रविवार, 5 नवंबर 2017

नाजरथ का मिथकीय जीसस Christ एवं भारत के हिंदू

विषकुम्भं पयोमुखं इसाइयों Christians के सूक्ष्म आक्रमण को समझने के लिये जीसस को समझना होगा। जीसस यीशू एक काल्पनिक, गढ़ा हुआ मिथक है। जो राष्ट्रवादी उसे कश्मीर में भारतीय योग शिक्षा प्राप्त आदि आदि बताते हैं, वे चौंकेंगे किंतु जो सच है, है। 

जीसस को सेण्ट पॉल द्वारा गढ़ा गया। जीसस का कोई यूरोपीय, रोमन, ग्रीक उत्स नहीं। जिन तीन मग साधकों द्वारा बेथेलहम में तारा दिखना बताया जाता है, वास्तव में वे प्रेक्षक नक्षत्रवेत्ता थे एवं उनके द्वारा देखी गयी या परिगणित उस समय की एक महत्त्वपूर्ण नाक्षत्रिक घटना को जीसस जन्म का पौराणिक रूप दे दिया गया। 

इसाइयत Xinity, christianity मुखौटे के रूप में जिन मूल्यों को आगे रखती है, उनके स्रोत बीज क्या हैं, कहाँ हैं? वे मूल्य क्या ग्रीको रोमन परम्परा में थे? उत्तर हाँ हो या न, यह पूछना होगा कि उनका उत्स क्या था? वे मूल्य बौद्ध प्रचारकों द्वारा ले जाये गये भारतीय चिंतन पद्धति के अङ्ग थे। आज कल की भाँति तीखी विभाजन रेखायें भारत में नहीं रहीं, तंत्र हो या योग, सभी मतावलम्बियों द्वारा अभ्यस्त थे। 

पॉल यहूदी था एवं रोमन नागरिक था। जेरुसलेम से डेमस्कस की यात्रा के समय उसे सुदूर पूरब के मतवाद की उपयोगिता का पता चला। जीसस को गढ़ते हुये पॉल ने त्रिरत्न, त्रिदेव आदि पर भी ध्यान रखा। Holy Trinity उसका परिणाम है। पहले से उपलब्ध पुराने संदेश old testament से आगे नये संदेश new testament की गढ़न में भारतीय पुराण एवं जातक कथा पद्धति का प्रयोग हुआ। 

यदि आप हिंदू हैं तो हृदय पर हाथ रख स्वयं से पूछिये। आप पायेंगे कि इसाइयों या इसाइयत के प्रति आप अपने को उतना विरोधी नहीं पाते जितना मुसलों के प्रति या आप इसाइयत को एक आदर्श की भाँति भी मानते हैं (यह बहुसंख्यक नागर हिंदुओं का सच है)। इसका कारण ऊपर के अंश में है। 

प्राचीन व्यापारिक गतिविधियों के कारण उस समय भी एशियाई मतों के मध्य पर्याप्त संवाद एवं वैचारिक आदान प्रदान थे। प्राचीन एशियाई मतों में जो आपसी ऐक्य दिखता है, उसका एक कारण यह भौतिक गतिविधि भी है। 

आधुनिक हिंदू बाबा बाबी, चाहे चंद्रमोहन हो चाहे रविशंकर चाहे जग्गी, इसाइयत के प्रति जो कोमल भाव रखते एवं प्रचारित करते हैं, उनके पीछे भी गिनाये गये कारण ही हैं। प्रवचन श्रोताओं में बिकना चाहिये एवं इनके बहुलांश अनुयायी नागर हिंदू ही हैं। मार्केटियर वही बेंचते हैं जो बिकता है। इसाइयत की मार्केट वैल्यू तो है ही! 

सार्वकालिक सत्य कहीं भी हों, एक ही होंगे। सबके लिये कल्याणकारी विचार भी एक ही होंगे। दो प्रश्न हैं। 

एक - जो पहले से ही आप के यहाँ उल्लिखित, पारिभाषित एवं अनुसंधान किया हुआ है, जिस पर सहस्राब्दियों की मेधा की मीमांसा उपलब्ध है, उसके लिये पराये पर क्यों मुग्ध होना? 

कारण यह है कि आप की शिक्षा ने आप को अपनी जड़ से काट रखा है एवं उसे आरोपित कर रखा है जो निज विकास हेतु नासमझ अंध-आयात पर निर्भर है। 

गत सप्ताह कहीं बोलते हुये मैंने यह बात कही कि original sin एवं अमृतस्य पुत्रा: में से किसी एक को चुनने का समय आ गया है। लोगों ने उस बड़े भाषण को बहुत सराहा किंतु मुझे पूरा विश्वास है कि सम्मेलन कक्ष से बाहर आते ही उन्हें सब कुछ भूल गया होगा, रह गया होगा मेरा मूल्यांकन कि बहुत अच्छा वक्ता था या यहाँ यहाँ उसने ठीक नहीं कहा या यहाँ यहाँ क्या बात कह दी! घर पहुँच कर टी वी खोल क्रिकेट मैच देखने लगे होंगे। हमारी शिक्षा ने हमें आत्मघाती जॉम्बी भी बना दिया है। 

यह नागर हिंदुओं का सच है। समूचे तंत्र परिवर्तन की हताशा में मैं कहता रहता हूँ कि नगरीकरण हिंदुओं के लिये घातक है। बचे रहना है तो गाँवों को सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध करो, वहाँ से पलायन रोको।

तुम्हारे पास सम्पूर्ण विश्व में केवल एक देश है - भारत। यह हाथ से निकला तो कहीं के न रहोगे! 

दूसरा प्रश्न - उससे क्या होता है? ऐसा कौन सा प्रलय टूट पड़ेगा जो सभी हिंदू इसाई हो गये? मनुष्य तो मनुष्य है। 

इस प्रश्न के पीछे अपनी जिस नग्न सचाई को आप ढकने का प्रयास करते हैं, वह यह है कि आप अप्रतिम भीरु एवं कायर हैं, इतने कि यही प्रश्न आप किसी इसाई या मुसल से नहीं कर सकते। 

इस प्रश्न के कई उत्तर हो सकते हैं किंतु जो स्थायी उत्तर हो सकता है वह यह है कि संसार की हर जाति का सकल मानवता के प्रति एक ऐसा अनूठा दाय होता है जो अन्य के पास नहीं होता। वैविध्य इस धरा की प्राण है। यदि कोई जाति नष्ट होती है तो धरा का आयुष्य भी नष्ट होता है। जिस भूमि से अग्निपूजक पारसी मिटा दिये गये या जहाँ से हिंदू नष्ट कर भगा दिये गये, उनकी स्थिति वहीं के प्रबुद्ध जन से पूछिये या स्वयं अध्ययन कीजिये। आप पायेंगे कि मानवता को अपूरणीय क्षति हुई तथा उसने अपने विनाश की दिशा में उसने कुछ तेज पग भी बढ़ा लिये। 

बचे रहना ही नहीं, गौरव, समृद्धि, भव्यता, सौंदर्य, औदार्य, चेतना, गहन वैचारिकता, आध्यात्म, भौतिक विकास इत्यादि के साथ फलते फूलते रहना हमारा दायित्त्व है, धरती माता का ऋण है जिससे हम कभी उऋण नहीं हो सकते। यदि हम स्वयं को नष्ट किया जाता छोड़ देते हैं तो समस्त धरा, पारिस्थितिकी एवं ब्रह्माण्ड के प्रति भी अपराधी होते हैं। 


जड़ को एवं से काटने वाली मिशनरियों को पहचानिये, उनका प्रतिरोध कीजिये। अपनी जड़ों को पहचानिये, उनसे जुड़िये, उन्हें गहरे जाने दीजिये। कटी जड़ों के साथ बोनसाई जीते हैं, वटवृक्ष नहीं। क्या बनना है, कितना जीना है, कैसे जीना है - निर्णय हमें करना है। इसे सुंदर दिखते सफेद दीमकों पर छोड़ना घातक है, द्रोह है।