शनिवार, 24 नवंबर 2018

श्रीरामवनगमन एवं सरोजस्मृति


तेषां वचः सर्वगुणोपपन्नं,
प्रस्विन्नगात्रः प्रविषण्णरूपः। 
निशम्य राजा कृपणः सभार्यो, 
व्यवस्थितस्तं सुतमीक्षमाणः ॥ 
...
रथ पर आरूढ़ श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण वन को जा रहे हैं। दशरथ एवं कौशल्या देवी की पीछे से पुकार है, थमो सुमंत्र, थमो - तिष्ठ तिष्ठ। श्रीराम का आदेश है, भगाओ सुमंत्र सुमंत्र भगाओ, दु:ख को खींचना पापकर्म है - चिरं दुःखस्य पापिष्ठमिति, भगाओ - याहि याहि! - तिष्ठेति राजा चुक्रोश याहि याहीति राघवः
सुमंत्र विचित्र परिस्थिति में हैं एवं राम ! मुड़ मुड़ कर पीछे देखते हैं, पुन: पुन: आगे। वाल्मीकि जी लिखते हैं, रथ के पीछे भागती, रुकती, आगे पुत्र को देखती, पीछे मुड़ कर पति को देखती कौशल्‍या देवी की गति ऐसी थी मानों नृत्य कर रही हों - नृत्यन्तीमिव मातरम्। प्रिय पुत्र बहू एवं अनुज सहित नयनों से दूर हो रहा है, पति की स्थिति चिंताजनक है, दो दूर होते प्रियपात्रों के बीच कौशल्या की स्नेह से बँधी इस स्थिति हेतु तुम्हें यही उपमा सूझी आदि कवि!
दो विरोधी पुकारों के बीच सुमंत्र की स्थिति कैसी है? मानों दो चक्रों के अंतर में सु मंत्री का मन पड़ गया हो!   
तिष्ठेति राजा चुक्रोश याहि याहीति राघवः। 
सुमन्त्रस्य बभूवात्मा चक्रयोरिव चान्तरा ॥ 
रथ दूर हो गया। बिछड़न बेला का वह गतिशील बिम्ब ठहर गया, जिसे जाना था, चला गया। मंत्रियों ने कहा, जिनके लौटने की हमें इच्छा है, उनके पीछे दूर तक नहीं जाते - यमिच्छेत्पुनरायान्तं नैनं दूरमनुव्रजेत्
ऊपर का उपेन्‍द्रव्रजा छन्द उसी समय का है जब सहसा ही सब रुक जाता है, दु:ख जड़ीभूत हो जाता है कि मंत्रियों की वाणी सर्वगुणसम्पन्न है, मान जाओ तथा स्थिति वैसी हो जाती है कि हाथ मलते रह जाना होता है। रथ के पीछे भागते रहने से गात स्वेद से भीग गया है, दु:ख से भरा रूप विषण्ण है, समस्त अस्तित्त्व ही दु:खपूरित कृपण है तथा पुत्र को तकते राजा रानी के साथ ठगे से खड़े रह जाते हैं।
इस श्रांत दु:ख भरे क्षण को कवि 'ण' वर्ण के प्रयोगों द्वारा स्थिर कर देते हैं। देखें कि प्रत्येक चरण में ण है। तीन पंक्तियों का पूर्वार्द्ध भौतिक स्थिति है तो उत्तरार्द्ध प्रभाव की जिसमें 'ण' है, विषण्ण विविध :
वच: > गुण: 
प्रस्विन्न > विषण्ण 
निशम्य > कृपण: 
अंतिम पंक्ति में क्रम उलट जाता है, प्रभाव पहले है, कारक अनंतर - व्यवस्थित<सुतमीक्षमाण, पुत्र को देखते देखते ठहर गये ! सुर बढ़ा बढ़ा, एकाएक खींच लिया !
...
यह भारतीय काव्य का सौंदर्य है जिसमें वर्णगरिमा ध्यातव्य है। यह न अरबी मुगलई उर्दू में मिलेगा न उस 'मिजाज' वाले इसे समझ या सराह पायेंगे। आयातित संस्कृति आप को बड़े प्रेम से आप से ही काटती है।
'ण' की इस गरिमा को आधुनिक काव्य में देखना हो तो निराला की सरोज स्मृति पढ़ें। पुत्री की असमय मृत्यु के पश्चात उसका 'तर्पण' करता कवि पिता जाने क्या क्या उड़ेल देता है, दु;ख है, गहन दु:ख है किन्‍तु किसी महर्षि की भाँति उसे अभिव्यक्त करता है :
ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;
तनये, ली कर दृक्पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!
गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह - "पित:, पूर्ण आलोक-वरण
करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,
'सरोज' का ज्योति:शरण - तरण!"  

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

छठ पर्व, स्कन्द एवं सूरसंहारम, कृष्ण, सन्तान गोपाल मन्‍त्र

यह मास कार्त्तिक कहलाता है क्यों कि इस मास पूर्णिमा के दिन चन्‍द्र कृत्तिका नक्षत्र पर होंगे। कृत्तिकायें अतिप्राचीन काल से ही गाँवों के स्वच्छ आकाश में अपनी विशिष्ट समूह आकृति के कारण नाक्षत्रिक प्रेक्षण एवं कथाओं का केन्द्र रहीं। ऋषि पत्नियाँ होने से ले कर स्कन्द माता होने तक कृत्तिकाओं की परास बहुत ही व्यापक है, जटिल है। वैदिक ग्रर्न्थों में वे सप्तर्षियों की सात पत्नियाँ हैं जिनका संयोग नहीं हो पाता क्यों कि सप्तर्षि उत्तर में रहते हैं तो कृत्तिकायें पूरब में।
एक बहुत ही प्राचीन प्रेक्षण है जब वसन्‍त विषुव (आज का 21 मार्च) के दिन सूर्य कृत्तिका नक्षत्र में उगते एवं नववर्ष का आरम्भ होता। कृत्तिका नक्षत्र के साथ नवरस नवसृष्टि भी जुड़ा हुआ था तथा कृत्तिकायें प्रजा या संतान प्राप्ति में सहयोगी पाई गईं। बहुत ही पुराने एवं अब सीमित प्रचलित मान्यताओं में शिव सूर्य स्वरूप हैं जिसके अवशेष आज भी प्रत्येक माह की कृष्ण त्रयोदशी/चतुर्दशी को शिवरात्रि मनाने से है जब पूरब में सूर्योदय से पूर्व द्वितीया कला समान दिखते चंद्र अस्त होते हैं तथा प्रतीत होता है कि शिव रूपी सूर्य चंद्र रूपी सोम को सिर पर धारण किये हुये थे। सूर्य में ताप है, ऊष्मा है तथा उनका अग्नि रूप वैदिक ग्रंथों में मिलता है। अग्नि की पत्नी स्वाहा सात ऋषि पत्नियों में से अरुंधती को छोड़ कर छ: के रूप धारण कर पति ऋषियों से युगनद्ध हुईं। कृत्तिका के सात तारों के छ: कृत्तिकाओं में परिवर्तन की कथा का मूल यह है। आगे शिव के पुत्र स्कन्द का जन्म हुआ जिन्हों ने देवसेना का नेतृत्त्व कर धरा को त्रास से मुक्ति दी। योद्धा पुत्र की जननियों के रूप में छ: कृत्तिकाओं की प्रतिष्ठा हो गयी तथा एक लम्बे कालखण्ड में स्कन्द एवं उनकी माताओं की आराधना होती रही जैसे आज कृष्ण एवं यशोदा की होती है। अग्नि अज अर्थात बकरे की सवारी करते दिखाये जाते हैं। अजमुख एक देवता भी होते थे - नैगमेष जिनकी बहुत प्रतिष्ठा थी तथा वे शिशुओं के संरक्षक रूप में माने जाते थे। नैगमेष को बाल स्कन्‍द एवं छ: माताओं के साथ चित्रित किया जाता था।
सूर्य-शिव-स्कन्‍द की समेकित संश्लिष्ट आराधना पद्धति आगे विकसित होती रही। कार्त्तिक मास के शुक्ल पक्ष की छठी तिथि एवं छठ मइया के मूल में यह धारा है जिसका सूर्य केंद्रित पक्ष शास्त्रों की आँखों से ओझल है। सन्दर्भ मिले तो लिखूँगा। स्कंद एवं छ: स्कंद माताओं की उपासना धारा के मूल में योग्य पुत्र की प्राप्ति की अभिलाषा रही जो कृष्ण आराधना की प्रबलता के साथ साथ क्रमश: तिरोहित होती चली गयी। पुत्रेष्टि यज्ञ आप ने सुना होगा जो कि अथर्वण परमरा केंद्रित था। उसी उद्देश्य से सरल पौराणिक रूप आया - सन्‍तान गोपाल मन्‍त्र अनुष्ठान जिसमें कृष्ण से अच्छी संन्तति हेतु प्रार्थना की जाती है - देहि मे तनयं कृष्ण .. एवं जिसका विधि विधान आज भी उपलब्ध है। विशाखा को स्कन्दप्रिया भी कहा जाता है, संयोग से आज सूर्य विशाखा नक्षत्र पर ही हैं। छ्ठ व्रत में पुरोहितों के न्यूनतम हस्तक्षेप होने का कारण लुप्त स्कन्द परम्परा से है जिसका कोई सूर्य पक्ष भी रहा होगा। छठ के स्कंद से जुड़े होने का प्रमाण अब दक्षिण में मिलता है। आज की तिथि कन्द षष्ठी के रूप में मनाई जाती है, व्रत उपवासादि होते हैं। व्रत प्रतिपदा से आरम्भ हो कर छ: दिन षष्ठी तक किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन स्कन्‍द या मुरुगन ने सूरपद्मन नामक दैत्य का वध किया था। यह दिन सूरसंहारम कहलाता है।
चित्र आभार : drikpanchang.com
कृत्तिकाओं पर कुछ और रोचक जानना हो तो यह आलेख भी पढ़ें।

रविवार, 11 नवंबर 2018

किशोर नाक्षत्रिकी - 1

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, साथ में अपने अक्ष पर घूमती भी है (परिभ्रमण) जैसे कि कोई लट्टू नाचते हुये किसी बिंदु का चक्कर भी लगा रहा हो।
उसके घूमने का अक्ष परिक्रमा के तल से प्राय: 23.5 अंश झुका हुआ है। सर्कस में झुकी हुई मोटरसाइकिल के साथ चालक का एक गोले में घूमना समझें, केवल यह मान कर कि चालक ऐसी सीट पर सवार है जो अपने अक्ष पर भी घूम रही है।
धरती का परिभ्रमण अक्ष उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं को निश्चित करता है तथा उसके लम्बवत जिन दो बिंदुओं के निकटवर्ती क्षेत्र में सूर्य क्रमश: उगता एवं अस्त होता दिखता है, वे क्रमश: पूरब एवं पश्चिम होते हैं। जब इण्टरनेट, जी पी एस आदि नहीं थे तथा हम प्रकृति से इतने कटे नहीं थे, तब लोग दिशाओं को बिना किसी यंत्र के ही बता सकते थे क्यों कि उनकी आंतरिक समझ सूर्य गतियों से अधिक जुड़ी थी, दिन में भी अंधेरा कर कृत्रिम प्रकाश से चलने वाले कार्यालय भी नहीं होते थे।
अक्ष के झुकाव के कारण सूर्य प्रतिदिन ठीक पूरब में उगता या पश्चिम में अस्त होता नहीं दिखाई देता, इस दो दिशाओं के सापेक्ष उस काल अवधि में दोलन करता दिखता है जिसे हम वर्ष कहते हैं। वर्ष क्या है?
अक्ष पर पृथ्वी के इस झुकाव के कारण ऋतुयें होती हैं। ऋतु अर्थात एक निश्चित आवृत्ति से धरती के वातावरण में गरमी, ठण्ड, सूर्य के दिखने के घण्टों में घटबढ़। यदि झुकाव नहीं होता तो घटबढ़ नहीं होती, सूर्य सदैव एक बिंदु पर उगता दिखता, एक ही बिंदु पर अस्त होता अर्थात धरती के विविध क्षेत्र उसके गोले अपनी अपनी विशेष स्थिति के अनुसार सदा सदा एक ही मात्रा में ऊष्मा प्राप्त करते।
मनुष्य हेतु सबसे स्पष्ट निश्चित आवृत्ति से होने वाली प्राकृतिक घटना वर्षा है। मनुष्य ने देखा कि एक निश्चित आवृत्ति से कुछ महीने या दिन ऐसे आते हैं जब वह वर्षा अधिक होती है, निरंतर होती है जो कि कृषि अर्थात पेट पालन के लिये अन्न आदि उत्पन्न करने के उद्योग हेतु बहुत लाभकारी होती है। उस निश्चित आवृत्ति को वर्ष नाम दे दिया गया।
वास्तव में वर्ष पृर्थ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लिया गया वह समय है जिसे एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक की समय इकाई 'दिन' या 'दिनमान' में मापा जाता है। जो कि मनुष्य के अपने विभाजन से 36 मुहूर्त या 24 घण्टे होता है।
मनुष्य ने पाया कि वर्ष 365 से 366 दिन तक का होता है जिसे गणना में सुविधा के लिये उसने 360 का निकट मान कर विविध इकाइयाँ बनाईं।
उसने ऋतुओं अर्थात एक निश्चित कालखण्ड में देह पर, कृषि पर, पेड़ पौधों पर, जलवायु पर होने वाले समेकित प्रभावों को नाम दिये। मोटा मोटी जाड़ा, गरमी, वर्षा।
भारत में रहने वाले मनुष्य ने इन तीन का पौधों एवं त्वचा पर प्रभावों को देखते हुये दो दो में विभाजन और किया - वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शीत तथा छ: ऋतुयें हो गईं।
उसने पाया कि वसंत के समय जब कि चहुँओर पुष्प खिले होते हैं, त्वचा एवं मन पर नया नया सा प्रभाव होता है, एक दिन सूर्य ठीक पूरब में उगता है तथा ठीक पश्चिम में अस्त होता है। प्राय: आधा वर्ष बीत जाने पर ऐसा पुन: होता है। ये दो दिन विषुव कहे गये।
ऐसे ही एक समय ऐसा भी होता है जब सूर्य के उदय का बिंदु उत्तर की दिशा में झुकते झुकते एक समय के पश्चात पुन: लौटने लगता है, यही बात एक अन्य समय के साथ दक्षिणी झुकाव में भी होती है मानों सूर्य एक डोरी से बँधा लोलक हो जो दोलन कर रहा हो!
इस चार बिंदुओं ने उसकी नींव डाली जिसे हम आज कैलेण्डर कहते हैं। वसंत ऋतु वहाँ भी होती है जहाँ आज सम्पूर्ण विश्व में मान्य ग्रेगरी का कैलेण्डर विकसित हुआ। यह कैलेण्डर ऋतु सापेक्ष है तथा वसंत विषुव प्रत्येक वर्ष एक निश्चित दिनांक (~ 21 मार्च) को ही पड़ता है।
पृथ्वी की अन्य ऐसी भी गतियाँ हैं जिसकी आवृत्ति वर्ष से हजार लाख गुना है अर्थात बहुत धीमी है। उनके प्रभाव पर आगे बात करेंगे किन्तु अभी वर्ष पर ही केंद्रित रहते हैं।
वर्ष के साथ समस्या यह है कि वह न तो ठीक 365 दिन का होता है, न ही 366 दिन का। वह इन दो के बीच, लगभग 365 दिन एवं 5 घण्टों एवं उससे भी अल्प समयावधियों को मिला कर होता है जो एक पूर्ण घण्टे से कम होती हैं।
कैलेण्डर में तो केवल दिन होते हैं, घण्टे नहीं। अनेक वर्ष बीतने पर यह अतिरिक्त अवधि बढ़ते हुये गड़बड़ करने लगती है यथा चार वर्ष पश्चात लगभग एक पूरे दिन का अंतर तथा घण्टे से लघु अवधियों के कारण आगे के सैकड़ो हजारो वर्षों में जुड़ने वाले अंतर। इस कारण ही समायोजन किया जाता है - लौद या लीप वर्ष, प्रत्येक 4 वर्ष पर एक दिन जोड़ कर 366 दिन का वर्ष मानना। अन्य समायोजन भी घण्टे से लघु अवधियों हेतु होते हैं जिन्हें हम आगे देखेंगे।
ध्यान देने योग्य यह बात है कि ग्रेगरी के कैलेण्डर में समायोजन इस प्रकार सदैव चलता रहेगा। ऋतु आधारित इस वर्ष गणना में किसी ऋतु का आरम्भ प्राय: निश्चित दिनांक पर ही होगा (लौद समायोजन के कारण कुछ एक दिनों का ही अंतर हो सकता है)। यह स्थिति हजारो वर्षों तक ऐसे ही रहेगी क्यों कि समायोजन कर के एक निश्चित दिनांक को वसंत विषुव हेतु सुरक्षित रखा जाता रहेगा।
यह हुआ पूर्णत: ऋतु या पृथ्वी से दर्श सूर्य गति आधारित कैलेण्डर किंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती। आकाश में रात में चंद्रमा भी दिखता है, उसका क्या? क्या ऐसे वर्ष भी हो सकते हैं जो सूर्य के अतिरिक्त चंद्र गति पर भी आधारित हों या केवल चंद्र गति पर ही आधारित हों?
उत्तर हाँ है। इस हाँ में मानव की विराट मेधा एवं प्रेक्षण क्षमता के प्रमाण हैं जिन्हें हम अगले अंक में देखेंगे।

शनिवार, 3 नवंबर 2018

संवादहीनता समाप्त करें, बच्चों को 'अच्छी बातें' बतायें

(विष्णुपुराण) 

System Analysis के आचार्य एक रोचक अध्ययन की चर्चा करते थे जिसमें सम्पूर्ण विश्व को एक समवाय मानते हुये उसका प्राय: 145 चरों के आधार पर आज से लगभग 40 वर्ष पूर्व गणितीय विश्लेषण किया गया था। स्थूल गणितीय न मान वैज्ञानिक समझें। चरों की संख्या, परिकल्पनाओं एवं निष्कर्ष पर प्रश्न उठ सकते हैं किन्‍तु महत्त्वपूर्ण यह है कि आधुनिक ज्ञान विज्ञान के उपयोग द्वारा ऐसा विश्लेषण किया गया था। परिणाम भी रोचक थे : 
1.  यदि सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो 2020-25 ग्रे. में संसार का अस्सी प्रतिशत नष्ट हो जायेगा, जीवधारी, मानव संरचनायें, संस्कृति आदि सब। 
2. यदि रोकथाम के सफल उपाय किये गये तो आपदा टल तो जायेगी किन्‍तु 2050-55 ग्रे. में सम्पूर्ण विनाश होगा - प्रलय।
 स्मृति के आधार पर लिख रहा हूँ, मूल से अंतर हो सकते हैं किन्‍तु मोटा मोटी बातें यही थीं। 
2020 आने में दो वर्ष शेष हैं तथा वैसे किसी प्रलय की आशंका नहीं दिख रही, हाँ इस्लाम के कारण उत्पन्न हुई समस्यायें जटिलतर हो सकती हैं। 2050 अभी दूर है, कुछ कहा नहीं जा सकता । 
इस प्रकार के प्रतिरूप (Model) अध्ययन अभियांत्रिकी एवं उच्च सांख्यिकी आदि में होते रहते हैं जिनकी परास सीमित होती है तथा जिनके चर चयन पर प्रश्न भी नहीं किये जा सकते। उनके परिणाम उपयोगी भी होते हैं। 
अब पुराणों  को देखें । 
पुराणों का प्रलय प्रतिरूप विशुद्ध रूप से गणितीय है । मानव वर्षों से होते हुये ब्रह्मा के परार्द्ध, द्विपरार्द्ध, विष्णु के शयन, नैमित्तिक आदि तीन प्रकार के प्रलय, मनु, मन्‍वन्‍तर, युग, युगसंधि आदि आदि समस्त पूर्णत: गणितीय बंध में हैं जिनमें सूर्य की अयनादि गतियों का, नाक्षत्रिक प्रेक्षणों का भी समावेश है। 
निरन्‍तर ह्रासमान समाज में अपने अध्ययन, अनुमान एवं निष्कर्षों के आधार पर विधि विधान समायोजनों के साथ एक गतिशील प्रक्रिया जो कि शास्त्रबद्ध है; पुराण अपने समकालीन सभ्यताओं से जाने कितने योजन आगे दिखते हैं। यह एक बहुत ही उन्नत एवं जीवन्‍त संस्कृति का गुण है। 
परिणाम क्या हुये?
 यह प्रश्न स्वत: ही आधुनिक शिक्षा पद्धति के 'उत्पाद' जन के मन में आता है। इस  प्रश्न में नकार एवं निषेध अन्तर्निहित रहते हैं। ऐसे जन दीर्घजीविता को भूल जाते हैं, नैरन्‍तर्य को भूल जाते हैं, सम्पूर्ण मानवता को प्रदत्त अवदान भूल जाते हैं, पुरखे तो उन्हें महामूर्ख लगते ही हैं ... भूलना कहना ठीक नहीं होगा, वह तो तब होगा जब ज्ञान हो, बताया गया हो। वे जानते ही नहीं ! उन्हें बताया ही नहीं गया। संक्षेप में कहें कि उन्हें संस्कारित ही नहीं किया गया।  
दूसरी समस्या अपने सँकरे घेरे में निज केंद्रित विश्लेषण की भी होती है जिसकी परिणति ऐसे प्रश्नों में भी होती है कि क्या होगा यदि समस्त भारत की जनसंख्या मुसलमान हो जायेगी? क्या होगा यदि भारत टुकड़े टुकड़े हो कुछ सौ देशों में बचा रह जायेगा? 
एक बात और ध्यान देने की है कि ऐसे प्रश्न उस पट्टी से ही अधिक आते हैं जो कभी आर्यावर्त, ब्रह्मावर्त आदि आदि थी। यह पट्टी मुख्य भारत भूमि की सबसे अल्प नवोन्मेषी, अल्प उद्योगी, महा अहंकारी, सर्व स्वार्थी एवं गुणवत्ताहीन सघन जनसंख्या को अपने में समेटे हुये है। अध्ययन नहीं, साहस नहीं, थेथरई एवं बकलोलई तत्त्व यहाँ प्रधान हैं। 
वे जन स्वाँग तो बहुत अच्छा करते हैं किन्‍तु यह विचार तक नहीं करते कि उनके प्रश्न तो संसार के प्रत्येक देश पर लागू होते हैं। वैश्विक नागरिक होने का नारा लगाते वे किसी चीनी, किसी जापानी या किसी रूसी से वैसे प्रश्न करने का साहस तक नहीं कर सकते क्यों कि जो उत्तर मिलेंगे वे सुरक्षात्मक बने सामान्य भारतीय जन के उत्तरों की अपेक्षा बहुत ही आक्रामक होंगे। 
दोष कहाँ है? 
दोष शिक्षा एवं संस्कार पद्धति के हैं, गुरुओं के हैं, अध्यापकों के हैं, अभिभावकों के हैं। हमने सब कुछ विद्यालयों पर छोड़ रखा है, अर्थसाध्य नाम बड़े दरसन को थोरो विद्यालयों पर ही समस्त नैतिकता, आदर्श, संस्कार आदि का दायित्त्व है, हम वर्ष में लाख रूपये शुल्क जो देते हैं ! 
अन्‍तिम बार आप ने अपने बच्चे को जो कि किशोर भी हो सकता है, कब 'अच्छी बातें' बताईं? पीढ़ियों के बीच जो संवादहीनता है, जो निर्वात है, उसे सांस्कृतिक आक्रमण का कचरा भर रहा है। 
संस्कारों की बातें तक करना पिछड़ापन हो चला है। न भूलें कि मनुष्य उनसे ही मनुष्य होता है। न भूलें कि संरचना मे एक भाँति के होते हुये भी प्राचीन भारत में राक्षस, गंधर्व, नाग, यक्ष आदि को मनुज 'मनुष्य' से भिन्न मानने की परिपाटी रही जिसके कि जाने कितने निहितार्थ थे। विचार करें तथा संवादहीनता समाप्त करें, बच्चों को 'अच्छी बातें' बतायें। 
Have-talks-with-your-children !