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रविवार, 25 मार्च 2018

भोजपुरी -12: रामनवमी : राम जी लिहलें अवतार रे चइतवा

फागुन रेचक है। वास्तविक मधुउत्सव तो चैत्र में होता है। नौ दिन नवदुर्गा अनुष्ठान, जन जन में रमते राम का नवजन्म नये संवत्सर में।
नवान्न दे पुनः प्रवृत्त होती धरा का स्वेद सिंचन, धूप में सँवरायी गोरी का पिया को आह्वान - गहना गढ़ा दो न, बखार तो सोने से भर ही गयी है!

चैत में शृंगार का परिपाक होता है। गेहूँ कटता है, रोटी की आस बँधती है, मधुमास भिन्न भिन्न अनुभूतियाँ ला रहा होता है एवं ऐसे में उस राम का जन्म होता है जो आगे चल कर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये किंतु उनके जन्मोत्सव में जो भिन्न भिन्न पृष्ठभूमियों के लोकगायकों एवं नर्तकों की हर्षाभिव्यक्ति होती है, उसमें उल्लास स्वर नागर शास्त्रीयता तथा अभिरुचि की मर्यादाओं को तोड़ता दिखता है। इसमें गाये जाने वाले चइता चइती की टेर अरे रामा, हो रामा होती है। 
चइता पुरुष गान है। सुनिये चइता विशाल गगन के स्वर में। 
(अंत तक सुनने पर ही समझ में आयेगा कि चैत क्यों फागुन से श्रेष्ठ!)  

पूरी प्रस्तावना के साथ गान होता है। प्रकृति भी आने वाले के स्वागत में है, रसाल फल गए हैं, महुवा मधुवा गए हैं, पवन कभी लहराता है तो कभी सिहराता है। 
घर में नया अन्न आ गया है, पूजन हो रहा है, मंगल गान है, क्रीड़ा है। मस्ती भरे वातावरण में राम जी जन्म लेते हैं! ढोल की ढमढम के साथ बधाई गीतों की धूम है।

सावन से न भादो दूबर, 
फागुन से ह चइत ऊपर 
गजबे महीना रंगदार रे चइतवा।

आम टिकोराइ जाला
महुवा कोचाइ जाला
रस से रसाइल रसदार रे चइतवा।

कबहू लहर लागे 
कबहू सिहर लागे 
किसिम किसिम बहेला बयार रे चइतवा।

गेंहू के कटाई होला
नवमी के पुजाई होला 
लेके आवे अजबे बहार रे चइतवा।

घरे घरे मंगल होला 
कुस्ती आ दंगल होला 
मस्ती से भरल मजदार रे चइतवा।

ढोल ढमढमाय लागे 
चइता गवाय लागे 
राम जी लिहलें अवतार रे चइतवा।

बाजे अजोधा में अनघ बधइया 
ए राम रामजी जनमलें 
दसरथ जी के अंगनइया।

बाजे चइत मास गावेला बधइया
ए राम रामजी जनमलें 
दसरथ जी के अंगनइया।


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शृंखला के अन्य गीत 

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लोक: भोजपुरी- 9: पराती, घरनियों का सामगायन
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लोक:भोजपुरी-1: साहेब राउर भेदवा


शनिवार, 15 अप्रैल 2017

सोरठी ब्रिजभार सुमिरन



सोरठी ब्रिजभार या बिरजाभार के गायन की परंपरा पूरब में रही है जिसके गायक बहुत कम बचे हैं। ग्रीष्मावकाश में हमलोग छतों पर लेटे रात भर सुने हैं। गायक उसके लिए धन नहीं लेते थे (बिद्या नाहीं बेचबे!), केवल सीधा अर्थात अन्न में चावल, दाल, तरकारी, नमक, हल्दी, आदि ले जाते। गायन की भावुकता सबको रुला देती थी। यह क्षेत्र ही करुण रस प्रधान रहा है।
इसमें सात जन्मों की कथा सौ भागों में मिलती है। इन्द्र के शाप से एक देव और एक अप्सरा मृत्यलोक में जन्म लेते हैं और आगे जनम जनम मिलते बिछड़ते रहते हैं। विशुद्ध प्रेम काव्य है। बहुत ढूढ़ने पर इसका बिहारी रूप मिला, वह भी लखनऊ में सड़क किनारे! प्रकाशन दिल्ली से।
‘एकिया हो रामा’, ‘हो राम’, ‘राम न रे की’ जैसे टेक ले यह कथा गायी जाती रही है। इस कथा में भी बहुत पुरानी चलन के संकेत मिलते हैं। उदाहरण के लिये सुमिरन मंगलाचरण में राम, अपनी धरती, शेषनाग, भगवान, पञ्च परमेश्वर, जन्मदायिनी माता, गुरु, सूर्य, सुबेहन (?), गंगा, हनुमान, पाँच पाण्डव, 56 कोटि देवता (33 नहीं!), काली, दुर्गा सात कुमारी बहिनी की वन्दना है।
दिशायें एक तरह से रचयिता की भौगोलिक स्थिति स्पष्ट कर देती हैं। पश्चिम में सुबेहन (?), दक्षिण में गंगा है, पाण्डव उत्तर में। कहीं न कहीं यह उस समय की कथा लगती है जब पञ्चदेव उपासना प्रचलन में थी। आगे वाचिक मौखिक परम्परा के साथ क्षेत्रीय रूप धारण करती चली गयी।
पाण्डवों की स्तुति इसे वीरगाथा परम्परा से तो जोड़ती ही है, साथ ही महाभारत कथा के बहुआयामी पक्ष को उजागर भी करती है कि देवता और योद्धा एक भी माने गये।
माता के दूध के ऋण के लिये ‘निखवा’ प्रयुक्त हुआ है जिसकी संगति वैदिक काल की मुद्रा ‘निष्क’ से लगाई जा सकती है। ऋण का भुगतान मुद्रा अर्थात निष्क से ही न किया जाता है!       

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 31

पिछले भाग से आगे...

गोंइठे की आग हाथ में लिये फेंकरनी धिया माई घिघियाती रहीं। सतऊ मतऊ उन्हें धिराते रहे। जब झपकी आये देवी सी दिखे – अंग, भंग, झोंटे से कस कर बाँधे हुये, समूची देह पर एक बस्तर नाहीं, बस झोंटा। करिया झोंटा बस्तर। मुँह से पुकार सी निकलती – माई माई और भवानी के रूदन में बदल जाती – केहाँ, केहाँ।

कांड की रात रमैनी काकी सो नहीं पाईं। बरमबेला में खटिया पर लेटे लेटे ही खदेरन को सराप रही थी – दहिजरा चमइन चाटे के सब कांड करवलस। सराप के फरुवाही बना देहलसि! तभी गोड़ पर मस ने काटा, काकी ने खींचा तो झूलती खटिया के ओनचन में फँस गया। जम के फाँस! काकी हड़बड़ा कर उठी। बझा गोड़ निकालने के चक्कर में भुँइया आ पड़ी।

कवन मुवाई रे हमके? भीतर भभुका सा उठा, मन बहका तो फेंकरनी, ओक रमाई, सतऊ, मतऊ, महोधिया, नगिनिया – चमइन अस्थान से जुड़े सारे मरे हुओं पर करुणा उमड़ पड़ी। काकी अहक अहक रोने लगी। जाने कितनी देर पड़ी रही। पहिली किरिन देह पर पड़ी तो बोध हुआ। आँखें पोछ खड़ी हुई तो पता चला कि पूरी रात उत्तर सिर्हान किये सोई थी। काकी के मुँह से सीताराम के बजाय निकला – डाढ़ा लागो! दोहाई हलुमान जी, दोहाई!

चूल्ह के लिये आगी लेने के बहाने पूरे गाँव का एक चक्कर काकी लगा आई। लौटी तो अपने पीछे जाने कितनी सनपाती मेहरियों में डर सँजो आई। जिन जिन ने नेबुआ अस्थान पर कभी कोई टोटका किया था उनके लिये सार्वजनिक नुस्खा छोड़ आई – कब्बो ओ पड़े न जइह सो, अगर जहई के परे त देबी के अच्छत सेनुर अगिला सुक्क के चढ़ा के माफी माँगि लीह सो! ओइजा भवानी के देंहि कटल बा। पुरान जमाना रहित त सकितपीढ हो जाइत। जहाँ से भी घूमी – कहाँ गइले रे नगिनिया?  गोहराना नहीं भूली।

 

नगिनिया आ कि सनकल सोहिता क भउजी कहाँ गई? इसरभर संघे उढ़र गई? विचित्र स्थिति थी। स्मृति में एक ओर क्षत विक्षत नवजात देह का भयानक दृश्य था तो दूसरी ओर कुलटा युवा स्त्री का सेवक के साथ पलायन। लोग अंड बंड कुछ भी सोचें, जुग्गुल और उसके खवासी लहकायें लेकिन घटना की भयानकता इतनी प्रबल थी कि मनोविलास, घृणा, क्रोध, जुगुप्सा सब करुणा में सिमट जाते और अंत में बस बच जाती – सहम। सोहित की पगलई दिनों दिन चुप्प होती गयी। जब भी अवसर मिलता कपड़े पहने ही नहा लेता – दिन में कई बार। जप चलता रहता – हमार भउजी, हमार भवानी!

 

 खदेरन के पिछले बारह दिन बारह वर्ष जैसे बीते थे। बेदमुनि और सुनयना, इन दो बच्चों के आपसी प्रेम ने मन को सँभाला था तो बेदमुनि द्वारा अनजाने ही तांत्रिक यंत्र रचना और पेंड़ के एकमात्र शिवली फूल द्वारा उसकी प्रतिष्ठा ने मन को जाने कितनी आशंकाओं की और मोड़ भी दिया था। भविष्य में क्या है? जानने के लिये कुंडली बाँचने का साहस तक नहीं हुआ!

उस दिन यंत्रवत प्रात: संध्या करते उनके सामने जैसे सुभगा बैठी थी। हवनकुंड नहीं, अघोर यंत्र था। आहुति नहीं पाँखियों की रक्तहीन बलि ... खदेरन सिहर उठे थे। स्वयं को केन्द्रित कर जैसे तैसे संध्या समाप्त किये। उसके बाद खुरपी ले कोला में ऐसे ही चिखुरते रहे – मोथा, दूब, डभिला। तन रमे तो मन रमे!

 

  पसीने से जनेऊ भीगा और पीठ पर खुजली होने लगी। झटक कर उठे और जाने कितने समय से भरा धिक्कार सवार हो गया – थाने जाने वाले थे न? और कितना समय चाहिये? भयभीत हो? साधक हो? निर्णय और संकल्प किस दिशा के यात्री हैं?

krishna_yantra प्रश्नों के गुंजलक केन्द्रित हुये और आँखों के आगे उजास ही उजास छा गया। वह यंत्र तो कृष्ण यंत्र भी है, बेदमुनि तो अक्षर भी लिख रहा था – कृष्णाय गोविन्दाय क्लीं ... गोपीजनवल्लभाय स्वाहा... नम: कामदेवाय ल ज्वल प्रज्जवल स्वाहा... कौन कन्हैया यहाँ आने वाला है खदेरन? दुविधा से मुक्त हो चलो, चलो खदेरन! कान्हा की लीला होनी भी होगी तो अभी बिलम्ब है।

घर के भीतर घुस खदेरन ने स्वयं ही निकाल गुड़ की ढेली के साथ पानी पिया, लाठी उठाये और निकल पड़े। मतवा की टोकार कंठ में ही अटकी रह गयी!

गाँव के सिवान पर जुग्गुल ने टोका – कवने ओर हो पंडित? खदेरन ठिठके, दोनों की आँखें मिलीं और खदेरन ने जो देखा वह जुग्गुल के पीछे था – सामने से इसरभर आ रहा था। हाथ की लाठी छूट गयी। (जारी)                             

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 30

पिछले भाग से आगे ...

बिहान हो गया है। गाँव में नये जगे की खुड़बुड़ है। संध्या विधान के पश्चात खदेरन पंडित चौकी पर दक्खिन उत्तर लेटे हैं। या तो यहाँ लेटना या चुपचाप सरेह में भटकना और मतवा ने जब कहा खा पी लेना, पिछ्ले नौ दिन ऐसे ही बीते हैं। बेदमुनि भी जैसे समझता है, पास नहीं जाता ...

इन दिनों में खदेरन ने नेबुआ तंत्र अनुष्ठान से लेकर नवजात कन्या की हत्या तक के समय को पुन: पुन: जिया था। मन इतना गहरे धँस गया था कि किसी भी तरह का पलायन असंभव था। एक समय जाने कौन बरम सिर पर सवार था जो ऐसी ही मन:स्थिति में भागते कामाख्या तक पहुँच गये थे! अब किससे भागें खदेरन, कहाँ जायें? कर्मों की डोर पाँवों की फाँस बन गयी। हर अनर्थ उन्हीं के हाथों घटा था, धरती पर नहीं, उनकी देह में। छाती पर सवार यमदूत हर रात बत्ता चरचराते, घुटती साँसों के बीच नींद खुल कर भी मुक्त नहीं करती – क्षत विक्षत रक्त सनी सुभगा अन्धेरे को चीरती खड़ी दिखाई देती। सुर्ख चमकती लहू की रेखायें जैसे कि गर्भगृह में काली प्रतिमा दमक रही हो! माँ, मुक्ति दो। अब तो शाप दे कर यातना पूरी भी कर दिया! अब क्यों, क्यों माँ?

ऐसे में खेती बाड़ी से लेकर घर गिरहस्ती तक सब मतवा ने सँभाला।  नयनों के दोनों कोर से निकलते बेकहल आँसुओं की ढबढब में पंडित ने देखा कि खुले नभ में पश्चिम दिशा में चन्द्रमा विराजमान थे तो पूरब में उगते सूरज। अँजोर होने पर भी लगा जैसे दिन रात साथ साथ हों! कहीं हूक सी उठी। ज्यों तेज चोट लगी हो, हड़बड़ा कर बैठ गये। एक बार फिर से दोनों को निहार बड़बड़ाये – नौ दिन बीत गये!

कुछ ही हाथ की दूरी पर चमकती भुइँया हिसाब की रेखायें थीं जिन्हें मिटाना मतवा भूल गयी थीं। दलिद्दर की घरनी – खदेरन ने मन ही मन सोचा और दुवार पर ही टहलने लगे। घरनी उनकी भेदिया थी। इन दिनों ऐसे बतियातीं जैसे कोई बहुत ही गोपनीय बात कर रही हों लेकिन उसमें गाँव गिराम की रोजमर्रा की खोज खबर ही होती। चिंता असवार स्वर कहीं पंडित फिर से भाग न जायँ! ... तीसरे दिन ही जुग्गुल ने सोहित का गोंयड़े का खेत जोतवा लिया था – पगलेट का क्या ठिकाना, जाने कब ठीक हो?  ये रहा रेहन का कागद। गाँव चुप्प रहा लेकिन खदेरन की हड़पने वाली बात सबको समझ आ गयी थी। ... सोहित, इसरभर और भउजी का कहीं अता पता नहीं। लोगों में सन्देह पुख्ता था कि कोई बड़ा कांड उनकी नाक नीचे हो चुका है और पता ही नहीं! ...रमेसरी से मतवा की रार भी हुई। उसने बस यह कहा था कि खदेरन पंडित को सब पता है। खदेरन किस से कहें कि न तो वे अगमजानी हैं और न ही भविस्स देख सकते हैं? अपनी बिद्या का आतंक तो उन्हों ने खुद फैलाया था। उसके आगे खुद असहाय थे – नेबुआ वाला टोटका इतना असरदार कैसे हो गया? ... हरदी ओरा गयी है, साहुन के यहाँ से मँगानी पड़ेगी ...हल्दी शुभ होती है खदेरन! शुभ खत्म हो गया! ... लोग नेबुआ मसान वाला रास्ता फिर से बराने लगे हैं ... सही कही बेदमुनि की महतारी, वह मसान ही है जिसकी चौकीदारी में सबसे बड़ा झुठ्ठा नीच जुग्गुल लगा हुआ है।

... नीचे धोती की खींच का अनुभव कर खदेरन थम गये। पीछे मुड़ कर देखे तो परसू पंडित की बेटी सुनयना थी। बिहाने बिहाने भवानी घर छोड़ यहाँ कैसे आ गई? सुहावन गौर चेहरे पर लाल बाल अधर – देवी स्वयं पधारी हैं, खदेरन सब भूल वर्तमान में पूरी तरह पग गये!  मुस्कुराती बच्ची हाथ फैलाये निहोरा सी कर रही थी – हमके कोरा ले ल! कितना भोला मुख, सम्भवत: घर का कोई बड़ा आसपास ही हो, खानदानी शत्रुता भूल खदेरन ने भवानी को गोद में उठा लिया – एन्ने कहाँ रे, बिहाने बिहाने? दूध पियले हउवे की नाहीं? उसे गोद में लिये कोला की और आगे बढ़ गये। शिउली गाछ के नीचे बेदमुनि धूलधूसरित जमीन पर बैठा कुछ करता दिखा। खदेरन पास पहुँचे – देख तs के आइल बा?

हाथ में लकड़ी लिये बेदमुनि तल्लीन भुँइया कुछ खींचने में लगा हुआ था। त्रिभुजों की शृंखला जो कि क्रमश: सुगढ़ होती आकृतियाँ दर्शा रही थी। बेदमुनि जैसे आखिरी खींचने में लगा हुआ था – एक दूसरे में प्रविष्ट दो त्रिभुज, षड्भुज आकार। यह तो यंत्र है, किसने इस बच्चे को सिखाया?... अवाक खदेरन ने सुनयना को गोदी से नीचे उतार दिया। वह जा कर बेदमुनि के सामने बैठ गयी – भइया! ... यंत्र के दो सिरों पर अब बेदमुनि और सुनयना बैठे थे। ऊपर से एक शिउली पुहुप गिरा – ठीक केन्द्र में। प्रात:काल हरसिंगार! इस महीने?  चौंक कर सिर ऊपर उठाये। झाड़ एकदम खाली था, भूमि पर भी कोई दूसरा फूल नहीं लेकिन यह भीनी सुगन्ध? खदेरन स्तब्ध थे, कैसा संकेत! ...सुनयना की जन्मकुंडली देखने पर उपजी भविष्यवाणी मन में मुखर थी – विलासिनी... ऋतेनादित्यास्तिष्ठंति दिवि सोमो अधि श्रित:

स्वयं को सम्बोधित कर बुदबुदाये - ऋतावरी प्रज्ञा का आह्वान करो खदेरन! ... दोनों बच्चे एक दूसरे का हाथ थामे दूर भागे जा रहे थे। पंडित ने आह भरी – रक्त अपना ठौर पा ही जाता है।

(जारी)       

रविवार, 20 सितंबर 2015

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 29

पिछले भाग से आगे...

रमैनी काकी माने माया छाया एक देह। कुछ पहर पहले ही जिस नगिनिया भउजी के लिये मन में माया हिलोर ले रही थी वह जुग्गुल की एक बात से अपनी पुरानी छाया में आ गई थी। रक्कत देख सन्तोख नहीं पूरा था, काकी तमाशा देखने को गोहरा रही थी!

घेरा तोड़ते खदेरन आगे पहुँचे तो जो वीभत्स दिखा वह कहीं नहीं, कभी नहीं दिखा था, कमख्खा में भी नहीं। एक नवजात मानुष देह क्षत विक्षत पड़ी थी, पास ही मझोले कद का एक कुत्ता किसी धारदार हथियार से कटा पड़ा था और जुग्गुल भ्रष्ट भैरव बना एक हाथ में टाँगी और दूसरे में नवजात की टाँग लिये उछ्ल रहा था। लाल कपड़े पर भी रक्त के छींटे स्पष्ट थे, धरती पर खून ही खून। रमैनी काकी को पंडिताइन के लाल गोड़ निसान याद आ गये, खुद को सँभालने को लबदी का सहारा ले धीरे धीरे वहीं बैठ गयी। दोनो गोड़ पानी जैसे हो गये थे!

जुग्गुल चिघ्घाड़ उठा – महापातक भइल बा गाँव में, महापातक! मुसमात देवर संगे सुहागिन भइल, केहू जानल? नाहीं। नागिन पेटे जीव परल, केहू जानल? नाहीं। भवानी पैदा भइल, केहू जानल? नाहीं। खेला देख जा पंचे, खेला! भवनिया के मुआ के एहिजा, भरल गाँव के बिच्चे गाड़ देले रहलि हे नगिनिया! बसगित में मुर्दा गड़ले रहलि हे नगिनिया खोनि के पिल्ला नोचत रहलें हँ सो, आपन पलिवार त खाही घरलसि, गाँव के सत्यानास करे चललि बा नागिन। रउरा पाछ्न के लइके फइके कुँवारे रहि जइहें, के बियही ए गाँवे जब ई खिस्सा चहुँ ओर फइली? कुलटा हे नगिनिया, कुलटा!...

(गाँव में बहुत बड़ा पाप हुआ है, महापातक! विधवा देवर संग सुहागिन हुई, किसी ने जाना? नहीं। नागिन गर्भवती हुई, किसी ने जाना? नहीं। बेटी पैदा हुई, किसी ने जाना? नहीं। तमाशा देखो पंचों! तमाशा। बेटी को मार कर यहीं, भरे पूरे गाँव के बीच नागिन ने गाड़ दिया था! बस्ती में नागिन ने मुर्दा दफन किया था, कुत्ते खोद के नोच चोथ रहे थे! अपना परिवार तो खा ही गयी, नागिन अब गाँव का सत्यानाश करने चली है। जब यह किस्सा आस पास फैलेगा तो उसके बाद कौन अपनी संतान इस गाँव में ब्याहेगा? आप सब के बच्चे कुँवारे रह जायेंगे। नागिन कुलटा है, कुलटा!...)

... कुलटा हे नगिनिया कुलटा! – सोहित के कान बस यही स्वर पड़े। बुढ़िया आँधी भरे मन ने स्वर पहचाना – जुग्गुल काका? एक ही सहारा था, वह भी...गद्दार...हमार भउजी कुलटा?

नयनों के आगे भीड़ दिखी, लाल लाल जुग्गुल दिखा, लाल आँखें, भउजी की काली आँखें, करिखही राति, बबुना... ढेबरी की लौ सम भक भक करिखही आँख... मस्तिष्क में भरे अरबों तंतुओं का आपसी संतुलन टूटा और काला पर्दा तन गया। सोहित के गले से माँ से बिछड़े पड़वे सी गुहार निकली – हमार भउजी कुलटा नाहीं, कब्बो नाहीं रे जुगुला! नरखा फाड़ते, केश नोचते सोहित जुग्गुल पर टूट पड़ा। लँगड़ा कहाँ सँभाल पाता, जमींदोज हुआ और उसके गले सोहित के हाथ कस गये...  

...सोहित के चेहरे की बदलती रंगत किसी ने सबसे पहले पहचानी तो इसरभर ने। उसे जुग्गुल की और झपटते देख इसरभर को चमैनिया अस्थान से जुड़ी सारी पुरानी घटनायें एक साथ याद आ गईं, वह पीछे मुड़ा और भाग चला – जल्दी से कुछु करे के परी,  लेकिन का? इसरभर सिर इसर सवार थे – मन में जाने कितने समीकरण बनने बिगड़ने लगे!  मलकिन के माटी कइसे पार घाट लागी? भइया त पगला गइलें! (मलकिन की मृत देह का संस्कार कैसे होगा? भैया तो पागल हो गये!)  कुलटा मलकिन, नगिनिया मलकिन ... सरापल गाँव में अब के अनरथ करी, खदेरन पंडित? ना, कब्बो ना!...(इस शापित गाँव में अब अनर्थ कौन करेगा? खदेरन पंडित? नहीं, कभी नहीं!)

...”सोहिता रे!” खदेरन पंडित ने स्वर पहचान लिया – बेदमुनि के महतारी? पीछे मुड़े और पियराती मतवा के उठे हाथ ने जैसे समझा दिया कि क्या करना है! झपट कर सोहित पर पिल गये जिसके नीचे गों गों करते जुग्गुल की आँखें बाहर निकल सी रही थीं। खदेरन को देख और लोग भी जुड़ गये। बहुत मुश्किल से सोहित का हाथ छूटा। जुग्गुल आश्चर्यजनक गति से पुन: खड़ा हो गया और सोहित? चुप्प! आँखें दूर तकती, जैसे किसी की तलाश में हों। अधखुले मुँह से लार बह रही थी, सुन्दर चेहरा विकृत हो गया था। खदेरन की आँखें भर आईं – इतने कम समय में कितनी यातना! सोहित लड़खड़ाता चल पड़ा। दूर सधी आँखें, पागल प्रलाप – भइया हो! ले चलs, भउजी के, हमके, गाँव के। घवराई भीड़ ने राह दे दी।

मन्नू बाबू के बाप के प्रचंड स्वर ने भीड़ को यथार्थ पर ला पटका – बरस बरस के नवमी के दीने, कुलदेबी पूजा के दीने अइसन गरहित कांड! थू। दुन्नू के गाँवे से बहरियावे के परी। (वर्ष में एक ही बार आने वाले इस नवमी के दिन, कुलदेवी की पूजा के दिन ऐसा घृणित कांड! थू। दोनों को गाँव से बाहर करना पड़ेगा।) विजयी स्वर में उन्हों ने प्रश्न किया - बोलs खदेरन पंडित! तोहार सास्त्र अब का कहता? कवनो दूसर उपाइ बा? आ कि चमइनियन जइसन फेंसे कुछु ...? (बोलो खदेरन पंडित!  तुम्हारा शास्त्र क्या कहता है? कोई दूसरा उपाय है? या वैसा कुछ करना है जैसा चमाइनों के साथ ...?)   

अधूरे छोड़ दिये गये व्यंग्य वाक्य में अहंकार कम, राक्षसी प्रवृत्ति का कोलाहल अधिक था। निर्बल मतवा को सहारा देते खड़े खदेरन भूत लोक में पहुँच गये। फेंकरनी गा रही थी – राम के कड़हूँ खरउँवा, कन्हैया जी के झूलन हो ... अमा की रात में सुभगा – मैं धरती हूँ बावले जिसकी वासना कभी समाप्त नहीं होती। युगों युगों से मैं तुम्हें भोगती आई हूँ, यहाँ जीवन मुझसे है। हाँ, हाँ, मुझे प्रेम करो, कहो सबसे कि मैंने धरती का सुख भोगा, कहो क्यों कि तुम्हारा कहना मुझे प्रबल करता है। हा, हा, हा...

करुणा की कीच सने मन को ठाँव मिली, उत्तर के पहले चेतना आई – धरती, भोग। यह सब षड़यंत्र है, जमीन हड़पने का। पंडितों की जमीन हड़पे, अब पट्टीदारों की जमीन हड़पने को ये नीच लगे हैं। खदेरन! तुम्हें यह सब समाप्त करना है। जाने कितनी बलियाँ इस गाँव में और होंगी। तुम्हारी करनी यह जगह शापित है, कुछ करो, कुछ करो!

“गाँव से बाहर कोई नहीं जायेगा बाबू! कोई नहीं। इस गाँव का शाप जायेगा!” खदेरन थम गये। चढ़े सूरज को घूरते तांत्रिक खदेरन का वही पुराना कौवे जैसा कर्कश स्वर भीड़ ने बहुत दिनों के बाद सुना:  

“त्वं जानासि जगत् सर्वं न त्वां जानाति कश्चन

त्वं काली तारिणी दुर्गा षोडशी भुवनेश्वरी

धूमावती त्वं बगला भैरवी छिन्नमस्तका

त्वमन्नपूर्णा वाग्देवी त्वं देवी कमलालया

सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं सर्वदेवमयी तनु:”     

 

तेज स्वर की सहम दस दिशाओं को मथती चली गयी, एक विकार से दूसरे विकार में प्रवेश करते जन जड़ हो गये थे!

“तव रूपं महाकालो जगत्संहारकारक:

महासंहारसमये काल: सर्वं ग्रसिष्यति

कलनात् सर्वभूतानां महाकाल: प्रकीर्तित:

महाकालस्य कलनात् त्वमाद्या कालिका परा ...

साकाराsपि निराकारा मायया बहुरूपिणी

त्वं सर्वादिरनादिस्त्वं कर्त्री हर्त्री च पालिका

... जो भवानी भूमि पर क्षत विक्षत पड़ी है, उसकी साक्षी मान मैं इस स्थान पर अब तक हुये सारे पापों को अपने सिर लेता हूँ। साथ ही यह शाप देता हूँ कि आज के बाद अगर किसी ने यहाँ कुछ भी टोना टोटका किया तो उसका और उसके परिवार का सर्वनाश हो जायेगा।“

धीमे स्वर में सबको सुनाते हुये खदेरन ने कहा – यह सब जमीन हड़पने की गर्हित कुचाल है। आप लोग खुद विचारें और समझें। विधि की विधना जो होनी थी, हो गयी, आगे आप सब के हाथ लेकिन अगर किसी ने यहाँ कोई टोना टोटका किया तो माँ काली की सौंह... ।

मतली आते हुये भी खदेरन ने नवजात की देह के टुकड़ों को उठाया, गमछे में लपेट भीड़ को चीरते चँवर की ओर चल पड़े। मतवा उनके अनुसरण में थीं।

 

जुग्गुल को चेत हुआ, उसने भीड़ को ललकारा – ई पखंड कवनो नया थोड़े ह, सोहिता त भटकते बा, नगिनिया के पकड़ि के बहरे कर के परी!

प्रतिक्रिया नहीं होते देख उसने पट्टीदारों को पुकारा – खून खनदान के फिकिर बा कि नाहीं? एक छोटा सा समूह सोहित के घर की ओर चल पड़ा। लोग घर में घुसे, जुग्गुल सबसे आगे भउजी की कोठरी में।

कोठरी एकदम व्यवस्थित साफ सुथरी थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो! न तो नागिन का अता पता था और न ही इसरभर का!

 

बचे दिन गाँव सरेह में दोनों की खोज चलती रही लेकिन वे नहीं मिले तो नहीं मिले! साँझ को दिया बारी पूजन के बेरा दक्खिन कोने किसी घर एक फुसफुसाहट उभरी – ऊ भवनिया देवरा के नाहीं, भरवा के रहलि हे। एहि से सोहिता पगला गइल हे अउर नगिनिया सँगे भरवा नपत्ता बा! धुँअरहा के धुँये और चूल्हे की आग के साथ यह बात घर घर में बँटती चली गयी। (वह भवानी देवर से नहीं, इसरभर के साथ हुये संबंध से थी। इसी से सोहित पागल हो गया और नागिन संग इसरभर लापता है!)  

 

शुद्धिस्नान और कर्मकांड के पश्चात कार्त्तिक शुक्ल पक्ष नवमी की उस सन्ध्या यह बात खदेरन पंडित के कान पड़ी और वह कराह उठे। शांति अब बस भ्रम थी। भीतर दाह उठने लगा। वहीं निखहरे चौकी पर लेट गये। मतवा ने हाथ लगाया तो जाना अब खदेरन की बारी थी। फीकी मुस्कान के साथ खदेरन बड़बड़ाये, सतमासी भवानी थी, नवमी के दिन सात महीनों की सँभाल व्यर्थ हुई। वे गलदश्रु हो उठे – आह, कहीं से भी सतमासी नहीं लगती थी... सुभगा!

... बेदमुनि की माँ, यह इकट्ठे पापों की ताप है, जल्दी नहीं जायेगी। धीरज रखना। जब भी यह काया ठीक हुयी, शिकायत ले थाने तो जाऊँगा ही।       

 

छिप कर सुने गये खदेरन के निश्चय के साथ लोगों की थू थू को जुग्गुल अपनी कोठरी में दुहरा रहा था।  उसके हाथ पीले बस्ते के वही कोरे कागज थे जिन पर अंगूठों की छाप थी। चेंचरा बन्द कर ढेबरी जला वह कुटिल मुस्कान लिये लिखता जा रहा था - हम कि सोहित सिंह वल्द ...

 

(अगले भाग में जारी)

सोमवार, 2 जून 2014

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 28

पिछले भाग से आगे...
राम राम बिहान में सोहित झटके से उठ बैठा। भुँइयाँ मत्था टेकने के बाद भउजी की कोठरी में झाँकने गया। उजास से अन्हार में आया था, बिछौना खाली सा दिखा। पलखत भर में आँखें अभ्यस्त हुईं और करेजा धक्क! उसने नजर इधर उधर दौड़ाई और डेहरी मे ऊपर भउजी की देह लटकती दिखी, समझ आते ही बैस्कोप की तरह से पिछला सब कुछ मन में घूमता चला गया और फिर कोर्रा हो गया। सीने में कहीं लुकारा भभक उठा, तीखा असहनीय कष्ट। चरम यातना छ्न भर में चीर गयी  – भ ...उ...जीsss। सोहित झपट कर लटकते गोड़ ऊपर उठाते डेहरी पर चढ़ा।
 जैसे तैसे कर देह को छुड़ाया ही था कि डेहरी भहरा गई। तोपना, जोड़ और मुँह सब खुल गये, घर की अनपुरना की देह लिटा ही पाया, निकलता धान देह को घेरने लगा। धरती, धान, धरनी घरनी सब जलछार! माटी की रक्षा के लिये इतना कुछ करने वाली भउजी लहास माटी माटी में उतान, देवी जइसन मुँह ओइसन के ओइसन!! सोहित धरती पर हाथ पीटता सिर पटकने लगा। आघात से उबरते मन में धुँधली सम्भावनायें उठने लगीं और नयन बरस पड़े। मन साफ होता गया, आँखें सूखती गयीं।
इसरभर आया तो ढोर नाद पर नहीं लगे थे। देरी होने पर मालिक खुद लगा देते हैं, क्या हुआ आज? उत्सुकता वश घर के भीतर हेरता घुसता गया। मलकिन की कोठरी में हिम्मत कर झाँका और जो दिखा वह अकल्पनीय था! उसके मुँह से आतंक भरी घिघियाहट निकली – ओs s मलिकाssssन, भुँइया घस्स से बैठ गया।  सोहित वैसे ही रहा जैसे पता ही न चला हो। इसरभर को सँभलने में थोड़ी देर लगी।...  
...पीठ पर हाथ और साथ के स्वर से चेत हुआ – मालिक! सोहित ने पहचाना – भइया!
“भइया त कब के सरगे गइलें। भइया नाहीं मालिक, ईसर। ई का हो गइल? मलकिनि ...”
सोहित ने सिर उठाया-ईसर? इसरभर??
सिर घूम रहा है ... भँवर है, नद्दी मइया का भँवर। सोहित ने नाव से हाथ बढ़ा भइया की देह उड़ेली है, अब भउजियो जइहें नद्दी में, माटी जाई पानी में? स्वाहा, सब जलछार??
टूटते मन ने बचने के लिये उस अभाव की ओर खुद को मोड़ा जिस पर अब तक सोहित का ध्यान नहीं गया था – भवनिया, केन्ने? का भइल होके??
शोकग्रसित करेजा संतान को ले चिंतित हुआ। सोहित किससे पूछे? खदेरन पंडित? ना! मतवा? ना! रमैनी काकी? ना!
बस एक राह – जुग्गुल काका। बूड़त बिलार कइन सवार।
भउजी की देह वैसे ही छोड़ वह बाहर की ओर भागा, इसरभर भी पीछे पीछे।
...
ज्वर मन्द पड़ गया था। मतवा का मन रह रह सोहित के यहाँ जा हाल चाल लेने को कर रहा था लेकिन पंडित अभी दिसा मैदान से लौटे नहीं थे। बेदमुनी को अकेले छोड़ जाना जाने क्यों ठीक नहीं लग रहा था। दतुअन कर मिट्ठा खा मतवा ने पहली घूँट ली और पानी लगा!
चौकी पर लोटा रख थोड़ा अगोरने लगीं कि मन्द पड़े तो पानी पियें, तभी नेबुआ झँखाड़ की ओर से शोर उठने लगा। मतवा से अब नहीं रुका गया। लबदी उठा लँगड़ाती घर से निकलीं तो रमैनी काकी की गोहार सुनाई दी – मतवा हो! बड़हन खेला भइल बा, दउरि आवs
राह में काँटे बिछा लहूलुहान करने वाली दौड़ कर खेला देखने का बुलावा दे रही थी! मतवा के पैर न आगे बढ़ें न पीछे जायँ!  
...
नेबुआ नियराया तो खदेरन को लोगों का घेरा दिखा। घेरे की भीतर से जुग्गुल की ऊपरी देह भर दिख रही – लाल बस्तर पहने वह किसी ओझा गुन्नी की तरह उछल रहा था। (जारी)