रविवार, 4 अगस्त 2019

Met Museum New York Vishnu-s न्यूयॉर्क संग्रहालय के दो विष्णु

(१) केशव 
केशव Keshava
विष्णु के विविध रूप नाम चार हाथों में चार अस्त्रों/उपादानों के क्रम से आते हैं। यह केशव रूप है। न्यूयॉर्क संग्रहालय The Met, 1000 Fifth Avenue, New York, NY 10028 में स्थित इस प्रतिमा का विवरण इस प्रकार है :
Artist:Dasoja of Balligrama
Period:Hoysala period
Date:first quarter of the 12th century
Culture:India (Karnataka, probably Belur)
Medium:Stone
Dimensions:H. 56 1/2 in. (143.5 cm); W. 28 in. (71.1 cm); D. 9 1/4 in. (23.5 cm)
Classification:Sculpture
Credit Line:Rogers Fund, 1918
Accession Number:18.41
दशावतार विकास के अनेक चरण रहे हैं तथा दक्षिण भारत का इसमें योगदान अधिक रहा। साम्प्रदायिक आग्रह, मतभेद, श्रेष्ठता की भावना आदि के कारण दाशरथि राम के पश्चात तथा वराह के पूर्व के क्रम एवं उपस्थिति, दोनों में विविधता रही। आज जो मान्यता है उसमें वराह, नृसिंह, वामन, दाशरथि राम एवं कल्कि को ले कर कभी समस्या नहीं रही।
मत्स्य, कूर्म, जामदग्न्य राम, संकर्षण राम, बुद्ध; इन पाँच को लेकर समस्यायें हैं जो कृष्ण को मिला कर जटिल हो जाती हैं। 
१३०० वि. का यह केशव विष्णु शिल्प होयसल राजाओंं के समय का है। यह बल्लिग्राम के दसोजा नामक शिल्पकार द्वारा निर्मित है। 
ऊपर पाँच पाँच कर दशावतार दिये गये हैं। दाशरथि राम के पश्चात हलधर संकर्षण राम, तब परशुधारी जामदग्न्य राम, तब बुद्ध एवं सबसे अंत में कल्कि हैं। श्रीकृष्ण को सर्वोच्च मान कर केशव में ही समाहित माना गया है अर्थात यह एक विशेष वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बंधित कृति है। उल्लेखनीय है कि राम जामदग्न्य संकर्षण राम के पश्चात दर्शाये गये हैं तथा बुद्ध दशावतार में हैं।

(२) महाविष्णु 
महाविष्‍णु Mahavishnu
महाविष्णु। तोमर काल। वर्तमान के पञ्जाब, हरयाणा एवं दिल्ली क्षेत्र। प्रतिमा अब न्यूयॉर्क संग्रहालय में, विवरण इस प्रकार है : 
Date:10th–11th century 
Culture:India (Punjab)
Medium:Sandstone 
Dimensions:H. 43 1/2 in. (110.5 cm); W. 25 5/8 in. (65.1 cm); D. 10 in. (25.4 cm) 
Classification:Sculpture 
Credit Line:Rogers Fund, 1968
Accession Number:68.46
विचार करें कि प्रतिमा किसी मन्दिर में ही रही होगी। कहाँ गया वह मन्दिर? उत्तर भारत के प्राय: समस्त बिखरे महालय मुसलमानों ने नष्ट कर दिये, उन पर मजार, मकबरा, मस्जिद बना दिये। परमर्दिदेव द्वारा निर्मित एवं जयपुर शासकों द्वारा परिवर्द्धित वह मन्दिर एक उदाहरण मात्र है जिसे आज ताजमहल कहते हैं।लोद़ियों से ले कर हुमायूँ के मकबरे तक, किसी की भी खुदाई हो, मन्दिर अवशेष मिलेंगे। भूचुम्बकीय सर्वेक्षण से भी जाना जा सकता है।
सभी बड़े मन्दिर शिक्षा के केन्द्र भी हुआ करते थे। अग्रहार या ग्रामदेय व्यवस्था के कारण शिक्षक वृत्ति हेतु शासन पर निर्भर नहीं रहता था तथा धर्मानुशासन उसे नियन्त्रण में रखता था, न कि आज के सब धान २२ पसेरी जैसा दण्डविधान।
सब समाप्त हो गया। आज इन क्षेत्रों की अधिकांश जनसंख्या अर्द्ध व्यञ्जन का उच्चारण तक नहीं कर पाती!
समझें कि शिक्षा एवं संस्कृति की लड़ी जब विछिन्न होती है तो युगीन दुर्घटनायें होती हैं। पीढ़ियाँ भ्रष्ट हो अपनी ही शत्रु हो जाती हैं।
कश्मीरी पत्थरबाजों के पुरखे सिकन्दर बुतशिकन के पूर्व वाजश्रवाओं के तुल्य होते थे।
शारदा देवी को आप वीणावादिनी तक सीमित जानते हैं। वृत्रहन्ता वाजिनी सरस्वती का वास्तविक रूप कश्मीर में सुरक्षित था।
... सब नष्ट हो गया। 

रविवार, 21 जुलाई 2019

देवता : वीर भोग्या वसुंंधरा Prime Numbers

चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँचे एवं सहस्राब्दियों में पसरे सनातन वाङ्मय का देवता वैविध्य भौतिक एवं आध्यात्मिक, दोनों स्तरों पर समेकित चिंतन एवं अभिव्यक्ति का द्योतक है।
द्यौ, भू एवं आप: (जल), विराट परिवेश के इन तीन स्पष्ट क्षेत्रों में ग्यारह ग्यारह देवताओं की उद्भावना के साथ कुल ३३ देवता बताये गये - त्रयादेवाऽएकादश त्रयस्त्रिंसासुराधस
पाँच तत्त्वों का अभिज्ञान रहा ही। ऋग्वेद से ले कर उपनिषदों तक संख्याओं के बारे में बहुत कुछ है ही, उनके विविध विभाजनों को ले कर भी बहुत कुछ है। प्रतीत होता है कि अविभाज्यता उनकी चेतना में रही होगी। एक ब्रह्म, दो पुरुष प्रकृति, तीन लोक, पाँच तत्व (पञ्चजन भी)। यहाँ तक आते आते इन अभाज्य संख्याओं (Prime Numbers) का योग ग्यारह हो जाता है। पाँच एवं ग्यारह के बीच सप्तमात्रिकायें ही अभाज्य बचती हैं, जिनका अपना तन्‍त्रमार्ग है।
३३ देवताओं को आगे पाँच तत्त्वों के समूह में बाँटे गये द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, अष्ट वसु एवं भूत भूतेतर को दर्शाते प्रजापति-इन्‍द्र या दो अश्विनीकुमारों का युग्म।
आदित्य पृथ्वी पर जीवन के कारक हैं, बारह महीनों में सूर्य के विविध रूप। रुद्र सम्पूर्ण भूतों का समन्‍वित रूप है, मानव सहित सभी पशु कहे गये हैं जिनकी बलि सृष्टि का विराट यज्ञपुरुष लेता रहता है, एकीकृत रुद्र पशुपति है। याज्ञिक बलि की इस प्रतीकात्मकता को न समझ पाने के कारण या नितान्‍त स्थूल शब्दार्थ लेने के कारण बहुत से अनर्थ हुये। आठ वसु धरा की सम्पदायें हैं। ज्येष्ठराजा इन्‍द्र की वासव संज्ञा हो या वीर राजन्यों हेतु कहा गया वीर भोग्या वसुंंधरा ; वसुओं का रूप स्पष्ट होता है।
छंदों को देवताओं का छाजन कहा गया जिनमें 'मृत्यु के भय' से देवता शरण लेते हैं। ध्यान दें तो १२, ११ एवं ८ की संख्यायें क्रमश: जगती, त्रिष्टुप एवं गायत्री छंदों से जुड़ती हैं जो क्रमश: (उत्पादक) वैश्य, (रक्षक) क्षत्रिय एवं (मन्त्री) ब्राह्मण छन्‍द कहे गये हैं। 
इन्‍हें घेरे दो सीमान्‍त प्रतीक, सत एवं असत, ऋग्वेद के प्रसिद्ध नासदीय सूक्त से समझे जा सकते हैं। अश्विनों में नासत्य जहाँ दयालु एवं पोषक है, वहीं दस्र भयङ्कर एवं संहारक। प्रजापति एवं इन्‍द्र को भी ऐसे ही जाना जा सकता है। पूर्वी बौद्ध देशों की यिन-यान संकल्पना हो या ऊपर बताये पुरुष प्रकृति, चक्रीय क्रम में ऐसे समझे जाने चाहिये।
अंत में समस्त देवताओं के एक रूप विश्वेदेवा देवता को समर्पित एक मन्त्र का अंश देखें, वीरभोग्या वसुन्‍धरा का मर्म अधिक प्रतिभाषित हो जायेगा :
आहुतयो मे कामान्त्समर्धयन्‍तु भू: स्वाहा। 
आहुतियाँ मेरी समस्त कामनाओं को समृद्ध करें। भू मेरे लिये सु-वह हो। 
ःःःःःःःःःःःःःःःःः
(उद्धरण अंश शुक्ल यजुर्वेद से हैं।) 

(३३ करोड़ देवताओं का सम्बन्ध संवत्सर गणना के क्रमश: सूक्ष्म एवं परिशुद्ध होते जाने से है। उस पर कभी लिखेंगे।) 
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रविवार, 14 जुलाई 2019

गुरु आधारित संवत्सर चक्र एवं पञ्चाङ्ग संशोधन की आवश्यकता - दैत्यगुरु शुक्र, देवगुरु बृहस्पति एवं शनि


गुरुपत्नी राजपत्नी मित्रपत्नी तथैव च ।
पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैताः मातरः स्मृताः ॥  
(गुरु, राजा, मित्र, पत्नी की मातायें एवं अपनी माता, इन पाँच को माता माना जाता है।) 
... 
सुदर्शन एवं दिव्यरूपधारी चन्द्र ने अपने गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा को लुभा लिया। वह आश्रम तज अपने प्रेमी के घर आ गई। बड़ी पञ्चायतों एवं देवासुर सङ्ग्राम के पश्चात चंद्र ने उसे लौटाया तो वह गर्भवती पाई गई। पूछने पर उसने बताया कि भावी संतान के पिता बृहस्पति नहीं, चंद्र हैं। उसके गर्भ से बुध का जन्म हुआ। बुध से ही आगे चन्द्रवंश चला।
(इस कथा को अभिधात्मक सत्य मानने वाले आगे न पढ़ें क्योंकि उनका मन नहीं रमेगा, व्यर्थ के प्रश्न उठेंगे। )
...
बृहस्पति का वर्ष पृथ्वी के लगभग बारह वर्षों के तुल्य होता है अर्थात वह किसी नक्षत्र पर लगभग 27/12 = सवा दो वर्ष रहते हैं। चंद्र के दैनिक नक्षत्र परिवर्तन की दृष्टि से या सूर्य के किसी नक्षत्र पर मात्र सवा दो महीने रहने की दृष्टि से यह लम्बी अवधि है।
कथा किसी ऐसे नाक्षत्रिक कूट की है जब बृहस्पति किसी नक्षत्र तारा के साथ पतिभाव में थे तथा अपनी दैनिक गति में चंद्र वहाँ पहुँचा। यह वह समय था जब सामान्यतया सूर्य से बहुत निकट होने के कारण आँखों से ओझल बुध का अभिज्ञान पूर्ण हुआ था। उस समय ही धरा पर सूर्यवंशियों अर्थात पूर्णत: सूर्यकेंद्रित वर्ष ज्योतिष अनुसार चलने वाले राजाओं के साथ साथ सूर्य एवं चंद्रसमन्वित वर्ष ज्योतिष मानने वाले चंद्रवंशियों का भी अभ्युदय हुआ। विमर्शों के लम्बे एवं अनेक सत्र चले होंगे, मतभेद आदि भी हुये होंगे।
तारा कौन हो सकती है? अनुमान लगायें?
पुष्य नक्षत्र के देवता गुरु बृहस्पति हैं तथा स्वामी शनि। बृहस्पति देवों की प्रज्ञा को दर्शाते हैं तो शनि स्थिरता का। राजन्यों में पुष्य की प्रतिष्ठा थी तथा महत्त्वपूर्ण अभियान पुष्य नक्षत्र देख कर किये जाते थे। रामायण एवं महाभारत में भी इसके संदर्भ हैं।
एक अन्य नक्षत्र ज्येष्ठा ध्यान में आता है जिसक देवता देवराज इन्‍द्र हैं तथा स्वामी बुध। मूल एवं ज्येष्ठा, इन दो नामों से परोक्ष रूप से किसी बहुत ही पुरातन काल में नक्षत्रमाला के आरम्भ के संकेत मिलते हैं। 'तारा' का अभिज्ञान स्वतन्‍त्र अध्ययन की माँग करता है किन्‍तु मेरा अनुमान पुष्य या ज्येष्ठा में से किसी के होने का है। 
कहा गया है कि चंद्र ने लालन पालन हेतु बुध को रोहिणी एवं कृत्तिका को सौंप दिया।
महाभारत युद्ध के समय वसंतविषुव रोहिणी पर था।
यदि आप नक्षत्रों के प्रारम्भ परिवर्तन को देखेंगे तो पायेंगे कि 'प्रागैतिहासिक' आरम्भ नक्षत्रों मूल एवं ज्येष्ठा के पश्चात पहला वैदिक प्रमाण इस उक्ति में मिलता है कि वत्सर आरम्भ श्वान नक्षत्र से है। आरम्भ नक्षत्र का अगला परोक्ष उल्लेख मिलता है मृगशिरा में। यह भी सम्भव है कि तब श्वान एवं मृग तक एक बड़ा नक्षत्रक्षेत्र माना जाता रहा हो।
मृगशिरा के पश्चात स्पष्ट प्रमाण रोहिणी छोड़ कृत्तिका के मिलने लगते हैं। उससे आगे भरणी तज आज कल अश्विनी से आरम्भ है। बीच बीच के छोड़े नक्षत्र सङ्क्रमण काल को दर्शाते हैं। वेदविभाजन एवं पुराण 'पुनर्रचना' वाला महाभारत काल सङ्क्रमण काल तो था ही।
बुध को रोहिणी एवं कृत्तिका को सौंपा जाना भी एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है। धरा एवं आकाश को मिला कर कहने की पौराणिक प्रवृत्ति के कारण ऐसी कूट कथायें प्रचलित हुईं।
शुक्र ग्रह एवं पृथ्वी के वर्षों में लगभग स्वर्णिम अनुपात का सम्बंध है।
कथित स्वर्णिम अनुपात होता है, φ = (√5+1)/2 ≈ 1.6180.
π तो जानते ही हैं ≈ 3.1416।
इन दोनों का लगभग सम्बन्ध है,
π ≈ 6/5×φ²
...
स्वर्णिम अनुपात की व्युत्पत्ति इससे है कि ऐसी संख्या जो अपने विलोम में एक जोड़ने पर पुन: अपना रूप प्राप्त कर ले :(1/φ)+1=φ
..
स्वर्णिम अनुपात में आकार आँखों को तुलनात्मक रूप से अधिक भाते हैं किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल उसी अनुपात में होने पर ही आकार अच्छे लगें।
इस अनुपात को ले कर आधुनिक काल में बहुत टण्टा किया जाता रहा है, खींच तान, मिथ, असत्य, छल आदि सब। परन्तु इस अनुपात का प्रयोग कर वस्तुयें सुगढ़ तो बनाई ही जा सकती हैं यथा यदि घर बना रहे हों तो शयन कक्ष की लम्बाई एवं चौड़ाई का अनुपात 1.6 के निकट रखें।
जितने समय में पृथ्वी सूर्य की आठ परिक्रमायें करती है, उतने में शुक्र तेरह कर लेता है। पृथ्वी एवं सूर्य के मध्य केवल दो ग्रह हैं - बुध एवं शुक्र। बुध सूर्य के अति निकट होने के कारण प्रेक्षण दुर्लभ है जब कि प्रात: (भुरकुवा, भोर का तारा) एवं साँझ के 'तारे' के रूप में दैदीप्यमान सुंदर शुक्र सबका परिचित है।
पृथ्वी से देखने पर शुक्र एक ऐसा चक्र दर्शाता है जिससे रहस्यमय पञ्चकोण बनता है। इस पञ्चकोण की भुजायें भी एक दूसरे को स्वर्णिम अनुपात में बाँटती हैं।
शुक्र, स्वर्णिम अनुपात एवं इनके अनुसार ज्योतिषचक्र पर दृष्टि  रखने दितिपुत्र दैत्य (कालांतर के असुर) थे। वास्तु एवं शिल्प आदि सुंदर रचनाओं में ये निष्णात होते थे। इनकी संततियाँ इसाइयत द्वारा लुप्त कर दी गयी पगान जनसंख्या में थीं।
इसके विपरीत अपेक्षतया स्थिर बृहस्पति हैं, देवगुरु। इनके अनुसार संवत्सर पर दृष्टि रखने वाले देव। बृहस्पति की सूर्यपरिक्रमा अवधि के बारह पृथ्वीवर्ष देव सभ्यता में बड़े महत्त्वपूर्ण रहे। बारह वर्ष तपस्या, बारह वर्ष पश्चात संन्यासी का अपने जन्मस्थान पर एक बार लौटना, बारह वर्ष के प्रयाण अभियान आदि आज भी जाने जाते हैं।
शनै: चर शनैश्चर सूर्य की परिक्रमा लगभग तीस पृथ्वी वर्ष में करता है। इन दोनों का ल.स. है साठ अर्थात यदि आज शनि एवं गुरु किसी नक्षत्र पर एक साथ हैं तो साठ वर्षों पश्चात पुन: उसी पर एक साथ होंगे या आज उनकी जो सापेक्ष स्थिति है, साठ वर्ष पश्चात यथावत होगी।
यह बड़ा चक्र गणना संशोधन एवं प्रेक्षण की दृष्टि से बड़ा उपयोगी है। इसमें सौर अधिवर्ष संशोधन के पंद्रह चक्र पूरे हो जाते हैं तथा चंद्र मेटॉनिक उन्नीस वर्षीय चक्र के तीन, यद्यपि दो से तीन वर्ष शेष रहते हैं किंतु उसे अन्य प्रकार से समायोजित किया जा सकता है।
कलियुग सोया है, द्वापर उठ बैठा, त्रेता खड़ा हुआ एवं कृत चल पड़ा!
प्रत्येक ४ वर्ष पर अधिवर्ष वैदिक वाङ्मय में भी है। 365 दिन तथा एक बटे चार और अर्थात 6 घण्टे।
कलि आरम्भ सूर्यास्त से - साँझ से 6 घण्टे आगे आधी रात तक शयन।
वर्ष बीतने के पश्चात आगे 6 घण्टे और अधिक, द्वापर, अर्द्धरात्रि से प्रात:काल तक दूसरा पाद, उठ बैठा। दूसरे के पश्चात तीसरा वर्ष त्रेता, 6 घण्टे आगे बढ़ा, उठ खड़ा हुआ प्रातःकाल से मध्याह्न तक।
तीसरा वर्ष बीता चौथा आया, मध्याह्न पश्चात चलता रहा साँझ तक, चक्रपूर्ति कर ली गयी - कृतयुग।
विष्णु के त्रिविक्रम को समझें कि तीन चरण पश्चात बलि रूपी सिर से चक्र पूरा हुआ।
प्रत्येक 19 वर्ष पर सौर दिनांक एवं चन्द्र तिथि का सम्पात अपने को दुहराता है।
कलि-द्वापर-त्रेता-कृत; प्रत्येक 4 वर्ष पर सौर अधिवर्ष होता है।
19×4=76, 76 वर्षों पर दुहराव और सटीक होना चाहिये। इस चक्र के पूर्ण होने के अगले 19 वर्ष पश्चात 95 वर्षों का एक वैदिक चक्र पूरा होता है। कहाँ लिखा यह?
76 का एक गुण देखें।  76ⁿ ≈ φ, जहाँ n = 1/9

साठ वर्षों का आज भी प्रचलित बृहद संवत्सर चक्र इस प्रकार गुरु प्रेरित है, बारह पचे साठ! अनेक जटिल समांतर परम्पराओं के कारण साठ वर्षीय संवत्सर चक्र का आरम्भ भी अब जटिल हो चला है, दक्षिण एवं उत्तर में अंतर हैं तथा चक्र आरम्भ का भौतिक प्रेक्षण रूप से गुरु-शनि वास्तविक युति का उन आरम्भों से मेल नहीं लगता। क्यों न नये से पुनरारम्भ करें?
वैदिक वाङ्मय में इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि एक साथ दो संवत्सर पद्धतियाँ चलती थीं। जन सामान्य हेतु सूर्य का उत्तरायण होना नववर्ष आरम्भ होता तथा ज्योतिर्विदों हेतु वसन्तविषुव का दिन।
आगामी 21 दिसम्बर 2020 ग्रे. को जब कि मूल नक्षत्र विराजमान सूर्य वार्षिक उत्तरायण यात्रा आरम्भ करेंगे, गुरु एवं शनि साठ वर्षों के पश्चात एक साथ उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर होंगे तथा दोनों छायाग्रह क्रमश: मृगशिरा एवं ज्येष्ठा पर, क्यों न पञ्चाङ्ग संशोधन सहित नये संवत्सर चक्र की आधारशिला रखी जाय!

... 
(चित्र में  गत तेरह जुलाई की रात बृहस्पति एवं चन्द्र पास पास! निकट ही जो वृश्चिक राशि का तारा दिखता है वह है - Antares (α scorpii), वैदिक ज्येष्ठराजा इन्द्र इसके देवता हैं।)

गुरुवार, 20 जून 2019

नववर्ष के पूर्व दिवस शुभकामनायें

कल २१ जून को ग्रीष्म अयनांत है अर्थात शीत अयनांत के दिन से उत्तरायण होते सूर्य कल अपनी उत्तरी यात्रा के चरम पर होंगे। उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे बड़ी अवधि का दिन होगा। इस दिन भारत के मध्य से जाती कर्क रेखा पर सूर्य लम्बवत होंगे। प्रेक्षण आधारित ज्योतिष हेतु ये समय एवं स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। आश्चर्य नहीं कि पुरातन काल से ही उज्जैन, ऐरण आदि स्थानों पर प्रेक्षण मंदिर एवं निर्माण रहे जिन्हें मुसलमान आक्रमणकारियों ने ध्वस्त कर दिया।
कर्क रेखा का यह नाम ही क्यों है? जिस समय इस रेखा का नामकरण किया गया, उस समय आज के दिन सूर्य कर्क राशि में होते थे। आज पश्चाभिगन के कारण इस समय वृष राशि में होते हैं एवं अगले ही दिन मिथुन राशि में प्रवेश कर जाते हैं। मैं पश्चिमी फलित ज्योतिष वाले राशि की बात नहीं कर रहा, आकाश में प्रेक्षणीय तारकसमूहों की बात कर रहा हूँ जो तुलनात्मक रूप से स्थिर माने जा सकते हैं। अर्थात किसी निश्चित दिनांक को सूर्य की स्थिर राशियों के सापेक्ष स्थिति कालक्रम में परिवर्तित होती रहती है। इस प्रकार किसी निश्चित अयन सापेक्ष (सायण) दिनांक को सूर्य की विविध राशियों में 'गति' का आवर्ती काल आज कल २५७७२ वर्ष पाया गया है। किसी निश्चित दिन को सूर्य जिस स्थिति में होता है उसी पर पुन: पहुँचने में इतने वर्ष लगते हैं अर्थात एक राशि से दूसरी राशि तक जाने में २५७७२/१२ = २१४७ वर्ष लगते हैं। कर्क से मिथुन तक एक राशि का अंतर है अर्थात कर्क रेखा का यह नाम आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व रखा गया था।
भारत में प्रेक्षण ज्योतिष का इतिहास बहुत पुराना है तथा ऋग्वेद में आज से नौ हजार वर्ष पूर्व के प्रेक्षण भी मिलते हैं। ऋग्वेद का जो पाठ आज मिलता है, वह इतना प्राचीन होते हुये भी अपना प्राचीनतम रूप नहीं लिये हुये है। बीच के मण्डलों में उस प्राचीनता के संकेत मिलते हैं तथा अन्य मण्डलों में 'पूर्वे', 'पूर्व' आदि शब्द उस प्राचीनता के संकेतक हैं जिसके बारे में पुराण कहते हैं कि वेद लुप्त हुये, भगवान ने उद्धार किया। अस्तु।
एक बात स्पष्ट हो जानी चाहिये कि जहाँ भी कर्क रेखा नाम मिले, वह अंश दो हजार वर्ष से पुराना नहीं हो सकता। ऐसे तथ्यों को काल निर्धारण में आंतरिक प्रमाण कहा जाता है।
प्राचीनतम उपलब्ध ज्योतिष ग्रंथ वेदांग ज्योतिष के आज से लगभग तीन हजार तीन सौ वर्ष पुराने होने के आंतरिक प्रमाण हैं।
ग्रीष्म अयनांत से शीत अयनांत तक छ: महीने की अवधि होती है। शीत अयनांत वही है जिसे आज उत्तरायण संक्रांति से मनाया जाता है। किसी समय शीत अयनांत एवं मकर संक्रांति सम्पाती थे, आज नहीं हैं।
वेदांग से सैद्धांतिक ज्योतिष पर आते समय शीत अयनांत का वैदिक महाव्रत संक्रांति संक्रमित हो गया। शीत अयनांत जहाँ ज्योतिष विद्वानों हेतु नववर्ष होता, वहीं वसंत विषुव जब कि वसंत ऋतु में सम पर दिन रात समान अवधि के होते, ऋतु सुखद होती, जनसामान्य का नववर्ष होता। चंद्रआधारित मास नाम से समन्वय होने पर इसे वर्ष प्रतिपदा, गुड़ी पड़वा, युगादि नामों से मनाया जाता है।
शीत अयनांत से कल के ग्रीष्म अयनांत तक की अवधि गवां अयन कहलाती थी। अयन का अर्थ गति है, यथा रामायण राम की अयोध्या से लंका एवं लंका से पुन: अयोध्या तक की गति है। शीत अयनांत से छ: महीने की दूरतम झुकाव तक अर्थात पुनरावर्तन के बिंदु ग्रीष्म अयनान्त को विषुवंत कहा जाता था। विषुव एवं विषुवंत में अंतर है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या दो विषुव एवं दो अयनांत, इन चारो बिंदुओं से नववर्ष आरम्भ होते थे? उत्तर सकारात्मक है। ग्रीष्म अयनांत से ही वर्षा का आरम्भ ब्रह्मावर्त में होता। अत: एक वर्ष वर्षा से भी आरम्भ होता था। वर्ष नाम से वर्षा को मिला कर देखें। उस प्राचीनतम वर्ष को हम भुला चुके हैं। 
बच गया सितम्बर का विषुव, शरद विषुव। क्या उससे भी नववर्ष आरम्भ होता था? यहीं वे विश्वामित्र ध्यान में आते हैं जिन्होंने समांतर विश्व 'रच' दिया था। रचना को बनाने से न समझ एक नयी व्यवस्था के चलन से समझें। इस बात के उल्लेख मिलते हैं कि विश्वामित्र से श्रावण नक्षत्र से नववर्ष बताया। यदि इस पर शोध हो कि शरद विषुव कब श्रावण नक्षत्र पर था तो इस बात के काल पर किसी परिणाम पर पहुँचा जा सकता है। आजकल २३ सितम्बर के शरद विषुव पर सूर्य उत्तरा फाल्गुनी पर हैं। उत्तरा फाल्गुनी से श्रावण दस नक्षत्र की दूरी पर है अर्थात यह बात २५७७२/२७ x १० = ९५४५ वर्ष पुरानी बैठती है। सम्भव है कि उस समय अभिजित को ले कर २७ के स्थान पर २८ नक्षत्र रहे हों, ऐसी स्थिति में अभिजित की स्थिति महत्त्वपूर्ण होगी तथा यह समय १०१२४ वर्ष पूर्व तक हो सकता है, यह इस पर निर्भर है कि अभिजित को श्रावण से पूर्व मानते हैं या नहीं। इसकी संगति ऊपर ऋग्वेद के बारे में बताये गये से भी बैठती है। महाभारत में अभिजित के पतन की कथा है, उस पर पुन: कभी। यह सदैव ध्यान रखें कि पोषण सबसे महत्त्वपूर्ण है तथा कोई भी नववर्ष आरम्भ कृषि चक्र के किसी महत्त्वपूर्ण बिंदु से ही जुड़ा होगा। वर्षा का कृषि हेतु महत्त्व बताना होगा क्या?
नववर्ष के पूर्व दिवस पर शुभकामनायें। प्यासी धरा पर्जन्य को जोह रही है। वर्षा हेतु कल सामूहिक प्रार्थना करें। भूजल का दोहन नियंत्रित करें तथा उसकी पूर्ति हेतु उपाय करें।
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यस्यां पूर्वे भूतकृत ऋषयो गा उदानृचुः ।
सप्त सत्त्रेण वेधसो यज्ञेन तपसा सह ॥ 
सा न: पशून् विश्वरूपां दधातु दीर्घमायुः सविता कृणोतु ।
यस्यामन्नं व्रीहियवौ यत्रेमा: पञ्च कृष्टयः ।
भूम्यै पर्जन्यपत्न्यै नमोस्तु वर्षमेदसे ॥ 
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(अथर्ववेद पैप्पलाद शाखा, १७.४.११-१२) 

गुरुवार, 30 मई 2019

पुराण, पुरा नवो भवति

(क) 
भारत में इतिहास को काव्य के माध्यम से जीवित रखा गया। स्वाभाविक ही है कि ऐसे में कवि कल्पनायें नर्तन करेंगी ही। कल्पना जनित पूर्ति दो प्रकार की होती है, एक वह जो तथ्य को बिना छेड़े शृङ्गार करती है, दूसरी वह जो तथ्य को भी परिस्थिति की माँग के अनुसार परिवर्तित कर देती है। दूसरी प्रवृत्ति की उदाहरण रामायण एवं महाभारत, दो आख्यानक इतिहासों, पर आधारित शताधिक रचनायें हैं जिनमें पुराण भी हैं। आख्यान का अर्थ समझ लेंगे तो बात स्पष्ट होगी। आख्यान आँखों देखी रचना होते हैं।
मूल में भी क्षेपक जोड़े गये जिनका अभिज्ञान कठिन है किन्तु असम्भव नहीं।
सूत, कुशीलव, चारण एवं भाँटों के माध्यम से प्रसारित  काव्य समन्वित इतिहास गायन सफल तो रहा किन्तुु कथा कहानी प्रिय समाज की कल्पनाओं को प्रश्रय भी देता रहा, उनके अनुकूल रचता रहा। जनमानस को नायक, प्रतिनायक एवं खलनायक का नाट्य प्रिय होता है। अत: काव्य नाटक एवं वीरगाथा अभिनय काव्य भी रचे गये। इन सबने अनेक नितान्त असत्य एवं भ्रामक स्थापनाओं को भी जन्म दिया जिनकी परास सीता की अग्नि परीक्षा से ले कर जयचन्द के द्रोह तक है।
पूरक कथाओं एवं प्रसंगों का उपयोग नैतिक उपदेश एवं समाज शिक्षण हेतु भी हुआ। यदि आज भी अनपढ़ जन से गहन प्रज्ञा की बातें सुनाई पड़ जाती हैं तो उनके नेपथ्य में वही काव्य कथा प्रशिक्षण होता है। इस पक्ष हेतु तो काव्य कल्पनायें ठीक हैं किन्तु उन्हें इतिहास, आँखों देखा विवरण मान लेने से बहुत हानियाँ भी है।
प्रबुद्ध वर्ग को इसका सदैव ध्यान रखते हुये अपनी बात रखनी चाहिये अन्यथा बिना पोथी खोले अंट शंट बकते कथावाचकों का भारत भूमि पर अकाल नहीं है। वे अपना काम कर रहे हैं, आप तो अपना करें।
(ख)
वैदिक संहिताओं, ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं प्रामाणिक उपनिषदों में भी इतिहास यत्र तत्र बिखरा पड़ा है। पुराण प्रसंगों एवं उनकी तुलना से एक बात स्पष्ट होती है कि अब उपलब्ध पुराणों का पञ्जर किसी बहुत बड़े एवं लम्बे अभियान का परिणाम है। यह तब हुआ होगा जब या तो प्राकृतिक या अन्य आपदाओं के कारण विस्मृति, विलोपन एवं अनध्ययन की लम्बी अवधियाँ बीतीं एवं जो रह गया था, उसे पुनर्सम्पादित किया गया, या लम्बे चले संघर्ष के पश्चात शान्ति स्थापित होने पर सम्पादन किया गया या दोनों का समन्वित कारण रहा। 
सरस्वती के सूखने एवं लम्बे दुर्भिक्ष अन्तरालों के काल को वैज्ञानिक विधियों से जाना जा सकता है किन्तु यह निर्धारित करना कि किसी विशेष ग्रन्थ या अंश का सम्पादन किसी निश्चित कालखण्ड में हुआ, बहुत बड़े बहुविद अभियान की माँग करता है।
 इतना निश्चित है कि आङ्गिरस भार्गवों की इस कार्य में बड़ी भूमिका रही। रामायण से ले कर पुराणों तक का जो रूप आज है, उसे सहेजने एवं सम्पादित करने में भार्गव आगे रहे।
यह भी आश्चर्यजनक है कि वे परिदृश्य से प्राय: सहसा ही लुप्त भी हो गये। वह कालखण्ड बौद्ध, जैन मतों सहित सत्तर अन्य समकालीन मतों का रहा होगा जब विन्ध्य के उत्तर व्यापक परिवर्तन हुये थे।
(ग)
एक प्रसंग से समझें। कारण एवं उदाहरण अनेक हैं, यह उनमें से एक है।
भीष्म को पुलस्त्य मुनि ने पद्मपुराण उद्घाटित करते हुये बताया कि एक बार पुष्कर सरस्वती क्षेत्र के दुर्भिक्ष में सप्तर्षियोंं सहित अनेक ऋषि फँस गये। भूख से प्राण पर बन आई तो एक मृत बालक को पका कर खाने चले। तब तक वहाँ राजा पहुँच गया। उसने निषेध करते हुये कहा कि इतना जघन्य कर्म! वह भी ऋषियों द्वारा!! मेरा प्रतिग्रह स्वीकार करें, अन्न, पेय, धन, स्वर्ण आदि सब हैं। सप्तर्षियों हेतु यह शोभनीय नहीं है।
लम्बी बातचीत है। परिणाम जानें कि ऋषियों ने राजा का अन्न वेश्या के अन्न से भी दस गुना पातक बताते हुये मना कर दिया तथा भूखे ही चल दिये।
आप वैदिक याग, यज्ञ एवं अन्य विधान भी देखेंगे तो पायेंगे कि ऋषि तो राजा से अन्न आदि स्वीकार करते ही थे, यहाँ क्या हो गया जबकि आपद्धर्म वाली स्थिति ऐसी बनी थी कि मृत बालक का मांस तक खाने को उद्यत हो गये थे?
दुर्भिक्ष कब आता है? जब या तो लम्बी अनावृष्टि रही हो या अंग्रेजों की भाँति राजा लुटेरा हो या इनकी संयोजी स्थिति हो।
सूखती सरस्वती के साथ तो राजा को कोश खोल देने थे! खोल दिया रहता तो स्वर्ण एवं धनसम्पदा बचते ही नहीं!
कथा इंगित करती है कि कब राजा का अन्न पातक हो जाता है, इतना कि उसकी तुलना में स्वयं ढूँढ़ा गया गर्हित आहार भी ग्राह्य हो जाता है। इस प्रसंग के माध्यम से ऋषि एवं राजन्य, दोनों के कर्तव्यों को रेखांकित कर दिया गया है।
आगे ऋषियों से वेश परिवर्तित किये इन्द्र मिलते हैं जो कि देव राजा हैं। वह प्रसंग भी रोचक है। इतना जानें कि सर्वाराध्य एवं सनातन संस्कृति के प्रतिमान इन्द्र को पुराणों में धूसर कर उनके स्थान पर उप+इन्द्र= उपेन्द्र विष्णु को प्रतिष्ठित करने के नेपथ्य में नर राजाओं हेतु नये आदर्शों की स्थापना का उद्देश्य है। आदर्शों की प्रस्तुति को नवोन्मेषी होना चाहिये अन्यथा यथेष्ट प्रभाव नहीं पड़ता। 'एक वृक्ष दस पुत्र समाना' का आज उतना प्रभाव नहीं पड़ेगा जितना वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) का कारण दे पौधारोपण करने को कहने का। क्षुद्र नारीवादी तो 'पुत्री क्यों नहीं?' पूछते वितण्डा करने लगेंगे!
युगसन्धि केवल कालसन्धि नहीं होती, उसमें सहस्राधिक कारक होते हैं। युगसन्धि मानससन्धि भी होती है। उस संक्रमण काल में धर्म को ले कर भीष्म या युधिष्ठिर में जो उहापोह की स्थिति बारम्बार दिखती है, उसमें वे दोषी नहीं। दोनों उस बीत चुके, रीत चुके समय के अन्तिम हस्ताक्षर हैं, जब मनुष्य देवताओं से मनुष्य की ही भाँति संवादित होते थे। उनके सिर बहुत बड़ा भार है। युधिष्ठिर भीष्म एवं कृष्ण के मध्य की स्थिति है।
कृष्ण अवतारी इस कारण है कि वह युगसन्धि के आगे देखते हुये नवोन्मेष करता है।
पुराण शब्द की एक व्युत्पत्ति 'पुरा नवो भवति' भी है। सार पर केन्द्रित रहते हुये पुराणों को समकालीन नवीन दृष्टि के साथ नहीं पढ़ने पर सिवाय गुञ्जलकों के कुछ हाथ नहीं लगना! वे राजमार्ग से दिखते हैं जिनकी सिद्धि इसमें ही है कि उनसे अनन्त पगडण्डियाँ निस्सृत हों।
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গিরিজেশ রাও
ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी, रेवती, २०७६ परिधावी

रविवार, 26 मई 2019

वैदिक छन्द : ब्राह्मण-शूद्र, क्षत्रिय-वैश्य | गायत्री-अनुष्टुभ, त्रिष्टुभ-जगती।

समस्त छन्दों के मूल में स्तुति (√स्तु - प्रशंसापरक उद्गार, गान आदिहै, छन्द देवताओं के छाजन हैं जिनमें वे मृत्यु के भय से शरण लेते हैं अर्थात स्तुति नहीं करेंगे तो आप के देवता मर जायेंगे अर्थात आप के भीतर से देवत्व समाप्त हो जायेगा।
स्तुति गुणगान मात्र नहीं है, देवता के ब्याज से अपनी शक्तियों का आह्वान है जिनसे जीवन का हर क्षण जुड़ा है।
मूल शब्द है - स्तुभ्। आह्लाद भरा गान। आह्लाद भी कोई साधारण शब्द नहीं।
गान से गायत्री हुई - स्तुति मूल। ८ वर्णों के तीन चरण। गायत्री ब्राह्मण है।
गायत्री में ८ का एक चरण जुड़ा तो अनुष्टुभ हुआ - ३२ का। अनुष्टुभ से आगे श्लोक हुआ।
त्रि+स्तुभ, प्रत्येक चरण में ३ वर्ण जोड़ दिये गये तो ११x४=४४ का हुआ त्रिष्टुभ। त्रिष्टुभ क्षत्रिय है।
क्षात्र धर्माख्यान रामायण एवम महाभारत श्लोक एवं त्रिष्टुभ में रचे गये।
जगत प्रजा है, विश् प्रजा है। विश् से वैश्य है। उसके लिये त्रिष्टुभ के चरणों में एक एक वर्ण जोड़ दिये गये तो ४८ का हुआ जगती छन्द।
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हाँ, आठ आठ के सात का ५६ वाला शक्वरी भी होता है! सात पग साथ चलना मित्रता का उत्स है।
५६ वाला मित्र है  यह महानाम्नी है, वसन्ततिलका जैसे छन्द का मूल ४x१४ =५६.

तो आगामी युग वासन्ती होगा या नहीं? भारत के भाल मधुमासी राम का तिलक लगेगा या नहीं?

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इतना लिखने के पश्चात यह सोचते हुये सो गया कि किसी भी छंद को शूद्र से क्यों नहीं जोड़ा गया? ऐसा तो नहीं हो सकता।
आज की विकृत शिक्षा पद्धति, जातिवादी द्वेष एवं श्रेष्ठता भाव, नारी-वाम-मूलनिवासी वादों एवं अनध्ययन-समासित-औचित्य-स्थापनाओं के कोलाहल में मेरी मति यदि सबकी उपेक्षा की रही है तो उसका कारण थोड़ा बहुत मूल ग्रंथों का अध्ययन है।
मुझे लग रहा था कि कुछ रह गया या कुछ भूल रहा हूँ क्यों कि वर्ण का मनोवैज्ञानिक विभाजन शूद्र हेतु शून्य नहीं रख सकता।
अर्द्धनारीश्वर हो या पुराणों की वह बात कि सृष्टि सत एवं असत दोनों से है या अन्य बौद्ध/प्राचीन एशियाई मतों में यिन यान का संतुलन; ब्राह्मण-शूद्र एवं क्षत्रिय-वैश्य के दो युग्म 'भारत' रूपी 'वर्ष' के दो अयनों की भाँति हैं। अस्तु।

प्रात:काल जगा तो जैसे चमत्कार हुआ। मन में युग्म था, जाने क्यों मिथुन राशि का अंग्रेजी नाम Gemini ध्यान में आया तो केवल ध्वनि साम्य से मैं जैमिनीय ब्राह्मण खोल बैठा और सत्य ने दर्शन दिये :
'...उसने इच्छा की कि मैं और आगे करूँ वृद्धि।
निज पाँवों रूपी प्रतिष्ठा से इक्कीस स्तोम किया प्रकट, 
अनुष्टुभ छन्द, यज्ञायज्ञीय साम, देवताओं में कोई न एक, 
मनुष्यों में शूद्र, पशुओं में भेड़। 
अत: अनुष्टुभ है शूद्र छंद तथा वेश्मपति है देव।' 
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गायत्री छंद ब्राह्मण में एक पाद और जोड़ कर बना छंद अनुष्टुभ शूद्र है। 
त्रिष्टुभ छंद राजन्य के प्रत्येक पाद में एक अक्षर जोड़ कर बना छंद जगती वैश्य है। 
ब्राह्मण-शूद्र एवं राजन्य-वैश्य का मनोवैज्ञानिक छंद शोध पूर्ण हुआ। इन स्थापनाओं को समझने की तर्क पद्धति जानने हेतु शतपथ पढ़ें। 
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গিরিজেশ রাও
ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी, धनिष्ठा, २०७६ परिधावी

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

रामनवमी, नववर्ष सतुआन, बैसाखी एवं नव लोकसभा चुनाव - नियति की इङ्गिति समझें


जन जन में रमने वाले पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म चैत्र माह की शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था अर्थात धरती से देखने पर क्रान्तिवृत्त के २७ भागों में से जो भाग पुनर्वसु कहलाता है अर्थात जिसमें पुनर्वसु तारकमण्डल पड़ता है, उनके जन्म के समय चन्द्रमा वहाँ स्थित थे।
पुनर्वसु नक्षत्र में चंद्रमा आज ०८.५९ तक हैं, अर्थात सूर्योदय के समय भी चंद्रमा पुनर्वसु नक्षत्र में हैं किंतु सूर्योदय की तिथि अष्टमी ही है अत: आज उदया तिथि अष्टमी मानी जायेगी। कल का सूर्योदय पुष्य नक्षत्र में है जब कि सूर्योदय की तिथि नवमी है। कल पुष्य नक्षत्र में चंद्रमा केवल ०७.४१ तक हैं तब भी उदया तिथि अनुसार नवमी कल ही मनाई जायेगी, जब कि नवमी कल केवल ०९.३६ तक ही है।

सूर्योदय से निरपेक्ष चंद्रमा की तिथि नवमी एवं मध्याह्न के सङ्गम पर श्रीराम का जन्मोत्सव होना चाहिये, ऐसा मानने वाले आज ही रामनवमी मनायेंगे।

संयोग देखिये कि कल सौर नववर्ष भी है - सौर संक्रांति पर्व सतुआन- नये अन्न के सत्त्व का पर्व जब सूर्य मीन से मेष राशि में संक्रमित होंगे अर्थात क्रांतिवृत्त के १२ राशि विभाजनों में से आज मीन नामक अंतिम क्षेत्र में हैं, कल ०२.२५ अपराह्न में मेष राशि में प्रवेश करेंगे। राशि चक्र के इस प्रथम क्षेत्र में सूर्य के प्रवेश से सौर नववर्ष होता है। कल भारत के अन्नक्षेत्र में पञ्जाबी बैसाखी होगी।
घट घट जीव पोषक विष्णु अवतारी श्रीराम के जन्म पर जगज्जननी सिद्धिदात्री के सान्निध्य में अन्नपूर्णा बनी महिलायें नये अन्न से 'नवमी के नौ रोटी' बना पूजन करती हैं।

मेरी माता जी स्वास्थ्य लाभ करने आई हुई हैं, उनके विवाहित जीवन की यह पहली रामनवमी है जब वह उस घर में नवमी पूजन नहीं कर पायेंगी जिसमें डोली से उतरी थीं। वह विशेष पूजन कहीं और नहीं किया जाता। उनकी व्यग्रता देख समझ रहा हूँ, साथ ही सहस्राब्दियों पुरातन सनातन समाधान को भी कि चैत में न पूज पायें तो बैसाख की शुक्ल नवमी भी पूजी जा सकती है, ऐसा विधान है। गँवई महिलाओं के इस विधान में मैं उस प्रवाहित ज्ञानसरि को देख पा रहा हूँ जिसने पञ्चनद नववर्ष को बैसाखी नाम दिया होगा, मैं देख पा रहा हूँ कि पश्चिम के बैसाखी से पूरब के सतुआन तक भारत एक है - पश्चिमी समुद्र से पूर्वी समुद्र तक पसरी धरा - पुराण ऐसा ही कहते हैं। मनु भी आर्यावर्त का प्रसार ऐसा ही बताते हैं :
रामनवमी एवं नववर्ष सदा एक साथ नहीं पड़ते, इस वर्ष संयोग ही है कि दोनों साथ पड़े हैं। क्या आप जानते हैं कि जन्मदिन के ही दिन श्रीराम को युवराज पद पर अभिषिक्त करने की अपनी इच्छा उनके पिता ने बताई थी तथा अगले दिन पुष्य नक्षत्र में उनका अभिषेक होना था? पुनर्वसु एवं पुष्य के संधि काल एवं रजनी को श्रीराम एवं देवी सीता ने विशेष व्रत एवं उपवास के साथ बिताया था। होनी कुछ और ही होनी थी, अभिषेक के स्थान पर श्रीराम का वनवास हो गया!

कितना सांकेतिक है इस बार का पुनर्वसु-पुष्य काल कि लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं अर्थात जिसका अभिषेक होना है, उसके चयन की प्रक्रिया है। इस नववर्ष पगे चुनाव अभियान में इस प्रकार मतदान करें कि कोई अनर्थ न हो।

मतदान अवश्य करें। आलस्य एवं प्रमाद वश उससे विरक्त हो छुट्टी या पिकनिक न मनायें। धूप से न घबरायें, नववर्ष माह के सूर्य का आतप अच्छा ही होता है।
(1) राष्ट्रहित शतप्रतिशत मतदान करें।
(2) उसके पक्ष में करें जिससे राष्ट्र का गौरव बढ़ता हो, जनसामान्य आयुष्मान होता हो।

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

मीन मेख निकालना


बहुत ही सूक्ष्म विश्लेषण आदि के लिये एक मुहावरा प्रचलित है - मीन मेख निकालना। उसका सम्बन्ध सौर-चंद्र समन्वित पंचांग के नववर्ष के आज के पहले दिन से ले कर 14 अप्रैल को सौर पंचांग अनुसार नववर्ष के पहले दिन (सतुआन/ बैसाखी पर्व) से है।
राशि चक्र मेषादि है अर्थात मेष से गणना आरम्भ कर मीन पर अंत होता है तथा आगे पुन: मेष से आरम्भ होता है। ऐसे ही चक्र चलता रहता है।
आज सौर-चंद्र समन्वित नववर्ष है चंद्र मीन राशि में हैं तथा सूर्य भी। ऋतुओं की कारक सूर्य गति है। अत: जब सूर्य मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करें तब राशि चक्र आरम्भ से सम्पात होने के कारण सौर नववर्ष होना चाहिये। 14 अप्रैल के दिन यही होता है, जब सूर्य मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करेंगे - मेष संक्रांति, सौर नववर्ष का आरम्भ।
राशि संक्रांति को नाक्षत्रिक परिशुद्धता के साथ मिला कर देखें तो नववर्ष आरम्भ का निर्धारण सूक्ष्म विश्लेषण की माँग करता है। वही है मीन मेख निकालना। 

बुधवार, 13 मार्च 2019

इस समाचार हेतु तुम्हें क्या दूँ हनुमान? [पौरुषन् विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा]

अपने समय का सबसे गर्हित दुरात्मा रावण मारा गया। श्रीराम के आदेश पर लक्ष्मण ने विभीषण का राज्याभिषेक किया। उसके पश्चात राम ने हनुमान ने देवी सीता के पास संदेश भेजा तथा कहा कि क्या कहती हैं, आ कर सुनाओ, सीधे ले आने को नहीं कहा। कदाचित उस राष्ट्र के नये राजा के निर्णय के बिना ले आना नीति की दृष्टि से उचित नहीं होता।
देवी सीता ने हनुमान को देखा किंतु तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दीं, चुप रहीं। स्मृति तंतुओं को झङ्कृत करने में दुखिया के मन को किञ्चित समय लगा - तूष्णीमास्त तदा दृष्ट्वा स्मृत्वा हृष्टाभवत्तदा
हनुमान ने देवी को जिस शब्द से सम्बोधित किया, वह उस स्थिति हेतु उपयुक्त था - वैदेही। पिता विदेह का नाम ज्ञान के कारण था किंतु पुत्री तो अपने प्रिय के बिना विदेह स्थिति में थीं।
हनुमान कह उठे - वैदेहि कुशली रामः ससुग्रीवः सलक्ष्मणः । कुशलं चाह सिद्धार्थो हतशत्रुररिन्दमः ...निहतो रावणो देवि ... 
राम सुग्रीव एवं लक्ष्मण के साथ सकुशल हैं, अपनी कुशलता एवं शत्रु के मारे जाने की आप को सूचना देते हैं। देवी ! रावण मारा गया।
आप विगतज्वर हो स्वस्थ हों - लब्धोऽयं विजयः सीते स्वस्था भव गतज्वरा
अब समझें कि आप अपने घर में रह रही हैं - तदाश्वसिहि विस्रब्धं स्वगृहे परिवर्तसे
हर्ष से सीता का कण्ठ अवरुद्ध हो गया, पहले तो कुछ कह ही नहीं पाईं - प्रहर्षेणावरुद्धा सा व्यहर्तुं न शशाक ह
हनुमान ने पुन: विनती की, क्या सोच रही हैं देवी? कुछ कहती क्यों नहीं?
किं त्वं चिन्तयसे देवि किं च मां नाभिभाषसे ? 
गद्गद कण्ठ से सीता के मुख से बोल फूटे - अब्रवीत्परमप्रीता बाष्पगद्गदया गिरा -
प्रहर्ष वशमापन्ना निर्वाक्यास्मि क्षणान्तरम् - हर्ष के वशीभूत हो क्षण भर के लिये मैं निर्वाक हो गयी हनुमान !
इस शुभ समाचार के लिये तुम्हें क्या दूँ, कुछ तो नहीं। सोना, चाँदी, रत्न, तीनो लोकों का राज्य भी पर्याप्त नहीं।
हिरण्यं वा सुवर्णं वा रत्नानि विविधानि च
 राज्यं वा त्रिषु लोकेषु नैतदर्हति भाषितुम् 
हनुमान ने उत्तर दिया कि आप के सार भरे ये प्रेमपूर्ण वचन ही उन सब सम्पदाओं से विशिष्ट हैं :
तवैतद्वचनं सौम्ये सारवत्स्निग्धमेव च 
 रत्नौघाद्विविधाच्चापि देवराज्याद्विशिष्यते 
आगे देवी सीता ने जो सराहना की, वह उनके वैदुष्य का प्रमाण है :
अतिलक्षणसंपन्नं माधुर्यगुणभूषितम्
बुद्ध्या ह्यष्टाङ्गया युक्तं त्वमेवार्हसि भाषितुम् 
श्लाघनीयोऽनिलस्य त्वं सुतः परमधार्मिकः

अत्युत्तम लक्षणों, बुद्धि एवं माधुर्य गुण से विभूषित ऐसी अष्टाङ्ग अलंकरण युक्त वाणी तुम ही बोल सकते हो। क्या हैं वे आठ अलंकरण?
सुश्रुषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, उह, अपोह, अर्थज्ञान, तत्त्वज्ञान।
तुम वायुपुत्र परमधार्मिक हो, श्लाघनीय हो।
आगे देवी सीता ने जो दस गुण गिनाये, वे श्रीराम को भी पता लग गये।
 बलं शौर्यं श्रुतं सत्त्वं विक्रमो दाक्ष्यमुत्तमम् 
तेजः क्षमा धृतिः स्थैर्यं विनीतत्वं न संशयः 
देवी उस समय हनुमान जी को कुछ दे नहीं पाई थीं, टीस बनी रही। इसी कारण राज्याभिषेक के समय जब श्रीराम ने उन्हें परमदिव्य मुक्ताहार दिया तो देवी सीता उसे हनुमान को देना चाहती थीं किंतु सङ्कोच भी था कि जाने स्वामी क्या समझें?

सीतायै प्रददौ रामश्चन्द्ररश्मिसमप्रभम् 
 अरजे वाससी दिव्ये शुभान्याभरणानि च 
अवेक्षमाणा वैदेही प्रददौ वायुसूनवे 
 अवमुच्यात्मनः कण्ठाद्धारन् जनकनन्दिनी 
अवैक्षत हरीन्सर्वान्भर्तारन् च मुहुर्मुहुः
उस समय उनकी इच्छा की संस्तुति करते हुये श्रीराम ने वे ही दस गुण गिनाये जो देवी सीता ने शुभ समाचार ले कर पहुँचे हनुमान हेतु कहे थे।
तामिङ्गितज्ञः सम्प्रेक्ष्य बभाषे जनकात्मजाम् 
प्रदेहि सुभगे हारन् यस्य तुष्टासि भामिनि
... 
तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्यं विनयो नयः
पौरुषन् विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा
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यदि आप हनुमान जी की भक्ति करते हैं तो समझें कि उनकी प्रशंसा में जो दो श्लोक स्वयं देवी सीता एवं श्रीराम ने कहे थे, उनसे महिमामण्डन करने पर आञ्जनेय सर्वाधिक प्रसन्न होंगे :
बलं शौर्यं श्रुतं सत्त्वं विक्रमो दाक्ष्यमुत्तमम् 
तेजः क्षमा धृतिः स्थैर्यं विनीतत्वं न संशयः 
... 
तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्यं विनयो नयः
पौरुषन् विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा
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पढ़ते समय जो मार्मिक प्रसङ्ग अच्छे लगते हैं, उनका जो कुछ समझ में आता है, यहाँ स्वान्त:सुखाय लगा देता हूँ। आगे जैसी आप सब की इच्छा। 

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

Kashmir - First 150 Years of Islamic Rule कश्मीर : मुसलमानी शासन के आरम्भिक 150 वर्ष


कश्मीर में 1313 जूलियन में पहले मुसलमान शासक की भूमिका बनने लगी। 1320 में रिञ्चन पहला इस्लामी सुल्तान हुआ तथा 1420 तक के सौ वर्षों में इस्लाम ने पूर्ण प्रसार पा लिया। रिञ्चन कश्मीर का नहीं था, लद्दाख की जनजाति भौट्ट से था तथा कश्मीर में शरणार्थी के रूप में आया था। उसके पुरखे कभी बौद्ध रहे थे। उसने धीरे धीरे अपनी शक्ति बढ़ा ली। राजा बनने के पश्चात उसने शैव या इस्लाम मत में दीक्षित होने हेतु दोनों के धर्मगुरुओं से सम्पर्क किया। राजसभा में वाद विवाद भी हुये किंतु जैसा कि होता ही रहा है, शैव हिंदुओं ने उसे अपने मत में दीक्षित नहीं किया तथा वह मुसलमान बन कर कश्मीर का पहला इस्लामी सुल्तान हुआ। कहते हैं कि उसे एक सूफी बुलबुल शाह ने मुसलमान बनाया था।
1389 जूलियन में सत्तासीन हुये सिकन्दर 'बुतशिकन' ने हिंदू मंदिरों एवं परम्पराओं का प्राय: सम्पूर्ण विनाश कर दिया, मतांतरण एवं जजिया तो चले ही।
 ध्वस्त या लूट कर विरूपित कर दिये गये कुछ मुख्य मन्दिर ये थे :
  • मार्तण्ड विष्णु सूर्य - मटन के निकट
  • विजयेशान या विजयेश्वर) - व्याजब्रोर
  • चक्रभृत या विष्णु-चक्रधर - त्स्कदर उडर
  • त्रिपुरेश्वर - त्रिफर
  • सुरेश्वरी या दुर्गा सुरेश्वरी - इशिबार
  • विष्णु-वराह - वरामुल (बारामुला)

द्वितीय राजतरङ्गिणी का रचयिता जोनराज लिखता है कि उनका प्रभाव ऐसा विनाशक था मानों टिड्डीदल उर्वर खेत पर छा गया हो !

ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी, लौकिक संवत 4489 तदनुसार 1413 जूलियन में सिकन्दर की मृत्यु तक कश्मीर का पारम्परिक सनातन स्वरूप ध्वस्त हो चुका था। आगे के सात वर्ष सत्ता संघर्ष में बीते ।
1420 जू. में सुल्तान बने जैनुल आबिदीन ने जजिया की मात्रा घटा कर, कुछ अल्पप्रसिद्ध मंदिरों का जीर्णोद्धार करा कर तथा पण्डितों को कुछ छूट दे कर भ्रम में डाला। इन सबके बीच कश्मीरी भाषा संस्कृत एवं शारदा के प्रति निष्ठा तज फारसीमय होती गयी। जैनुल आबिदीन ने लगभग पचास वर्ष तक शासन किया।
जब अत्याचार चरम पर हो तो किञ्चित मुक्ति भी बहुत बड़ी लगती है| जिन कश्मीरी पण्डितों ने यवन आक्रमण के प्रतिरोध हेतु प्रथम बार कराधान का विरोध अनशन कर प्राण त्यागने से किया था, उन्हों ने ही जैनुल आबिदीन को नारायण का अवतार बता दिया !

सिकंदर बुतशिकन से अधिक जिहादी जुनून वाला उसका सेनापति सूहा भट्ट था जो कि मतांतरित हो मुसलमान बना पण्डित था। जितने भी मंदिरों के ध्वंस या अत्याचार हुये, उनमें उसकी बड़ी भूमिका रही।

सिकन्‍दर को बुतशिकनी (हिन्‍दू प्रतिमा भञ्जन) हेतु प्रेरित कर कश्मीर को दारुल इस्लाम बनाने हेतु बड़ी प्रेरणा एक सूफी जैसे इस्लामी मीर सैय्यद मुहम्मद की भी रही जो अरबी मूल का था तथा कश्मीर में मात्र 22 वर्ष की आयु में वहाँ आया था। उसकी विद्वता से सिकंदर बहुत प्रभावित हुआ था।

 जैनुल आबिदीन के समय श्री भट्ट नाम के प्रभावशाली पण्डित ने राजा से उन पण्डितों के शुद्धिकरण की अनुमति ले ली थी जो मुसलमान बना दिये गये थे या जिनके दादा, पिता आदि पण्डित थे किंतु पण्डित समाज ने स्पष्ट मना कर दिया।
एक स्वर्णिम अवसर भक्तिधारा ले कर मुख्य भारत से पहुँचे वैष्णव संन्यासी नारायण स्वामी के पहुँचने पर भी आया था जिसे पण्डितों ने गँवा दिया। 

इन वर्षों में स्त्रियों की भूमिका भी विचित्र विध्वंसक रही तथा इस्लाम के इस विजय अभियान में उनका बहुत चतुराई से उपयोग किया गया। आरम्भिक वर्षों में इस्लामी सुल्तानों ने पास पड़ोस के अन्य जातीय राजाओं (डामर आदि) से अपने बेटियाँ ब्याह दीं जिससे कि उनकी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ हो सके । एक आरम्भिक सुल्तान शाह मीर इस प्रकार के वैवाहिक सम्बंधों को करने में अग्रणी रहा। जोनराज लिखते हैं कि डामर वंशी शाह मीर की बेटियों को माला की भाँति धारण किये हैं, वे नहीं जानते कि वे सब घोर विषैली नागिनें हैं।
ये नागिनें भी कश्मीर में इस्लाम स्थापना की कारण बनीं। 
सिकन्दर की एक हिंदू रानी शोभा थी जिससे उसका सबसे बड़ा बेटा फिरोज हुआ था किंतु सिकंदर ने यह सुनिश्चित किया कि सबसे बड़ा होते हुये भी एक हिंदुआनी की कोख से उपजा सुल्तान न बने तथा अपनी मुस्लिम रानी से उत्पन्न मीर खान को उत्तराधिकारी बना गया। 

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

अभिमन्यु वध के पश्चात श्रीकृष्ण की वैकल्पिक योजना Plan - B

श्रीराम एवं बाली का प्रसङ्ग तो लगाया ही था। अब देखिये एक दूसरे अवतारी श्रीकृष्ण को जिन्हों ने महाभारत युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी। सम्भावित आपदा काल हेतु क्या योजना बनाये थे?     
....
कुरुवंश की नयी पीढ़ी के सबसे योग्य कुमार अभिमन्यु का छल पूर्वक वध किया जा चुका था। अधर्मपूर्वक उन्हें घेर कर मारने वाले छ: महारथियों में आचार्य द्रोण एवं कर्ण भी थे। अन्य चार थे - कृपाचार्य, कृतवर्मा, बृहद्वल एवं अश्वत्थामा। अभिमन्यु के संतप्त पिता अर्जुन ने प्रतिज्ञा कर ली कि जिस जयद्रथ ने व्यूह में अभिमन्यु की रक्षा हेतु मेरे भाइयों को प्रवेश नहीं करने दिया, यदि उसने,
- मारे जाने के भय से धृतराष्ट्रपुत्रों का त्याग नहीं कर दिया,
या
- मेरी, श्रीकृष्ण या महाराज युधिष्ठिर की शरण में नहीं आ गया,
तो कल मैं उसका वध अवश्य कर डालूँगा।
न चेद्वधभयाद्भीतो धार्तराष्ट्रांप्रहास्यति 
न चास्माञ्शरणं गच्छेत्कृष्णं वा पुरुषोत्तमम्
भवन्‍तं वा महाराज श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् 
इसमें असफल होने पर अपने ऊपर संसार भर के ढेर सारे विविध पापों के पड़ने की बात करते हुये अर्जुन ने जोड़ दिया :
यद्यस्मिन्नहते पापे सूर्योऽस्तमुप्यास्यति 
इहैव सम्प्रवेष्टाहं ज्वलितं जातवेदसम् 
यदि पापी जयद्रथ को मारे बिना ही सूर्य अस्त हो गये तो मैं यहीं प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के क्रोध में साथ देते हुये उस समय अपना पाञ्चजन्य शङ्ख फूँक दिया। अर्जुन ने अपना देवदत्त शंख फूँका। सेना उत्साह में भर गयी। पाण्डव पक्ष का सिंहनाद उस अतीव शोक के समय में भी समस्त अवनी को पाताल सहित कम्पित करने लगा - जगत् सपाताल ... प्रकम्पयामास !
[युद्ध में स्थायी शोक के लिये न समय होता है, न अवसर। हृदय पर पत्थर रख कर भी सेना का मनोबल बना रहे, ऐसा करने रहना पड़ता है। जो नेतृत्त्व में हैं, उन्हें तो दैन्य कदापि नहीं प्रदर्शित करना चाहिये।] 
दुर्योधन के पक्ष ने सुना तो सभी का उत्साह क्षीण हो गया। जयद्रथ तो मारे भय के काँपने लगा। द्रोण ने उसे आश्वस्त किया कि तुम्हारी रक्षा मैं करूँगा तथा जिसकी रक्षा मैं करूँ उस पर देवताओं का भी वश नहीं चलना - अहं हि रक्षिता तात भयात्त्वां नात्र संशय:, न हि मद्बाहुगुप्तस्य प्रभवन्‍त्यमरा अपि
...
सब हो गया तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को झिड़का, बिना मुझसे मंत्रणा किये तुमने यह बड़ा भारी भार उठा लिया। ऐसी स्थिति में हम सम्पूर्ण लोकों के उपहास के पात्र कैसे नहीं बनेंगे (यदि असफल हुये तो) - असम्मन्त्र्य मया सार्धमतिभारोऽयमुद्यत:, कथं तु सर्वलोकस्य नावहास्या भवेमहि ? 
मैंने दुर्योधन के शिविर में गुप्तचर भेजे थे तथा वे वहाँ का समस्त समाचार मुझे बता गये हैं। जयद्रथ तो भाग जाना चाहता था किंतु उसकी रक्षा हेतु द्रोण ने विशेष प्रबंध किये तो रह गया।
कर्ण, भूरिश्रवा, अश्वत्थामा, वृषसेन, कृपाचार्य एवं शल्य; ये छ: महारथी कल उसकी रक्षा में उससे आगे रहेंगे। द्रोण ने शकट-कमल व्यूह रचने का निर्णय लिया है। पिछले कमल व्यूह के मध्य की कर्णिमा के बीच सूचीव्यूह होगा तथा उसके पार्श्व में अन्यान्य वीरों से रक्षित जयद्रथ रहेगा।
अर्जुन ने सुना तथा वीर वचन कहने लगे कि मधुसूदन, जिन छ: के नाम आप ने गिनाये हैं उनका बल मेरे आधे जितना भी नहीं है - तेषां वीर्यं ममार्धेन न तुल्यमिति मे मति: । केशव ! उस दुर्मति पापी जयद्रथ की रक्षा का बीड़ा उठाये जो द्रोण हैं न, पहले उन्हीं पर आक्रमण करूँगा - यस्तु गोप्ता महेष्वासस्तस्य पापस्य दुर्मते:, तमेव प्रथमं द्रोणम् अभियास्यामि केशव
आप की कृपा से इस युद्धस्थल में कौन सी ऐसी शक्ति है, जो मेरे लिये असह्य हो !  तव प्रसादाद्भगवन्‍किमिवास्ति रणे मम !  जिस प्रकार यज्ञ में लक्ष्मी का होना ध्रुवसत्य है, उसी प्रकार जहाँ आप नारायण विद्यमान हैं, वहाँ विजय भी अटल है - श्रीर्ध्रुवापि च यज्ञेषु ध्रुवो नारायणे जय: । अर्जुन ने श्रीकृष्ण को रात बीतते ही सर्वसज्ज रथ प्रस्तुत करने का निर्देश भी दे दिया - संदिदेशार्जुनो नर्दन्‍वासवि: केशवं प्रभुम्, यथा प्रभातां रजनीं कल्पित: स्याद रथो मम। 
अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा एवं अभिमन्यु पत्नी उत्तरा सहित अन्य स्त्रियों को ढाँढ़स बँधाने चले गये।
...
श्रीकृष्ण के मन में बहुत कुछ चल रहा था। लौट कर अर्जुन के शिविर पहुँचे, जलस्पर्श किये, कुश की शय्या बना कर अक्षत, गंध, माला सहित उस पर समस्त शस्त्रास्त्र रखे तथा अर्जुन से आचमन करवाया। परिचारकों ने उन्हें दिखाते हुये त्र्यम्बक निशा बलि पूजन किया - नैशं त्रैयम्बकं बलिम् । अर्जुन ने समस्त पूजा उपहार श्रीकृष्ण को अर्पित कर दिये। श्रीकृष्ण ने उन्हें शयन करने को कहते हुये यह भी बताया कि मैं अब तुम्हारा कल्याण साधन करने जा रहा हूँ - सुप्यतां पार्थ भद्रं ते कल्याणाय व्रजाम्यहम्
सोना कहाँ था, उस रात शिविर में कोई सो न सका, सब में जागरण का आवेश हो गया था - प्रजागर: सर्वजनं ह्याविवेश विशाम्‍पते
अर्द्धरात्रि हुयी तथा अर्जुन की प्रतिज्ञा का स्मरण करते हुये श्रीकृष्ण जाग उठे। अपने सारथी दारुक से बोले कि कल जयद्रथ की रक्षा हेतु समूचा दुर्योधन पक्ष लग जायेगा। दैत्यों एवं दानवों के दर्प का दलन करने वाले त्रिलोकी में एकमात्र वीर इंद्र हैं परंतु वे भी द्रोणाचार्य से रक्षित जयद्रथ को नहीं मार सकते - एको वीर: सहस्राक्षो दैत्यदानवदर्पहा, सोऽपि तं नोत्सहेताजौ हन्तुं द्रोणेन रक्षितम्। मैं कल कुछ ऐसा करूँगा कि सूर्यास्त के पूर्व अर्जुन जयद्रथ का वध कर दें। मित्रता से भीने भगवान कहते चले गये :
 न हि दारा न मित्राणि ज्ञातयो न च बान्धवाः
 कश्चिन्नान्यः प्रियतरः कुन्तीपुत्रान्ममार्जुनात्
 अनर्जुनमिमं लोकं मुहूर्तमपि दारुक
 उदीक्षितुं न शक्तोऽहं भविता न च तत्तथा
 अहं ध्वजिन्यः शत्रूणां सहयाः सरथद्विपाः
 अर्जुनार्थे हनिष्यामि सकर्णाः ससुयोधनाः
 श्वो निरीक्षन्तु मे वीर्यं त्रयो लोका महाहवे
 धनंजयार्थं समरे पराक्रान्तस्य दारुक
 श्वो नरेन्द्रसहस्राणि राजपुत्रशतानि च
 साश्वद्विपरथान्याजौ विद्रविष्यन्ति दारुक
 श्वस्तां चक्रप्रमथितां द्रक्ष्यसे नृपवाहिनीम्
 मया क्रुद्धेन समरे पाण्डवार्थे निपातिताम्
 ... 
 ज्ञास्यन्ति लोकाः सर्वे मां सुहृदं सव्यसाचिनः
 यस्तं द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्तमनु स मामनु
 इति संकल्प्यतां बुद्ध्या शरीरार्धं ममार्जुनः
मुझे स्त्री, मित्र, ज्ञाति, बंधु तथा अन्य कोई भी कुन्तीपुत्र अर्जुन से अधिक प्रिय नहीं है। मैं अर्जुन से रहित इस संसार को दो घड़ी भी नहीं देख सकता। ऐसा हो ही नहीं सकता (कि मेरे रहते अर्जुन का अनिष्ट हो)।
मैं अर्जुन के लिये हाथी घोड़े, कर्ण एवं दुर्योधन सहित समस्त शत्रुओं को जीत कर सहसा उनका संहार कर डालूँगा। तुम कल देखोगे कि मैंने समराङ्गण में कुपित हो कर पाण्डव अर्जुन हेतु सारी शत्रु राजसेना को चक्र से प्रमथित कर मार गिराया है। कल सभी जानेंगे कि मैं अर्जुन का सुहृद हूँ। जो अर्जुन से द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है और जो अर्जुन का अनुगामी है, वह मेरा अनुगामी है, तुम अपनी बुद्धि से निश्चय कर लो कि अर्जुन मेरा आधा शरीर है।
 यथा त्वमप्रभातायामस्यां निशि रथोत्तमम्
 कल्पयित्वा यथाशास्त्रमादाय व्रतसंयतः
 गदां कौमोदकीं दिव्यां शक्तिं चक्रं धनुः शरान्
 आरोप्य वै रथे सूत सर्वोपकरणानि च
 स्थानं हि कल्पयित्वा च रथोपस्थे ध्वजस्य मे
 वैनतेयस्य वीरस्य समरे रथशोभिनः
 छत्रं जाम्बूनदैर्जालैरर्कज्वलनसंनिभैः
 विश्वकर्मकृतैर्दिव्यैरश्वानपि च भूषितान्
 बलाहकं मेघपुष्पं सैन्यं सुग्रीवमेव च
 युक्त्वा वाजिवरान्यत्तः कवची तिष्ठ दारुक
कल प्रात:काल तुम शास्त्रविधि के अनुसार मेरे उत्तम रथ को ससुज्जित करके सावधानी के साथ ले कर युद्धस्थल में चलना। कौमोदकी गदा, दिव्य शक्ति, चक्र, धनुष, बाण तथा अन्य समस्त सामग्रियों को रथ पर रखकर उसके पिछले भाग में समराङ्गण रथ पर शोभा पाने वाले वीर विनतानन्‍दन गरुड़ के चिह्न वाले ध्वज के लिये भी स्थान बना लेना। उसमें मेरे चारो श्रेष्ठ अश्वों - बलाहक, मेघपुष्प, शैव्य तथा सुग्रीव को जोत लेना और स्वयं भी कवच धारण कर विराजमान रहना।
श्रीकृष्ण ने वह सङ्केत भी बताया जिसके होने पर दारुक को बड़े वेग से उनके पास पहुँचना था - पाञ्चजन्य शङ्ख का ऋषभ स्वर में नाद। वह भैरव नाद जब सुनाई दे तब बड़े वेग से मेरे पास सज्जित युद्धक रथ ले कर पहुँच जाना।
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषमार्षभेणैव पूरितम्
 श्रुत्वा तु भैरवं नादमुपयाया जवेन माम्   
...
यह बात और है कि इसकी आवश्यकता नहींं पड़ी किन्‍तु श्रीकृष्ण अपने कर्म के बारे में, कर्तव्य के बारे में पूर्णत: निश्चित थे तथा परिणाम की गुरुता को देखते हुये उसके लिये अपनी प्रतिज्ञा को भी तोड़ने हेतु सन्नद्ध थे।

मित्रता हेतु सीख : 

- संकट की स्थिति में साथ बना रहे,
- युद्ध में साथी योद्धा द्वारा सहसा निर्णय लेने पर भी सबके सामने उत्साह बढ़ाये,
- जब एकान्‍त हो तो उसकी करनी की गुरुता बताये,
- उसकी सुने, विश्वास बनाये रखे,
- वह मनोवैज्ञानिक रूप से सबल रहे, इस हेतु उपाय करे,
तथा
- विचार कर के ऐसी वैकल्पिक योजना Plan B बना कर नियोजित रखे कि आवश्यकता पड़ने पर तुरन्‍त प्रयोग में लाई जा सके।
    

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

शत्रु कपटी हो, शक्तिशाली हो तो कपट से या छिप कर मारें


श्रीराम ने बाली को छिप कर मारा। रामायण में बाली ने उन्हें बहुत खरी खोटी सुनाई है। स्वयं क्या किया था उसने? भाई को निर्वासित कर एक निश्चित घेरे में रहने पर विवश कर दिया था। पुत्रवधू समान अनुजवधू से बलात संसर्ग करता था, मारा गया तो धर्म की बातें करने लगा।
बाली के चरित्र को आजकल के कम्युनिस्टों एवं मुसलमानों का प्रतिनिधि समझें, अपने तो सारे कुकर्म करेंगे किंतु जब प्रतिकार होगा तो स्वयं को धर्मात्मा बताते हुये सामने वाले पर टूट पड़ेंगे। मीडिया से ले कर नेता अभिनेता तक जो कुछ हो रहा है, बाली कर्म ही है।
बाली ने क्या बातें कहीं हैं! पठनीय हैं -
राजा के गुण गिनाते हुये श्रीराम की भर्त्सना करता है - दम: शम: क्षमा धर्मो धृति: सत्य पराक्रम: । पार्थिवानां गुणा राओजन् दण्डश्चाप्ययकारिषु॥
तुमको तो बड़ा धर्मात्मा सुना था, बड़े अधर्मी निकले ! तुम्हारी बुद्धि मारी गयी है - विनिहतात्मानं। तुम्हारा आचार पापपूर्ण है - पापसमाचारम्। तुम घास फूस से ढके कुँये के समान धोखा देने वाले हो - तृणै: कूपमिवावृतम्। साधुओं के वेश में पापी हो - सतां वेषधरं पापं, राख से ढकी अग्नि समान हो, धर्म का छ्द्माभ्यास करते हो - धर्मच्छद्मानिसंवृतम्
मैं तो तुम्हारे राज्य में कोई उपद्रव नहीं कर रहा था, तब भी मुझ निरपराध को क्यों मारा? - विषये वा पुरे वा ते यदा पापं करोम्यहम् ... कस्मात् तं हंस्य?
महान क्षत्रियकुल में जन्मा, धर्म ज्ञाता बताते हुये उसने उन्हें क्रूरकर्मा कह कर ग्लानि से ग्रस्त करने का प्रयास भी किया, जैसे आज कल बरखा से रबिश तक सभी हिंदुओं पर लगे हुये हैं - धर्मलिङ्गप्रतिच्छन्न: क्रूरं कर्म समाचरेत् ! अखलाक के वध पर जैसी प्रतिक्रियायें आई थीं, इस अंश को पढ़ते हुये वे सभी ध्यान में आती हैं।
तुम्हें नीति एवं विनय नहीं ज्ञात, दण्ड एवं अनुग्रह का राजधर्म भी नहीं पता, तुम तो बड़े संकीर्ण, क्रोधी अमर्यादित हो - कोपनश्चानवस्थित:, संकीर्ण:। जहाँ कहीं भी बाण चलाते फिरते हो - शरासनपरायण:। तुम्हारी बुद्धि स्थिर नहीं है।
मुसलमानों की ही भाँति विक्टिम कार्ड भी खेलने लगा -
हत्वा बाणेन काकुत्स्थ मामिहानपराधिनम् ।
किं वक्ष्यसि सतां मध्ये कर्म कृत्वा जुगुप्सितम् ॥
मुझ निरपराध को बाण से मारने का जुगुप्सित कर्म कर तुम सत्पुरुषों के बीच में क्या कहोगे?

बाली ने इतना तक कह दिया कि अरे !  तुम शठ हो, अपकारी हो, क्षुद्र हो,  मिथ्या ही अपने को शांतचित्त दिखाते रहते हो। महात्मा जैसे राजा दशरथ से तुम्हारे जैसा पापी कैसे उत्पन्न हो गया !
शठो नैकृतिक: क्षुद्रो मिथ्याप्रश्रितमानस: । कथं दशरथेन त्वं जात: पापो महात्मना !
श्रीराम आज कल के मोहनदासी हिंदू होते तो पानी पानी हो गये होते!

श्रीराम ने उत्तर देना आरम्भ किया - धर्म, अर्थ, काम एवं लौकिक आचार को तो तुम स्वयं नहीं जानते, बालोचित अविवेक से ग्रस्त हो मेरी निंदा करते हो? - अविज्ञाय कथं बाल्यान्मामिहाद्य विगर्हसे ! यह समस्त पृथ्वी इक्ष्वाकुओं की है, वे पशु पक्षी सहित समस्त मनुष्यों पर दया करने एवं दण्ड देने के अधिकारी हैं।
धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वी का पालन करते हैं - तां पालयति धर्मात्मा भरत: सत्यवानृजु:। भरत की ओर से हमें तथा अन्य पार्थिवों को यह आदेश प्राप्त है कि जगत में धर्म पालन एवं प्रचार का यत्न किया जाय। अत: हमलोग धर्म का प्रसार करने की इच्छा से इस पृथ्वी पर विचरते हैं :
तस्य धर्मकृतादेशा वयमन्ये च पार्थिवा: ।
चरामो वसुधां कृत्स्नां धर्मसंतानमिच्छव: ॥
राम ने भरत की महिमा बताई तथा आगे वह कारण गिनाये जिनके कारण बाली को उन्हें मारना पड़ा, तुलसीदास ने अनुवाद किया - अनुजबधू भगिनी सुतनारी  ...
राम ने पापकर्म का दण्ड भरत के प्रतिनिधि होने के कारण दिया।
तदेतत्कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हतः
भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्
अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः
रुमायां वर्तसे कामात्स्नुषायां पापकर्मकृत्
तद्व्यतीतस्य ते धर्मात्कामवृत्तस्य वानर
भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन्दण्डोऽयं प्रतिपादितः
न हि धर्मविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुषः
दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप
औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य यः
प्रचरेत नरः कामात्तस्य दण्डो वधः स्मृतः
भरतस्तु महीपालो वयं त्वादेशवर्तिनः
त्वं च धर्मादतिक्रान्तः कथं शक्यमुपेक्षितुम्
गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन्
भरतः कामवृत्तानां निग्रहे पर्यवस्थितः
वयं तु भरतादेशं विधिं कृत्वा हरीश्वर
त्वद्विधान्भिन्नमर्यादान्नियन्तुं पर्यवस्थिताः
श्रीराम ने यह भी बताया कि दण्ड देने में प्रमाद करने पर राजा को दूसरों के पाप भोगने पड़ते हैं। भारत की समस्या यही है कि राजदण्ड या तो है ही नहीं या मोहनदासी प्रभाव में चलता ही नहीं।
लोकतंत्र में तो लोक ही राजा है न? सरकार उसकी प्रतिनिधि। प्रतिनिधि दण्ड नहीं देगा तो राजा पाप भोगेगा अर्थात लोग कष्ट भोगेंगे। भारत की जनता भोग रही है।
victim card ख़ेल कर आजकल के वामपंथी प्रयासों की भाँति उन्हें अवसाद एवं पछतावे, ग्लानि आदि से भर देने के बाली के कथनों पर श्रीराम ने बहुत स्पष्ट कह दिया :
न मे तत्र मनस्तापो न मन्युर्हरिपुङ्गव ।
वागुराभिश्च पाशैश्च कूटैश्च विविधैर्नरा :॥
इस कार्य के लिये मेरे मन में न तो संताप होता है और न खेद ही। मनुष्य जाल बिछा कर, पाश पसार कर तथा नाना प्रकार के कूट उपाय कर मृगों को पकड़ लेते हैं, तू तो शाखामृग (उत्पाती) है - यस्माच्छाखामृगो ह्यसि !
...
शत्रु कपटी हो, शक्तिशाली हो तो कपट से या छिप कर मारें । मन में कोई अपराध भाव या ग्लानि न रखते हुये दुरात्माओं को येन केन प्रकारेण नष्ट करने वाले क्षात्रधर्म की आवश्यकता है।  

बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

भार्गव वाल्मीकि एवं जातीय गतिशीलता

जातीय गतिशीलता को नहीं समझने से, काल की बृहद परास में घटित की विस्मृति से या उपेक्षा करने से आज कल की बहुत सी समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। भारत तोड़क प्रचार तंत्र की भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका है।
भार्गव कुल एवं संततियाँ नवोन्मेष हेतु जानी जाती हैं। पनही, छाता, आँवा में पकाये मृद्भाण्ड, परशु आदि कुछ ऐसे क्रांतिकारी नवोन्मेष हैं जिनका उन्हें श्रेय है। महाभारत में कुम्भकार का कर्मस्थल 'भार्गवकर्मशाला' कहा गया है। 
गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां; पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ।
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीतौ; भिक्षेत्यथावेदयतां नराग्र्यौ॥
[महाभारत (बड़ौदा संस्करण), ०१.१८२.००१]
भार्गवों ने ही स्मृति, पुराण, आख्यान आदि का पुनर्सम्पादन किया, लुप्तप्राय को पुनर्जीवित किया। वाल्मीकि भी भार्गव थे। यदि अतिप्राचीन एकत्त्व से कोई वर्ग आज कहता है कि वाल्मीकि 'वाल्मीकि समाज' से थे तो उसे आज के परिप्रेक्ष्य में नहीं, सहस्राब्दियों पूर्व के एकत्त्व से समझा जाना चाहिये। क्या यह सम्भव नहीं कि कुछ भार्गवों ने शिल्प व्यवसाय चुना हो तथा उसी में रह गये हों? गोत्र की अवधारणा को ही देखिये, क्या सभी समान गोत्र वाले एक ही पुरुष की संतान हैं या एकसमान गुरु, शिक्षा एवं दीक्षा परम्परा के कारण एक गोत्र के कहलाते हैं?
विविधता एवं विविध घटित की उपेक्षा कर अपेक्षतया नये रूपों की संकीर्णता में देखेंगे तो सामाजिक विघटन ही होगा, संगठन नहीं। सनातन शत्रु यही चाहते हैं। कोई आवश्यक नहीं कि सदैव प्रतिक्रिया दी ही जाय, मौन का अपना महत्त्व है। अध्ययन की परास लम्बी अवश्य होनी चाहिये जिससे कि समझ विकसित हो सके।

बुधवार, 16 जनवरी 2019

Mahabharat Shanti Parv महाभारत : शांतिपर्व - 1 [राजा रञ्जयति प्रजाः]

भारत का महाभारत युद्ध अभूतपूर्व विनाश के साथ समाप्त हो चुका था। भरतवंश के उत्तराधिकारी युधिष्ठिर का मन खिन्न था, उचाट। श्रीकृष्ण ने उन्हें शरशय्या पर बुझी हुई अग्नि के समान पड़े वृद्ध भरतवंशी भीष्म के पास जा कर शिक्षा लेने को कहा, कहा कि इस समय भीष्म मेरा ध्यान कर रहे हैं अत: मेरा मन भी उन्हीं में लगा है। 
कहा कि वसिष्ठ मुनि द्वारा शिक्षा प्राप्त भीष्म के अवसान के साथ ही ज्ञान का प्रकाश अस्त हो जायेगा अत: मैं तुम्हें उनके पास चलने को कहता हूँ। 
श्रीकृष्ण ने पास पहुँच कर भीष्म से कहा कि युधिष्ठिर शोकहत हो गये हैं, उन्हें समाधियुक्त धर्मार्थ का सत्य उपदेश करें, इन्हें शोक से मुक्त करें। 
भीष्म ने उत्तर दिया कि कृष्ण, आप के होते हुये यह काम मैं करूँ? गुरु के रहते हुये शिष्य उपदेश देने का अधिकारी भी है? मेरी देह बाणों से पीड़ित है, बुद्धि काम नहीं कर रही, न दिशाओं का ज्ञान है, न आकाश का, न पृथ्वी का। मैं तो केवल आप के प्रभाव से यहाँ बना हुआ हूँ। 
कृष्ण ने उन्हें समस्त दोषों से मुक्त करने हेतु वर दिया, उनकी बुद्धि को सतोगुण में स्थिर कर दिव्य दृष्टि दी तथा अगले दिन आने की कह युधिष्ठिर सहित विदा ले ली। 
वैशम्पायन बताते हैं कि लौट कर कृष्ण एवं पाण्डव ने भवन में ऐसे प्रवेश किया मानों श्रम से थके सिंह अपनी गुहा में प्रविष्ट हो रहे हों - श्रमान्‍विता मृगपतयो गुहा इव
... 
अगले दिन वहाँ पहुँचने पर पाण्डवों ने दाहिने हाथ उठा कर महर्षियों का अभिवादन किया। महर्षियों से घिरे भीष्म इस प्रकार दिख रहे थे जैसे देवताओं से घिरे ब्रह्मा हों। नक्षत्रों से घिरे चंद्रमा की भाँति भाइयों से घिरे युधिष्ठिर ने देखा, कुरुवंश का शलाका पुरुष शरतल्प पर शयन करता ऐसा दिख रहा था मानों सूर्य आकाश से गिर पड़ा हो - शरतल्पे शयानं तमादित्यं पतितं यथा
युधिष्ठिर भय से काँप उठे - भयाच्चागतसाध्वस:
श्रीकृष्ण ने भीष्म से उनकी कुशल पूछी - रात आप ठीक से सोये तो? बुद्धि निर्मल तो है? कोई ग्लानि तो नहीं? मन व्याकुल तो नहीं? 
भीष्म ने उत्तर दिया, हे वार्ष्णेय! तुम्हें देख कर मेरे समस्त दोष दूर हो गये। मैं भूत, भविष्य, भव सब देख रहा हूँ। वेदोक्त धर्म एवं वेदांत को भी साक्षात देख पा रहा हूँ। शिष्ट जन द्वारा बताया धर्म मुझे स्पष्ट है। 
हे जनार्दन!‍ देश, जाति, कुल एवं कुलधर्म का भी मुझे ज्ञान है। आश्रम धर्म एवं राजधर्म मुझे प्रकाशित हैं। जिस विषय में जो कुछ भी कहने योग्य है, मैं कहूँगा। आप के निरंतर स्मरण से मैं युवा हो गया हूँ - युवेवास्मि। आप के प्रसाद से वक्ता हो उपदेश देने में मैं समर्थ हूँ। 
तब भी मैं जानना चाहता हूँ कि आप पाण्डव युधिष्ठिर को स्वयं उपदेश क्यों नहीं करते? माधव, शीघ्र बताइये। 
स्वयं किमर्थं तु भवाञ्श्रेयो न प्राह पाण्डवम् । 
किं ते विवक्षितं चात्र तदाशु वद माधव ॥ 

वासुदेव ने उत्तर दिया, हे कौरव ! यश एवं श्रेय का मूल मैं हूँ। सत एवं असत पदार्थ मुझसे ही उत्पन्न हैं। चंद्रमा शीतल किरणों से सम्पन्न है, यह कहने पर किसे विस्मय होगा ! सम्पूर्ण यश से सम्पन्न मुझसे उपदेश प्राप्त कर किसे आश्चर्य होगा ! मुझे आप के यश की प्रतिष्ठा करनी है। जब तक यह पृथ्वी रहेगी, आप की कीर्ति सम्पूर्ण लोकों में रहेगी। आप पाण्डव युधिष्ठिर के पूछने पर जो भी कहेंगे, वह वेद सिद्धांत की भाँति इस वसुधा पर मान्य होगा - वेदप्रवाद इव ते स्थास्यते वसुधातले। 
मरने से बचे हुये राजन्य गण आप के पास धर्म का अनुनय ले कर बैठे हैं, उन्हें बतायें। आप वृद्ध हैं, श्रुति आचार से समन्‍वित हैं, राजधर्म के ज्ञाता सदाचारी हैं। राजन्य को उसी प्रकार उपदेश दें जिस प्रकार एक पिता पुत्र को देता है। इसे धर्म बताया गया है कि सुनने की इच्छा रखने वाले को श्रेष्ठ विद्वान पूछने पर उपदेश दे। 
भीष्म ने सहर्ष स्वीकृति देते हुये युधिष्ठिर की प्रशंसा में जो शब्द कहे, वे प्रकारान्तर से मानों गम्भीर विषयों पर प्रश्न करने की पात्रता के निकष हैं : 
सर्वेषां दीप्तयशसां कुरूणां धर्मचारिणाम्
यस्य नास्ति समः कश्चित्स मां पृच्छतु पाण्डवः
धृतिर्दमो ब्रह्मचर्यं क्षमा धर्मश्च नित्यदा
यस्मिन्नोजश्च तेजश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः
सत्यं दानं तपः शौचं शान्तिर्दाक्ष्यमसंभ्रमः
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि स मां पृच्छतु पाण्डवः
यो न कामान्न संरम्भान्न भयान्नार्थकारणात्
कुर्यादधर्मं धर्मात्मा स मां पृच्छतु पाण्डवः
संबन्धिनोऽतिथीन्भृत्यान्संश्रितोपाश्रितांश्च यः
संमानयति सत्कृत्य स मां पृच्छतु पाण्डवः
सत्यनित्यः क्षमानित्यो ज्ञाननित्योऽतिथिप्रियः
यो ददाति सतां नित्यं स मां पृच्छतु पाण्डवः
इज्याध्ययननित्यश्च धर्मे च निरतः सदा
शान्तः श्रुतरहस्यश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः

कृष्ण ने कहा कि युधिष्ठिर तो लज्जा से ग्रस्त हैं कि मुझसे इतना बड़ा जगत संहार हो गया, वे तो शाप के भय से भयभीत हैं, अत: नहीं पूछ रहे - अभिशापभयाद्भीतो भवन्तं नोपसर्पति। 
... 
वासुदेव की भूमिका पूर्ण हुई। अपने ही रक्त, पीव में सना पुरा-भारत भविष्य के भारत को उपदेश देने की भङ्गिमा में आ गया। वह रणक्षेत्र जो शवभक्षी जंतुओं का मोदस्थल बना हुआ था, समस्त महर्षियों एवं स्वयं भगवान की उपस्थिति में, ध्वंस की पृष्ठभूमि में, शान्ति के उपदेश का, प्रजा के दुख को राजा कैसे शांत रखे, इस उपदेश का साक्षी हुआ, नाम पड़ा - शांतिपर्व। 
पहला श्लोक, दो अग्रणी वर्णों के धर्म क्या हैं, बताते हुये निस्सृत हुआ जो कृष्ण को सम्बोधित था। जैसे कभी अर्जुन ने युद्ध आरम्भ से पूर्व गुरु द्रोण के पाँव शर संधान कर आशीर्वाद लिया था, वैसे ही भीष्म ने पहला श्लोक गुरु कृष्ण को धर्म बताते हुये कहा : 
ब्राह्मणानां यथा धर्मो दानमध्ययनं तपः
क्षत्रियाणां तथा कृष्ण समरे देहपातनम्

श्लोक युधिष्ठिर हेतु अभयदान था कि पूछो वत्स, जो कुछ पूछना है। युधिष्ठिर पास गये तो उनका मस्तक सूँघ पास बैठा लिये - तात! मैं स्वस्थ हूँ, निर्भय हो कर प्रश्न करो - पृच्छ मां तात विस्रब्धं मा भैस्त्वं कुरुसत्तम। 
युधिष्ठिर ने पहला प्रश्न पूछा, धर्मज्ञ विद्वानों का कहना है कि राजाओं का धर्म परम धर्म है, मैं इसे बहुत बड़ा भार मानता हूँ। 
हे पार्थिव! मुझे राजधर्म का उपदेश करें : 
राज्यं वै परमो धर्म इति धर्मविदो विदुः
महान्तमेतं भारं च मन्ये तद्ब्रूहि पार्थिव

राजधर्म में धर्म, अर्थ एवं काम तीनों का समावेश है - त्रिवर्गो हि समासक्तो राजधर्मेषु। मोक्ष भी उसमें समाविष्ट है। अश्व एवं हाथी को नियंत्रित रखने हेतु जिस प्रकार वल्गा एवं अङ्कुश आवश्यक हैं, उसी प्रकार लोक मर्यादा हेतु राजधर्म आवश्यक है - नरेन्‍द्रधर्मो लोकस्य तथा प्रग्रहणं स्मृतम्। 
राजा प्रमादग्रस्त हो जाय तो समस्त व्यवस्था बिगड़ जाये, सभी व्याकुल हो जायँ। जिस प्रकार सूर्य अंधकार का नाश कर देते हैं, उसी प्रकार राजधर्म मनुष्य के अशुभ आचरणों का निवारण कर देता है ...
... कुरुवंश की दो पीढ़ियाँ एक दूसरे के समक्ष आहत समय पर औषधि लेप की चिंता में बैठी थीं। बताने वाला वह था जिसने सक्षम होते हुये भी राजसिंहासन का त्याग कर दिया था, जिसने मर्यादा की वल्गा तोड़ने की अपेक्षा अशुभ का पोषण रक्षण करना चुना था, जो शरशय्या पर मृत्यु की प्रतीक्षा में था। पूछने वाला भी वृद्ध हो चला था, जाने कितने नरसंहार की सञ्चित पीड़ा के बीच उसके मन में राजसिंहासन की अपेक्षाओं को ले कर शंकायें थीं, जिसका विश्वास डोल रहा था किंतु धर्मबुद्धि तब भी स्थिर थी। मृत्यु को भी वश में करने वाला आहत प्रपितामह धर्म उपदेश देने लगा। युधिष्ठिर जैसा सुपात्र एवं जिज्ञासु श्रोता उसे कभी मिला ही नहीं था। युद्ध पीछे रह गया, प्रशान्‍त ज्ञानसरि बह चली...
राज्ञा रञ्जनकाम्यया - राजा को प्रजा के रञ्जन की कामना से देवता एवं ब्राह्मणों के प्रति यथाविधि व्यवहार करना चाहिये। युधिष्ठिर ! तुम सदैव पुरुषार्थ हेतु प्रयत्नशील रहना। उसके बिना प्रारब्ध राजाओं का प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकता - न ह्युत्थानमृते दैवं राज्ञामर्थं प्रसादयेत्। मैं पुरुषार्थ को ही प्रधान मानता हूँ - पौरुषं हि परं मन्ये। आरम्भ किया हुआ कार्य पूरा न हो तब भी तुम उसका दु:ख न मान अपने पुरुषार्थ में लगे रहना - विपन्ने च समारम्भे संतापं मा स्म वै कृथा:
राजा के लिये सत्य ही परम धन है, ऋषियों हेतु भी - ऋषीणामपि राजेन्‍द्र सत्यमेव परं धनम्।
गुणवाञ्शीलवान्दान्तो मृदुर्धर्म्यो जितेन्द्रियः
सुदर्शः स्थूललक्ष्यश्च न भ्रश्येत सदा श्रियः
आर्जवं सर्वकार्येषु श्रयेथाः कुरुनन्दन
पुनर्नयविचारेण त्रयीसंवरणेन च
मृदुर्हि राजा सततं लङ्घ्यो भवति सर्वशः
तीक्ष्णाच्चोद्विजते लोकस्तस्मादुभयमाचर

गुणी, शीलवान, मन एवं इंद्रियों का संयमी, प्रसन्नमुख एवं दानी राजा की श्री भ्रष्ट नहीं होती। समस्त कार्यों में सरलता एवं कोमलता का अवलम्बन करे किंतु अपने दोष, अपनी मंत्रणा एवं अपने कार्यकौशल; इन तीन में संयम रखे, गोपनीयता रखे तथा सरलता का आश्रय न ले। जो राजा सदैव मृदु रहता है, उसकी आज्ञा का सभी उल्लङ्घन कर जाते हैं तथा जो सदैव तीक्ष्ण एवं कड़ा रहता है, उससे सभी उद्विग्न रहते हैं। राजा को आवश्यकतानुसार कठोरता एवं कोमलता, दोनों का अवलम्बन लेना चाहिये। 
ब्राह्मण पूजनीय है किंतु यदि वह विनाश को उद्यत हो या शस्त्र उठा कर आक्रमण करने आ रहा हो तो उसके वेदांत पारग होने पर भी उसे बंदी बना लेना चाहिये - उद्यम्य शस्त्रमायान्तमपि वेदान्तगं रणे । निगृह्णीयात्स्वधर्मेण धर्मापेक्षी नरेश्वरः ॥
दुर्गेषु च महाराज षट्सु ये शास्त्रनिश्चिताः
सर्वेषु तेषु मन्यन्ते नरदुर्गं सुदुस्तरम्
तस्मान्नित्यं दया कार्या चातुर्वर्ण्ये विपश्चिता
धर्मात्मा सत्यवाक्चैव राजा रञ्जयति प्रजाः

महाराज युधिष्ठिर ! 
रक्षा में समर्थ छ: प्रकार के दुर्ग बताये गये हैं - मरु (जलहीन भूमि क्षेत्र), जल, पृथ्वी, वन, पर्वत एवं मनुष्य । इन सबमें नरदुर्ग अर्थात मनुष्यों द्वारा प्रदत्त रक्षा ही प्रधान है। शास्त्रों को जानने वाले विद्वान समस्त दुर्गों में मानव दुर्ग को ही अत्यंत दुर्लङ्घ्य मानते हैं अर्थात किसी राज्य के यदि समस्त वर्गों के मनुष्य राजा से संतुष्ट हैं तो वे ही उसके सबसे सुदृढ़ दुर्ग हैं। 
अत: विद्वान राजा को चारो वर्णों पर सदा दया करनी चाहिये। धर्मात्मा एवं सत्यवादी राजा ही प्रजा को प्रसन्न रख पाता है। 

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(क्रमश:)