म का साथ देता रहा , और यही आज हम जैसे पढ़े लिखे लोग एक "परिपक्व, सज्जन, निष्कामी, वीर नेता" के इंतज़ार में कर रहे हैं | और ऐसा बिल्कुल नहीं था कि अधर्म युधिष्ठिर ने ना किया हो - किया था - किन्तु दो गलत मिल कर एक सही नहीं बनते |
तो यदि रामदेव खरे नहीं भी हों, तो भी उनके मुद्दे का महत्व कम नहीं , ना ही हम सब का चुप रह कर यह सोचना सही है कि जब कोई परफेक्ट नेता मिले तब लड़ेंगे - यह चुप्पी एक मूक समर्थन है उन लोगों को जो इस मुद्दे को हराना चाहते हैं - उन्हें रामदेव से शिकायत नहीं - नहीं तो रामदेव और बालकृष्ण पर जो जांच कमिटियाँ अब बैठ रही हैं - वे पहले ही बिठा दी गयी होतीं |
आपके बारे में तो नहीं जानती, लेकिन ------ मुझ जैसे कई लोगों को मैं जानती हूँ ------ जो बहुत कुछ समझते हैं कि यह सही या यह गलत है - लेकिन हिम्मत नहीं कि सरकार या सिस्टम से लोहा ले सके .... उसे सुधारने के लिए किसी हिम्मती को सामने आना होगा .. और आरोप प्रत्यारोप भी लगेंगे ही
कल से यहाँ पर चल रहे बहस को पढ़ रहा हूँ, मॉडरेशन के अँदेशे में टिप्पणी करने से बचता रहा ।
जवाब देंहटाएंमैं सीधे सीधे यही कहूँगा कि क्यों करें शट-अप... बहुत शट-अप हो चुका, हम स्वयँ ही शट-अप होते रहे... अब क्यों करें शट-अप ?
अब बतकहियों के वताशे फोड़ने का समय नहीं है, हम बहुत बौद्धिक जुगाली कर चुके.. कुछ कुछ चेतना जगी है.. तो क्यों करें शट-अप ?
पहले ही अधिकतर सामाजिक मुद्दों पर हमलोग इतने सहिष्णु हो चुके हैं कि कोई कुरीति कोई अनाचार हमारे लिये एक खबर मात्र बन कर रह जाती है, इसके उलट धार्मिक मुद्दों पर हमारी असहिष्णुता अव्वल दरज़े की रही है । किसी ऎरे गैरे का भगवा, और अलाने फलाने की दाढ़ी हमें श्रद्धावनत करती आ रही है ।
अफ़सोस तो तब होता है जब बुद्धिजीवी समाज जागरूकता में पहल करने के बजाये ’ क्या कहा जाये, अब किया ही क्या जा सकता है ’ जैसे ज़ुमलों में घुसे रहना पसँद करता है । हमारी तार्किक दृष्टि जैसे कुँद हो गयी हो । उनमें मनन का स्पष्ट अभाव है, हाल के वर्षों में मीडिया ने हम सबको तमाशबीन बना दिया है । जैसे घरों में बैठे बैठे चैनलों को कोट करते रहने में ही समग्र बुद्धिमता समाहित हो ।
आज देश की ज़रूरत यह नहीं है कि कहीं से एक नेता अवतरित होकर अपने पीछे जनसमुदाय खड़ा करे, बल्कि ज़रूरत यह है कि जनसमुदाय स्वयँ खड़ा होकर अपने मध्य से एक नेतृत्व खड़ा करे ।
डाक्साब!
जवाब देंहटाएं@ मॉडरेशन - अपने अपने अन्देशे :) आप ने 'टेस्टिंग मॉडरेशन' वाली टिप्पणी नहीं की;)
वैसे मॉडरेशन अच्छा विकल्प है। जब जब यहाँ रहा, कभी भी किसी टिप्पणी को मॉडरेट करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। इसके नहीं रहने के दौर में अलबत्ता एकाध टिप्पणियाँ हटानी पड़ीं क्यों कि उनमें सीधे सीधे मुझे व्यक्तिगत गालियाँ दी गई थीं - मैं, एक परिवारी व्यक्ति, 'प्रेमपत्र' कैसे लिख सकता था? कैसे कैसे मानक!
@ क्यों करें शट-अप... बहुत शट-अप हो चुका, हम स्वयँ ही शट-अप होते रहे... अब क्यों करें शट-अप ?
अब बतकहियों के वताशे फोड़ने का समय नहीं है, हम बहुत बौद्धिक जुगाली कर चुके.. कुछ कुछ चेतना जगी है.. तो क्यों करें शट-अप ? - जनता यही तो सत्ताधीशों से कह रही है। ये आन्दोलन जन की ऊब और आक्रोश को ही तो दिखा रहे हैं कि अब हम चुप नहीं रहने वाले!
जनसमुदाय ऐसे किसी एजेंडे पर नहीं चलता कि उसे फला काम के लिये एक नेता तैयार करना है। नेतृत्त्व क्षमता रखने वाले, किसी मुद्दे से जुड़ाव रखने वाले और उसे अभिव्यक्त करने वाले के आस पास लोग जुड़ते हैं और धीरे धीरे वह व्यक्ति जनाकांक्षाओं को सामने रखने वाला और संघर्ष करने वाला बन जाता है। वह व्यक्ति भी जन का ही अंग होता है।
भगवा और दाढ़ी वालों से जुगुप्सा स्वाभाविक है क्यों कि नेता और बाबा अपने कर्मों के कारण आज के दौर के दो सबसे घृणित वर्ग हैं लेकिन जब इतने वर्षों के बाद भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे उठे हैं तो सामान्यीकरण और सरकारी प्रचार/भ्रम तंत्र के चक्कर में उन्हें पुन: नेपथ्यगामी न होना पड़े, यह ध्यान रखना होगा। किसी अण्णा, किसी बाबा, किसी बेदी, किसी केजरीवाल को तो आगे रहना ही होगा। इनसे भी समर्थ और पाक साफ जन हैं लेकिन खुद को बिलवाये हुये हैं तो और क्या रास्ता है सिवाय इसके कि मुद्दे को जीवंत रखा जाय और प्रतीक्षा की जाय।
इन आन्दोलनों से जुड़े लोग अवश्य जारी बहसों, विमर्शों, आपत्तियों, आलोचनाओं को देख सुन रहे होंगे। आशा ही रखी जाय कि आन्दोलन दिन ब दिन निखरते जायेंगे। हाँ, अगर छलिये हैं तो उनका पतन अनिवार्य है लेकिन तब भी इस पूरी प्रक्रिया में जो हासिल होगा वह निश्चय ही मुद्दा/आन्दोलनविहीन स्थिति के प्राप्य से बेहतर होगा। व्यवस्था परिवर्तन धीमी प्रक्रिया है। क्रांतियाँ होती हैं लेकिन उनके पहले गर्भकाल भी होता है।
चलते चलते ...कभी लोग वकीलों से इतने आतंकित थे कि आज़ादी की लड़ाई में 'प्लीडरों के लीडर' बन जाने पर नाक भौं सिकोड़ते थे :)
भविष्य से भूत बदलता है।
....... यदि काले धन के लिए कानून बनेगा, तो ऐसा बिल्कुल नहीं कि रामदेव उस कानून से बाहर होंगे - वे भी उसके दायरे में उतना ही होंगे जितना अन्य लोग | बात रामदेव की नहीं - बात अँधेरे को दूर करने के लिए आगे आने की है ... ramdev is not stopping any one else from coming forward ... he is doing his part - what he feels right ....
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प्रिय व आदरणीय गिरिजेश जी,
इस मुद्दे पर अभी तक बहुत कुछ कहा गया है और अभी काफी कुछ आगे भी कहा जायेगा...
आप का पक्ष यहाँ जान अच्छा लगा... मुझे अपने पक्ष के दुहराव की आवश्यकता नहीं है... वैसे क्या हम कहीं और भी संवाद कर चुके हैं... ;)
इस बात पर शायद आप सहमत हों कि 'समय' आखिरकार सबसे बड़ा निर्णायक है... समय ही बतायेगा कि कौन सही है यहाँ पर... तब तक के लिये गुस्सा थूकिये व स्नेह बनाये रखिये...
और हाँ, लोकतंत्र में किसी को शटअप नहीं कहते !
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प्रवीण जी,
जवाब देंहटाएंसही गलत की बात तो वहाँ आती है न जहाँ व्यक्ति का पक्ष लिया जाय या उसके विरुद्ध हुआ जाय? मेरी बात मुद्दे की है और वह सही था, है और रहेगा। व्यक्ति या नेतृत्त्व आते जाते रहेंगे। अगर काला धन ऐसे ही जमा रहा और फलता फूलता रहा तो भले 'सही' साबित हो, इस देश का दुर्भाग्य ही होगा। बाकी तो कह ही चुका हूँ।
@ शटअप - अब आप को 'शब्द शक्तियों' के बारे में बताऊँ क्या? स्वयं ढूँढ़ लीजिये। अभी तिब्बत में व्यस्त हूँ जो कि एक सुखद अनुभव नहीं है। आप आये और अपनी बात कहे इसके लिये आभार।
भैया जी,
जवाब देंहटाएंभारतीय जनमानस आज भी तुलसी बाबा की मन्थरा द्वारा कहलवायी उक्ति पर चलता है कि
"को नृप होइ हमै का हानि, चेरी छोड़ ना होइब रानी"
और शायद यही मानसिकता हमे हर हाल में जिजीविषा भी प्रदान करती है। दुष्यन्त कुमार जी कि दो लाइने याद आ रही हैं:
"मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी कि व्यक्तिगत आलोचना है।।।।।।"
बहुत दिनो के बाद सिस्टम टीप करने दे रहा है सो टीपिया दे रहा हूँ, आपको पढ़ना हमेशा सुखद लगा है चाहे जो भी लिखा हो आपने. पितामह की एक बात याद आ रही है, कभी विनोबा जी आए थे हमारे गान्व (वर्तनी सही नही लिख पा रहा हूँ), और उन्होने अणुव्रत लेने का आग्रह किया था सभी उपस्थित सज्जनो से. साथ में यह भी कहा कि किसी को बताओ या ना बताओ, आपकी मर्ज़ी लेकिन इसका पालन ज़रूर करो. औरों का तो पता नही लेकिन मेरे पितामह ने जो अणु व्रत लिया बिना टिकट यात्रा नही करने का, उसका उन्होने जीवनपर्यंत पालन किया. लब्बोलुआब कहने का बस यही है कि नेतृत्व अपनी जगह पर, जनता को भी अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए. विनोबा जी का ही लिखा हुआ एक और लेख याद आ रहा है, ' जीवन और शिक्षण'. बहुत ही सटीक है आज के सन्दर्भ में.
सादर