शनिवार, 5 सितंबर 2009

बाउ, क़ुरबानी मियाँ और दशहरा : पूर्वपीठिका

मय: बाउ और उनके पुरनियों का, मिश्रित                       परम्परा: श्रौत और बैताली
(अ)
(8) 
1858। वीरांगना लक्ष्मीबाई के वीरगति को प्राप्त होने के बाद अंग्रेजों की कुदृष्टि, कुकर्म और दमन का जोर पूरे शबाब पर।
गाँव – अगहरी, बुन्देलखण्ड का एक छोटा सा चन्देलों का गाँव। ललमूहें गोरों की फौज गाँव की ओर आ रही थी । अपराध – इस गाँव के सारे वयस्क पुरुष रानी की सेना में थे। हार के बाद सभी फरारी में थे लेकिन दूसरी जगहों पर बच्चों और महिलाओं पर हुए अत्याचारों की सुनी सुनाई बातें वापस गाँव में खींच लाईं और साथ साथ ले आईं – अंग्रेजों की बदनीयत और बदले की आग।
आग ! जाने कितने गाँव जला दिए गए। मर्द तोपों से उड़ा दिए गए और अबला बच्चे बलात्कार और सामूहिक हत्याकाण्ड के शिकार हुए। उस आँधी को कैसे झेला अगहरी ने ?. . .
पास के जंगल में एक जड़ी मिलती थी। कहते हैं उस पर चन्द्रदेव का आशीर्वाद था। अँजोरिया में औषधि और अन्हरिया में प्रबल विष। कृष्ण पक्ष में किसी भी दिन पिसी हुई जड़ को ठंढे दूध में मिला कर पिला दो तो आध घड़ी में आदमी सो जाता था, कभी न उठने के लिए। शांतिपूर्ण मृत्यु ! यही काम सात बार अँजोरिया में करने से बाँझ कोख भी हरी हो जाती थी – जीवन !
ब्राह्मण कन्या और चन्द्रमा की यह संतति, ऋषि चन्द्रात्रेय की कृपा से इस वनौषधि को बखूबी जानती थी। जीवन मृत्यु । आज मृत्यु की बारी थी। ..अन्हरिया आए दो ही दिन हुए थे।
(आ)
वृद्ध शाह जू देव ने जब पैरों पर धराशायी पड़े हाँफते मोहमदीन को उठाया तो इस अधेड़ मुसलमान के चेहरे के आतंक से ही सब समझ गए।
“दाऊ जू , पूरी फौज आ रही है। एक घड़ी में चहुंप जाएगी। रुका नहीं हूँ, जब से सुना भागता ही रहा हूँ।"
“कुल देवी का प्रकोप है। मेरे अपने बेटे ने ही चन्देल वंश की शपथ को भंग किया है । पराजय के बाद प्रलापी शराब पी कर लुढ़का रहता है।"
“क्या होगा?”
“विनाश होगा। मौत नाचेगी।"
"या खुदा! बख्श दे।"
"नहीं दीनू, जिन्दगी के लिए मौत जरूरी होती है। तुम चले जाओ। फिर यहाँ आने को बचेगा ही क्या? भसम और रात में चिल्लाते सियार !”
"दाऊ जू , आज आप की बात नहीं मानेंगे। आज होगा हसन हुसैन का खेल। दाऊ मैं कहीं नहीं जाऊँगा।"
"अरे मलेच्छ अपने दोजख में जाएगा। खुदकुशी पाप है।"
"दाऊ ये जिन्दगी तुम्हारी देन है। अल्ला का करम। बाल बच्चों से घर आबाद है। अब क्या?”
"तो जा पापी। ये सन्देशा तुम्हारे जिम्मे। तू आज हमारा महादेव है नहीं तो ये ललमुँहे अँजोरिया में भी तो आ सकते थे। राम जाने तब क्या होता? कैसे होता?”
....बड़बड़ाते दाऊ जू ने अब जोर से कहा," जा घर घर कह दे ठंढे दूध का समय आ गया। कभी कहीं चन्देलों की संतान तुम्हारा अहसान गुनेगी।"
"इसका मतलब?”
"थोड़ी देर में समझ जाएगा। भाग, समय नहीं है।"
.... मोहमदीन को कहाँ पता था कि हसन हुसैन से आल्हा ऊदल तक वक्त बदले मिजाज सी लगने वाली एक सी ही कथाएँ कहता रहा था और आज एक ऐसी कथा जुड़ने वाली थी जिसका शायद कोई नामलेवा भी नहीं बँचने वाला था। ...  जमाना बस अनुमान ही लगाने वाला था।
(इ)
माताओं ने बच्चों को ठंढे दूध पिलाए। बच्चे पूछते रहे माँ आज ठंढा क्यों ? माँ क्या कहे? आँसू पोंछे, मन की हाहाकार समेटे तब तो बोले !
सभी बालाओं और नारियों ने सहर्ष दूध पिए और फिर बच्चों के साथ जंगल चल दीं।.... कुलदेवी का मन्दिर बलि माँग रहा था।
अगहरी में बाकी बँच गए लड़ाके पुरुष और एक मद्यप – सारे गाँव के लिए जीवित शाप।
(ई)
"भैया घोड़ा वेग से दौड़ाओ। बाँई आँख तेज फड़क रही है।"
यह ननिहाल से लौटता छोटा था – बीस की उमर।
गबरू बड़े भाई ने जवाब दिया,"क्यों ! बहुरिया से मिलने की जल्दी है क्या?”
“भैया, जब देखो छेड़ते रहते हो। कोई छोटे भाई से ऐसे कहता है क्या?”
"अरे, ऐसा छोटा भाई है किसको जो कहेगा?”
"भैया, मन घबरा रहा है। घोड़ा दौड़ाओ”
पवन वेग से घोड़े दौड़ चले - अगहरी की ओर। दोनों भाई नहीं जानते थे कि क्या देखना शेष था और क्यों आँख फड़क रही थी !
.....
.....
कुसुमावत । षोडसी। ब्याह कर नई आई छोटे की बहुरिया।
उसने दूध लिया तो लेकिन पिया नहीं गिरा दिया। अपनी जिठान बहिन को कुलदेवी के सपने के बारे में बताया तो यह आदेश मिला था।
“अगहरी का कुलदीप तेरी कोख की आग से जलता रहेगा। यहाँ नहीं कहीं और। देवी मैया ने दरस दिया है तो निभाएगी भी। लेकिन बहू हम लोगों के साथ मन्दिर तुम भी चलना।“
कहते हुए बड़की बहुरिया गटा गट दूध पी गई।
....अंग्रेजों को गाँव में बड़बड़ाता एक शराबी भर मिला। मारे जाने से पहले उस प्रलापी ने जंगल की ओर इशारा कर दिया था। दाऊ जू उसे साथ न ले जा कर कई आशंकाओं से बँचे थे लेकिन यह आशंका ? मनुष्य का मस्तिष्क बहुत तिलस्मी होता है।
.....
....
उस समय बस एक को छोड़ सभी नारियाँ शील बचाने की चिन्ता से मुक्त हो अपने कुलदेवी के आँचल में सो चुकी थीं। ....
कुसुमावत। कोई देखे तो नाम न ले। कछाड़ बाँधे ‘कुसुम’ चुपचाप हाथ में भाला लिए कवच बाँधे मानवतियों की मिट्टी बनैले पशुओं से रखा रही थी। भाग बड़ो जो ये तन पाया . .
(उ)
जंगल किनारे झाड़ियों में छिपे जवान। घने पेंड़ों पर फन्दे लिए छिपे वंचक चुपचाप अंग्रेज फौज की प्रतीक्षा में थे। अचानक बिगुल की आवाज गूँजी। करीब सौ आँखों ने देखा – हजारों अंग्रेज सैनिक, गोला बारूद और हथियारों से लैस।
क्या अंग्रेजों की जासूसी खत्म हो गई थी?
या प्रतिशोध की आग उन्हें घसीट लाई ?
अभी भी डरे थे क्या?
आतंक फैलाना था क्या ?
.... नहीं तो इतने छोटे से गाँव को नेस्तनाबूत करने के लिए ऐसी फौज की क्या जरूरत थी ?
दाऊ जू फीकी सी हँसी हँस दिए। पेंड़ पर चढ़े अपने दीनू को देखा तो वह मियाँ ठीक उनके उपर झुरमुट में छिपा सन्नद्ध था, जैसे मँडराते काल को भी फन्दा लगा देगा ...जारी

13 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक । आगे क्या होगा ? यह कौतूहल का विषय है। आभार ।

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  2. यदि सिर्फ़ इतना कह दूं ..कि इतना प्रभावित तो मैं तब भी नहीं हुआ जब हिंदी साहित्य की ....न जाने कितनी रचनायें पढी थी...बस एक सम्मोहन सा हो जाता है...आपकी शैली देख कर...आगे पढने की तीव्र उत्कंठा हो जाती है..

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  3. आगे क्या हुआ ? ऐसे मोड़ पर ले जाके मत रोका कीजिये :)

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  4. सारा द्रष्य आँखों के आगे साकार हो उठत है । वाह !

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  5. ओह, गजब लेखन।

    मेरे ससुराल में लोग कंतिथ के दुबे हैं। कहा जाता है कि औरंगजेब ने गंगापार पूरा कंतिथ गांव मार डाला था ब्राह्मणों का। एक गर्भवती महिला तैर कर गंगापार आई और उसके शिशु से चला इन दुबे लोगों का वंश!

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  6. शीर्षक, कथ्य, शैली - सम्मोहन का वैचित्र्य ।
    घबरवा देते हैं आप ।

    एक गजब का तनाव रचते हैं भईया ! नट की डोर-सा !

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  7. डिग (Digg) की डुगडुगी बजा आया हूँ । आपो कमेंट कै दें, दूसरे से भी कहैं । डिग की डिंगडिंग में हिन्दी में आप जैसों का लिखा हुआ ही तो ठहरता है भाई साहब !

    एक बात और - अपने चिट्ठे पर डिग सबमिशन का बटन तो लगा ही दें । मेरे ही लिये । ठोंक दिया करुंगा ।

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  8. सन सत्तावन की जीवंत कथा. अगहरी जैसे गाँवो के अनगिनित विस्मृत सेनानियों का योगदान कोई याद नहीं करता. पर क्या उनकी आहुतियों के बिना वह संग्राम पूरा है?
    फिर तुम्हारी कौतुक भर देने वाली भाषा. शायद मुझे आगे की कथा का आभास है, फिर भी उत्कंठा है कि अब क्या?

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  9. बहुत ही असाधारण ! इस आपाधापी में भी अपने पूर्वजों के अतीत को उकेरने का प्रयास वाकई में स्तुत्य है!


    इस बात कि उत्कंठा है कि इस शीर्षक को किस प्रकार से आप निभाते हैं.............


    पुन: साधुवाद !

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  10. अब ये सारी कथा इत्मीनान से पढी जायेगी -
    बेहद मनमोहक और बाँध कर रखनेवाली है
    क्या गज़ब लिखते हैं आप !!
    आनंदम आनदं
    स्नेह,
    - लावण्या

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  11. इतिहास का रोमांच, दंतकथाओं का रहस्य, उत्कृष्ट किस्सागोई का सम्मोहन और सात समंदर पार से आये लुटेरों की क्रूरता और दमन - कितना कुछ छिपा है इस सशक्त लेखनी में. पितृपक्ष में पितरों के जीवन (और मृत्यु) के इस पक्ष से पहचान कराने का शुक्रिया. अगहरी के इतिहास की अगली कड़ी की बेसब्री से प्रतीक्षा है.

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