रविवार, 19 अगस्त 2018

कोणार्क महागायत्री देउल के कोणादित्य विरञ्चि नारायण, Konark Sun Temple : A Brief Timeline

1248 ई.। रज़िया की मृत्यु हो चुकी है, उसके पूर्व वह कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा ध्वस्त मूल काशी विश्वनाथ मंदिर पर मस्जिद बनवाना नहीं भूली। 
सुल्ताना की मृत्यु से मुक्त हुये बंगाल के सूबेदार तुगन खान ने उड़िया राजा नरसिंहदेव के पास संदेश भेजवाया कि जगन्नाथ मंदिर समर्पित कर दो जिससे कि वहाँ मस्जिद बनवाई जा सके तथा सम्पूर्ण पुरी क्षेत्र इस्लाम कुबूल करे। नीति का आश्रय ले राजा ने मुसलमानों की सेना को ऐसा काटा कि आगे 300 वर्षों तक मुसलमान उड़ीसा पर दृष्टि डालने का साहस नहीं कर सके। राजा की प्रेरणा राजमाता थीं।
इस विजय की स्मृति में पहले से ही उपस्‍थित कोणादित्य के मंदिर को विस्तार दे राजा ने महागायत्री देउल की स्थापना की योजना बनाई। 
13 जनवरी 1258 ई. को रविवार के दिन कोणार्क के महालय में आदित्य की प्राण प्रतिष्ठा हुई। 
नरसिंहदेव के वंशज नरसिंहदेव चतुर्थ के 1384 ई. लिखित ताम्रपत्र में महालय में अर्चना का उल्लेख है अर्थात मंदिर पूरा हुआ था एवं उसमें अर्चना पूजन को सवा सौ वर्ष से भी अधिक हो चुके थे। 

अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने मंदिर की यात्रा सोलहवीं शताब्दी में की थी, पूजन अर्चन तब भी चल रहा था। उसने आइन-ए-अकबरी में यह लिखा है। 



1568 ई.। 
पराजय के 310 वर्षों पश्चात इस्लाम का पुन: आक्रमण पुरी पर हुआ। दीनी नायक था मतांतरित हिन्दू, विशाल, कृष्णकाय जिसे 'काला पहाड़' नाम दिया गया। इस बार इस्लाम विजयी हुआ। 
पुरी के मंदिर ने ध्वंस देखा। दारु विग्रह जला दिये गये। पुरी के मार्ग पर मुख्य विग्रह के जल कर बचे हुये अंश पर थूकते एवं उसे पाँवों से ठोकर मार कंदुक की भाँति खेलते अट्टहास करते 'काला पहाड़' की स्मृति उड़िया मानस में सदा सदा हेतु अङ्कित हो गयी। 
उसका अगला लक्ष्य था महागायत्री देउल कोणार्क महालय। 
यहाँ उसे अधिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा परंतु वह मुख्य शिखर के (key stone) दधि नौति को शिथिल करने में सफल रहा। शिखर के ध्वस्त होने का कारण उसने सुनिश्चित कर दिया। 

1847 में जब जेम्स फरगुसन बालू से अंशत: ढँके उस परित्यक्त मंदिर तक पहुँचा तो शिखर का एक अंश गिरने से बचा हुआ था। उसने उसका प्रस्तर आधार चित्र (lithograph) बनाया। 

आगे के वर्षों में बचा हुआ शिखर भी तड़ित पात से ध्वस्त हो गया। 
मन्दिर कब परित्यक्त हुआ था? इस प्रश्न का उत्तर मिला 1929 ई. में जब अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जीवविज्ञानी पी. पर्या ने मंदिर से प्राप्त एक ऐसे पत्थर के टुकड़े का परीक्षण किया जो कि ऊपर अगम्य स्थान से प्राप्त हुआ था। उस पर काई, शैवाल इत्यादि के अनेक तल बैठ गये थे, कुल 357 अर्थात कुल 357 वर्षा ऋतुयें।
1929 में से उसे घटा कर यह निश्चित किया गया कि 1573 ई. से मंदिर की कोई देखभाल नहीं हुई थी। 
उल्लेखनीय है कि मंदिर के शिखर एवं उसकी प्रतिमाओं पर चूने का पलस्तर किया गया था जिन्हें प्रति वर्ष विविध रंगों से रँगा जाता था। जगन्नाथ मंदिर में आज भी प्रचलन है। रंगों के अवशेष आज भी कोणार्क के जगमोहन मण्डप की प्रतिमाओं पर दृष्टिगोचर हैं। 
अबुल फजल वहाँ 1594 ई. में गया था। 1568, 1573 एवं 1594 ई. ये तीन स्वतंत्र बिंदु हैं जो कि एक दूसरे के निकट हैं एवं जिनसे स्पष्टत: घटित का भान हो जाता है। 
काला पहाड़ के आक्रमण के पश्चात ही मंदिर उपेक्षित होना आरम्भ हो गया था। देउल का दूषित होना, तत्कालीन राजवंश की उसके प्रति श्रद्धा न होने से संरक्षण का अभाव, जगन्नाथ की बढ़ती कीर्ति, सूर्य पूजा का घटता चलन - इन सबके एकत्र हो जाने से मन्‍दिर का रखरखाव बाधित हो गया। जर्जर मंदिर क्रमश: परित्यक्त होता गया, कुछ वैसे ही जैसे आराधकों की न्यूनता से खजुराहो के मंदिर हो गये। 
विरञ्चि नारायण की गर्भगृह प्रतिमा के लिये भाँति भाँति की बातें सुनने को मिलती हैं, कुछ के अनुसार उसे काला पहाड़ ने तोड़ दिया था, कुछ के अनुसार उसे वहाँ से ला कर जगन्नाथ मंदिर में स्थापित किया गया एवं कुछ के अनुसार देवता अभी भी कोणार्क तट की बालुका में कहीं विलीन हैं। 
कालान्तर में मंदिर के आगे का अद्भुत अरुण स्तम्भ हटा कर जगन्नाथ मंदिर के समक्ष स्थापित कर दिया गया जो आज भी पूजित है। जगन्नाथ मंदिर की सज्जा में वहाँ से लाई गई अन्य प्रतिमायें भी प्रयुक्त हुईं। 
... 
इतिहास इतना ही है।

शनिवार, 18 अगस्त 2018

बोध कथा एक , पुरानी परिचित : ... यही दृष्टि है


'तुम स्त्री को नहीं देखोगे।'
'यदि वह देखे तो?'
'तो भी नहीं।'
'स्त्री से बोलना मत!'
'यदि वह कुछ पूछे या कहे तो?'
'तो भी नहीं।'
'स्त्री को सुनना मत!'
'वह स्वयं पुकारे तो?'
'तो भी नहीं।'
'स्त्री का स्पर्श नहीं करोगे।'
'यदि वह स्वयं स्पर्श करे तो?'
'तो भी नहीं।'
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सन्न्यस्त आचार्य अपने शिष्य को प्रात:काल का उपदेश दे रहे थे। शिष्य हर बात को मन में अश्म रेख की भाँति बैठाता जा रहा था। सूरज आधा बाँस चढ़ आया तो आचार्य ने कहा - अब हमें प्रस्थान करना चाहिये। नाविक चला जायेगा तो पार होना दुष्कर हो जायेगा। 
दोनों नदी तट पहुँचे, न कोई नाव थी, न कोई नाविक। नदी का प्रवाह मन्थर था, तैर कर पार किया जा सकता था। प्रतीक्षा लम्बी होने लगी तो दोनों ने तैर कर पार करना उचित समझा। 
उसी समय एक युवती वहाँ विह्वल स्थिति में पीछे से आई तथा दोनों से हाथ जोड़ पार कराने की प्रार्थना करने लगी। शिष्य ने तो आँखें नीचे ही झुका रखी थीं, मन ही मन प्रतीक्षा करने लगा कि देखें, अब गुरु क्या करते हैं, उपदेश तो बहुत दिये थे ! कनखियों से देख भी चुका था कि युवती सुन्दर थी। 
गुरु ने उससे कहा - वत्स ! दुखिया है, उसे पार कराओ। शिष्य ने समझा कि परीक्षा ले रहे हैं। उसने उत्तर दिया - क्षमा आचार्य, यह आप की शिक्षाओं के विपरीत होगा। हमें इस माया को यहीं छोड़ चल देना चाहिये। 
गुरु ने युवती से कहा - स्थविर आयु है किन्‍तु तुम्हें पार करा सकता हूँ। मेरी पीठ पर सवार हो अपने को इस ओढ़नी से दृढ़ता से मुझसे बाँध लो। हम तैर कर पार कर लेंगे। 
शिष्य इस प्रस्ताव से आश्चर्य में पड़ गया किन्‍तु मौन ही रहा। आचार्य ने युवती को पीठ पर चढ़ाया एवं तैर कर उस पार उतार दिया। धन्यवाद देती वह अपने मार्ग गई। उन दोनों ने भी पन्‍थशाला का मार्ग पकड़ा। 
... 
शिष्य दु;खी था, बहुत दु:खी। आचार्य भ्रष्ट हो चुके थे। शिक्षा के मध्य में ही इनका त्याग करना होगा, यह सोचते हुये वह उद्विग्न मन से साथ बना रहा। पहुँचते पहुँचते संध्या हो गई। संध्या वन्दन एवं अल्पाहार के पश्चात आचार्य विश्राम की मुद्रा में लेट गये। शिष्य भी पार्श्व में पड़ रहा। 
कुछ ही समय में आचार्य गहरी नींद में खो गये किन्‍तु शिष्य करवटें लेता रहा। आधी रात तक जब नींद नहीं आई तो उसने सोचा कि अब क्या सम्मान करना? जगा ही देते हैं। 
आचार्य को उसने पुकार कर जगाया एवं रुष्ट स्वर में बोला,"मैं आप का त्याग कर रहा हूँ, आप भ्रष्ट हो गये हैं।" 
आचार्य ने साश्चर्य पूछा,"वत्स ! मैं भ्रष्ट ? कैसे ?"
शिष्य ने उत्तर दिया,"आप ने एक सुंदरी युवती को पीठ पर आरूढ़ करा नदी पार कराया। उसके अङ्ग लम्बे समय तक आप से लगे रहे ! अपनी शिक्षा का भी सम्मान नहीं करते, ढोंगी हैं आप! छि: !!"
गुरु अट्टहास कर उठे,"वत्स ! मैं तो पार कराते ही उससे मुक्त हो गया था। वह दुखिया भी मुझसे उसी समय मुक्त हो गई। तुमने तो उसकी कोई सहायता भी नहीं की थी ! किन्‍तु अब तक ढोये जा रहे हो? वह तुम्हारे मन मस्तिष्क पर सवार है। सच कहो, देखा था न उसे?"
शिष्य ने रूँधे गले से कहा - हाँ एवं फूट फूट कर रोने लगा। 
आचार्य उसका सिर अपनी गोद में ले सान्त्वना देने लगे - गुरु का कहा मानना चाहिये वत्स ! न मानने से शिष्य नरकगामी होता है। 
तुमने आज दारुण नरक भोगा है। अब मुक्त हो। शान्‍त हो सो जाओ। प्रात:काल बातें करेंगे। 
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'तुम स्त्री को नहीं देखोगे।' 
'कदापि नहीं आचार्य! मैं उसे देख कर भी नहीं देखूँगा।' 
'यदि वह देखे तो?' 
'मैं नहीं देखूँगा तो वह कैसे देख सकेगी?' 
'हाँ वत्स ! यही दृष्टि है।'
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हिन्‍दू विवाह, सप्तपदी, पारस्कर गृह्य सूत्र


हिन्‍दू विवाह सप्तपदी, पारस्कर गृह्य सूत्र 
1.8.1


प्रथम पग इषे - अन्न हेतु, 
दूसरा पग ऊर्जे - बल हेतु, 
तीसरा पग रायस्पोषाय - धन हेतु, पोषण, पुष्टि हेतु, 
चौथा पग मायोभवाय - सुख सन्‍तुष्टि हेतु, 
पाँचवा पग पशुभ्य: - पशु सम्पदा हेतु, 
छठा पग ऋतुभ्य: - ऋतुओं हेतु, 
सातवें के साथ स+खा, सखा हो मुझसे जुड़ जाओ,
मेरी अनुव्रता हो, सात लोकों में। लोक तो गिना दिये ऊपर, अन्तिम तो तुम्हारा सख्य है। 
सात जन्मों की बात सम्भवत: यहाँ से आई होगी। 
...
पारस्कार विवाह संस्कार विधान दिन का है। सूर्यास्त पश्चात वर वधू को ध्रुवतारा दिखाता है - 
अस्तमिते ध्रुवं दर्शयति। ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवैधिपोष्ये मयि मह्यं त्वादादबृहस्पतिर्मया पत्या प्रजावती सञ्जीव शरद: शतमिति। 
तुम ध्रुव हो, मैं तुम्हें ध्रुव देखता हूँ, तुम मेरे साथ ध्रुव अर्थात दृढ़ हो हे पोषणीया! तुम्हें बृहस्पति ने मुझे दिया है, मुझ पति से सन्तानोत्पत्ति करती हुई तुम मेरे साथ सौ शरद ऋतुओं तक रहो।
... 
विवाह पश्चात तीन रातों तक वे लवणहीन भोजन करेंगे, भूशायी रहेंगे तथा एक संवत्सर तक शारीरिक सम्बन्‍ध नहीं बनायेंगे। एक संवत्सर तक सम्भव न हो तो बारह रातों तक, वह भी न हो सके तो छ: रातों तक, वह भी न हो सके तो न्यूनतम तीन रातों तक संयम रखें। 
इस निषेध के पीछे कितना बड़ा मनोवैज्ञानिक तथ्य छिपा है, समझा जा सकता है।
... 
गाँवों में (नगरों में तो अब सब दुर्बी दुलाम दुलक्षणं है) इस निषेध को महिलाओं ने कुछ दिनों से जोड़ दिया है कि इन दिनों में कङ्गन नहीं खुलना! तीन से छ: दिनों तक का निषेध सामान्य है। मेरे विवाह पश्चात अनुपालन किया गया था। 
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हिन्‍दू विवाह इतनी सुन्‍दर पद्धति सम्भवत: अन्य कोई नहीं होगी।

रविवार, 5 अगस्त 2018

ग्राम गिरा - मुसलमान नहीं, तुरकट


1146 वि.। परमार भोज एवं कलचुरी कर्ण के अवसान के पश्चात तुरुष्क अर्थात तुर्क आक्रमणों से पीड़ित उत्तर भारत के कन्नौज में राष्ट्रकूट राठौर चंद्रदेव गहड़वाल का अभिषेक हुआ। सूर्य एवं चंद्र वंशी राजाओं का नाश हो चुका था, वेद लुप्त हो रहे थे। ऐसे में धरा के इस उद्धारक ने सब कुछ व्यवस्थित किया एवं परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर परम महेश्वर चन्द्रादित्य नाम धारण किया।  
प्रध्वस्तेसोमसूर्योद्भवविदितमहाक्षत्रवंशद्वयेस्मिनुत्सन्नप्रायवेदध्वनिजगदखिलंमन्यमान: स्वयम्भू:।
इस वंश की दूसरी राजधानी वाराणसी हुई।
सौ वर्षों से भी अधिक समय पश्चात 1251 वि. में मुहम्मद गोरी के गुलाम नायक कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा शक्तिशाली राठौर राजा जयचंद पराजित किया गया एवं उत्तर भारतीय इतिहास का एक बहुत ही उपेक्षित किंतु बहुत ही महत्वपूर्ण अध्याय आरम्भ हुआ। 
व्यापार, उद्योग, कला, संस्कृति एवं धर्म की नगरी वाराणसी पर तुर्कों ने आक्रमण किया। 'तज-उल-मासिर' में हसन निज़ामी लिखता है कि 'दीन' के दुश्मन की सेना हरा दी गयी थी। काशी विश्वेश्वर मंदिर के साथ ही कुल 1000 मंदिर तोड़े गये जिनके स्थान पर मस्जिदें एवं कब्रें तामीर की गयीं। 
अभूतपूर्व लूट एवं अत्याचार का सामना करती जनता ने आक्रांता इस्लाम का अभिज्ञान एक नाम से किया - तुर्क। स्वतंत्रता पश्चात तक कांग्रेसी इतिहास से अपरिचित पूर्वी उत्तरप्रदेश की भोजपुरी जनता मुसलमानों को एक ही नाम से जानती थी - तुरकट, तुरुष्क का लोक रूप। 
पहली स्मृति स्थायी हुयी, यद्यपि काशी औरंगजेब तक बारम्बार लूटी गयी, पुन: पुन: उठ खड़ी हुई। इस जीवनी शक्ति के पीछे था - निरंतर प्रतिरोध, जिसे झुठलाते हुये इतिहास में ऐसे पढ़ाया जाता है मानों मुसलमानों को थाली में परोस कर भारत दे दिया गया ! प्राचीन, मध्य एवं आधुनिक काल के रूप में सोचने के अभ्यस्त सदियों लम्बे प्रतिरोध, संघर्ष, शांति, उद्योग एवं पुन: पुन: निर्माण एवं समृद्धि को भुला देते हैं। 
औरंगजेब तक के पाँच सौ वर्ष लम्बे इस काल में मुसलमानी आक्रमणों की बारम्बारता एवं उसके सजग, सर्वजन, सफल प्रतिरोध ने इस देश में आंतरिक प्रवजन को जन्म दिया। राजपूतों के साथ सपुरोहित प्रवजन करती जातियों ने जाने कितने गाँव बसाये, जाने कितने गाँव उजाड़ भी दिये किंतु भारत को जीवित रखा। सभी जातियाँ लड़ीं - लघु सीमांतों (सिवानों) पर, बड़े युद्धों में, गाँवों के समूहों में। 'सात जातियों' वाले मानक गाँव को मानों इस काल ने पुनर्जीवित कर दिया। 
लघु स्तर पर इसके वैविध्य को 1857 ई. के पश्चात अंग्रेजों के अत्याचार के कारण घटित प्रवजन से समझा जा सकता है। 
पूर्वी उत्तरप्रदेश एवं पश्चिमी बिहार के विशाल भू भाग में बिखरे जाने कितने गाँवों में विविध जाति वंशों का वैविध्य प्रमाण है। दो किलोमीटर की ही परास में पाँच छ: वंशों का मिलना कोई आश्चर्य नहीं, न ही लघु गाँवों की विशिष्ट वास्तुयोजना जो कि कौटल्य द्वारा निर्धारित रूप से साम्य रखती है। 
यदि एक पीढ़ी 40 वर्ष की मानी जाय तो आज तक के लगभग 800 वर्षों में बीस पीढ़ियाँ होती हैं। दस पीढ़ियों वाले गाँव चार सौ वर्ष पुराने होंगे। 
यदि आप ऐसे किसी गाँव में रहते हैं, जाति चाहे जो हो, जहाँ पिछली दस बीस पीढ़ियों का लेखा जोखा किसी भी कथा एवं समय चिह्न के साथ अब भी उपलब्ध है तो आप भारत की उन भुला दी गयी सदियों के पुनर्निर्माण में सहयोग कर सकते हैं। गाँव, तहसील, जिला, उपजाति, पीढ़ी संख्या, विक्रमी संवत के पुराने संदर्भ एवं जनश्रुतियों के साथ इन सूचनाओं को एकत्र कर इस क्षेत्र का सत्य लोक इतिहास रचा जा सकता है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे। 
कभी अमृतलाल नागर ने 'गदर' किये पुरखों के 'फूल' चुन सहेज दिये थे। क्या कोई इस जटिल एवं बृहद काम को हाथ में लेगा? 
नगरों का इतिहास बहुत हो चुका, गाँवों के इतिहास को पढ़ना होगा।

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

जाति एवं जातिवाद से आगे क्या

पिछले भाग से आगे ... 


कभी कभी एक वाक्य ही आप को बहुत गहराई तक सोचने पर विवश कर देता है, आप की धारणाओं को तोड़ देता है। सम्भवत: यह घटना पहले भी लिख चुका हूँ, लोहार एवं ब्राह्मण परिवारों में कलह हुआ , बात बढ़ी नहीं क्यों कि समझदारी दोनों पक्षों में थी। उस समय अशिक्षित लोहार गृहणी ने एक बात कही - वे लोग ब्राह्मण हैं, बारह गुण वाले, हम लोग विश्वकर्मा हैं, बीस गुण वाले, क्षत्रिय छत्तीस। जाने क्यों यह हास्यास्पद वाक्य मन में कहीं स्थिर सा हो गया, साथ ही यह भी कि तब तो शूद्र शत अर्थात सौ गुणों वाले होंगे जो कि वैविध्य देखते ठीक ही लगता है। उसी समय सम्भवत: अज्ञेय की 'शेखर एक जीवनी' में एक प्रसंग मिला जिसमें खा पी कर सो जाने पर एक घर की महिला अपने बालक को रटवाती थी - हम लोग _________ हैं। समझे? लेखक के संकेत से उसका अंत्यज होना समझ में आता है।    
जैसे एक गुहा खुली हो, मुझे वे वाक्य गर्वबोध लगे। सहस्राब्दियों में पसरे वैविध्य भरे भारतीय इतिहास का एक बहुत बड़ा सच खुलता चला गया - अपनी जाति पर गर्व, जाति खोने का भय एवं जाति कर्म बनाये रखने का उद्योग - भारत की दीर्घजीविता के महत्वपूर्ण कारणों में से हैं। जिस जाति व्यवस्था पर ब्रिटिश काल से ही सुधारकों ने अकूत पानी डाला, एवं आज भी डाले जा रहे हैं, वह जाती क्यों नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत बचा ही इस वैविध्य के कारण? 
गर्वबोध उत्कृष्टता का था। लोहार अपने काम में पीढ़ियों से अर्जित दक्षता रखता था, वयनजीवी भी, प्राय: प्रत्येक जाति के साथ क्रमश: उत्कृष्ट होते जाने का सच साथ था। ब्रिटिश आगमन से पूर्व तक सदियों के आक्रमण एवं लूट अनाचार को झेलता भारत आर्थिक रूप से समृद्ध बना रहा, सामाजिक शक्ति बनी रही। संस्कृति भी सम्पदावान होती रही तो क्यों भला? कारण जाति व्यवस्था में अंतर्निहित उत्कृष्टता थी। प्रत्येक जाति अपना योगदान कर रही थी तो क्यों भला? प्रशासन तंत्र स्वस्थ था। आक्रांता मुसलमानों ने भी इस व्यवस्था से बहुत अधिक छेड़ छाड़ की हो, नहीं लगता। उनके माथे कलंक है कि कुछ प्रतिरोधी जातियों को वञ्चित कर घृणित जीवन जीने पर विवश किया किन्‍तु सुचिंतित ढंग से हर क्षेत्र में आक्रमण घुसपैठ कर विकृतिकरण के साथ साथ पीढ़ियों से अर्जित कौशल का समूल नाश करने का काम अंग्रेजों ने किया। उन्हों ने शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन कर भारतीय जन को आत्महीनता एवं आत्मघृणा से पूरित मानसिक दास बनाया जो कि आज तक चला आ रहा है। 
उनके आने से पहले की एक सहस्राब्दी भारतीय प्रतिरोध, जिजीविषा एवं शक्ति की ज्वलंत उदाहरण है जिसे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने पूर्णत: उलट चित्रित किया है। शक, हूण, इस्लामी आक्रमणों के साथ सभ्यतायें समूल नष्ट हो गयीं किंतु भारत बना रहा तो अपने प्रबल प्रतिरोधी भाव के कारण। 
यदि आप मानते हैं कि भारतीय सेनाओं में मात्र राजपूत ही थे तो भयानक भूल कर रहे हैं। वनवासियों से ले कर ब्राह्मणों तक, भारत की प्रत्येक जाति अपनी भूमि, अपनी संस्कृति एवं अपनी संतति की सुरक्षा हेतु लड़ी तब हम आज  जीवित बचे हुये हैं। जिससे जो हो सका, शत प्रतिशत से भी अधिक किया, तब हम आज बचे हुये हैं। 
हीनता बोध के पुरोधा इतिहासकार उदाहरण देते हैं कि युद्ध हो रहा था, जनता देख रही थी या धन ले कर किसी भी पक्ष में भारतीय लोग लड़ जाते थे, उनमें राष्ट्रीय भावना नहीं था आदि आदि। 
युद्ध प्रशिक्षित सेनायें लड़ती हैं, उनमें सामान्य जनता का क्या काम? क्या यह सच नहीं कि प्रत्येक जाति के सैनिक लड़े? वे क्या भावप्रवण नहीं थे? साधारणीकरण बुद्धिजीवी के पास उपलब्ध सबसे घातक अस्त्र होता है, जिसके अनुप्रयोग में कम्युनिस्ट इतिहासकार निष्णात हैं। 
धन ले कर कुछ भी करने वाले तो सदा से रहे हैं, आज भी हैं। इस कारण से यदि आधुनिक काल बुरा नहीं तो मध्य काल कैसे हो गया बंधु! शत प्रतिशत आदर्श की बात कर हीनता बोध से भरता चरम श्रेणी की धूर्तता है, अन्य कुछ नहीं। मूल भाव देखना होता है कि क्या था? भारत आदर्शों की दृष्टि से उस समय भी आदर्श था एवं सम्पूर्ण सभ्य विश्व में उसकी कीर्ति बनी हुयी थी। 
विविध जातियों के रहने का लाभ यह था कि किसी एक के नाश या पराभव से सब कुछ का नाश नहीं होने वाला था। भारत पुन: पुन: उठ खड़ा होता था तो इसके पीछे सञ्जीवनी जाति व्यवस्था ही थी जिसने धूर्त अंग्रेजों को मौलिक विकृतियों की स्थापना हेतु विवश किया कि वाणिज्यिक एवं आर्थिक दोहन के साथ भारत पर शासन तब ही सम्भव है, जब जाति केंद्रित उत्कृष्टता को नष्ट भ्रष्ट कर निर्वात को अपने अनुकूल तत्वों से भर दिया जाय। बहुत ही सधे हुये ढंग से उन सबने यह सुनिश्चित किया। 
आज भारत उनके बनाये विधान द्वारा शासित है। अंग्रेज का अर्थ अंग्रेज एवं उनके मानस पोषितों से लें। यह विधान समानता वादी है, सिद्धांतत:, दिखाने को सब को समान अवसर उपलब्ध हैं किंतु वास्तविकता यह है कि जाति एवं पंथ आधारित विशेष प्रावधान इतने सुगढ़ हैं कि सामान्य जन देख देख सीझते रहते हैं। लोकतंत्र के नाम पर भींड़तंत्र में धनबल एवं जनबल की चलती है। पुरानी उत्कृष्टता रही नहीं, कुशीलव, शिल्पी एवं उत्पादक समाज ने हीनता बोध से ग्रसित हो कोड़ियों व्यवसाय अब्राहमी पंथों के हाथ दे दिये, ले दे कर या तो श्रम बेंचना बचा या बढ़ती जनसंख्या के बोझ से आक्रांत भूमि का एक टुकड़ा जिसका सस्य उत्पादन न तो पर्याप्त है, न मूल्यवान। यह दशा द्विज कहलाने वाले अधिकतर त्रिवर्ण की भी है। ऐसे में समाज विकासशील भले दिखे, विकसित नहीं हो सकता। 
हताशा की स्थिति में बीते कुछ बीसेक वर्षों में जाति आधारित जातिवादी सङ्गठनों की बाढ़ सी आ गयी है - जन बल होने का भ्रामक बोध इसका कारण है। कहते हैं कि श्रेष्ठताबोध एवं हीनताबोध एक ही निष्क के दो पक्ष होते हैं। इसका जातिवादी संगठनों से उपयुक्त उदाहरण हो ही नहीं सकता। ऐसा तब है जब विधान को सत्तर वर्ष भी नहीं हुये ! 
इससे आप अपने पुरखों की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं जब आक्रांता उनके राजा बन बैठते थे, समाज का संतुलन डाँवाडोल हो जाता था एवं आदर्श विपथगामी। भारत की, उनकी शक्ति एवं बुद्धिमत्ता इसमें थी कि परिवर्तित होती सदियों में परिवर्तित होते हुये उन्हों ने स्वयं को जीवित तो रखा ही, समृद्ध भी बनाये रखा। आप में वह शक्ति नहीं रही जिसके कारण आप जातिवादी संगठनों को उन्मुख होते हैं, वे संगठन जिन पर अधिकांशत: धन बल वालों का प्रभुत्व है, जो आप का उपयोग अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु करते हैं।  
प्राचीन ग्रंथों के सावधान अवगाहन से बहुत से सत्य झाँकते दिख जाते हैं, सबसे बड़ा सत्य यह है कि वेदों के अतिरिक्त समस्त ग्रंथों में सामयिक परिवर्तन परिवर्द्धन होते रहे। समाज की शक्ति उसकी नम्यता, आघातवर्द्धनीयता एवं नित्यता थी। वे जन मृषा का प्रसार करते हैं जिनके अनुसार किसी व्यास, किसी पराशर या किसी मनु के द्वारा जो शास्त्र रचे गये वे तब से यथावत हैं, उनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। ऐसे जन समाजद्रोही कहे जाने चाहिये क्यों कि वे आप को शक्ति से वञ्चित कर रहे होते हैं। शक्तिवञ्चना आक्रमण का ही दूसरा पक्ष है, लक्ष्य वही निर्बल निरीह बनाये रखना या बना देना। 
इन शास्त्रों में बहुत सी ऐसी बातें मिलती हैं जो समसामयिक निकष पर घृणित ठहरती हैं। वे पूर्णत: घृणित मन्तव्य से रची गईं, ऐसा नहीं है। ऊपर सत्तर वर्षों में ही जो स्थिति हुई है, लिख चुका हूँ। ऐसी ही जाने कितनी स्थितियों का सामना शताब्दियों में पसरे भारतीय जन ने किया एवं अपने विधान, अपने शास्त्र आवश्यकतानुसार परिवर्तित परिवर्द्धित किये। यह उनकी शक्ति थी। जो विधान अप्रासङ्गिक हो गये थे, उनके त्याग के उल्लेख शास्त्रों में भी मिलते हैं अत: आज अप्रासंगिक हो गये विधानों को लेकर रोना एवं आक्रोश मूर्खता एवं हीनताबोध के अतिरिक्त कुछ नहीं। नया विधान है, उसमें कैसे आप समृद्ध, निरामय एवं प्रगतिगामी होते हुये स्वयं को, परिवार को, समाज को, राष्ट्र को आगे ले जा सकते हैं, यह विचार का विषय है, बीते हुये पर वक्षताड़न करना नहीं।    
जाति पर ही शास्त्रों में एक महत्वपूर्ण पक्ष मिलेगा - शूद्र स्वयं को शूद्र कहने में लज्जा का अनुभव नहीं करते थे। क्यों ? क्यों कि उनके पास उत्कृष्टता का बल था, कौशल था, आत्मविश्वास एवं आत्मगौरव का पीढ़ियों से सञ्चित भाव था; समृद्धि तो थी ही। आप को शूद्र राजाओं के भी उल्लेख मिलेंगे। ऐसे समझें कि उत्पादक एवं शिल्पी समाज के दरिद्र रहते हुये कोई भी देश 'सोने की चिड़िया' नहीं हो सकता। यदि ये फलते फूलते नहीं रहेंगे तो धन आयेगा कहाँ से? 
बिना इस मीमांसा में पड़े हुये कि ऐसे अंश कब आये होंगे, यदि हम आगे दिये कतिपय उदाहरणों पर ध्यान दें कि ऐसा कभी सुदूर भूत में हुआ था तो सुंदर सचाइयाँ उद्घाटित होती हैं। 
भारत काल में मंत्री विदुर नीति का उपदेश एवं अपनी विचार अभिव्यक्ति पूरे विश्वास के साथ करने के पश्चात कहते हैं कि मैं शूद्र हूँ, मुझे श्रुति अधिकार नहीं है, अत: मैं आगे नहीं कह सकता। पुराण प्रवक्ता सूत लोमहर्षण कहते हैं कि प्रतिलोमज (ब्राह्मण माता एवं क्षत्रिय पिता की संतान) होते हुये भी हमें ऋषि समाज को सुनाने का गौरव मिला है। मौर्य काल में चाणक्य लिखते हैं कि पुराणों के सूत प्रतिलोमज सूतों से भिन्न हैं एवं वे ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों से विशिष्ट हैं। विष्णु पुराण सौति को महामुनि एवं जगद्गुरु जैसी संज्ञाओं से विभूषित करता है।  
सहस्राब्दियों की परास के इन कुछ उद्धरणों से जो स्पष्ट होता है, वह यह है कि विविध जातियों को अपनी निजी जाति को ले कर हीनता बोध न था एवं समस्त व्यवस्था लचीली थी, प्रवाही थी तथा उसमें सामयिक यथार्थ के अनुकूल बने रहने का गुण  था। ऐसा जब तक रहा, भारत बना रहा। अंग्रेजों के 'इण्डिया' में उत्कृष्टता गई, गौरव बोध गया, समृद्धि भी गयी, बच गया भङ्ग समूह-बोध जो कि विविध जातियों को जातिवादी संगठनों की ओर आकर्षित करता है। 
जाति उन्मूलन एवं जातीय वर्चस्व स्थापना जैसी वायवीय संकल्पनाओं को तज 'उत्कृष्टता' की साधना करें, जाति चाहे जो हो। यह मार्ग पहले भी प्रभावी था, आज भी है। भारत के नाम में ही 'भा', भासमान प्रकाश है, हम अन्धकार में कभी नहीं रहे, हमें केवल अंधकार युग की संतति बताया जाता रहा है जिसका उद्देश्य औपनिवेशिक स्वार्थपूर्ति रहा एवं अब निहित स्वार्थ वश भींड़ तंत्र में सत्ता में बने रहना है। आँखें खोलिये, भासमान भारत पुकार रहा है। 
आप उत्कृष्ट होंगे तो जाति, समाज एवं देश, सभी उत्कृष्ट होंगे। ऐसे में सबका स्वार्थ भी सधेगा या नहीं?


बुधवार, 1 अगस्त 2018

जाति एवं उत्कृष्टता

प्राय: जाति एवं वर्ण के ले कर लम्बे लम्बे विमर्श, वाद, विवाद, कलह, मनोमालिन्य आदि होते रहते हैं। दो आत्यंतिक विचार भी प्रचलित हैं - भारत की दुर्दशा जाति व्यवस्था के कारण  हुई एवं भारत में जाति व्यवस्था थी ही नहीं, अंग्रेजों की देन है। कहना न होगा कि दोनों व्यर्थ के बकवाद से अधिक महत्व नहीं रखते। 
जाति का अर्थ किसी भौगोलिक क्षेत्र में विकसित विशिष्ट लक्षणों वाले मानव समूह से है। जातियाँ वैविध्य को दर्शाती हैं - यक्ष, देव, नाग, किन्नर, गंधर्व इत्यादि जातियाँ हैं। वर्ण की अवधारणा एवं व्यवस्था जाति की परवर्ती है, तब की जब कि क्षेत्र विशेष में रहने वाला मानव समाज इतना उन्नत हो गया कि उसे कार्य विभाजन की आवश्यकता पड़ी। 
भारत भूमि का ऐतिहासिक विस्तार आज के अफगान-ईरान सीमा से ले कर कामरूप तक था। उत्तर में उत्तर कुरु को तज भी दें तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक। इस एक भूमि की अवधारणा शनै: शनै: विविध जातियों के परस्पर सम्पर्क, संघर्ष, समायोजन एवं सामञ्जस्य से विकसित हुई। एक बार हो गई तो सहस्राब्दियों तक सुरक्षित रही। स्पष्ट है कि ऐसा समाज जब वर्ण विभाजन करेगा तो उसमें विविध जातियों के गुणसूत्र रहेंगे। बंगाल के ब्राह्मण के गुणसूत्र वहीं के किसी अन्य वर्ण से सारस्वत क्षेत्र के ब्राह्मण से अधिक मेल खायेंगे। भारत वंश का यही सच है, इससे आगे वितण्डा, जातिवाद, जन्मना श्रेष्ठता भाव, अहङ्कार इत्यादि हैं जिनके तर्क वितर्क न केवल अंतहीन हैं अपितु पतनकारी भी।
कार्य विभाजन के साथ ही विविध जातियाँ वर्णसाम्यता की दिशा में अग्रसर हुईं, हो भी गयीं अर्थात शताब्दियों पश्चात जाति कोई भी रही हो, न तो उसकी स्मृति रही, न उससे कोई जुड़ाव। लम्बे कालखण्ड का वर्ण ही जाति विशेष हो गई। 
उन्नत समाज व्यवहार संहितायें रखता ही है। स्मृतियाँ वही संहितायें हैं। यहाँ संहिता का अर्थ वेद संहिता से नहीं, विधानों के सम्यक एकत्रीकरण से है। वे उस व्यवस्था को अभिलिखित करती हैं जिसमें जाति-वर्ण के ऐक्य को सुनिश्चित रखने के लिये विविध विधान बनाये गये। समाज की दीर्घजीविता एवं शांति हेतु यह आवश्यक भी था। एक पीढ़ी से दूसरी, तीसरी ... को प्रवाहित कुशलता अल्पसाध्य थी, उत्कृष्टता को दीर्घजीवी भी बनाती थी एवं नवोन्मेष हेतु आवश्यक वातावरण भी सुनिश्चित करती थी। उदाहरण के लिये रथकार का पुत्र भी शिल्पी रथकार हो, इसमें अधिक सरलता है, समाज एवं तंत्र पर अल्प बोझ है। राजन्य का पुत्र रथकार बने तो पहले से चली आ रही कुशलता का लोप तो होगा ही, श्रमसाध्य भी होगा एवं सातत्य टूटेगा। ऐसा नहीं था कि अपवाद नहीं थे, किंतु वे अपवाद ही रहे। स्मृतियाँ इसी कारण उपनयन एवं शिक्षा आरम्भ का समय, वटुकों के वस्त्र, दण्ड आदि को उसके पिता के वर्ण से निर्धारित करती हैं। यह नैरंतर्य का सूचक है कि तू उत्पन्न हुआ इस जाति विशेष में, अत: तुझे ऐसे ही, यही सीखना है, यदि नहीं करेगा तो पतित हो जायेगा। पतित का सामाजिक बहिष्कार होता था या वह समाजबाह्य हो जाता था।
इस व्यवस्था की यदि एकमात्र विशेषता देखी जाय तो वह है - उत्कृष्टता Excellence। यहीं राजा एवं राजन्य की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे उस पारिस्थितिकी को बनाये रखना है जो प्रत्येक जाति में, प्रत्येक उत्पादन कर्म में, प्रत्येक शिक्षा पद्धति में उत्कृष्टता सुरक्षित रखे। राजन् शब्द रञ्जन से जुड़ता है, यह रञ्जन मनोरञ्जन मात्र नहीं, प्रत्येक क्षेत्र में 'सुख समृद्धि शांति निरामयता' की स्थापना एवं दीर्घजीविता है जिससे समस्त समाज एवं राज्य तंत्र कल्याणकारी हो, वृद्धिपरक हो - राजन् [राज्-कनिन् रञ्जयति रञ्ज्-कनिन् नि ˚]। इसके साथ ही रक्षण है जो दुष्टों का दलन एवं सज्जनों की सुरक्षा है, क्षत से सुरक्षा करने वाला क्षात्र कर्म। राजा एवं राजन्य वर्ग में ये दोनों समाहित किये गये जिसके कारण ही अच्छा राजा विष्णु रूप माना गया, वह जो पोषण करता है, वह जो अत्याचारियों से रक्षा करता है, उसके लिये चाहे जो करना पड़े ! 
शब्द देखें तो यह सूक्ष्म संकल्पना उद्घाटित होती है। अच्छे राजा द्वारा शासित प्रदेश 'राजन्‍वत्'  है किंतु सामान्य राजा, जिसमें कि कोई उत्कृष्टता नहीं, द्वारा शासित प्रदेश 'राजवत्' है। एक अर्द्ध 'न' के अंतर से वरेण्य एवं रूढ़ में अंतर स्पष्ट कर दिया गया है। 
सामान्य प्रजा पहले विश् कहलाती थी, वैश्य उसी से है - कृषि, पशुपालन एवं शिल्प इत्यादि में रत रहने वाला बहुसंख्यक समाज। इसी से विशेषज्ञता एवं शिल्प कुशलता वाले कुशीलव निकले जिनका सामान्य स्तर सेवा करने वाला शूद्र हुआ। प्रजा से ही रक्षा करने वाले क्षत्रिय हुये एवं उन्हें निर्देशित करने वाले, विधि विधान के संयोजक पुरोहित ब्राह्मण। राजा या क्षेत्र विशेष का मुखिया  विश्पति कहा गया, उसकी पत्नी विश्पत्नी - जो विश् अर्थात प्रजा का पालन करने के कारण पूज्य है, आदरणीय है। 
अनेक प्रकार से कु-व्यञ्जित पुरुष सूक्त में राजन्य रूपी बाहु एवं वैश्य रूपी ऊरू अर्थात जानु (जंघे) पर ध्यान दें। राजन्य का आजानुबाहू होना शुभ लक्षण माना गया। इसके मूल में वही भाव है कि राजन्य वह जिसकी परास वैश्य तक हो। 
ऐसा राजा उत्कृष्टता को सुनिश्चित करता है, धरती पर विष्णु का रूप होता है। इस आदर्श ने प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता सुनिश्चित की। व्यापारी, सार्थवाह गण, कुशीलव उपनिवेश इत्यादि इतने शक्तिशाली थे कि राजसभा में उनका सम्माननीय प्रतिनिधित्व था। राजा मनमानी करते हुये निरङ्कुश नहीं हो सकता था। जो हुये, उनकी दुर्गति सुनिश्चित की गयी। राजा का कोश ही उसकी शक्ति है जो कि कराधान से भरता है। कराधान तब ही बढ़ेगा जब कृषक, वैश्य, शिल्पी, समृद्ध होंगे, फले फूलेंगे। 
स्पष्ट होता है कि 'उत्कृष्टता एवं कुशलता' इस व्यवस्था की देन थे एवं यह भी कि कोई भी जाति अपने पर लज्जित नहीं थी। इस्लामी आक्रान्‍ताओं ने इस शक्ति से सामञ्जस्य कर ही राज्य किया एवं अंग्रेजों की चतुर वणिक बुद्धि ने इस शक्ति को भारत को उपनिवेश बनाये रखने के मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा पाया। इस शक्ति को विविध उपायों द्वारा जिनमें कि दमन, दुष्ट कराधान एवं वैमनस्य वपन प्रमुख थे, उन्हों ने नष्ट कर दिया जिससे भारत आज तक उपरा नहीं पाया है। 
जाति आधारित आधुनिक मञ्चों में किसी को भी इसकी समझ है, प्रतीत नहीं होता। उत्कृष्टता की साधना के स्थान पर प्रयास जातिवादी राजनीतिक समूह प्रभाव सुनिश्चित करने की है जिसकी भीड़ आधारित लोकतन्‍त्र में सुनी जाय। ध्यान इस पर अधिक है जो कि प्रगति की मूलभूत आवश्यकता के विरुद्ध जाता है। पुराने का गौरव गान करते हुये वर्तमान स्थिति को विस्मृत कर देना हानिकारक है। प्रत्येक जाति अपने गौरव पुरुष ढूँढ़ने, बनाने एवं स्थापित करने में लगी है, बिना इस पर विचार किये कि सहस्राब्दियों के भारतीय इतिहास में किसी भी समूह को ऐसा करने की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ी, अब क्यों पड़ रही है? 
ब्राह्मणों पर बहुत लिखा गया, लिखा जा रहा है किन्तु उस राजन्य वर्ग का क्या जिसे कि ब्रह्मविद्या का पोषक माना गया, जिसे कि कभी ब्राह्मण ग्रंथों ने ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ घोषित किया? यह वर्ग भी पतनोन्मुख है। तामस, अनावश्यक उग्रता, मद्यपता एवं क्षुद्रता इसके लक्षण हो गये हैं। महाराणा का घोष करने वाले जानते तक नहीं कि महाराणा ने अपने अल्प शासन काल में ही उत्कृष्टता के कितने आयामों का स्पर्श किया। राजपूत का पूत उस संतति परम्परा हेतु है जो पुरखों की थाती सँभाले, उत्कृष्टता में उनसे आगे बढ़े अन्यथा काहे का राज,  काहे का राजपूत?  ज्ञान के अभाव में झूठा गर्व हास्यास्पद तो लगता ही है, युवाओं को दिशा भी नहीं देता, उल्टे गर्त में ही ढकेलता है। 
राज शब्द राजति, प्रकाशित होने का भी अर्थ रखता है, उत्कृष्टता होगी तो प्रकाशित होगी ही। किसी भी जाति ने निकृष्टता को आदर्श नहीं बनाया, बड़ी सामान्य सी बात है किन्‍तु वही आँखों से ओझल है। 
ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य; जो भी अपने को इन तीन जातियों में मानते हैं, यदि जाति आधारित मञ्चों को ही सब कुछ मान बैठे हैं तो भयानक भूल कर रहे हैं। स्वीकार कर रहे हैं कि वे चुक गये, उनके पुरखों का प्रभाव मर गया। 
ऐसे मञ्च अनुपयोगी हैं, ऐसा नहीं है किन्‍तु एक देश के रूप में, एक समाज के रूप में उत्कृष्टता सुनिश्चित करने में गौण भूमिका ही रखेंगे। यदि आप ऐसे किसी मञ्च से जुड़े हैं तथा वहाँ जय परशुराम, जय रावण, जय महाराणा; जैसी जय जय मात्र है तो बाहर आयें। जाति का गौरव तब ही बढ़ेगा जब उत्कृष्टता होगी, देश का भी नाम होगा जो कि द्विजता का अर्हण होगी। प्रतिद्वन्द्विता में शूद्र न बनें। भार्गव राम ने या महाराणा ने या अग्रसेन महाराज ने जय जाति, जय जाति उद्घोष कर अपने को स्थापित नहीं किया था। 
चेतें ! आप की सन्‍तानों के लिये आगत समय कठिन होने वाला है। अब्राहमी पंथ वैधानिक संरक्षण में आप को दिन प्रतिदिन काटने में लगे हुये हैं। जाति से जुड़े रहते हुये भी दृष्टि को व्यापक विराट बनायें, सूक्ष्म आक्रमणों पर ध्यान दें एवं उत्कृष्टता में लग जायें। एक साथ उठें, खण्ड खण्ड नहीं। ऐसे उदाहरण हैं जहाँ विविध जाति समूह एक उद्देश्य के साथ व्यापक एवं सूक्ष्म, दोनों स्तरों पर एक साथ लड़ते हैं, उपाय भले भिन्न हों, उद्देश्य एक है। दूजा कोई मार्ग नहीं।    
  

शनिवार, 14 जुलाई 2018

हथिया के पेटे जाड़ - नक्षत्र, सूर्य, चंद्र, पृथ्वी प्रेक्षण - लोकगिरा, वर्ष, ऋतु, माह

सूर्य पृथ्वी का निकटमत तारा है जहाँ से प्रकाश को तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकण्ड की गति से पहुँचने में मात्र आठ मिनट लगते हैं अर्थात किसी भी समय हमारी आँखों से देखा जाने वाला सूर्य आठ मिनट पुराना होता है अर्थात यदि सूर्य पर कुछ घटित हो तो हमें आठ मिनट पश्चात दिखेगा। 
प्रॉक्जिमा सैंटौरी तारा हम से दूसरा निकटतम तारा है जो कि लगभग सवा चार प्रकाशवर्ष की दूरी पर है अर्थात वहाँ से चले प्रकाश को हम तक पहुुँचने में सवा चार वर्ष लगेंगे अर्थात उसे जब भी हम देखेंगे, सवा चार वर्ष पुराना ही देखेंगे। 
अब उन तारों, निहारिकाओं, मंदाकिनी इत्यादि की सोचें जो हमसे लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं, उनका वर्तमान तो हम जान ही नहीं सकते ! दिक्काल की सीमायें यही हैं।
...  
विराट ब्रह्माण्ड में यदि हम अपने क्षुद्र सौरमण्डल को देखें तो पृथ्वी अपने अक्ष पर जितने समय में एक चक्र पूरा करती है, उससे लगभग 365 गुना समय में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है। सूर्य भी अपने समस्त ग्रहों के साथ तीव्र गति से भागता जा रहा है किंतु हमें तो स्थिर प्रकाश पिण्ड ही लगता है जिसकी परिक्रमा हम कर रहे हैं। कारण है, तुलनात्मक रूप से हमारा अति लघु रूप। हमें दिन रात जो कि पृथ्वी के अक्षीय घूर्णन के कारण होते हैं, प्रति दिन पता चलते हैं, दिन की इकाई बनी ही उससे है किंतु उससे क्रमश: बढ़ने में समस्यायें होने लगती हैं। 
By LucasVB [Public domain], from Wikimedia Commons
ऋतुयें इस कारण होती हैं कि पृथ्वी का घूर्णन अक्ष लट्‍टू की भाँति झुका हुआ है जिसका शीर्ष एक वृत्त में घूमता  रहता है, आकाश के जिस क्षेत्र की सीध में किसी समय उसकी शिरोरेखा पड़ती है, उसे ध्रुव कहते हैं, धुरी की भाँति अटल जो कि वस्तुत: लगभग 21 से 26 हजार वर्षों के आवर्तकाल से परिवर्तित होता रहता है। उसकी दिशा ही उत्तर दिशा है - ऊपर, उदीचि, उत्तर। चूँकि यह एक धीमी गति है, इसका प्रेक्षण सभ्यताओं के विद्वान ज्योतिषी ही कर पाये, जनसामान्य के लिये तो ध्रुव धुरी बने स्थिर ही रहे।
इस गति के कारण ही सूर्य देव पूरब पश्चिम में क्रमश: उदित अस्त दिखते हुये भी उत्तर दक्षिण दिशाओं में झुकते, सीधे होते, पुन: झुकते एक आवर्ती गति करते प्रतीत होते हैं। झुकाव के अल्प एवं अधिक होने से विकिरण, ऊष्मा आदि की प्राप्ति में हुये एवं उनसे जुड़े अन्य परिवर्तनों के कारण विविध नाटकीय परिवर्तन धरा पर दिखते हैं, कभी फूल ही फूल, कभी सब पत्ते लुप्त, कभी वर्षा ही वर्षा तो कभी तपती धूप। ये परिवर्तन सहसा नहीं हो जाते, उनका पता हमें अपेक्षतया मंद गति से शनै: शनै: पड़ता है।
ये परिवर्तन एक लय में होते हैं - संस्कृत का ऋत, अंग्रेजी का rhythm. ऋतु अनुकूल आहार विहार से स्वास्थ्य ठीक रहता है, rhythm में विविध ध्वनियाँ सङ्गीत हो जाती हैं, जीवन सङ्गीत यही तो है ! आवर्ती लय।     
इन दो घूर्णन गतियों के साथ साथ पृथ्वी द्वारा सूर्य की वार्षिक परिक्रमा है ही। चूँकि ये सारी गतियाँ लयबद्ध हैं, इनमें कोई यादृच्छ या अनिश्चित या सहसा परिवर्तन नहीं हो सकते; सूर्य सापेक्ष सबसे बड़े परास वाली गति 365 दिनों के वर्ष विभाजन के सापेक्ष हम शेष दो को व्यवस्थित कर सकते हैं। यही तो है अभियांत्रिकी एवं प्रबंधन की एक प्रिय कार्यविधि - सकल से सूक्ष्म की दिशा में, from WHOLE to PART
चंद्रमा को आप प्राकृतिक कैलेण्डर मान सकते हैं जो कि भीति पर टँगा होने के स्थान पर आकाश में टँगा कलाओं के माध्यम से तिथियाँ बताता रहता है। आज सामान्य जन भले चंद्र को देख तिथि न बता पायें, एक पीढ़ी पूर्व तक लोग देख कर बता देते थे - अन्हार या अँजोर, चौथी या पञ्चमी ! 
उसकी सोलह कलाओं में से आरम्भ एवं अंत को हटा दें तो चौदह चौदह दिन की दो अवधियाँ हुईं अट्ठाइस एवं वे दो मिला कर एक अवधि हुई तीस दिन की। मा, चंद्रमा से मास, moon से month. 365 को जब इन तीस दिनों में बाँटा गया तो बारह इकाइयाँ हो गयीं, बारह नामों वाले महीने। बचे खुचे दिनों का समायोजन विविध रीतियों से कर लिया गया। एक दूसरा गणित, अधिक सटीक 'पक्ष' वाला हुआ - जब चंद्र घट रहा हो तो अन्हार, बढ़ रहा हो तो अँजोर - क्रमश: कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष। माह में दो पक्ष हो गये मानोंं मास रूपी उड़ते पक्षी के दो पंंख हों ! 
दो महीने मिला कर हो गयी एक ऋतु जब कि परिवेश का समेकित सकल प्रभाव निश्चित प्रकार से पारिभाषित किया जा सकता है। बारह अद्धे छ: ऋतुयें हुईंं। 
...  
इनके अतिरिक्त जो भी गतियाँ हैं, उनके लिये हमें विशेष यंत्र, प्रेक्षण, विद्या इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। उन्हें हम इनके बिना नहीं जान सकते, अतिशय मेधावी जन अनुमान मात्र लगा सकते हैं। 
रात में आकाश देखें तो हमें भिन्न भिन्न तारामण्डल दिखाई देते हैं जो विविध आकृतियों में सहस्राब्दियों से यथावत मानव को दिखते रहे हैं। इस कारण ही अनेक कल्पनाओं एवं कहानियों का सृजन हो पाया किंतु उन ताराओं में भी सापेक्ष गतियाँ हैं जो कि अतिशय दूरी के कारण हमें कोरी आँखों से पता नहीं चल पातीं। लाखों वर्षों के पश्चात उनके आकार वही नहीं रहने जो आज दिखते हैं, सप्तर्षि पूँछ वाली पतंग की भाँति उड़ते नहीं दिखेंगे, आकार परिवर्तित हो जायेगा।  
कल्पना करें कि पृथ्वी की परिधि पर एक वृत्तीय पथ बना हुआ है जिस पर हम किसी वाहन में सवार अबाध गति से चल रहे हैं। पहला परिक्रमण पूरा होते ही हमें खिड़की से वही संरचनायें दिखने लगेगीं जो आरम्भ में दिखी थीं। बाह्य परिवेश हमारा स्थिर संदर्भ बिंदु हो जायेगा जिसके सापेक्ष हम गतिमान होंगे, कहेंगे यहाँ पहुँच गये, अब आगे वह वृक्ष आयेगा, सरोवर पीछे छूट गया आदि आदि। 
इसी प्रकार पृथ्वी की गति अंतरिक्ष में है। वे विविध तारामण्डल स्थायी स्थिर संरचनाओं की भाँति संदर्भ बिंदु हैं, स्थिर stationary station, स्‍थिर स्थानक हैं जिनके सापेक्ष गाड़ी की गति का लेखा जोखा रखा जाता है। अंतर इतना ही है यह गाड़ी विलम्ब नहीं करती, न कभी समय से पहले चल पाती है। लगभग स्थिर मान का वर्ष उसकी इस समयबद्धता के कारण ही है। गति में विविध सूक्ष्म अंतर हैं किंतु उनकी उपेक्षा की जा सकती है या उन्हें जटिल बृहद गणित में समोया जा सकता है। बृहस्पति का साठ वर्षीय चक्र, सप्तर्षि का 2700 वर्षीय आदि ऐसी ही व्यवस्थायें हैं। 
हमारी गति के कारण वर्ष भर सूर्य जिस पथ पर चलता दिखाई देता है, उस पर सम दूरी पर विविध तारों एवं तारामण्डलों के 27 स्थानक मान लिये गये जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। 27 ही क्यों? 
यहाँ पुन: चंद्रमा रूपी प्राकृतिक कालेन्‍द्र calendar काम आया। सूर्य के साथ समस्या यह है कि जब वह दिखता तो कोई अन्य तारे या नक्षत्र नहीं दिखते। चंद्रमा के साथ यह समस्या नहीं है। वह नक्षत्रों के साथ साथ रात में दिखता है, सबसे प्रभावी दिखता है। इसी कारण से उसे नक्षत्र रूपी स्त्रियों का स्वामी मान लिया गया। देखा यह गया कि वह किसी नक्षत्र की सीध में 27 से 28 दिनों के बीच की अवधि में बारम्बार आ जाता है, चंद्र के रूप में मानव को सूर्य गति के प्रेक्षण हेतु एक स्वतंत्र मापनी मिल गयी !  
ऋतु कोई हो, सूर्य पृथ्वी कुछ भी कर रहे हों, चंद्रमा अपनी यह 27 दिवसीय यात्रा निरपेक्ष भाव से करता रहता है। चूँकि पृथ्वी की परिक्रमा के साथ साथ वह सूर्य की भी परिक्रमा कर रहा है, वह निरपेक्ष होते हुये भी इनके सापेक्ष सत्यापन की युक्ति हो सकता है। 
वह आभासी पथ जिस पर सूर्य अपने समस्त ग्रहादि एवं उनके उपग्रहों के साथ गतिमान प्रतीत होता है, उसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। क्रांतिवृत्त को 27 स्थानकों या नक्षत्रों में बाँट दिया गया - सूर्य जी जब इस स्थानक आये थे तो चंद्र जी अपनी फला कला में फला स्थानक पर थे ! घड़ी की व्यवस्था हो गयी। 
आकाश में चलते चलते सूर्य जब किसी नक्षत्र पर पहुँचता है अर्थात जिसकी सीध में दिखता है, उसे उस समय का सूर्य नक्षत्र कहते हैं या इस भाँति कहते हैं कि अभी सूर्य उस नक्षत्र पर है। ऐसा ही चंद्र के साथ है। इस कारण ही किसी दिन सूर्य नक्षत्र एवं चंद्र नक्षत्र, दो होते हैं। दोनों का एक साथ एक ही नक्षत्र पर होना बहुत सुलभ घटना नहीं है।  
365.25 दिनों की पृथ्वी की वार्षिक गति को 27 नक्षत्रों से भाग दें तो सूर्य एक नक्षत्र पर साढ़े तेरह दिनों से किञ्चित अधिक समय तक रहेगा। 
(कभी यह भी था कि मानव निर्मित ये विभाजन समान नहीं थे किंतु हमें तो अब  का देखना है।)
ग्रेगरी का अंग्रेजी कैलेण्डर शुद्ध सौर है अर्थात उसमें चंद्रमा की कलाओं, मास, दिन, तिथि आदि के संयोजन नहीं होते, न उस उद्देश्य से गणितीय संशोधन किये जाते हैं; इस कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित इस कैलेण्डर के दिनाङ्कों को सौर गति अर्थात उसके विविध नक्षत्रों में प्रवेश से जोड़ा जा सकता है। उदाहरणतया :                 
अगस्त मास में 18 को सूर्य मघा नक्षत्र में प्रवेश कर 30 तक रहते हैं,  31 को पूर्व फाल्गुनी में, 14 सितम्बर को उत्तर फाल्गुनी में एवं 28 सितम्बर को सूर्य रूपी गाड़ी हस्त स्थानक अर्थात नक्षत्र पर पहुँचती है। 
(दिन सूर्योदय से गिनते हैं अत: रात्रि में या सूर्योदय के पश्चात हुये परिवर्तनों के लिये +/- 1 दिन की परास रहेगी।
स्पष्ट है कि इसी प्रकार ऋतु आरम्भ एवं अंत के दिनाङ्क भी बताये जा सकते हैं जो वर्षो वर्ष एक ही रहेंगे। तमिळ कैलेण्डर भी पूर्णत: सौर है, भारतीय मानक शक संवत भी। इनमें भी ऋतुओं की आरम्भ तिथियाँ निश्चित एवं स्थिर होंगी। 
24 अगस्त को शरद ऋतु का आरम्भ हो जाता है, 26.50 उत्तरी अक्षांश के निकटवर्ती क्षेत्रों में इसी दिन के निकट अगस्त्य का उदय होता है अर्थात सूर्य की ओट में अपनी कांति खो चुके अगस्त्य उससे मुक्त हो पुन: भोर में दिखना आरम्भ करते हैं। (यहाँ समस्या यह है कि इस प्रकार के उदय अस्त अक्षांश आधारित होते हैं। क्यों ? कभी समझायेंगे।
अक्षांश आधारित स्थानीय प्रेक्षण भारत में बहुत हुये एवं कृषि आधारित समाज में उन्हें ऋतुओं से जोड़ कर एक मौखिक परम्परा के ढीले ढाले लोक-कैलेण्डर के रूप में बारहो महीनों, छहो ऋतुओं के लिये सँजो लिया गया। पीढ़ियों तक इस कला में निष्णात 'घाघ भड्ढरी' प्रकार के जन किसानों का मार्गदर्शन तो करते ही रहे, उन्हें शिक्षित कर एक स्वतंत्र सशक्त वैज्ञानिक परम्परा को भी सुरक्षित सम्वर्धित करते रहे। 
ऐसे प्रेक्षणों के साथ समस्या यह है कि ये सार्वदेशिक नहीं लागू किये जा सकते। कोल्लम का प्रेक्षण काशी में काम नहीं आयेगा। हाँ, यदि दोनों स्थानों के औपचारिक ज्योतिर्विद एक साथ बैठें तो अपने अपने क्षेत्रों के लोकज्ञान के संयोग से जाने कितने रहस्य उद्घाटित कर सकते हैं।  
उत्तर भारत में अगस्त्य दर्शन को वर्षा ऋतु का अन्त माना जाता है। वर्षा इससे आगे भी होती है किन्‍तु अवसान वाली। लगभग महीने भर पश्चात जब 28 सितम्बर को सूर्य हस्त नक्षत्र में होते हैं तब अंतिम वर्षा के झँकोरों के साथ ही जाड़े की भूमिका हो जाती है। 
लोक में कहते हैं - हथिया के पेटे जाड़हस्त नक्षत्र हाथ के आकार में समाता चार तारकों का समूह है जो कि लोकगिरा में हस्त से हाथ, हाथ से हाथी हो गया है (हाथी या हस्ति को यह नाम इस कारण दिया गया है कि चौपाया होने पर भी उसकी सूँड़ ऐसे काम करती है जैसे मनुष्य का हाथ।)  
देखें तो बारह महीनों में छ: ऋतुओं हेतु प्रति ऋतु दो माह ही पड़ते हैं किंतु संधि काल का ध्यान लोक में रखा गया है। शरद है किंतु उसमें हो रही वर्षा को अगस्त्य तारे से जोड़ कर सँजो लिया गया। 
शरद है किन्‍तु उसमें हो रही अंतिम वर्षा के साथ हेमन्त (हिम का अंत अर्थात हिमपात अब ठहर जायेगा, पिघलेगा तो दाँत कड़कड़ाने वाले शिशिर का आगम होगा) अर्थात जाड़े की पूर्वऋतु से जोड़ कर स्मृतिबद्ध कर लिया गया। 
वस्तुत: शरद-हेमन्त-शिशिर की तिकड़ी ऐसी रही कि उनमें ऋतुओं का संक्रमण उतना स्पष्ट न होने के कारण पाँच ऋतुओं की भी संकल्पना करनी पड़ी। 
इसके अनेक उदाहरण वैदिक वाङ्मय में उपलब्ध हैं।
शतपथ ब्राह्मण में वर्षा एवं शरद को मिला कर पाँच ऋतुओं की बात की गयी है: 
लोको॑वसन्त॑ऋतुर्य॑दूर्ध्व॑मस्मा॑ल्लोका॑दर्वाची॑नमन्त॑रिक्षात्त॑द्द्विती॑यम॑हस्त॑द्वस्याग्रीष्म॑ऋतु॑रन्त॑रिक्षमेवा॒स्य मध्यमम॑हरन्त॑रिक्षमस्य वर्षाशर॑दावृतू य॑दूर्ध्व॑म्न्त॑रिक्षादर्वाची॑नं दिवस्त॑च्चतुर्थम॑हस्त॑द्वस्य हेमन्त॑ऋतुर्द्यउ॑रेवा॒स्य पञ्चमम॑हर्द्यउ॑रस्य शि॑शिर ऋतुरि॑त्यधिदेवतम्।
ऐसा क्यों? इसमें उस समय की स्मृति है जब वर्ष का आरम्भ वर्षा से था। शरद मिला देने पर शरद विषुव (23 सितम्बर) जो कि वसंत विषुव (21 मार्च) से छ: महीने के अंतर पर पड़ता है, वर्षा के साथ आ जाता है, नाक्षत्रिक एवं ऋत्विक प्रेक्षणों के सम्मिलन से सुविधा हो जाती है (विषुव अर्थात जब उत्तर दक्षिण में दोलन करता सूर्य माध्य स्थिति में दिखे, ठीक पूरब में उगे, ठीक पश्चिम में अस्त हो)
ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत एवं शिशिर को मिला दिया गया है: 
हेमन्‍तशिशिरयो: समासेन तावान्‍संवत्सर: संवत्सर: प्रजापति: प्रजापत्यायतनाभिरेवाभी राध्नोति य एवं वेद। 
आजकल के आधे कार्त्तिक से आधे फाल्गुन तक के इस कालखण्‍ड में माघ महीना पड़ता है जो कभी संवत्सर का आरम्भ मास था, वही शीत अयनांत वाली उत्तरायण अवधि जिसे अब लोग संक्रांति के रूप में मनाते हैं।
... 
आगे लिखते रहेंगे। हमारी मान्यताओं में जाने कितनी सहस्राब्दियों के अवशेष छिपे हुये हैं। सावधान विश्लेषण करें तो ! 

शुक्रवार, 29 जून 2018

मेघदूत अनुवाद की भूमिका से - केशव प्रसाद मिश्र

आचार्य केशवप्रसाद मिश्र ने कालिदास कृत मेघदूत का हिन्दी छन्दानुवाद किया जो सं.1992 वि. (सन् 1935)  में प्रकाशित हुआ (अभी राजकमल प्रकाशन में उपलब्ध है)। आचार्य संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। अनुवाद की भूमिका में उन्हों ने छ्न्द बन्ध की आलोचना की। देखते ही मैं चौंक गया। आचार्य की भाषा में ही वह अंश प्रस्तुत है:

...छ्न्द के पींजड़े में बन्द की गई कविता-कोकिला स्वच्छ्न्द नहीं रहती। न तो वह मौज से पर फैला कर उड़ सकती है और न स्वभावमधुर कूक ही सुना सकती है। अपनी सारी अठखेलियाँ उसे उसी घेरे के भीतर करनी पड़ती हैं। फिर वह कोकिला चाहे किसी कलावंत खिलाड़ी की हो या किसी अताई तुक्कड़ की।
कविकुलगुरु कालिदास सच्चे कवि थे। जब कभी उनकी प्रतिभा जागृत होती, उनकी सूझ रीझती; वे तुरन्त मधुरोचित पदावली की चाशनी को छन्दों के साँचों में डाल देते और सुन्दर पद्यों की मीठी मीठी मूर्तियाँ निकल आतीं। पर कभी कभी उन्हें भी छ्न्दों की परिच्छिन्नता-नाप जोख- के कारण स्वाभाविकता की सुघराई से हाथ धोना पड़ा है। बानगी देखिये –
 तां कस्यां चिद् भवनवलभौ सुप्तपारावतायां नीत्वा रात्रिं चिरविलसनात् खिन्नविद्युत्कलत्र:” पूर्वमेघ 39
यक्ष कहता है – भाई मेघ! देख, तू अपनी प्रिया सौदामिनी का ख़याल रखना। वह बड़ी ही सुकुमार है। क्षण भर में उसकी प्रभा –उसकी ओप- उतर जाती है। तू ठहरा अतिविलासी। रास्ते भर छेड़छाड़ से तू बाज आने का नहीं। और मुझे आता है उस बेचारी पर तरस। इससे सुन मैं बतलाऊँ। रात को किसी अटारी पर, जहाँ अति विलास से थके कबूतर भी निधड़क सो रहे हों, तू उसे विश्राम देना। छेड़ना मत। हाँ!
परंतु छ्न्द-रचना से यह अर्थ स्पष्टतया नहीं निकलता। छ्न्द की तंगी से कवि ने ‘खिन्नविद्युत्कलत्र:” (जिसकी विद्युत-पत्नी खिन्न हो गई हो, वह) पद को ‘त्वम्’ का विशेषण बनाया है। जिसका यह अर्थ हुआ कि –‘खिन्न विद्युत पत्नी वाला तू’ (रात बिता कर चलना)। इस अर्थ से कवि की इष्टसिद्धि नहीं होती। क्यों कि विशेषण और विधेय में बड़ा अंतर है। ‘पूर्वसिद्ध-कथन’ के लिये विशेषण का प्रयोग होता है और ‘अपूर्वबोधन’ के लिये विधेय का। यहाँ ‘विद्युत पत्नी का खेद’ अपूर्व -नई बात- है। उसे विशेषरूप से बोधन करना, उस पर ध्यान दिलाना कवि को इष्ट था; अत: उसका प्रयोग विधेय-विधया होना चाहिये था। परंतु विशेषण-कोटि में रखने से उस अपूर्व बात की अपूर्वता -विधेयता- नष्ट हो गई है और पूर्वसिद्धता –उद्देश्यता – प्रतीत होती है। “भूखे घोड़े वाला तू कुछ खा पी ले” इस वाक्य से यह स्पष्टतया नहीं सूचित होता कि ‘तेरा घोड़ा भूखा है, तुझे उसकी खबर लेनी चाहिये’। ‘भूखे घोड़े वाला’ केवल ‘तू’ के परिचय के लिये प्रयुक्त सा मालूम पड़ता है। इस प्रकार विधेय के अनुचित प्रयोग को ‘विधेयाविमर्श’ दोष कहते हैं। उक्त पद्यार्थ का अनुवाद इस प्रकार किया गया है –
ऐसी छत पर, जहाँ कबूतर निधड़क करते हों आराम,
अतिविलास से थकी चंचला प्यारी को देना विश्राम।
इसी प्रकार का एक और उदाहरण उत्तर मेघ से लीजिये –
मत्संभोग: कथमुपनमेत् स्वप्नजोऽपीति निद्रा –
माकाङ्क्षंतीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम्। उत्तरमेघ 28
यक्ष कहता है – मेरी विरहिणी निरुपाय होकर यह चाहती होगी कि मुझे नींद आ जाय और प्रत्यक्ष नहीं तो स्वप्न ही में मैं प्रियमिलन का आनन्द ले लूँ। पर हाय! उसकी आँखों में नींद कहाँ! उनसे तो आँसुओं की धारा उमड़ती होगी।
परंतु “नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम्” (आँसुओं के उमगने से जिसे स्थान नहीं मिलता – वह) पद को ‘निद्राम्’ (नींद) का विशेषण बना कर कवि ने बात बिगाड़ दी। इससे यह प्रतीति सी होने लगी कि – वह निर्विघ्न निद्रा नहीं चाहती, वह ऐसी निद्रा चाहती है जिसे आँसुओं के मारे आँखों में स्थान न मिलता हो। देखा आपने! छ्न्द की झंझट ने कितनी हानि की। इसका अनुवाद यों है –
मिलन स्वप्न में ही हो इससे करती निद्रा का अभिलाष,
किंतु अश्रुधारा के मारे उसको वहाँ कहाँ अवकाश!
एक और –
विद्युत्वन्तं ललितवनिता: सेन्द्रचापं सचित्रा: सङ्गीताय प्रहतमुरजा: स्निग्धगम्भीरघोषम् ।
अन्तस्तोयं मणिमायभुवस्तुङ्गमभ्रंलिहाग्रा: प्रासादास्त्वां तुलयितुमलं यत्र तैस्तैर्विशेषै: ॥
 उत्तरमेघ 1
इस पद्य में बड़ी सुन्दरता से मेघ और अलका के प्रासादों की तुलना की गई है। पहले सम्बोध्यमान मेघ के तुल्य गुण बतलाये गये हैं पीछे प्रासादों के। और यही क्रम उचित भी है। क्योंकि मेघ सामने है और प्रासाद है आँखों की ओट। किंतु छ्न्द की निष्ठुरता से यह क्रम न निभा। द्वितीय चरण में प्रासादों का जिक्र पहले और मेघ का पीछे आ गया। बात बिगड़ गई। ‘भग्नप्रक्रमता’ अथवा ‘क्रमभंग’ दोष आ पड़ा।
  इस प्रकार महाकवि कालिदास को जब काव्य भर में एक छ्न्द के प्रयोग का नियम करने से कठिनता हुई तब अनुवादक बेचारे की कौन कहे! उसे तो एक नहीं अनेक संकट हैं। महाकवि के भावों की रक्षा करना; अन्यूनानतिरिक्त –नपे तुले – शब्दों से उन्हें प्रकट करना; महाकवि ने अपनी अनोखी प्रतिभा की लहर में जो बात अनायास कह डाली है उसे गढ़ गढ़ कर छ्न्द की डिब्बी में बन्द करना; न कुछ बढ़ाने की उसकी शक्ति और न कुछ घटाने का उसका अधिकार!
ऐसी अवस्था में सहृदय पाठक समझ सकते हैं कि मेरा अनुवाद कैसा होगा और मुझे अपने अनुवाद की सफलता पर कैसा विश्वास होगा। अंत्यानुप्रास का बखेड़ा अपने सिर मढ़ कर मैंने दुस्साहस किया है। पर करता क्या? यदि इस नीरस रचना को वह अलंकार भी न पहनाता तो बेचारी निरी नंगी रहती।
(आभार: राजकमल प्रकाशन)
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आचार्य ने अपने अनुवाद को ‘नीरस रचना’ उपाधि से विभूषित किया है न कि मूलकृति को किंतु उनके वाक्य से उल्टा ही प्रतीत हो रहा है। जाने इस दोष को क्या कहते हैं?  

गुरुवार, 14 जून 2018

संस्कृत सौन्‍दर्य - 1

बोल कर संस्कृत पढ़ने से जिह्वा, मुख एवं स्वर तंत्र का व्यायाम भी होता है। किसी एक ही मन्‍त्र के पाठ या जप का यह परोक्ष लाभ है। पुरुष सूक्त के प्रथम मन्‍त्र को देखें, अथर्वण सहस्रबाहु के स्थान पर ऋग्वैदिक सहस्रशीर्षा।
स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः सहस्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात् । स भूमिं॑ वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वात्य॑तिष्ठद्दशाङ्गु॒लम् ॥ य, र, ल, व, श, ष, स, ह, क्ष, अक्षमाला का अंतिम य वर्ग समस्त ऊष्म संघर्षी ध्वनियों के साथ उपस्थित है। पहले शब्द में ही र एवं ह के सम्पुट के साथ तीनों ध्वनियाँ - स, श, ष उपस्थित हैं, सम्पूर्ण ऊष्म परास। हममें से कितने इसका शुद्ध उच्चारण कर सकते हैं? स+ह+स्+र+श+ई+र्+ष+आ - सहस्रशीर्षा। ई कुण्डलिनी स्वरूपा मानी जाती है, आ अर्थात अन्त में स्वाहा! स्वाहा की गढ़न भी देखें - ऊष्म ध्वनियों का संयोजन है।

रविवार, 27 मई 2018

जातवेद या जावेद ?

या॑वन्तो देवास्त्व॑यि जातवेदः .... आत्मन्नग्निं गृह्णीते चेष्यन्नात्मनो ... 
समस्त जीव जगत उस अनुशासन में बँधा है जिसे ऋत कहा गया। कर्मकाण्ड सृष्टि रूपी यज्ञ की अनुकृति होते हैं, अग्नि से समझ सकते हैं। अग्नि जातवेद हैं, समस्त जीवन को जानने वाले या जिन्हें समस्त जीवधारी जानते हैं, समोये हुये हैं। जीवन के लिये ऊष्मा आवश्यक है, हिमक्षेत्रों में भी। मानव द्वारा प्रयुक्त अग्नि पहले द्विज हैं – जिसका दो बार जन्म हुआ हो। पहली बार अरणि मन्थन से, दूसरी बार जब गार्हपत्य अग्नि के रूप में स्थापना हुई या किसी अन्य याज्ञिक रूप में। प्रकृति की विराट लीला तो पूर्णत: गम्य नहीं है किन्‍तु देखें तो जीवन में यादृच्छ विनाशी दावानल का अनुकरण नहीं किया गया है, सायास उपजाई हुई नियन्‍त्रित अग्नि का किया गया है जो जन्म से ले कर मृत्यु तक समस्त जीवधारियों को चलायमान रखती है। मैथुन द्वारा गर्भ स्थापन पश्चात माँ के उदर से बाहर आना प्रथम जन्म है। संस्कार होने पर दूसरा जन्म है, द्विज, अनुशासन बद्ध, ऋत से स्वयं को जोड़े हुये। पात्रता सुनिश्चित करने के लिये प्रथम जन्म से पूर्व भी गर्भाधान संस्कार की व्यवस्था है, पुंसवन है।
 द्विज से अपेक्षा है, अद्विज से नहीं। संस्कारी से अपेक्षा है, असंस्कारी से नहीं। समाज के मेधावियों से अपेक्षा है, जन सामान्य से नहीं।
अग्नि का गुण है – दोष भस्म करना। अग्नि का गुण है जोड़ना। कृषि पहला यज्ञ है। भास्वित, प्रकाशित 'भ' के साथ शक्तिमान पहली 'र' अग्नि को ले कर भ+र+तों ने अभियान किये। वन प्रान्‍तर जले, कृषि आश्रम व्यवस्था स्थापित हुई, पूर्णत: प्रकृति पर आश्रित वनवासी समाज ने आहार उगाना स्वयं सीखा – आर्य हुये। 
इन्‍द्रम् वर्धन्तो अप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । 
अपघ्नन्तो अराव्ण: ॥ 
इस ऋचा के पीछे मानव सभ्यता का इतिहास बोलता है। 
द्विज भ्रष्ट हुआ, जीवन भ्रष्ट हुआ, समाज भ्रष्ट हुआ। आधुनिक वैश्विक चेतना प्रचार के नेपथ्य में देखें तो आप को यही सनातन प्रज्ञा परिवर्तित प्रस्तुति के साथ मिलेगी। नदी को प्रदूषित करना अद्विज कर्म है, सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट करना, प्रदूषण प्रसारित करना, अनियन्‍त्रित भोग, भ्रष्ट धन संग्रह, अ-दान इत्यादि इत्यादि समस्त के पीछे द्विजत्व का क्षीण होना ही है। 
इस क्षीणता से ही भ्रम की स्थिति है जोकि जातवेद की तुलना में जावेद को प्रतिष्ठित करती है, त लुप्त है। भास्वित या प्रकाशित 'भ' को ऊष्म वह्नि 'र' के साथ धारण कर सकने वाला ‘त’ न हो तो न भरत होने, न भारत, अन्य देशों की नियति मैं नहीं जानता।
भ्रम इतना व्यापक है कि हमें पता ही नहीं चलता ! मैट्रिक्स फिल्म की भाँति, अत्यल्प को वास्तविकता का आभास या ज्ञान होता है। हम अंधे हुये भागे जा रहे हैं। भग देवता की एक आँख फूटी थी, हमारी दोनों हैं। 
द्विजत्व के क्षीण होने के कुछ उदाहरण देखें। मुस्लिम राजपूत। वीडियो चलते हैं, साक्षात्कार होते हैं कि हम मुस्लिम राजपूत हैं जी, भगवान राम हमारे पुरखे हैं। कई पीढ़ियों पहले हमारे पूर्वज मियाँ बन गये थे किन्‍तु हैं हम राजपूत ही ! लोग चरमानंद की प्राप्ति के साथ प्रसारित करने लगते हैं। भाई! जब ज्ञान हो ही गया है तो मरुस्थल के लुटेरे को तज लौट क्यों नहीं आते? 
न जी, हमें तो हुजूर प्यारे हैं उनकी शान में उल्टा सीधा न बोलो, तुम्हारे गले पर सल्ला फेर देंगे। आयेंगे तो तुम्हारी बिरादरी में ही, बोलो बेटी दोगे? 
भारी समस्या। पतित हुये, मल पीढ़ियों तक ढोते रहे, लौटना है तो उनकी बेटियों के लिये ही, जिनके पुरखों ने, जिन्होंने सब कुछ सह कर भी अपना सत्व न छोड़ा, धर्म नहीं छोड़ा ! 
जावेद खान राजपूत भाई! आर्यसमाज है, नित्यानन्‍द हैं, अनेक विकल्प उपलब्ध हैं। लौट आओ। 
न जी, रहेंगे तो मुसलमान ही, लौटे तो हमें वही चाहिये। 
... इन्हें आप सिर पर उठाये हुये हैं ! इनकी शान में नातिया कलाम रचे गाये जा रहे हैं। 
यही पतित होना है, भ्रष्ट होना है। 
पढ़ना लिखना कुछ नहीं, शस्त्र के साथ शास्त्र नहीं, समाज को क्षत से बचाने वाले ये क्षत्रिय हैं। जो मार देंगे, काट देंगे का दिन रात जप करते हैं, आवश्यकता पड़े तो लाठी भी न उठे! जीन्स सरकने लगेगी !!  
दूसरा पक्ष है इसाइयत का, पढ़े लिखे हिंदुओं को बहुत सहानुभूति है उनसे जिनमें द्विज श्रेष्ठ ब्राह्मण सबसे आगे हैं। ब्राह्मण? चौंक गये न?? 
अरे! ब्राह्मणों का मतान्‍तरण तो सबसे अल्प है, क्या बक बक कर रहे हो? 
भैया जी‍ ! मैं बपतिस्मा पढ़ कर क्रॉस लटकाये की बात नहीं कर रहा, तिलक लगाये मानसिक इसाई की बात कर रहा हूँ। शिक्षा दीक्षा में परम्परा से ब्राह्मण को आगे रहना है। आजकल भी हैं। आजकल की शिक्षा पद्धति की वास्तविकता क्या है? इसाइयत का प्रसार। पढ़ाई जाने वाली करुणा भी इसाई करुणा है, बचपन से मस्तिष्क प्रक्षालन। प्रक्षालितों में सबसे आगे ब्राह्मण। भारत का वर्तमान तन्‍त्र नीचे से शीर्ष तक बैठे इन मानसिक इसाइयों से लड़ रहा है। इनके कारण ही वह हाजी अली, हाजी अली जपना तज नहीं पा रहा क्योंकि उसे पता है कि चाँद मियाँ उर्फ साईं बाबा को प्रतिष्ठित भी इन्हीं मानसिक इसाइयों ने किया। अब्राहमी भाईचारा ‘त’ विहीन, अग्नि च्युत, संस्कार मुक्त, sterile भारत की समस्त विश्व को देन है। उसके साथ कम्युनिज्म को भी जोड़ दें तो परशु परशु जपते, साथ में मुसलमान पिता की संतान कैथोलिक इसाई को जनेऊ पहना ‘पण्डित’ घोषित करने वाले कौन हैं? कम्युनिज्म के शीर्ष पर सबसे अधिक कौन मिलेंगे? हाँ, ठीक समझे। 
द्विजों, द्विजबंधुओं ! क्षमा करना, इस देश को संस्कारहीन अद्विजों ने नहीं, संस्कार’च्युत’ विप्रों ने, मूँछ मरोड़ते राजन्य वर्ग ने, स्वार्थी तोंदुल वैश्य ने गर्त में पहुँचाया। सोशल मीडिया पर इनके सबसे अधिक जातिवादी 'गोपनीय' समूह हैं, राम जाने वहाँ क्या करते रहते हैं!  
विचित्र विभ्रम की स्थिति है। अनेक युवा तेजस्वी ब्राह्मण भी मूर्खता नहीं तज पा रहे। वे सम्मिलन की बातें करते हैं किन्‍तु यह स्थूल सच देख ही नहीं पाते कि अब्राहमियों ने तुम्हारा कितना अपनाया? कई पूजा घरों में साँई बाबा के साथ इसा मसीह भी मिलेगा, किसी अब्राहमी के घर में राम, कृष्ण, शङ्कर मिलेंगे? सब कचरा करने का ठीका तुमने ही क्यों ले रखा है भाई?
पाश्चात्य फैशन प्रचार जैसे फेमिनिज्म से ये बहुत प्रभावित हैं। मेधावी हैं ही, भारत के संदर्भ में परिवर्तित कर प्रस्तुत करते हैं – आह, उह, वाह तीनों एक साथ पाने के लिये। दर्शायेंगे कि कैसे तंत्र साधना पद्धति स्त्रियों के नेतृत्व में एक अनजान से गाँव में आज भी प्रचलित है, स्थापित है। श्रेय किसे? विदेशों में बसे वहाँ के भारतीयों को। 
लगे हाथ यह भी बताते चलेंगे कि वे स्त्रियाँ इसाई हैं, बपतिस्मा भी लिया हुआ है, चर्च जाती हैं किन्‍तु अपना तंत्र मार्ग नहीं छोड़ा। 
अरे भोंदू! 
इसी प्रवृत्ति का लाभ तो इसाई मतांतरण करने वाले उठा रहे हैं! तुम्हारी अनुकृतियाँ लगा कर मूर्ख बनाते हैं किन्तु अपना मूल कभी नहीं छोड़ते। चर्च में योनिपीठम् की स्थापना करा कर देखो तो ! इसा को तज रुद्र की प्रतिमा लगाने की बात करो तो !! 
वे लोग तंत्रमार्गी नहीं, तुम्हारे ही समान भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था के जने हैं जिन्हें मूल सच ही नहीं दिखता कि जड़ों में दीमक लगे हैं। जिन्हें गले लगाये हैं, वे कर्कोटक नाग से भी अधिक घातक हैं।   
ऐसे विप्रों के साथ सबसे बड़ी समस्या धूर्तता है जोकि कभी कभी बहुत ही भोलेपन के साथ ‘भी’ दिख जाती है। धूर्तता भोलेपन के साथ? इस कारण कि वह अब सहज स्वभाव बन चुकी है, पता ही नहीं चलता रे कि क्या कर रहे हैं! हजार शब्दों का लेख लिखेंगे, एक वाक्य, केवल एक वाक्य दस से बीस शब्दों का, प्रवाह के साथ ही डाल देंगे। 
वह वाक्य ही जामन का, नींबू के रस का काम करता है – अवचेतन के स्तर पर। सारा दूध जम कर, फट कर व्यर्थ ! भ्रष्ट विप्र सबसे घातक होता है क्यों कि वह आप के अवचेतन से खेलता है। कहते हैं न, मन्‍त्र की शक्ति शस्त्र से कई गुनी? आधुनिक समय का मन्‍त्र है – अवचेतन के स्तर पर प्रदूषण एवं प्रहार। ऐसे विप्रों से सावधान रहें, जातिवाद की माला जपते शूरवीरों से सावधान रहें, भ्रष्ट द्विजों से सावधान रहें, सतर्क रहें। 
.... 
बतकूचन बहुत हो गई, वास्तविक काम का समय आ गया है। नीचे लिखे संदेश को ट्विटर पर लगायें ताकि सोई हुई भारत सरकार के जगने की प्रायिकता में वृद्धि हो।

लोकतंत्र में जन दबाव काम करता है। सोती हुई सरकार को जगायें एवं स्वयं भी जागृत हों। समाज एवं परिवेश पर सजग दृष्टि रखें। जो हिंदू भाई वास्तव में संकट में हैं, उनकी सहायता करें। इसाई भेंड़िये ऐसों की ही सहायता कर मतांतरण कराते हैं। 

twitter.com एक माइक्रोब्लॉगिंग साइट है जो विविध सरकारी संगठनों के ध्यानाकर्षण हेतु बहुत प्रभावी है। 
अनुरोध है कि यदि वहाँ खाता न हो तो बनायें एवं नीचे लिखे संदेश को कॉपी कर के पोस्ट करें ताकि प्रधानमंत्री, उनके कार्यालय एवं गृहमंत्री तक संदेश पहुँचे। इसे अधिकाधिक साझा करें तथा अपने मित्रों एवं परिचितों को भी करने के लिये प्रेरित करें। हिंदू धर्म एवं भारत वास्तव में संकट में हैं। 
मैं दक्षिण में देख रहा हूँ, जिसकी पुनरावृत्ति उत्तर में होने वाली है। 

विश्वास करें कि न तो इससे आप की पवित्रता पर आँच आयेगी, न उदारता पर, न आप पर धर्मांधता की चिप्पी लगेगी। आप के आराध्य भी रुष्ट भी नहीं होंगे। मोहनदास वास्तव में प्रसन्न होंगे क्यों कि ‘सामान्य हिंदू कायर होते हैं’, उनकी यह सत्य की खोज असत्य सिद्ध हो जायेगी। आप को कोई घातक रोग भी नहीं पकड़ेगा। भारत सरकार आप के विरुद्ध कोई कार्रवाई भी नहीं करेगी। 

... कहने का अर्थ यह है कि आप को कोई हानि नहीं पहुँचनी, हाँ एक बहुत बड़ी आसन्न आपदा को बाधित करने में आप का यह एक अति लघु योगदान अवश्य होगा। 
Choice is yours! 
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@narendramodi @PMOIndia @rajnathsingh इसाई संगठन जोशुआ प्रोजेक्ट भारत में मतान्‍तरण में लिप्त है।इसके विशाल तन्‍त्र,डाटाबेस से स्पष्ट है कि इसे अकूत अमेरिकी फंडिंग है।राष्ट्रहित में कृपया इसे एवं इसके ये वेबसाइट भी प्रतिबंधित करें https://joshuaproject.net/countries/IN , https://godlovesyadav.org
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गुरुवार, 24 मई 2018

नारद पुराण में राम उपासना

नारद पुराण में विविध आराध्यों की उपासना विधियाँ बीज मन्‍त्रों, न्यासादि के साथ दी हुई हैं। फेसबुक पर श्री विशाल वर्मा ने 'र' अक्षर की महत्ता पर लिखा तो सहज ही ध्यान में आया कि तन्‍त्र में शारदा लिपि की अक्षर-मात्रायें देवी विग्रह के रूप में भी जानी जाती हैं।

वैदिक शब्द 'भरत' अग्नि अर्थ में भी प्रयुक्त है, 'र' वर्ण को अग्नि से सम्बद्ध बताने के संदर्भ उपलब्ध हैं। मैंने सोचा कि पुराण अध्ययन क्रम में नारद पुराण में ढूढ़ूँ तो सम्भवत: कुछ मिल जाये। क्या संयोग है! मिल ही गया। 
रामोपासना का मन्‍त्र 'रामाय नम:' वैष्णव मन्‍त्रों में सर्वाधिक फलदाता है, गाणपत्यादि मंत्रों से कोटि कोटि गुना प्रभावी।... 
वैष्णवेष्वपि मन्त्रेषु राममन्त्राः फलाधिकाः ।

गाणपत्यादिमन्त्रेभ्यः कोटिकोटिगुणाधिकाः ॥ १,७३.३ ॥

विष्णुशय्यास्थितो वह्निरिन्दुभूषितमस्तकः ।

रामाय हृदयान्तोऽयं महाघौधविनाशनः ॥ १,७३.४ ॥

...
दूसरे श्लोक में 'र' वर्ण की विवेचना स्पष्ट होती है।वह्नि अर्थात अग्नि रूपी अक्षर 'र' विष्णु शय्या पर अवस्थित है। 'म' रूपी सोम (चन्द्र) इसके मस्तक पर विराजमान है तथा यह 'आय' से अंत होता है -
रामाय नम:।

बीज रूप में राम को वर्णन अनुसार 'राँ' लिखा जाना चाहिये। एकाक्षर रघुपति मन्त्र, मानों दूजा कल्पवृक्ष। 
...
वह्निः शेषान्वितश्चैव चन्द्रभूषितमस्तकः 

एकाक्षरो रघुपतेर्मन्त्रः कल्पद्रुमोऽपरः

...
वह्नि: - अग्नि स्वरूप 'र'
शेषान्‍वित - शेष अर्थात 'आ' की मात्रा [लक्ष्मण को शेष का अवतार भी कहा जाता है]
चन्द्रभूषित मस्तक: - सिर पर चन्द्रबिन्दु
(ँ चिह्न तन्‍त्र में विविध अर्थ रखता है, शक्ति से भी सम्बंधित, जाने क्यों चंद्रवदनी सीता देवी ध्यान में आने लगती हैं, 'राँ' अरण्य में रमते राम, सीता एवं लक्ष्मण का प्रतीक तो नहीं?)

मुझसे बहुत पहले किसी ने पूछा था कि सूर्यवंशी राम 'रामचंद्र' क्यों कहे जाते हैं। प्रतीत होता है कि आज उत्तर मिल गया।
यह मंत्र महापापों का विनाश करने वाला है। राम बीज है, नम: शक्ति। इसकी महत्ता ऐसे लिखी गयी है:
सर्वेषु राममन्त्रषु ह्यतिश्रेष्ठः षडक्षरः ।
ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञाताज्ञातकृतानि च ॥ १,७३.५ ॥

स्वर्णस्तेय सुरापानगुरुतल्पायुतानि च ।

कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपापानि यानि वै ॥ १,७३.६ ॥
मन्त्रस्योञ्चारणात्सद्यो लयं यान्ति न संशयः ।
ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छन्दो रामश्च देवता ॥ १,७३.७ ॥
आद्यं बीजं च हृच्छक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये ।
षड्दीर्घभाजा बीजेन षडङ्गानि समाचरेत् ॥ १,७३.८ ॥


श्रीराम राजसभा में हनुमान जी का ध्यान प्रभु के आगे पुस्तक बाँचते हुये करना चाहिये - वाचयन्तं हनूमन्तग्रतो धृतपुस्तकम्। 

लोक में र एवं म के इन स्वरूपों की स्मृति भी है। पं. छन्नूलाल मिश्र के गायन में सुनिये : 





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