रविवार, 1 मार्च 2020

satyakam jabal क्या सत्यकाम की माता जबाला कुलटा, वेश्या या बहुगामिनी थीं?


सत्यकाम जाबाल की कथा की व्यथा यह है कि उसे जिसने जैसे चाहा विकृत किया। कुछ उदाहरण :

 (1) मृदु नारीवादियों द्वारा - माता जबाला वेश्या या बहुगामिनी होते हुये भी शिक्षा के प्रति कितनी समर्पित थी!  (2) उग्र स्त्रीवादियों द्वारा - स्त्री का शोषण होता था तथा उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं था।
(3) नवहिंदूवादियों द्वारा - कुलटा/वेश्या/शूद्रा होते हुये भी ऋषि ने उसके पुत्र को उसका नाम दे कर शिक्षा दी। कितना उदार था हमारा समाज!
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इनके अनेक क्रमचय सञ्जय भी उपलब्ध हैं। प्रतीत होता है कि या तो मूल को लोगों ने पढ़ा ही नहीं या उसे छिछले अनुवादों से समझा।

वास्तविकता क्या है? 

जबाला को मूल में न तो कुलटा कहा गया है, न वेश्या, न बहुगामिनी। पहले इन शब्दों के अर्थ समझें।
  • कुलटा बना है - कुल+टा अर्थात कुल की गर्भ मर्यादा से बाहर जा कर अगम्य गमन करने वाली।
  • गम शब्द का एक अर्थ सम्भोग से भी जुड़ता है। अगम्या अर्थात जिनसे मैथुन सम्बन्ध निषिद्ध हैं - माता, भगिनी, गुरुपत्नी, राजा की पत्नी, पुत्री, सगोत्री, सपिण्डा, पराई भार्या। यह स्त्रील्लिङ्ग हेतु भी लागू।
  • बहुगामिनी वह है जो बहुतों के साथ गमन अर्थात मैथुन में रत होती है।
  • वेश्या शब्द वेश से बना है - जो विविध वेश बना कर देह बेचती है।

सामवेदी उपनिषद छांदोग्य में उन्हें ऐसा कुछ नहीं कहा गया है। वह परिचारिणी हैं - अनेक घरों में परिचर्या करने वाली। परिचारिका शब्द तो आज भी प्रचलित है। क्या विमान परिचारिकाओं को वेश्या कहेंगे जो सभी यात्रियों की सेवा में रहती हैं? क्या अपनी कामवाली को वेश्या दुराचारिणी कहेंगे जो अनेक घरों में काम करती है? कोशों में भी कहीं भी परिचारिणी का अर्थ यह नहीं है कि वह स्वामी के साथ यौन सम्बंध में रत रहती हो और पुरातन वाङ्मय ऐसी बातें छिपाता नहीं, स्पष्ट लिख देता है। 
उपनिषद में न कोई शंका है और न ही आश्रम वासियों द्वारा कोई आशंका कि गौतम निकाल देंगे। गढ़ी हुई कथायें कभी कभी विचित्र संप्रेषण करने लगती हैं।
जबाला स्थविर आयु में है, रजोनिवृत्ति के समीप पुत्र प्राप्त हुआ, स्त्री को संतान यौवन में ही प्राप्त होती है। मैं तुम्हारा गोत्र नहीं जानती, तुम्हें यौवन में बहुतों की परिचर्या करते हुये तुम्हें पाया - इस वाक्य का अर्थ यह लगाया गया है कि वह मुक्त यौन सम्बंध रखने वाली थी। यह अर्थ आज के मानस को ठीक लगता है तथा इसके समर्थन में ऋषियों व राजन्यों की विविध अप्सराओं आदि के साथ यौन सम्बंधों की पुराण गाथायें सुना दी जाती हैं। नेपथ्य में कोई बहुत शास्त्रीय समर्पण की भावना नहीं काम कर रही होती, उन्मुक्त यौन सम्बंधों को प्रचलित करने तथा विवाह व परिवार संस्था को ध्वस्त करने में लगे लोगों की विकृतियाँ ही काम पर लगी होती हैं। विस्तार से वामपंथियों व उग्र नारीवादियों का ऐसे विषयों पर लेखन देखेंगे तो समझ में आयेगा कि प्रकटत: जो बहुत लुभावना व उदात्त दिख रहा है, वह वास्तविकता में क्या है!

तो एक दूसरी सम्भावना क्या हो सकती है?  

यह घटना तब की है जब विवाह व परिवार संस्थायें स्थापित हो चुकी थीं। स्त्री व पुरुषों में विवाहविच्छेद पुराने के अवशेष के रूप में सामान्य रहे हो सकते हैं। आज भी गाँवों में कुछ शूद्र व अंत्यज वर्गों में विवाहविच्छेद जातिपञ्चायत की देखरेख में  सरल है। किसी अन्य से नेह लग गया तो उसे छोड़ अन्य को अपना लेना बहुत जटिल नहीं है। किंतु यह मान लेना कि एक स्त्री को अपनी संतान के पिता का अभिज्ञान ही नहीं रहेगा, उसका परिचय ही नहीं ज्ञात रहेगा, बहुत दूर की कौड़ी है। स्त्री सब जानती है तथा संतान का सच उसकी स्मृति में मरणसेज तक रहता है। 
 'यौवने त्वामलभे' स्त्री यौवन में ही संतान को जन्म देती है, बूढ़ी होने पर नहीं। यौवने कहने का तात्पर्य यही है कि जबाला अपनी वर्तमान आयु को आरेखित कर रही हैं कि बहुत दिन हो गये तुम्हारे जन्म को, गोत्र की विस्मृति है। साथ ही यह भी कि पुत्र, तुम्हारी आयु भी उपनयन की दृष्टि से अधिक हो गयी है। देखना यह है कि यह इतनी विकसित अवस्था का समाज है जिसमें परिचारिणी का पुत्र भी जानता है कि विद्याध्ययन हेतु उसे गुरु के पास जाना होगा तथा वहाँ की आवश्यकतायें क्या क्या हैं?
उस समाज में ऐसी परिचारिणी भी है जो शिक्षा के महत्त्व को समझते हुये, सीमाओं को जानते हुये भी आश्वस्त है कि माता का नाम भी प्रयोग में लाया जा सकता है क्योंकि जाने कितने ऋषि हैं जो माताओं के नाम से जाने गये हैं, यथा ममता के पुत्र दीर्घतमा मामतेय, इतरा के पुत्र ऐतरेय आदि। उल्लेखनीय है कि माता के नाम पर पुत्र को जानने की भारतीय परम्परा बहुत पुराने समय से रही और जारी रही।
उस समाज में गौतम जैसा गुरु भी है जो इस मर्यादा का आदर करता है तथा स्थूल नियम बंधनों से ऊपर उठ कर सोचता है।
अब आते हैं गोत्र पर।
वह सेविका है, सेवा करने वाली शूद्रा है- परिचारिणी। गोत्र की अवधारणा कुल से पहले स्थान विशेष की मानव बस्ती की रही। यह घटना बहुत बहुत पुरानी है जब गोत्र की आज की रूढ़ अवधारणा आकार ले रही थी। गोत्र परिवर्तन के जाने कितने उदाहरण उपलब्ध हैं। ऋग्वेद में वह है न, जिसमें एक ही कुल में अनेक व्यवसायों वाली बात है।
ना॒ना॒नं वा उ॑ नो॒ धियो॒ वि व्र॒तानि॒ जना॑नाम् । तक्षा॑ रि॒ष्टं रु॒तं भि॒षग्ब्र॒ह्मा सु॒न्वन्त॑मिच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
जर॑तीभि॒रोष॑धीभिः प॒र्णेभि॑: शकु॒नाना॑म् । का॒र्मा॒रो अश्म॑भि॒र्द्युभि॒र्हिर॑ण्यवन्तमिच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
का॒रुर॒हं त॒तो भि॒षगु॑पलप्र॒क्षिणी॑ न॒ना । नाना॑धियो वसू॒यवोऽनु॒ गा इ॑व तस्थि॒मेन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
अश्वो॒ वोळ्हा॑ सु॒खं रथं॑ हस॒नामु॑पम॒न्त्रिण॑: । शेपो॒ रोम॑ण्वन्तौ भे॒दौ वारिन्म॒ण्डूक॑ इच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
जबाला घर परिवर्तन कर काम करने वाली कामवाली थी - बह्वं चरन्ति परिचारिणी। अनेक ग्रामों में, अनेक कुलों में सेवा करने वाली। शूद्रा का आज के अर्थ में गोत्र नहीं, किन्तु उस समय यदि एक ही गाँव की सेवा में रहती तो उसे गोत्र बता सकती थी। वैसा था नहीं और स्मृति साथ नहीं दे रही कि उस समय कहाँ काम कर रही थी, जब पुत्र गर्भ में आया। दुविधा से मुक्त व स्पष्ट हो अपने नाम को ही गोत्र बताने को कहती है - नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि... जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति।  गौतम इस सत्य पर मुग्ध होते हैं - सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा ! कि ऐसा कह कर अपना शूद्र वर्ण और गोत्र अनिश्चितता दोनों सच सच कह दिया। वे कहते हैं कि ऐसा ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य नहीं कर सकता- नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति.. समिधा लाओ, तुम्हारा उपनयन करना है - इति तमुपनीय।