कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

शेफाली

 

पहली किरणों के सम्मोहन से उबर किशोर ने झोला गले में लटकाया और द्वार की साँकल पर पाँव रख ऊपर चढ़ गया। काठ के तीरों से वस्त्र बचाते भीतर कूद पड़ा, भद्द!

 एक किशोरी की चीख सुन वह चकित रह गया। बाहर उजाले में हरसिंगार से बरसते मदगन्ध तले पहुँचा और वह मुड़ी।

अपार सौन्दर्य! वैसा तो कभी देखा ही न था। दोनों को समझ में नहीं आया कि नवरातन के पहले दिन हेतु चोरी छिपे फूल लोढ़ने कोई अन्य भी वहाँ आ कैसे आ सकता है? किशोर ने पूछा, फूल लेने आई हो?

पाटल दल खुले और दाड़िम दन्तावली मुस्कुरा उठी, नयनों के भँवरे उड़ चले,"हाँ, मैं उधर से, पड़ाव के पार से आई हूँ... माँ ने बताया था।" 

"किन्तु वहाँ तो बँगले पर ऐसे ही बहुत फूल हैं। यहाँ क्यों?" 

"जवाकुसुम नहीं हैं।"

"जवाकुसुम?"

"हाँ, नहीं जानते? वो रहे।"

"वे तो अड़हुल हैं।"

"अड़हुल? .... छि! कैसा नाम!"

दाड़िम दन्तावली पुन: खिल खिल चमक उठी। किशोर को नाम की नहीं पड़ी थी और पड़ी भी थी। नये पाये नाम में उसे बिहाने बिहाने सन्ध्या सुन्दरी दिख रही थी - साँझ की लाली में उड़ते धवल क्षौम। वह कुछ और सोचता कि सुनाई पड़ा, वे फूल तोड़ दोगे?

कँटीले तारों के पार अँड़हुल, नहीं, जवाकुसुम खिले थे - लाल लाल।

काठ के तीरों से बचा कर आया था किन्तु कालायस के काँटे तो जैसे थे ही नहीं। कैसे उस पार गया, ज्ञात नहीं, लौटा तो नयनभ्रमर प्रतीक्षा में थे। दुपट्टा पसर गया - इसमें, इसमें रख दो।

किशोर ने रखा और बचते हुये हरसिंगार के पुहुप चुनने लगा। वैसा ऊँचा, घना वृक्ष उसने कभी न देखा था, धरती पर देवी के भूषण बिछे थे, रजतपुष्प हिरण्य बिन्दु।

"हे, हे... भुँइया के फूल नहीं चढ़ते!" किशोर ने बिना देखे ही जवाकुसुम फूलते सुना।

"अम्मा कहती हैं कि हरसिंगार में दोष नहीं लगता।"

"अरे, जब पेंड़ से ले सकते हो तो भुँइया के क्यों चुनना?"

"गिरेंगे तो भुँइया ही न?"

"बुद्धू, देखो इधर।" 

किशोरी ने दुपट्टे का एक भाग भूमि पर बिछा दिया - अब हिलाओ पेंड़। देखूँ तो कितने बलवान हो!... 

.... किशोर वृक्ष हिला रहा है। झर झर झरते पुष्प किसी के आँचल में गिर रहे हैं। मुग्ध हँसी है, अनार फूले हैं, दुग्ध अभिषेक हो रहा है! 

"बस, बस, बस... मैं भी फूल भरी हो गई।"

किशोर को लगता है कि उसके केशों से कुछ फूल चुन लेने चाहिये किन्तु साहस नहीं होता।....

किशोरी ने पत्तों के दोने बनाये। उनमें हरसिंगार और जवाकुसुम भरे, किशोर के झोले में रखा - चलें अब?

किशोर अवाक सा या सपनों में या जाने कहाँ था। हाँ... कुछ और न कहा, जैसे आया, वैसे ही लौट गया।

दूसरे दिन से ले कर अष्टमी तक अनुमति नहीं मिली। अम्मा बोलती, साँप रहते होंगे उधर। वह मन ही मन कहता कि पहले दिन भी तो रहे होंगे, तब क्यों?

अन्तिम दिन पुन:। वहीं, वही दुहराव।

"अरे तुम बीच में आये ही नहीं?"

"नहीं, पहले और अन्तिम दिन ही विशेष होता है हमारे यहाँ तो।"

"हुस्स... नवो दिन होना चाहिये। इधर का लोग बोका है।"

"मैं नहीं था तो जवाकुसुम कैसे?"

किशोरी ने मुँह बना लिया - ट्राई की थी, यह देखो! उसकी बाँह पर गहरी खँरोचें थीं।

"माँ ने देखा तो माली को बोल दिया लाने को। मैं तो केवल शेफा... जानते हो, हरसिंगार को शेफाली बोलते हैं, शेफालिका। मेरा नाम भी शेफाली है... मैं तो बिना भुँइया गिरे फूल लेने आती थी, उतना नहीं हो पाता था जितना पहले दिन... तुम हर दिन आते तो कितना अच्छा होता।" 

जवाकुसुम चुन गये, दुपट्टे पर शेफालियाँ बरस गईं। दोने बनते व भरते देखता रहा किन्तु किशोर आगे कुछ पूछ नहीं पाया।

चलने के समय दाड़िम दन्तावली खिली, सोम को कलकत्ता चली जाऊँगी। जिसे माँ कहती हूँ न, वो मेरी मासी है। चलें अब?

"हाँ"

कुछ पग ही चला होगा कि सुनने को मिला... तुम बोका हो। खिल खिल खिल.... हरसिंगार की मादक गन्ध थी या हँसी की, किशोर कब घर पहुँचा, पता ही नहीं चला।

तब से आज तक हर लता, हर वनस्पति में वह शेफाली देखता है और उसे केवल एक रहस्य न जान पाने का दु:ख रहता है - वह भीतर आती कैसे थी? क्या वह भी द्वार के ऊपर से कूद कर?... नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। 

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

डेट

शनिवार का दिन समुद्र के किनारे डूब रहा था और मैं प्रतीक्षा में था। उसे अनजान भेंट ही कहूँगा, ब्लाइण्ड डेट में किसी ऐसे परिचित का होना अनिवार्य होता है जो दोनों को मिला दे। हमारे साथ ऐसा नहीं था, इंटरनेट को  मनुष्य तो नहीं कह सकते न!
साँझ की थकान में नीचे आ गये सूरज के साथ पश्चिम के मकान भी पियरा गये थे। मुझे थमी सी बयार साँवरी लग रही थी जिसके रुख पर हल्दी का लेप लगा था। मैं अपने में मुस्कुराया – परिवेश भी मनुष्य की नकल करता है। यहाँ की साँवली महिलायें मुख में हल्दी लगा घूमती जो हैं! पूरब में बदली सी थी या धुन्ध, पता नहीं लग रहा था लेकिन इतना अवश्य था कि किनारे घूमते सैकड़ो लोगों में कोई साँझ में यूँ डूबा न होगा जैसा मैं था। सब अपने आप में मगन थे। हहरते सागर में कोई कितने संवाद घोल सकता है! मैं चकित भी था।
मनुष्य अकेलेपन से कतराता है। जो भी उसका विस्तार है वह भीतर के निर्वात को भरने के लिये ही है जिसे उसने जाने कितने भागों में बाँट अलग अलग नाम दे रखे हैं। मैं भी उससे बचना चाहता था। यह भी कह सकता हूँ कि एक पचपन साल के किरानी के लिये वह अनिवार्य है, तब जब कि न कोई मित्र हो, न पत्नी हो और न बच्चे। उस दिन जाने क्या सूझी तो एक डेटिंग साइट पर चला गया, यह सोच कि कोई मिल ही जाय। मुझे किसी स्त्री मित्र की चाहना नहीं थी लेकिन ऐसी साइट पर किसी पुरुष का पुरुष मित्र ढूँढ़ना तो उसे समलैंगिक अधिक सिद्ध करता जो कि मैं हूँ नहीं। इस हास्यास्पद कारण से ही मैं स्त्री मित्र ढूँढ़ने निकला।
पुलिस द्वारा अपराधी की जाँच पड़ताल सरीखे प्रश्न झेल कर प्रविष्ट हुआ तो उबकायी आने लगी। कुण्ठाओं के लिजलिजे चित्र सर्वत्र बिखरे थे। साइट डिजाइन करने वाला पक्का कुलोचन होगा, यह तय था। यूँ ही पन्ने पलटते एक चित्रहीन प्रोफाइल पर ठहर गया। आयु 35 वर्ष, ऊँचाई 4'4'', रुचि 55-60 की वय-परास के पुरुष। विचित्र सी प्रोफाइल उलझाने वाली थी – ड्रॉप डाउन में वय चुनने में त्रुटि हुई होगी जिसे उसने बहुत दिनों से देखा ही नहीं होगा लेकिन प्रोफाइल तो सक्रिय थी। उत्सुकता में मैंने अपनी पसन्द जाहिर कर दी... 4'4"! हूँ।
... चैट से होते होते बातें जाने कब मोबाइल पर आ गईं और हम खुलते चले गये लेकिन हमने एक दूसरे का न पता जाँचा और न चित्रों की अदला बदली की। इस नम सीझते नगर में उमस बढ़ती जाय तो जीना मरना हो जाता है। ऐसे ही एक दिन का जब मैं रोना रो रहा था तो वह खिलखिला उठी – पता है? मैं सप्ताह में बस तीन दिन ही नहाती हूँ। मैंने उसे फूहड़ गन्धिनी कहते हुये बताया कि मैं दिन में दो बार।
तो मिल कर जान ही लें कि कौन अधिक गन्धाता है और किसकी खाल धुलते धुलते इतनी पतली हो गयी है कि बयार भी चुभने लगी है? – प्रस्ताव उधर से ही आया और शनिवार का दिन तय हुआ।
उसने पूछा – तुम्हें पहचानूँगी कैसे?
मैंने तुरंत बताया – काली टी शर्ट। इस नगर में कोई और नहीं पहनता होगा।
“क्यों भला?”
“मैंने आज तक नहीं देखा। काले पर जमे पसीने की धारियाँ भद्दी जो लगेंगी, सूरज सोख कर देह स्वयं अपने को घायल कर लेगी सो अलग!
खनक तेज हुई – अच्छा, तो कहाँ मिलेंगे?
“वहीं जहाँ मरुधर को उसकी लल्ली ने विदाई दी थी।”
वह प्रगल्भ हो चली – आना पक्का, साँझ को जब दिन डूबने लगे लेकिन आर्यश्रेष्ठ! इन दोनों का परिचय भी करायेंगे?
मैंने हँसते हुये उत्तर दिया  - अरे, एम जी आर और अम्मा, और कौन? 
दूसरी ओर अचानक ही शांति छा गयी। मोबाइल एकदम से कट गया। मैंने दुबारा मिलाया लेकिन आउट ऑफ कवरेज बताने लगा।
आने वाले दो दिन कोई बात न कोई चीत। मैं पुनरावलोकन करने लगा – मेरी हँसी में हल्कापन या असहज करने वाले संकेत तो नहीं थे? क्या कारण हो सकता है, वह ऐसी प्रूड तो नहीं है। मैंने कुछ अवांछित तो कहा नहीं!
पता नहीं, लेकिन मैं जाऊँगा अवश्य...
...बालू के ऊपर दूर तक दुकानें टिमटिम हो चलीं थीं। नीचे रेती की पियराई सलवटों पर झँवराई चढ़ने लगी थी लेकिन उसका कहीं पता नहीं था। मैं ऐसे सोच रहा था जैसे उसे पहचानता होऊँ। विरक्त हो मैंने पूरब की और दृष्टि फेरी, आश्चर्य हुआ कि बादल इतने लाल थे जैसे उनके पीछे दूसरा सूरज छिपा हो। छलना, मैं बुदबुदाया। ऊब इतनी गहन हो सकती है कि ध्यान की उच्चतम स्थिति जैसी हो जाय। उस किनारे तक पहुँच चुका था  फिर भी मैं बैठा रहा, मरुधर से जया मिलेगी ही। 

पश्चिम को निहारते आँखें थक गयीं - उस कद की कोई न दिखी कि पीछे से किसी ने कन्धे पर थपकी दी - सॉरी देव, विलम्ब हो गया। वही थी, कुछ लोगों का स्वर मोबाइल से इतर कितना मधुर लगता है न! 
मैंने आँखें घुमाईं और ठगा सा रह गया - अवस्था उतनी ही थी लेकिन देह तो सामान्य ऊँचाई की थी। अंग्रेजी औपचारिक वेशभूषा में वह आकर्षक लग रही थी, पाँव में साधारण चप्पल ही थे, हाई हील नहीं। मुझे मुँह बाये देख वह खिलखिला उठी - अरे, जया को आसन ग्रहण करने के लिये नहीं कहेंगे आर्यश्रेष्ठ! 
वह सुन सके ऐसे मैं बुदबुदाया - उपविश द्रविड़े! और हम दोनों खिलखिला उठे। 
उसने कहा - यू डॉण्ट लुक दैट ओल्ड।
मैंने पलट कर कहा - तुम भी उतनी नाटी नहीं हो नॉटी! 
मैंने एक नारियल पानी उसे थमाया और दूसरा स्वयं ले लिया - सही सही बताओ, क्या करती हो? 
उसने उत्तर दिया - एक प्राइवेट फर्म में फाइनेंस देखती हूँ। गुड्डी और मेरे लिये पर्याप्त है। 
“गुड्डी? 
हाँ, मेरी बहन है। बंगलोर में एम सी ए कर रही है।
मैं चुप हो गया। मौन कुछ खिंचा तो उसने ढीला किया - चुप क्यों हो गये?
मैंने प्रतिप्रश्न किया - अम्मा और एम जी आर कहने पर तुम एकदम से क्यों चुप हो गयी थी?
उसने ठंढे स्वर में उत्तर दिया - उस बात को आगे बढ़ाना ठीक नहीं होगा। पहली भेंट का स्वाद न बिगाड़ो, नारियल पानी पियो।
मैंने मनुहार सी की - बताओ न? 
उसने बात घुमा दी - जानते हो, एक तमिळ कवि हुये हैं जिन्हों ने नारियल की तुलना पयोधर से की है। तुम्हारे हाथ में जो है उसे देखो तो! 
वह कौतुक के साथ मुस्कुराने लगी। मैं लजा सा गया। 
“ए, , ए ... द ओल्ड मैन इज ब्लशिंग!”
उन खिलखिलाहटों से समुद्र की गरज भरती गयी ठीक वैसे जैसे साँझ को बाबा की धीर गम्भीर समझावन के बीच यकायक माँ किसी बच्चे को दुलराने लगती थी। साँवरी के दाँत चमक उठे और मैंने कहा - बस, बस ... मेघ बरसने लगेंगे। बाढ़ से मुक्त हुये अभी अधिक दिन नहीं हुये।
वह सहसा चुप हो गयी और मैंने मन में उपमा गढ़ी - जैसे बादलों के बीच प्लेन का इंजन यकायक बन्द हो जाय और वह नीचे धँसने लगे - सूँ sssss...

प्रकृतिस्थ हो उसने कहा - कुछ अपने बारे में कहो जेंटिल ओल्ड मैन।
मैंने प्रतिवाद किया - ओल्ड कहना आवश्यक था? 
उसने मुस्कुरा कर उत्तर दिया - हाँ, नहीं होते तो मैं तुमसे बातें कर रही होती?
 बताओ, कहाँ से कहूँ?
अपने ब्याह से। 
हैं? 
हैं नहीं हाँ। चलो, बढ़ो।
कुछ खास नहीं। कॉलेज में था तभी हो गया था।
हैं, हैं, हैं ... लभ्भ मैरिज? द ग्रेट ओल्ड मैन - उसने अपने वक्ष आगे कर होठों पर हाथों से मूँछों की भंगिमा बनाई।
न्न रे, मैं मनहूसियत की सीमा तक मासूम था। सभी यौवनाओं का छोटा भाई। सोच कर ही हँसना आता है। 
इसमें हँसने की क्या बात हुई?
हाँ, रोने की बात है। 
रोने की भी नहीं है। आगे, आगे क्या, कैसे हुआ? 
कुछ नहीं। हमलोग बचपन में ही ब्याह दिये गये थे। सयाना हुआ तो उसे ले आया, गवना कहते हैं हमारे यहाँ। 
उत्सुकता में उसकी आँखें और काली हुईं थीं या नहीं लेकिन मुझे तो लगीं। वह उठ खड़ी हुई - वाह भइ वाह ... सुनो सुनो, सुनो इक प्रेमकहानी। लब्भ लेटरी। खूब चिट्ठीबाजी होती होगी?
नहीं रे, उस आयु में यह सब कहाँ हो पाता? जब तक समझ आती, तब तक घर का बूढ़ा अपनी पगड़ी बेटे के सिर पर रख हुक्का गुड़गुड़ाने चल दिया होता।
ऐसा क्या? ...तुम्हारे बाबा कब...?

उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया और मैं बमक उठा - मरे तुम्हारा बाप। मेरा अभी भी जीवित है और तुम जैसियों को आज भी अपनी मूँछों में बाँध कर नचा सकता है!
“सॉरी बाबा, सॉरी। उनको मेरी आयु के भी दसेक बरस लग जायें। बताओगे भी कि क्या करते हो?”  
“तुम्हारी ही तरह नौकर हूँ। ऊब कर यहाँ भाग आया।
“मैं ऊब के लिये नहीं, खूब के लिये आयी हूँ।
मैंने पूछा – खूब?
यस, टू अचीव स्टेट ऑफ फुलफिलमेंट। तुम भी यहाँ इसीलिये हो। हम सभी अपने खालीपन को भरने को व्याकुल कोटर भर हैं – उसका गम्भीर उत्तर था जो मुझे आतंकित कर गया।
जैसे किसी खंडहर के वृहद रखरखाव कार्यक्रम के दौरान हुई पुताई ने पुराना भले छिपा दिया हो लेकिन वह जहाँ तहाँ से झाँक रहा हो।  उसकी हिन्दी वैसा ही प्रभाव दे रही थी। मैं आतंकित सा हो रहा था – कोई छलना तो नहीं?
पूछ बैठा – तुम्हारी हिन्दी ...? उसकी आँखों की हँसी ने आगे पूछने नहीं दिया।

प्रस्तावना तो लम्बी दे सकती हूँ लेकिन समय नहीं है, कहते हुये वह पास खिसक आयी। मैंने भी पार्श्व में खिसक उसके कन्धे पर अपना सिर रख दिया, झुरझुरी का अनुभव मुझे हुआ लेकिन देह कौन सी, अलग नहीं कर पाया। हम दोनों क्षितिज देखने लगे, अचकचापन छिपाने को इससे अच्छा क्या हो सकता था?  
तनिक विराम के पश्चात उसने जारी रखा – हमलोग मूलत: गोवा से थे। पापा की पोस्टिंग बनारस में थी। सागर किनारे से गंगातीरे का यह संयोग ऐसा था कि मुझे आज भी लगता है दुबारा नहीं हुआ होगा। मेरा बचपन गंगा के रामनगर तट की बालुका में खेलते बीता, नाव तो नाव, कई बार तैर कर भी उस पार पहुँच जाती। पापा अजातशत्रु थे लेकिन एक दिन पता नहीं क्यों, किसने, पुलिस आज तक पता नहीं लगा पाई, उन्हें काशी स्टेशन पर गोली मार दी। टिकट मैं ही ले आई थी, कैंट स्टेशन पर मैंने ही विदा किया था...

...मौन कितना लम्बा खिंच सकता है? कितना भी लेकिन मृत्यु इतना नहीं। आँसू मृत्यु के तनाव को बहा देते हैं और हम व्यर्थ ही समय को श्रेय देते हैं।...मुझे ‘उसकी हिन्दी’ समझ में आ गई थी।

उसने एक बार मुझे भरपूर निहारा जैसे कुछ पढ़ सी रही हो और पुन: उस क्षितिज की ओर हो गई जो अब था ही नहीं – सबके पास संघर्ष की कोई न कोई कहानी होती ही है। तुम्हें सुना कर बोर नहीं करूँगी। ‘जया और मरुधर’ पर मेरी प्रतिक्रिया तुम्हें सता रही होगी, सुनाती हूँ कि ऐसा क्यों है?
इस बार उसने मेरा सिर खींच कर अपने कन्धे पर टिका लिया – रखे रहो, भरोसा होता है... पुरुष समाज में स्त्री अवचेतन में तीन पुरुषों की कामना रखती है, पिता, भाई और संगी। पुरुष कितनों की रखते हैं, मुझे नहीं पता। क्यों रखती है, बताना मेरे वश का नहीं। तीनों अलग अलग हों, कोई आवश्यक नहीं। कभी कभी वह निरे रक्त सम्बन्ध और बॉयोलॉजी से बहुत आगे बढ़ जाती है। किसी एक में तीनों मिल जायँ तो उससे अच्छी बात कोई हो ही नहीं सकती।
न, न, सिर न हटाना, उसी के सहारे तो कह रही हूँ। इस समय तुम तुम नहीं, मेरा आरोपण हो।
जया के पिता उसके बचपन में ही चल बसे थे, यह कहें कि वह इतनी छोटी थी कि उसे स्मृति ही नहीं तो अतिशयोक्ति न होगी। मरुधर में उसकी खोज पूरी हुई। संसार किसे अवैध सम्बन्ध कहता है, वह संसारातीत होता है, सम नहीं विषम किंतु सम को समोये। संसार रखैल और कुलटा कहता है तो वह उसके मानक होते हैं लेकिन उनका क्या जो उन मानकों से अपने को परे रखते हैं? एकाध बजर ढींठ हो जाते हैं, परवाह नहीं करते। जया और मरुधर भी, उन्हीं में से एक ...

... घिरती साँझ और पीली हो चुकी थी। दूर कहीं गेरुवा काला हो रहा था और मैं अपनी पूरी देंह को भिगोते स्वेद का अनुभव कर रहा था। सिर उठा कर देखा और पुन: रख दिया। तट पर दीप्त होते एकाध लट्टुओं की पृष्ठभूमि में किलोल करते घूमते लोग आँखों में स्थिर हो गये। सिर ही नहीं सब कुछ स्थिर था। कैसी चलती फिरती स्थिरता थी! जाने कब उसके कन्धे भीगे होंगे। मुझे नहीं पता कि मेरे आँसू थे या दो देहों के स्वेद, इतना याद है कि उसने अपने कन्धे और मेरे सिर के बीच अपनी हथेली लगा दी थी। उसके कहे  नारियल पयोधर और हाथ की सोच मैं सिहर उठा, मेरा सिर!...

मैं लेट गया और वह मुझे थपकी सी देने लगी – आगे और सुनोगे?
“हूँ”, मैंने बच्चे सी हुँकारी भरी।
“संगी ढूँढ़ ली हूँ, भाई और पिता की खोज ने मुझे डेटिंग पर विवश किया। कन्यादान के लिये ये दोनों चाहिये न। तुम किसलिये यहाँ हो, जानती हूँ। सोचो कि महानगर में एक आधुनिक कुमारी बाप और बीर कैसे ढूँढ़ पाती? नियति के तार में कोई कोई अपने आप से नहीं जुड़े होते, जोड़ने पड़ते हैं। सोचो कि वैसा विचित्र प्रोफाइल नहीं देती तो तुम कैसे मिलते? ... हो सकता है कि तुम अभी तक उबर न पाये हो लेकिन मेरा मन कहता है कि तुम्हारा मन समझ गया होगा। तुम यहाँ नर मादा सम्बन्ध के लिये तो नहीं आये थे न?”
मैं ने हुँकारी भर दी।
“तुम साइट पर परिपाटी से परे एक नितांत अपने वाले की खोज में रैण्डम आजमाने गये थे और मैं मिल गई। लकी हो या नहीं?”
मैंने पुन: हुँकारी भर दी।
“मैं भी लकी हूँ। ... अपने को कहाँ फिट पाते हो? बताओ?”

साँझ अब साँझ नहीं रह गयी थी। लट्टुओं ने गतर गतर उदास उजाला छिड़क दिया था और मैं गढ़ुवाये आकाश में आकार ढूँढ़ रहा था। लेटे ही लेटे मैंने उसे अपनी ओर खींचा और वह मुझ पर उतर आई। उसका सिर हाथ में ले और निकट किया तो निकटता में परफ्यूम की धीमी गन्ध घुल गई। उसकी साँसें दुधमुँहे बच्चे सी महक रही थीं। होठों से हट मैं मस्तक चूमने चला, लगा कि कुछ अवांछित मन में है इसलिये हिचक है। जाने कहाँ से किसी मेक्सिकन फिल्म का दृश्य ध्यान में आ गया जिसमें एक युवा पुत्र ने अपने पिता की मित्र से लजाते हुये कहा था – डैड अभी भी मुझे होठों पर चूमते हैं!
मैंने खींच कर सीने से लगा उसके होठ चूम लिये। दुधमुँही को जैसे जीवन मिल गया था।

...वापस आते हुये उसने अपनी बाँह मेरी बाँह में फँसा दी, फेल्ट कैप को मेरे सिर से उतार अपने पर रख लिया और यूँ सट कर सहारा लेते चलने लगी जैसे प्रेमी प्रेमिका चलते हैं। उसने चुहुल की – योर फ्रेम फिट्स बेटर दैन योर फ्यूचर सन इन लॉ। इस अन्धेरे में जो देखेंगे कहेंगे क्या जोड़ी है!   
“बापू, कल ठीक ठाक हुलिया बना पाँच बजे शाम को कन्नगी की प्रतिमा के पास आ जाना, भावी जामाता से मिलना होगा। आना अवश्य नहीं तो देवी कन्नगी का शाप तुम्हारे पुहार की ऐसी तैसी कर देगा।
चेन्नई कडक्करइ का लोकल रेल स्टेशन पास आ गया था। उसने कहा, यहीं ठहरो टिकट ले कर आती हूँ।
मैंने रोका -  रहने दो, मेरे पास मासिक टिकट है।
“तुम्हें विदा भी तो करना है बापू! टिकट तो लूँगी ही। अगले स्टेशन पर फिर से मर मरा मत जाना। बीर को भी तो ढूँढ़ना है।... हे, हे, हे। मजाक कर रही थी, अब टाइम नहीं ढूँढ़ ढाँढ़ की। तुम्हीं सब हो। फेमिली बनाने में और लेट नहीं करनी!


उसने फेल्ट कैप वापस मेरे सिर पर रख दिया और मैं टिकट की प्रतीक्षा में वहीं कर्ब पर बैठ गया। नीचे समय की दबी हुई रेत थी – काशी की मीठी बालू, चेन्नई की नमकीन।  
__________________
- गिरिजेश राव      

शनिवार, 12 सितंबर 2015

कहनी कहानी

कहानियों का मेल कहने से बैठता है लेकिन हर कहा हुआ कहानी नहीं हो पाता। होने भर और हो पाने का विभेद कहानियाँ मिटा देती हैं।  जब मैं कहानी शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ तो मेरा कहनाम न तो संस्मरण से है और न ही उन ऐतिहासिक व्यक्तियों या घटनाओं से जो महाकाव्य और अतिशयोक्ति बन देवताओं और देवियों को अमरत्त्व और सौन्दर्य प्रदान करते हैं। कहानियाँ घटनाओं की निर्जीव समुच्चय नहीं, उनकी जीवित देह होती हैं जिसमें रक्त के स्थान पर अमृत बहता है और साँसों के स्थान पर शाश्वत भावनायें। कहानियाँ सबकी होती हैं और किसी की भी नहीं! मूर्खता वश ही सही या सही कहें तो उत्सुकता भर मैं प्राय: स्वयं से पूछता रहा हूँ कि पहली कहानी किसने रची होगी? यह प्रश्न अपने आप में एक कथ्थक की प्रस्तावना है, उस कथ्थक की जो कहते हुये थकता नहीं।
अपने सृजन में एक कहानी नितांत वैयक्तिक होती है लेकिन ओठ से मुक्त होते ही या यूँ कहें कि मन में उठान पाते ही सबकी हो जाती है, कह जो दी जाती है! यह वह चादर होती है जिसे किसी ठिठुरती रात में समय को उसका सही स्थान बताने और पीड़ा को विश्राम देने के लिये कोई माँ बच्चों के साथ ओढ़ती है और ऊषा की ऊष्मा छिटकते ही पंछियों के साथ आकाश की और छोड़ देती है कि जाओ, पूस की रातों से कुछ बच्चों को बचाओ! कड़कती धूप भरे दिन में दुपहरिया छुट्टी की छाँव होती है कहानी। तब जब कि श्रम सीकर सूखते हैं और भीतर की उमस थकान से बातें करती है कि देखो न! हाथों की झुर्रियाँ रेखाओं से उलझ नियति की लेखनी बन गई हैं, तो ऊँघते सपनों के नीरस भोजपृष्ठ रंगीन होने लगते हैं, काले, नीले, लाल, पीले। थके प्रकाश वाली साँझ को जब गमछा चिंताओं को खोलता बिछता है तो ओठ पर वे रंग सजने लगते हैं जिन्हें उकेरना किसी के वश का नहीं, कथ्थक के भी नहीं। कहानियाँ अनकही कहन होती हैं, कह भर देने से अपराधबोध टूटता है कि अब तक क्या जिये और एक नया दिन सामने आ खड़ा होता है, चलो, जीने को समय की किल्लत कभी नहीं!
कहानियाँ अच्छी या बुरी नहीं, बस होती हैं, वैसे ही जैसे रामसिंह किसान होता है और उसके बैल होते हैं। वैसे ही जैसे सचिव मीरा और उसकी कोई बॉस होती है, वैसे ही जैसे किसी भास्कर की कोई लीलावती होती है। इन सबकी तरह ही मुझे आज तक कोई भी अच्छी या बुरी कहानी नहीं मिली। अनजान, पास होते हुये भी किसी दूसरे लोक सम दूर जन में अच्छा क्या, बुरा क्या? पहचान भरा अचीन्हापन कहानियों को शाश्वत बनाता है। भीतर का सारा दुःख सुख हम उनमें उड़ेल उन्हें शून्य पी एच का बना देते हैं। उसके बाद कोई अच्छाई, कोई बुराई हमें भिगोती सताती नहीं। एकदम सहज भराव के साथ हम प्रारम्भ करते हैं – एक अच्छी परी थी और एक बुरा राक्षस... विश्वास करो, कहानियाँ अपने आप में अच्छी बुरी नहीं होतीं, वे प्रार्थना भरी होती हैं। मनुष्य की पहली ऋचा ‘अग्निमीळे’ से नहीं, उससे पहले, बहुत पहले ‘एक’ से प्रारम्भ हुई – एक था बच्चा, एक थी गइया... आश्चर्य नहीं कि मनुष्य की सबसे विवादास्पद खोज ईश्वर भी ‘एक’ ही है!
प्राणवायु के पश्चात जो सबसे आवश्यक उपादान है वह कहानी है। मनुष्य भूखे प्यासे रह सकता है लेकिन कहानी के बिना नहीं। यह कथन बहुत विचित्र गल्प सा लग सकता है लेकिन इस पर ध्यान देने से कि बात मनुष्य की हो रही है, स्पष्ट होने लगता है। क्षुधा और तृप्ति के बीच जो कुछ भी घटित होता है वह कहानी नहीं तो और क्या है? वायुमंडल का प्रदूषण यदि अब भी पराजित है तो वह इसलिये कि उसमें अरबो खरबो वर्षों की कहानियाँ घुली हुई हैं। कहानियाँ न मरती हैं और न हमें मरने देती हैं। अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है कि हम जब तक जीते रहेंगे, कहानियाँ कहते रहेंगे और जब तक कहानियाँ घटती रहेंगी, हम जीते रहेंगे। तुम कहोगी कि ऐसे तो प्रलय कभी होगा ही नहीं? जी, प्रलय जैसा कुछ होता ही नहीं। लय भर होता है। उसमें अनकही कहानियों के आवर्त होते हैं, आवर्त से अनुनाद और अनुनाद राग भर किसी स्तनाग्र से दुग्ध धार फूट पड़ती है। मनुष्य के बच्चे पहली रुलाई रोने लगते हैं – केहाँ, केहाँ ...
... ठहरो, ठहरो! तुम्हारी बात में दोष है, उलट पलट है।
धुत्त! तुम इस समय ‘व्यस्त’ हो इसलिये ऐसा कह रही हो। आज छुट्टी के समय किसी छाँव में बैठ विराम लेना, तुम्हें पहली कहानी सुनाई देगी, एक था मनु, एक थी शतरूपा और एक थी इड़ा। उस समय कान में कहते समीर से कहना - ठहरो, ठहरो! तुम्हारी बात में दोष है, उलट पलट है। वह हँसेगा, खूब हँसेगा। तुम भी मुस्कुरा नहीं दी तो कहना ...        

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

...एक सुख ऐसा भी

 कुछ इलाकों की हवायें ऐसी बोझल होती हैं कि उनका भार वही जान पाता है जिसकी नाक लम्बी हो। आप पूछेंगे कि नाक और भार? ये क्या बात हुई? मैं कहूँगा जैसे आप जान नहीं पाते वैसे ही समझ भी नहीं पायेंगे, छोड़िये।

कुआर के घाम में दिन भर भागदौड़ करते मैं बेतहाशा छींकता रहा। साँझ होते होते स्थिति ऐसी हो गयी कि नाक छिल गयी थी, पेट में भूख किंतु जीभ को इनकार। ऐसी स्थिति भी हो सकती है! पहला साक्षात्कार था। कपड़ों के नीचे मधुर गन्धी डियो मेघ तब स्वेद सन मानुषगन्धी हो चले थे और थकान संपूर्ण।

 अयोध्या स्टेशन पर गाड़ी में बैठाने साधू बाबा लाख मना करने पर भी साथ आये थे तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक नहीं, रोगी के साथ कोई भी हो परिचारक होता है। हाथ में भोजन की पोटली थमाने लगे तो मैंने मना किया काशी बहुत दूर नहीं बाबा, मन नहीं है। बाबा के श्मश्रु ढके होठों पर स्मित खो गयी मन तो मनाने से मानता है बेटा! रामरस है, पा लो। सीता की रसोई अन्नपूर्णा के द्वार किसी को भूखा कैसे भेज सकती है? मरजाद तो रखनी ही होगी।

सीता की रसोई! भीतर कुछ ढहता चला गया, अनमने ही मैंने हाथ बढ़ा थाम लिया और उनके हाथ आशीर्वाद में उठ गये - भाग्यवानों को भगवान का प्रसाद मिलता है। सुख पाओगे।

ट्रेन चल दी।

कूपे में एक वृद्ध दम्पति मेरी सीट की ओर बैठे हुये थे। मेरे कहने पर खाली करते उनके चेहरों पर परिचय की झाँकी उभरती सी दिखी लेकिन मैं भीतर बाहर उदासीन ही रहा। देखने से ही सतलज तीर के वासी लग रहे थे, ट्रेन भी तो वहीं से गंगा को जा रही थी। बैग जमाने के बाद मैंने सामने की फोल्डेबल टेबल पर पोटली पानी रख दिया और एक काम यह भी हो जाय, सोच कर उसी समय पोटली खोल दी। दृष्टि ऊपर उठायी तो साइड बर्थ पर बैठे दम्पति को स्वयं को एकटक घूरता पाया। मन ही मन मैंने कहा आप की सीट तो थी नहीं, खाली करा दिया तो इतना मनमैल! आधी बोगी खाली पड़ी है, कहीं चले क्यों नहीं जाते?

भोजन आरम्भ किया और भीतर विचित्र सी ऊष्मा उगने लगी। एलर्जी वालों को कई बार ऐसे अनुभव होते हैं जिन्हें ऐन्द्रजालिक कहा जा सकता है लेकिन इस बार ऊष्मा भौतिक वास्तविकता थी। ए सी डिब्बे में भी पसीना आना शुरू हो गया और जीभ पर स्वाद भी। कौर दर कौर रस भीनने लगा और ललाट पर पसीना भी बह चला।

 क्या सोचते होंगे वे लोग? कैसा भुक्खड़ है ये? – स्वयं को कोसते मैंने उनकी ओर देखा तो वे अब भी घूरे जा रहे लेकिन अब उनके चेहरों पर प्रगाढ़ परिचय और वात्सल्य के भाव स्पष्ट थे। मैं झुँझलाया ऐसे भाव मुझे ही दिखते हैं या औरों को भी? मैं तो इन्हें जानता तक नहीं! भीतर चुगली हुई वे तुम्हें जानते हों तो? जिसे मैंने चुप करा दिया। साफ सफाई के पश्चात पसीना सुखाने मैं पंखे की ओर खिसक कर बैठ गया। पढ़ने के लिये नया ज्ञानोदय निकाला ही था कि वृद्ध ने पूछा बेटा जी, बनारस जा रहे हो? मेरे हूँ पर उन्हों ने बात आगे बढ़ायी हमलोग भी वहीं जा रहे हैं। मैंने दुबारा हूँ की तो इस बार वृद्धा ने शिकायत की देखो न, आधी बोगी खाली है लेकिन मुझ सीनियर सिटिजन को तब भी साइड अपर बर्थ दिया, मान लो आगे तक जाना होता तो? बूढ़ी देह कैसे चढ़ पाती? नासपीटे!

नासपीटे सुन कर मेरी रुचि जगने सी लगी, वैसे भी ज्ञानोदय में कुछ खास रचनायें नहीं थीं।

मैंने उन्हें समझाया इसे यूँ देखिये न, आगे के स्टेशनों पर औरों के आरक्षण होंगे और जिन्हें रात की यात्रा करनी होगी, उन सीनियर जनों को लोअर बर्थ दिये गये होंगे। टीटी अभी चेक करने आयेंगे तो बात कर लेंगे, तब तक आप नीचे ही लेट जाइये।

वृद्धा और वृद्ध की आँखें मिलीं, चेहरे चमके और तुरंत गहरी उदासी घिर गयी। प्रकृतिस्थ हो वृद्धा खाँसने लगीं कोई नहीं। ठंड है, कुछ गरम मिल जाता तो ... उन्हों ने बात छोड़ मेरी ओर एक ताम्बे का पुरायठ सा डिब्बा बढ़ाया बेटा, जरा इसे खोल दो। हमलोग कोशिश किये लेकिन मुआ जाने कैसा चढ़ गया है, खुलता ही नहीं! डिब्बा ले कर मैंने यंत्रवत ही प्रयास किया, नहीं खुला। दोनों जाँघों के बीच उसे दबा दोनो हाथ लगा घुमाया तो खुला। वृद्ध दम्पति और खुल गये तुम्हारी पैंट गन्दी हो गयी। मैंने देखा कि सफेद पैंट पर निशान पड़ गये थे। वृद्धा ने कहा रुमाल पानी में भिगो कर ले आओ बेटा, साफ हो जायेगा।

मैंने कहा छोड़िये भी आंटी, घर पर साफ हो जायेगा। पानी का दाग देख लोग जाने क्या सोचने लगें! इस बात पर हम तीनों एक साथ हँस पड़े।

 कोई कोई हँसी ऐसी होती है जैसे बाँध दरक रहा हो और पानी धीरे धीरे प्रवाह पा रहा हो। वे दोनों ऐसे ही हँसे थे हालाँकि  मैं यह देख थोड़ा उलझा भी कि उन्हों ने डिब्बा वापस वैसे ही झोले में रख दिया था।

आप लेटेंगी?”

नहीं। ...सीट का रेक्सिन बहुत गन्दा होता है। चादर हो तो लेटूँ।

वह तो है न!

बिछायेगा कौन? ... मेरे हाथ काँपते हैं। इन्हों ने बिस्तर ताउम्र कभी नहीं लगाया, ढंग ही नहीं आता।कह कर वृद्धा हँस पड़ीं और वृद्ध बस मुस्कुरा दिये। मुझे अब अजीब नहीं, अच्छा लगने लगा था।

घर पर जैसे तैसे मैं ही लगाती हूँ लेकिन यहाँ जाने क्यों .... ट्रेन भी कितनी हिल रही है!

मैं लगा देता हूँ।अपने स्वर में मैंने निर्णयमिश्रित अनुमति की माँग पाया।

हाँ, लगा दो ... तकिये का कवर भी बदल देना। कम्बल नहीं। ... वो जो काला बैग है न, उसमें से मेरी शाल निकाल जब चादर ओढ़ लूँ, तब ऊपर से डाल देना।

वृद्धा लेट गयीं तो वृद्ध ने शुरू की क्या करते हो बेटा?

नौकरी।
बनारस में कहाँ रहते हो?”

कमच्छा पर।

वहाँ से घाट कितनी दूर है?”

पास ही है। आप लोग कहाँ ठहरेंगे?”

पंडे वाला आयेगा, जहाँ ठहराये... तुम्हारे कितने बच्चे हैं बेटा?”

जी, अभी तो साल भर हुये बन्धन में बँधे।

अच्छा, अच्छा ...

मैं स्वयं से ही पूछ पड़ा ये नवाँ दशक है क्या? ट्रेन में ऐसी बातें इस युग में ...

कुछ कहा बेटा?”

नहीं तो।

बुढ़ापे में कान बजते हैं ... ह, , ह।

वृद्धा उठ बैठी थीं बहू काम पर जाती है बेटा?

नहीं अम्मा, घर सँभालती है।

सहज ही निकल पड़े अम्मा शब्द पर हम तीनों चौंक से गये।

ठीक है बेटा... तुम्हारे भाग कि घरनी मिली, फिकरनी नहीं।

वे दोनों हँस पड़े थे।

फिकरनी? माने??”

अरे, बाहर भी खटे और भीतर भी तो कामधन्धे वाली फिकरनी ही रहेगी नमरदाँ तो सुधरने से रहे! इन्हें ही देख लो।

अम्मा, अब जमाना बहुत आगे ...

रहने दो ... देख रही हूँ, आगे गड्ढे में जा रहा है।” – कहते हुये वह मुस्कुरा दीं।

 मौन खिंच गया। गाड़ी की हड़हड़ उससे परे थी और दोनो वृद्ध परिचय वात्सल्य के साथ मुझे पुन: घूरने से लगे। वृद्धा लेटी हुयी थीं। मैं बैठे बैठे ही झपकी लेने लगा। जाने कितने समय के बाद उनकी पुकार से मेरी झपक खुली।  

बेटा...पंखा बन्द कर दे। ठंड लग रही है। नीचे पाँव से शाल खिसक गयी है, वापस उढ़ा दे।

मैंने सहज ही कर दिया। वृद्ध बस देखते रहे। थोड़ी देर बाद बैठे बैठे ही वे इधर उधर होने लगे। अंतत: कह ही पड़े मुझे बाथरूम जाना है। चप्पलें नीचे जाने कहाँ खो गयी हैं। निकाल दोगे बेटा?

मुझे थोड़ा अटपटा तो लगा लेकिन उनकी आयु विचार मैं नीचे झुका। वाकई चप्पलें निकालनी उनके वश की नहीं थीं। चप्पलें पहन वे टॉयलेट गये और मेरे पेट में मरोड़ सी उठने लगी सीता की रसोई, अन्नपूर्णा के द्वार... क्या बाबा!

मुझे टॉयलेट जाना ही पड़ा। लौट कर बैठा ही था कि ट्रेन धीमी होने लगी। वृद्धा उठ कर बैठ गयीं बेटा, मुझे ठंड लग रही है। झोले में से गिलास निकाल कर चाय ले आओ न!

वृद्ध ने जोड़ा इतनी लम्बी ट्रेन और चाय वाले तक नहीं!

मैंने प्रतिवाद किया घूम कर गये तो!

वृद्धा ने प्रत्युत्तर दिया जब जरूरत पड़े तो आयें ही न नासपीटे... बेटा, ले आ। जा दौड़ ला।

उस स्टेशन पर स्टॉपेज नहीं था फिर भी मैं उतर गया। संयोग से एक चाय वाला दिखा और मैं दौड़ा। अभी चाय लिया ही था कि ट्रेन चल पड़ी। एक हाथ में आधा भरा गिलास लिये उसे छलकने से बचाते जैसे तैसे दौड़ता मैं डिब्बे के गेट पर आया तो दोनों को वहीं खड़े तमाशा देखते पाया। मैं चिल्लाया किनारे होइये। वृद्धा ने लपक कर चाय का गिलास हाथ में ले लिया और मैं चढ़ गया।

कूपे में वापस बैठ जाने पर वृद्धा ने चुस्की लेते हुये कहा अमरित लाये हो बेटा, अब राहत मिल जायेगी, तब उखड़ी साँसों को मैं संयत ही कर रहा था, ट्रेड मिल टेस्ट! ... हम सभी चुप हो गये थे।

जाने क्यों लगा कि इस बार के मौन पर वेदना खिंची हुयी थी। उनकी भठ्ठर दीठ जब असह्य हो चली तो मैं मोबाइल जी पी एस पर ट्रेन की स्थिति देखने लगा। काशी बस दो किलोमीटर। ट्रेन हताश प्रेमी की चाल चल रही थी धीमी हो, रुके, सरके, चले, रुके।

वृद्ध ने खाँस कर गला साफ किया बेटे, हमारी किसी बात का बुरा तो नहीं लगा?

नहीं तो

हमारा बेटा सरवन तुम्हारे जैसा ही है। बचपन में एक दिन जब खेल कर लौटा तो ऐसा बिस्तर पकड़ा कि छोड़ नहीं पाया। बहुत इलाज, झाड़ फूँक कराया लेकिन कोई लाभ नहीं। डॉक्टरों ने हार्ट और ब्रेन दोनों से जुड़ा कुछ बताया। थक हार कर घर ले आये और उसकी सेवा में हम दोनों लग गये। ये बहुत जिन्दादिल है, मुझसे उसका बिस्तर नहीं बदला जाता...

वृद्ध का गला भर आया तो वृद्धा ने बात आगे बढ़ायी तुम्हारे माथे जब रोटी खाते पसीना बहने लगा तो मुझे यकीन हुआ कि तुम भी उस जैसे ही हो। तुमने बर्थ वाली बात जैसे काटी, वह भी ऐसे ही समझाता है।

एक तमन्ना थी बेटा कि हमारा सरवन भी ठीक होता और हम बूढ़ों की सेवा करता। तुमने पूरी कर दी, चैन हुआ। जानते हो, जब तुम पाखाने गये थे तो मैंने इन्हें कहा कि तुम्हें दौड़ाऊँगी। सरवन दौड़ने के बाद ही पड़ा था। तब से किसी को भागते नहीं देख पाती थी। किसी अपने को दौड़ता देखना चाहती थी सो तुम्हें चाय लाने को ... तुम न समझोगे कि तुम्हें भागते  आते देख हमदोनों को कितना सुख मिला! ...

वृद्ध संयत हो गये थे, कहने लगे गये हफ्ते सरवन नहीं रहा। पुरोहित बाबा के कहे अनुसार उसकी भसम यहाँ गंगा में दहाने हम आये हैं। उस डिब्बे में वही है। जिस नदी के किनारे वह खेला बढ़ा उसे उसकी राख सौंपते हमें भी ठीक नहीं। ...

... दरभंगा को जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म नम्बर ...उद्घोषणा के साथ ट्रेन वाराणसी कैंट स्टेशन पर रुक चुकी थी। मैं कहीं गहरे डूबा उतरने को उठा कल आप लोगों के साथ घाट चलूँगा।

नहीं बेटा, जीते जी तुम्हें ले कर वहाँ ... नहीं, हम कर लेंगे। हम फिर से मौत नहीं देखना चाहते...जाओ, सुखी रहो।

पूरी यात्रा के दौरान मेरा मोबाइल एक बार भी नहीं बजा था, न ही एलर्जी वाली छींकें उभरी थीं। मेरे मन में शब्द ही शब्द थे रामरस ...भाग्यवानों को भगवान का प्रसाद... सुख पाओगे ... मुआ जाने कैसा चढ़ गया है, खुलता ही नहीं! ... जाओ सुखी रहो...

 गहरे दुख से उबरना सबसे बड़ा सुख होता होगा।

थकान जाने कहाँ थी।  

_______________
ऑडियो श्री अनुराग शर्मा के स्वर में: यहाँ