रविवार, 19 अगस्त 2018

कोणार्क महागायत्री देउल के कोणादित्य विरञ्चि नारायण, Konark Sun Temple : A Brief Timeline

1248 ई.। रज़िया की मृत्यु हो चुकी है, उसके पूर्व वह कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा ध्वस्त मूल काशी विश्वनाथ मंदिर पर मस्जिद बनवाना नहीं भूली। 
सुल्ताना की मृत्यु से मुक्त हुये बंगाल के सूबेदार तुगन खान ने उड़िया राजा नरसिंहदेव के पास संदेश भेजवाया कि जगन्नाथ मंदिर समर्पित कर दो जिससे कि वहाँ मस्जिद बनवाई जा सके तथा सम्पूर्ण पुरी क्षेत्र इस्लाम कुबूल करे। नीति का आश्रय ले राजा ने मुसलमानों की सेना को ऐसा काटा कि आगे 300 वर्षों तक मुसलमान उड़ीसा पर दृष्टि डालने का साहस नहीं कर सके। राजा की प्रेरणा राजमाता थीं।
इस विजय की स्मृति में पहले से ही उपस्‍थित कोणादित्य के मंदिर को विस्तार दे राजा ने महागायत्री देउल की स्थापना की योजना बनाई। 
13 जनवरी 1258 ई. को रविवार के दिन कोणार्क के महालय में आदित्य की प्राण प्रतिष्ठा हुई। 
नरसिंहदेव के वंशज नरसिंहदेव चतुर्थ के 1384 ई. लिखित ताम्रपत्र में महालय में अर्चना का उल्लेख है अर्थात मंदिर पूरा हुआ था एवं उसमें अर्चना पूजन को सवा सौ वर्ष से भी अधिक हो चुके थे। 

अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने मंदिर की यात्रा सोलहवीं शताब्दी में की थी, पूजन अर्चन तब भी चल रहा था। उसने आइन-ए-अकबरी में यह लिखा है। 



1568 ई.। 
पराजय के 310 वर्षों पश्चात इस्लाम का पुन: आक्रमण पुरी पर हुआ। दीनी नायक था मतांतरित हिन्दू, विशाल, कृष्णकाय जिसे 'काला पहाड़' नाम दिया गया। इस बार इस्लाम विजयी हुआ। 
पुरी के मंदिर ने ध्वंस देखा। दारु विग्रह जला दिये गये। पुरी के मार्ग पर मुख्य विग्रह के जल कर बचे हुये अंश पर थूकते एवं उसे पाँवों से ठोकर मार कंदुक की भाँति खेलते अट्टहास करते 'काला पहाड़' की स्मृति उड़िया मानस में सदा सदा हेतु अङ्कित हो गयी। 
उसका अगला लक्ष्य था महागायत्री देउल कोणार्क महालय। 
यहाँ उसे अधिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा परंतु वह मुख्य शिखर के (key stone) दधि नौति को शिथिल करने में सफल रहा। शिखर के ध्वस्त होने का कारण उसने सुनिश्चित कर दिया। 

1847 में जब जेम्स फरगुसन बालू से अंशत: ढँके उस परित्यक्त मंदिर तक पहुँचा तो शिखर का एक अंश गिरने से बचा हुआ था। उसने उसका प्रस्तर आधार चित्र (lithograph) बनाया। 

आगे के वर्षों में बचा हुआ शिखर भी तड़ित पात से ध्वस्त हो गया। 
मन्दिर कब परित्यक्त हुआ था? इस प्रश्न का उत्तर मिला 1929 ई. में जब अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जीवविज्ञानी पी. पर्या ने मंदिर से प्राप्त एक ऐसे पत्थर के टुकड़े का परीक्षण किया जो कि ऊपर अगम्य स्थान से प्राप्त हुआ था। उस पर काई, शैवाल इत्यादि के अनेक तल बैठ गये थे, कुल 357 अर्थात कुल 357 वर्षा ऋतुयें।
1929 में से उसे घटा कर यह निश्चित किया गया कि 1573 ई. से मंदिर की कोई देखभाल नहीं हुई थी। 
उल्लेखनीय है कि मंदिर के शिखर एवं उसकी प्रतिमाओं पर चूने का पलस्तर किया गया था जिन्हें प्रति वर्ष विविध रंगों से रँगा जाता था। जगन्नाथ मंदिर में आज भी प्रचलन है। रंगों के अवशेष आज भी कोणार्क के जगमोहन मण्डप की प्रतिमाओं पर दृष्टिगोचर हैं। 
अबुल फजल वहाँ 1594 ई. में गया था। 1568, 1573 एवं 1594 ई. ये तीन स्वतंत्र बिंदु हैं जो कि एक दूसरे के निकट हैं एवं जिनसे स्पष्टत: घटित का भान हो जाता है। 
काला पहाड़ के आक्रमण के पश्चात ही मंदिर उपेक्षित होना आरम्भ हो गया था। देउल का दूषित होना, तत्कालीन राजवंश की उसके प्रति श्रद्धा न होने से संरक्षण का अभाव, जगन्नाथ की बढ़ती कीर्ति, सूर्य पूजा का घटता चलन - इन सबके एकत्र हो जाने से मन्‍दिर का रखरखाव बाधित हो गया। जर्जर मंदिर क्रमश: परित्यक्त होता गया, कुछ वैसे ही जैसे आराधकों की न्यूनता से खजुराहो के मंदिर हो गये। 
विरञ्चि नारायण की गर्भगृह प्रतिमा के लिये भाँति भाँति की बातें सुनने को मिलती हैं, कुछ के अनुसार उसे काला पहाड़ ने तोड़ दिया था, कुछ के अनुसार उसे वहाँ से ला कर जगन्नाथ मंदिर में स्थापित किया गया एवं कुछ के अनुसार देवता अभी भी कोणार्क तट की बालुका में कहीं विलीन हैं। 
कालान्तर में मंदिर के आगे का अद्भुत अरुण स्तम्भ हटा कर जगन्नाथ मंदिर के समक्ष स्थापित कर दिया गया जो आज भी पूजित है। जगन्नाथ मंदिर की सज्जा में वहाँ से लाई गई अन्य प्रतिमायें भी प्रयुक्त हुईं। 
... 
इतिहास इतना ही है।

शनिवार, 18 अगस्त 2018

बोध कथा एक , पुरानी परिचित : ... यही दृष्टि है


'तुम स्त्री को नहीं देखोगे।'
'यदि वह देखे तो?'
'तो भी नहीं।'
'स्त्री से बोलना मत!'
'यदि वह कुछ पूछे या कहे तो?'
'तो भी नहीं।'
'स्त्री को सुनना मत!'
'वह स्वयं पुकारे तो?'
'तो भी नहीं।'
'स्त्री का स्पर्श नहीं करोगे।'
'यदि वह स्वयं स्पर्श करे तो?'
'तो भी नहीं।'
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सन्न्यस्त आचार्य अपने शिष्य को प्रात:काल का उपदेश दे रहे थे। शिष्य हर बात को मन में अश्म रेख की भाँति बैठाता जा रहा था। सूरज आधा बाँस चढ़ आया तो आचार्य ने कहा - अब हमें प्रस्थान करना चाहिये। नाविक चला जायेगा तो पार होना दुष्कर हो जायेगा। 
दोनों नदी तट पहुँचे, न कोई नाव थी, न कोई नाविक। नदी का प्रवाह मन्थर था, तैर कर पार किया जा सकता था। प्रतीक्षा लम्बी होने लगी तो दोनों ने तैर कर पार करना उचित समझा। 
उसी समय एक युवती वहाँ विह्वल स्थिति में पीछे से आई तथा दोनों से हाथ जोड़ पार कराने की प्रार्थना करने लगी। शिष्य ने तो आँखें नीचे ही झुका रखी थीं, मन ही मन प्रतीक्षा करने लगा कि देखें, अब गुरु क्या करते हैं, उपदेश तो बहुत दिये थे ! कनखियों से देख भी चुका था कि युवती सुन्दर थी। 
गुरु ने उससे कहा - वत्स ! दुखिया है, उसे पार कराओ। शिष्य ने समझा कि परीक्षा ले रहे हैं। उसने उत्तर दिया - क्षमा आचार्य, यह आप की शिक्षाओं के विपरीत होगा। हमें इस माया को यहीं छोड़ चल देना चाहिये। 
गुरु ने युवती से कहा - स्थविर आयु है किन्‍तु तुम्हें पार करा सकता हूँ। मेरी पीठ पर सवार हो अपने को इस ओढ़नी से दृढ़ता से मुझसे बाँध लो। हम तैर कर पार कर लेंगे। 
शिष्य इस प्रस्ताव से आश्चर्य में पड़ गया किन्‍तु मौन ही रहा। आचार्य ने युवती को पीठ पर चढ़ाया एवं तैर कर उस पार उतार दिया। धन्यवाद देती वह अपने मार्ग गई। उन दोनों ने भी पन्‍थशाला का मार्ग पकड़ा। 
... 
शिष्य दु;खी था, बहुत दु:खी। आचार्य भ्रष्ट हो चुके थे। शिक्षा के मध्य में ही इनका त्याग करना होगा, यह सोचते हुये वह उद्विग्न मन से साथ बना रहा। पहुँचते पहुँचते संध्या हो गई। संध्या वन्दन एवं अल्पाहार के पश्चात आचार्य विश्राम की मुद्रा में लेट गये। शिष्य भी पार्श्व में पड़ रहा। 
कुछ ही समय में आचार्य गहरी नींद में खो गये किन्‍तु शिष्य करवटें लेता रहा। आधी रात तक जब नींद नहीं आई तो उसने सोचा कि अब क्या सम्मान करना? जगा ही देते हैं। 
आचार्य को उसने पुकार कर जगाया एवं रुष्ट स्वर में बोला,"मैं आप का त्याग कर रहा हूँ, आप भ्रष्ट हो गये हैं।" 
आचार्य ने साश्चर्य पूछा,"वत्स ! मैं भ्रष्ट ? कैसे ?"
शिष्य ने उत्तर दिया,"आप ने एक सुंदरी युवती को पीठ पर आरूढ़ करा नदी पार कराया। उसके अङ्ग लम्बे समय तक आप से लगे रहे ! अपनी शिक्षा का भी सम्मान नहीं करते, ढोंगी हैं आप! छि: !!"
गुरु अट्टहास कर उठे,"वत्स ! मैं तो पार कराते ही उससे मुक्त हो गया था। वह दुखिया भी मुझसे उसी समय मुक्त हो गई। तुमने तो उसकी कोई सहायता भी नहीं की थी ! किन्‍तु अब तक ढोये जा रहे हो? वह तुम्हारे मन मस्तिष्क पर सवार है। सच कहो, देखा था न उसे?"
शिष्य ने रूँधे गले से कहा - हाँ एवं फूट फूट कर रोने लगा। 
आचार्य उसका सिर अपनी गोद में ले सान्त्वना देने लगे - गुरु का कहा मानना चाहिये वत्स ! न मानने से शिष्य नरकगामी होता है। 
तुमने आज दारुण नरक भोगा है। अब मुक्त हो। शान्‍त हो सो जाओ। प्रात:काल बातें करेंगे। 
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'तुम स्त्री को नहीं देखोगे।' 
'कदापि नहीं आचार्य! मैं उसे देख कर भी नहीं देखूँगा।' 
'यदि वह देखे तो?' 
'मैं नहीं देखूँगा तो वह कैसे देख सकेगी?' 
'हाँ वत्स ! यही दृष्टि है।'
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हिन्‍दू विवाह, सप्तपदी, पारस्कर गृह्य सूत्र


हिन्‍दू विवाह सप्तपदी, पारस्कर गृह्य सूत्र 
1.8.1


प्रथम पग इषे - अन्न हेतु, 
दूसरा पग ऊर्जे - बल हेतु, 
तीसरा पग रायस्पोषाय - धन हेतु, पोषण, पुष्टि हेतु, 
चौथा पग मायोभवाय - सुख सन्‍तुष्टि हेतु, 
पाँचवा पग पशुभ्य: - पशु सम्पदा हेतु, 
छठा पग ऋतुभ्य: - ऋतुओं हेतु, 
सातवें के साथ स+खा, सखा हो मुझसे जुड़ जाओ,
मेरी अनुव्रता हो, सात लोकों में। लोक तो गिना दिये ऊपर, अन्तिम तो तुम्हारा सख्य है। 
सात जन्मों की बात सम्भवत: यहाँ से आई होगी। 
...
पारस्कार विवाह संस्कार विधान दिन का है। सूर्यास्त पश्चात वर वधू को ध्रुवतारा दिखाता है - 
अस्तमिते ध्रुवं दर्शयति। ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवैधिपोष्ये मयि मह्यं त्वादादबृहस्पतिर्मया पत्या प्रजावती सञ्जीव शरद: शतमिति। 
तुम ध्रुव हो, मैं तुम्हें ध्रुव देखता हूँ, तुम मेरे साथ ध्रुव अर्थात दृढ़ हो हे पोषणीया! तुम्हें बृहस्पति ने मुझे दिया है, मुझ पति से सन्तानोत्पत्ति करती हुई तुम मेरे साथ सौ शरद ऋतुओं तक रहो।
... 
विवाह पश्चात तीन रातों तक वे लवणहीन भोजन करेंगे, भूशायी रहेंगे तथा एक संवत्सर तक शारीरिक सम्बन्‍ध नहीं बनायेंगे। एक संवत्सर तक सम्भव न हो तो बारह रातों तक, वह भी न हो सके तो छ: रातों तक, वह भी न हो सके तो न्यूनतम तीन रातों तक संयम रखें। 
इस निषेध के पीछे कितना बड़ा मनोवैज्ञानिक तथ्य छिपा है, समझा जा सकता है।
... 
गाँवों में (नगरों में तो अब सब दुर्बी दुलाम दुलक्षणं है) इस निषेध को महिलाओं ने कुछ दिनों से जोड़ दिया है कि इन दिनों में कङ्गन नहीं खुलना! तीन से छ: दिनों तक का निषेध सामान्य है। मेरे विवाह पश्चात अनुपालन किया गया था। 
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हिन्‍दू विवाह इतनी सुन्‍दर पद्धति सम्भवत: अन्य कोई नहीं होगी।

रविवार, 5 अगस्त 2018

ग्राम गिरा - मुसलमान नहीं, तुरकट


1146 वि.। परमार भोज एवं कलचुरी कर्ण के अवसान के पश्चात तुरुष्क अर्थात तुर्क आक्रमणों से पीड़ित उत्तर भारत के कन्नौज में राष्ट्रकूट राठौर चंद्रदेव गहड़वाल का अभिषेक हुआ। सूर्य एवं चंद्र वंशी राजाओं का नाश हो चुका था, वेद लुप्त हो रहे थे। ऐसे में धरा के इस उद्धारक ने सब कुछ व्यवस्थित किया एवं परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर परम महेश्वर चन्द्रादित्य नाम धारण किया।  
प्रध्वस्तेसोमसूर्योद्भवविदितमहाक्षत्रवंशद्वयेस्मिनुत्सन्नप्रायवेदध्वनिजगदखिलंमन्यमान: स्वयम्भू:।
इस वंश की दूसरी राजधानी वाराणसी हुई।
सौ वर्षों से भी अधिक समय पश्चात 1251 वि. में मुहम्मद गोरी के गुलाम नायक कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा शक्तिशाली राठौर राजा जयचंद पराजित किया गया एवं उत्तर भारतीय इतिहास का एक बहुत ही उपेक्षित किंतु बहुत ही महत्वपूर्ण अध्याय आरम्भ हुआ। 
व्यापार, उद्योग, कला, संस्कृति एवं धर्म की नगरी वाराणसी पर तुर्कों ने आक्रमण किया। 'तज-उल-मासिर' में हसन निज़ामी लिखता है कि 'दीन' के दुश्मन की सेना हरा दी गयी थी। काशी विश्वेश्वर मंदिर के साथ ही कुल 1000 मंदिर तोड़े गये जिनके स्थान पर मस्जिदें एवं कब्रें तामीर की गयीं। 
अभूतपूर्व लूट एवं अत्याचार का सामना करती जनता ने आक्रांता इस्लाम का अभिज्ञान एक नाम से किया - तुर्क। स्वतंत्रता पश्चात तक कांग्रेसी इतिहास से अपरिचित पूर्वी उत्तरप्रदेश की भोजपुरी जनता मुसलमानों को एक ही नाम से जानती थी - तुरकट, तुरुष्क का लोक रूप। 
पहली स्मृति स्थायी हुयी, यद्यपि काशी औरंगजेब तक बारम्बार लूटी गयी, पुन: पुन: उठ खड़ी हुई। इस जीवनी शक्ति के पीछे था - निरंतर प्रतिरोध, जिसे झुठलाते हुये इतिहास में ऐसे पढ़ाया जाता है मानों मुसलमानों को थाली में परोस कर भारत दे दिया गया ! प्राचीन, मध्य एवं आधुनिक काल के रूप में सोचने के अभ्यस्त सदियों लम्बे प्रतिरोध, संघर्ष, शांति, उद्योग एवं पुन: पुन: निर्माण एवं समृद्धि को भुला देते हैं। 
औरंगजेब तक के पाँच सौ वर्ष लम्बे इस काल में मुसलमानी आक्रमणों की बारम्बारता एवं उसके सजग, सर्वजन, सफल प्रतिरोध ने इस देश में आंतरिक प्रवजन को जन्म दिया। राजपूतों के साथ सपुरोहित प्रवजन करती जातियों ने जाने कितने गाँव बसाये, जाने कितने गाँव उजाड़ भी दिये किंतु भारत को जीवित रखा। सभी जातियाँ लड़ीं - लघु सीमांतों (सिवानों) पर, बड़े युद्धों में, गाँवों के समूहों में। 'सात जातियों' वाले मानक गाँव को मानों इस काल ने पुनर्जीवित कर दिया। 
लघु स्तर पर इसके वैविध्य को 1857 ई. के पश्चात अंग्रेजों के अत्याचार के कारण घटित प्रवजन से समझा जा सकता है। 
पूर्वी उत्तरप्रदेश एवं पश्चिमी बिहार के विशाल भू भाग में बिखरे जाने कितने गाँवों में विविध जाति वंशों का वैविध्य प्रमाण है। दो किलोमीटर की ही परास में पाँच छ: वंशों का मिलना कोई आश्चर्य नहीं, न ही लघु गाँवों की विशिष्ट वास्तुयोजना जो कि कौटल्य द्वारा निर्धारित रूप से साम्य रखती है। 
यदि एक पीढ़ी 40 वर्ष की मानी जाय तो आज तक के लगभग 800 वर्षों में बीस पीढ़ियाँ होती हैं। दस पीढ़ियों वाले गाँव चार सौ वर्ष पुराने होंगे। 
यदि आप ऐसे किसी गाँव में रहते हैं, जाति चाहे जो हो, जहाँ पिछली दस बीस पीढ़ियों का लेखा जोखा किसी भी कथा एवं समय चिह्न के साथ अब भी उपलब्ध है तो आप भारत की उन भुला दी गयी सदियों के पुनर्निर्माण में सहयोग कर सकते हैं। गाँव, तहसील, जिला, उपजाति, पीढ़ी संख्या, विक्रमी संवत के पुराने संदर्भ एवं जनश्रुतियों के साथ इन सूचनाओं को एकत्र कर इस क्षेत्र का सत्य लोक इतिहास रचा जा सकता है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे। 
कभी अमृतलाल नागर ने 'गदर' किये पुरखों के 'फूल' चुन सहेज दिये थे। क्या कोई इस जटिल एवं बृहद काम को हाथ में लेगा? 
नगरों का इतिहास बहुत हो चुका, गाँवों के इतिहास को पढ़ना होगा।

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

जाति एवं जातिवाद से आगे क्या

पिछले भाग से आगे ... 


कभी कभी एक वाक्य ही आप को बहुत गहराई तक सोचने पर विवश कर देता है, आप की धारणाओं को तोड़ देता है। सम्भवत: यह घटना पहले भी लिख चुका हूँ, लोहार एवं ब्राह्मण परिवारों में कलह हुआ , बात बढ़ी नहीं क्यों कि समझदारी दोनों पक्षों में थी। उस समय अशिक्षित लोहार गृहणी ने एक बात कही - वे लोग ब्राह्मण हैं, बारह गुण वाले, हम लोग विश्वकर्मा हैं, बीस गुण वाले, क्षत्रिय छत्तीस। जाने क्यों यह हास्यास्पद वाक्य मन में कहीं स्थिर सा हो गया, साथ ही यह भी कि तब तो शूद्र शत अर्थात सौ गुणों वाले होंगे जो कि वैविध्य देखते ठीक ही लगता है। उसी समय सम्भवत: अज्ञेय की 'शेखर एक जीवनी' में एक प्रसंग मिला जिसमें खा पी कर सो जाने पर एक घर की महिला अपने बालक को रटवाती थी - हम लोग _________ हैं। समझे? लेखक के संकेत से उसका अंत्यज होना समझ में आता है।    
जैसे एक गुहा खुली हो, मुझे वे वाक्य गर्वबोध लगे। सहस्राब्दियों में पसरे वैविध्य भरे भारतीय इतिहास का एक बहुत बड़ा सच खुलता चला गया - अपनी जाति पर गर्व, जाति खोने का भय एवं जाति कर्म बनाये रखने का उद्योग - भारत की दीर्घजीविता के महत्वपूर्ण कारणों में से हैं। जिस जाति व्यवस्था पर ब्रिटिश काल से ही सुधारकों ने अकूत पानी डाला, एवं आज भी डाले जा रहे हैं, वह जाती क्यों नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत बचा ही इस वैविध्य के कारण? 
गर्वबोध उत्कृष्टता का था। लोहार अपने काम में पीढ़ियों से अर्जित दक्षता रखता था, वयनजीवी भी, प्राय: प्रत्येक जाति के साथ क्रमश: उत्कृष्ट होते जाने का सच साथ था। ब्रिटिश आगमन से पूर्व तक सदियों के आक्रमण एवं लूट अनाचार को झेलता भारत आर्थिक रूप से समृद्ध बना रहा, सामाजिक शक्ति बनी रही। संस्कृति भी सम्पदावान होती रही तो क्यों भला? कारण जाति व्यवस्था में अंतर्निहित उत्कृष्टता थी। प्रत्येक जाति अपना योगदान कर रही थी तो क्यों भला? प्रशासन तंत्र स्वस्थ था। आक्रांता मुसलमानों ने भी इस व्यवस्था से बहुत अधिक छेड़ छाड़ की हो, नहीं लगता। उनके माथे कलंक है कि कुछ प्रतिरोधी जातियों को वञ्चित कर घृणित जीवन जीने पर विवश किया किन्‍तु सुचिंतित ढंग से हर क्षेत्र में आक्रमण घुसपैठ कर विकृतिकरण के साथ साथ पीढ़ियों से अर्जित कौशल का समूल नाश करने का काम अंग्रेजों ने किया। उन्हों ने शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन कर भारतीय जन को आत्महीनता एवं आत्मघृणा से पूरित मानसिक दास बनाया जो कि आज तक चला आ रहा है। 
उनके आने से पहले की एक सहस्राब्दी भारतीय प्रतिरोध, जिजीविषा एवं शक्ति की ज्वलंत उदाहरण है जिसे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने पूर्णत: उलट चित्रित किया है। शक, हूण, इस्लामी आक्रमणों के साथ सभ्यतायें समूल नष्ट हो गयीं किंतु भारत बना रहा तो अपने प्रबल प्रतिरोधी भाव के कारण। 
यदि आप मानते हैं कि भारतीय सेनाओं में मात्र राजपूत ही थे तो भयानक भूल कर रहे हैं। वनवासियों से ले कर ब्राह्मणों तक, भारत की प्रत्येक जाति अपनी भूमि, अपनी संस्कृति एवं अपनी संतति की सुरक्षा हेतु लड़ी तब हम आज  जीवित बचे हुये हैं। जिससे जो हो सका, शत प्रतिशत से भी अधिक किया, तब हम आज बचे हुये हैं। 
हीनता बोध के पुरोधा इतिहासकार उदाहरण देते हैं कि युद्ध हो रहा था, जनता देख रही थी या धन ले कर किसी भी पक्ष में भारतीय लोग लड़ जाते थे, उनमें राष्ट्रीय भावना नहीं था आदि आदि। 
युद्ध प्रशिक्षित सेनायें लड़ती हैं, उनमें सामान्य जनता का क्या काम? क्या यह सच नहीं कि प्रत्येक जाति के सैनिक लड़े? वे क्या भावप्रवण नहीं थे? साधारणीकरण बुद्धिजीवी के पास उपलब्ध सबसे घातक अस्त्र होता है, जिसके अनुप्रयोग में कम्युनिस्ट इतिहासकार निष्णात हैं। 
धन ले कर कुछ भी करने वाले तो सदा से रहे हैं, आज भी हैं। इस कारण से यदि आधुनिक काल बुरा नहीं तो मध्य काल कैसे हो गया बंधु! शत प्रतिशत आदर्श की बात कर हीनता बोध से भरता चरम श्रेणी की धूर्तता है, अन्य कुछ नहीं। मूल भाव देखना होता है कि क्या था? भारत आदर्शों की दृष्टि से उस समय भी आदर्श था एवं सम्पूर्ण सभ्य विश्व में उसकी कीर्ति बनी हुयी थी। 
विविध जातियों के रहने का लाभ यह था कि किसी एक के नाश या पराभव से सब कुछ का नाश नहीं होने वाला था। भारत पुन: पुन: उठ खड़ा होता था तो इसके पीछे सञ्जीवनी जाति व्यवस्था ही थी जिसने धूर्त अंग्रेजों को मौलिक विकृतियों की स्थापना हेतु विवश किया कि वाणिज्यिक एवं आर्थिक दोहन के साथ भारत पर शासन तब ही सम्भव है, जब जाति केंद्रित उत्कृष्टता को नष्ट भ्रष्ट कर निर्वात को अपने अनुकूल तत्वों से भर दिया जाय। बहुत ही सधे हुये ढंग से उन सबने यह सुनिश्चित किया। 
आज भारत उनके बनाये विधान द्वारा शासित है। अंग्रेज का अर्थ अंग्रेज एवं उनके मानस पोषितों से लें। यह विधान समानता वादी है, सिद्धांतत:, दिखाने को सब को समान अवसर उपलब्ध हैं किंतु वास्तविकता यह है कि जाति एवं पंथ आधारित विशेष प्रावधान इतने सुगढ़ हैं कि सामान्य जन देख देख सीझते रहते हैं। लोकतंत्र के नाम पर भींड़तंत्र में धनबल एवं जनबल की चलती है। पुरानी उत्कृष्टता रही नहीं, कुशीलव, शिल्पी एवं उत्पादक समाज ने हीनता बोध से ग्रसित हो कोड़ियों व्यवसाय अब्राहमी पंथों के हाथ दे दिये, ले दे कर या तो श्रम बेंचना बचा या बढ़ती जनसंख्या के बोझ से आक्रांत भूमि का एक टुकड़ा जिसका सस्य उत्पादन न तो पर्याप्त है, न मूल्यवान। यह दशा द्विज कहलाने वाले अधिकतर त्रिवर्ण की भी है। ऐसे में समाज विकासशील भले दिखे, विकसित नहीं हो सकता। 
हताशा की स्थिति में बीते कुछ बीसेक वर्षों में जाति आधारित जातिवादी सङ्गठनों की बाढ़ सी आ गयी है - जन बल होने का भ्रामक बोध इसका कारण है। कहते हैं कि श्रेष्ठताबोध एवं हीनताबोध एक ही निष्क के दो पक्ष होते हैं। इसका जातिवादी संगठनों से उपयुक्त उदाहरण हो ही नहीं सकता। ऐसा तब है जब विधान को सत्तर वर्ष भी नहीं हुये ! 
इससे आप अपने पुरखों की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं जब आक्रांता उनके राजा बन बैठते थे, समाज का संतुलन डाँवाडोल हो जाता था एवं आदर्श विपथगामी। भारत की, उनकी शक्ति एवं बुद्धिमत्ता इसमें थी कि परिवर्तित होती सदियों में परिवर्तित होते हुये उन्हों ने स्वयं को जीवित तो रखा ही, समृद्ध भी बनाये रखा। आप में वह शक्ति नहीं रही जिसके कारण आप जातिवादी संगठनों को उन्मुख होते हैं, वे संगठन जिन पर अधिकांशत: धन बल वालों का प्रभुत्व है, जो आप का उपयोग अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु करते हैं।  
प्राचीन ग्रंथों के सावधान अवगाहन से बहुत से सत्य झाँकते दिख जाते हैं, सबसे बड़ा सत्य यह है कि वेदों के अतिरिक्त समस्त ग्रंथों में सामयिक परिवर्तन परिवर्द्धन होते रहे। समाज की शक्ति उसकी नम्यता, आघातवर्द्धनीयता एवं नित्यता थी। वे जन मृषा का प्रसार करते हैं जिनके अनुसार किसी व्यास, किसी पराशर या किसी मनु के द्वारा जो शास्त्र रचे गये वे तब से यथावत हैं, उनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। ऐसे जन समाजद्रोही कहे जाने चाहिये क्यों कि वे आप को शक्ति से वञ्चित कर रहे होते हैं। शक्तिवञ्चना आक्रमण का ही दूसरा पक्ष है, लक्ष्य वही निर्बल निरीह बनाये रखना या बना देना। 
इन शास्त्रों में बहुत सी ऐसी बातें मिलती हैं जो समसामयिक निकष पर घृणित ठहरती हैं। वे पूर्णत: घृणित मन्तव्य से रची गईं, ऐसा नहीं है। ऊपर सत्तर वर्षों में ही जो स्थिति हुई है, लिख चुका हूँ। ऐसी ही जाने कितनी स्थितियों का सामना शताब्दियों में पसरे भारतीय जन ने किया एवं अपने विधान, अपने शास्त्र आवश्यकतानुसार परिवर्तित परिवर्द्धित किये। यह उनकी शक्ति थी। जो विधान अप्रासङ्गिक हो गये थे, उनके त्याग के उल्लेख शास्त्रों में भी मिलते हैं अत: आज अप्रासंगिक हो गये विधानों को लेकर रोना एवं आक्रोश मूर्खता एवं हीनताबोध के अतिरिक्त कुछ नहीं। नया विधान है, उसमें कैसे आप समृद्ध, निरामय एवं प्रगतिगामी होते हुये स्वयं को, परिवार को, समाज को, राष्ट्र को आगे ले जा सकते हैं, यह विचार का विषय है, बीते हुये पर वक्षताड़न करना नहीं।    
जाति पर ही शास्त्रों में एक महत्वपूर्ण पक्ष मिलेगा - शूद्र स्वयं को शूद्र कहने में लज्जा का अनुभव नहीं करते थे। क्यों ? क्यों कि उनके पास उत्कृष्टता का बल था, कौशल था, आत्मविश्वास एवं आत्मगौरव का पीढ़ियों से सञ्चित भाव था; समृद्धि तो थी ही। आप को शूद्र राजाओं के भी उल्लेख मिलेंगे। ऐसे समझें कि उत्पादक एवं शिल्पी समाज के दरिद्र रहते हुये कोई भी देश 'सोने की चिड़िया' नहीं हो सकता। यदि ये फलते फूलते नहीं रहेंगे तो धन आयेगा कहाँ से? 
बिना इस मीमांसा में पड़े हुये कि ऐसे अंश कब आये होंगे, यदि हम आगे दिये कतिपय उदाहरणों पर ध्यान दें कि ऐसा कभी सुदूर भूत में हुआ था तो सुंदर सचाइयाँ उद्घाटित होती हैं। 
भारत काल में मंत्री विदुर नीति का उपदेश एवं अपनी विचार अभिव्यक्ति पूरे विश्वास के साथ करने के पश्चात कहते हैं कि मैं शूद्र हूँ, मुझे श्रुति अधिकार नहीं है, अत: मैं आगे नहीं कह सकता। पुराण प्रवक्ता सूत लोमहर्षण कहते हैं कि प्रतिलोमज (ब्राह्मण माता एवं क्षत्रिय पिता की संतान) होते हुये भी हमें ऋषि समाज को सुनाने का गौरव मिला है। मौर्य काल में चाणक्य लिखते हैं कि पुराणों के सूत प्रतिलोमज सूतों से भिन्न हैं एवं वे ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों से विशिष्ट हैं। विष्णु पुराण सौति को महामुनि एवं जगद्गुरु जैसी संज्ञाओं से विभूषित करता है।  
सहस्राब्दियों की परास के इन कुछ उद्धरणों से जो स्पष्ट होता है, वह यह है कि विविध जातियों को अपनी निजी जाति को ले कर हीनता बोध न था एवं समस्त व्यवस्था लचीली थी, प्रवाही थी तथा उसमें सामयिक यथार्थ के अनुकूल बने रहने का गुण  था। ऐसा जब तक रहा, भारत बना रहा। अंग्रेजों के 'इण्डिया' में उत्कृष्टता गई, गौरव बोध गया, समृद्धि भी गयी, बच गया भङ्ग समूह-बोध जो कि विविध जातियों को जातिवादी संगठनों की ओर आकर्षित करता है। 
जाति उन्मूलन एवं जातीय वर्चस्व स्थापना जैसी वायवीय संकल्पनाओं को तज 'उत्कृष्टता' की साधना करें, जाति चाहे जो हो। यह मार्ग पहले भी प्रभावी था, आज भी है। भारत के नाम में ही 'भा', भासमान प्रकाश है, हम अन्धकार में कभी नहीं रहे, हमें केवल अंधकार युग की संतति बताया जाता रहा है जिसका उद्देश्य औपनिवेशिक स्वार्थपूर्ति रहा एवं अब निहित स्वार्थ वश भींड़ तंत्र में सत्ता में बने रहना है। आँखें खोलिये, भासमान भारत पुकार रहा है। 
आप उत्कृष्ट होंगे तो जाति, समाज एवं देश, सभी उत्कृष्ट होंगे। ऐसे में सबका स्वार्थ भी सधेगा या नहीं?


बुधवार, 1 अगस्त 2018

जाति एवं उत्कृष्टता

प्राय: जाति एवं वर्ण के ले कर लम्बे लम्बे विमर्श, वाद, विवाद, कलह, मनोमालिन्य आदि होते रहते हैं। दो आत्यंतिक विचार भी प्रचलित हैं - भारत की दुर्दशा जाति व्यवस्था के कारण  हुई एवं भारत में जाति व्यवस्था थी ही नहीं, अंग्रेजों की देन है। कहना न होगा कि दोनों व्यर्थ के बकवाद से अधिक महत्व नहीं रखते। 
जाति का अर्थ किसी भौगोलिक क्षेत्र में विकसित विशिष्ट लक्षणों वाले मानव समूह से है। जातियाँ वैविध्य को दर्शाती हैं - यक्ष, देव, नाग, किन्नर, गंधर्व इत्यादि जातियाँ हैं। वर्ण की अवधारणा एवं व्यवस्था जाति की परवर्ती है, तब की जब कि क्षेत्र विशेष में रहने वाला मानव समाज इतना उन्नत हो गया कि उसे कार्य विभाजन की आवश्यकता पड़ी। 
भारत भूमि का ऐतिहासिक विस्तार आज के अफगान-ईरान सीमा से ले कर कामरूप तक था। उत्तर में उत्तर कुरु को तज भी दें तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक। इस एक भूमि की अवधारणा शनै: शनै: विविध जातियों के परस्पर सम्पर्क, संघर्ष, समायोजन एवं सामञ्जस्य से विकसित हुई। एक बार हो गई तो सहस्राब्दियों तक सुरक्षित रही। स्पष्ट है कि ऐसा समाज जब वर्ण विभाजन करेगा तो उसमें विविध जातियों के गुणसूत्र रहेंगे। बंगाल के ब्राह्मण के गुणसूत्र वहीं के किसी अन्य वर्ण से सारस्वत क्षेत्र के ब्राह्मण से अधिक मेल खायेंगे। भारत वंश का यही सच है, इससे आगे वितण्डा, जातिवाद, जन्मना श्रेष्ठता भाव, अहङ्कार इत्यादि हैं जिनके तर्क वितर्क न केवल अंतहीन हैं अपितु पतनकारी भी।
कार्य विभाजन के साथ ही विविध जातियाँ वर्णसाम्यता की दिशा में अग्रसर हुईं, हो भी गयीं अर्थात शताब्दियों पश्चात जाति कोई भी रही हो, न तो उसकी स्मृति रही, न उससे कोई जुड़ाव। लम्बे कालखण्ड का वर्ण ही जाति विशेष हो गई। 
उन्नत समाज व्यवहार संहितायें रखता ही है। स्मृतियाँ वही संहितायें हैं। यहाँ संहिता का अर्थ वेद संहिता से नहीं, विधानों के सम्यक एकत्रीकरण से है। वे उस व्यवस्था को अभिलिखित करती हैं जिसमें जाति-वर्ण के ऐक्य को सुनिश्चित रखने के लिये विविध विधान बनाये गये। समाज की दीर्घजीविता एवं शांति हेतु यह आवश्यक भी था। एक पीढ़ी से दूसरी, तीसरी ... को प्रवाहित कुशलता अल्पसाध्य थी, उत्कृष्टता को दीर्घजीवी भी बनाती थी एवं नवोन्मेष हेतु आवश्यक वातावरण भी सुनिश्चित करती थी। उदाहरण के लिये रथकार का पुत्र भी शिल्पी रथकार हो, इसमें अधिक सरलता है, समाज एवं तंत्र पर अल्प बोझ है। राजन्य का पुत्र रथकार बने तो पहले से चली आ रही कुशलता का लोप तो होगा ही, श्रमसाध्य भी होगा एवं सातत्य टूटेगा। ऐसा नहीं था कि अपवाद नहीं थे, किंतु वे अपवाद ही रहे। स्मृतियाँ इसी कारण उपनयन एवं शिक्षा आरम्भ का समय, वटुकों के वस्त्र, दण्ड आदि को उसके पिता के वर्ण से निर्धारित करती हैं। यह नैरंतर्य का सूचक है कि तू उत्पन्न हुआ इस जाति विशेष में, अत: तुझे ऐसे ही, यही सीखना है, यदि नहीं करेगा तो पतित हो जायेगा। पतित का सामाजिक बहिष्कार होता था या वह समाजबाह्य हो जाता था।
इस व्यवस्था की यदि एकमात्र विशेषता देखी जाय तो वह है - उत्कृष्टता Excellence। यहीं राजा एवं राजन्य की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे उस पारिस्थितिकी को बनाये रखना है जो प्रत्येक जाति में, प्रत्येक उत्पादन कर्म में, प्रत्येक शिक्षा पद्धति में उत्कृष्टता सुरक्षित रखे। राजन् शब्द रञ्जन से जुड़ता है, यह रञ्जन मनोरञ्जन मात्र नहीं, प्रत्येक क्षेत्र में 'सुख समृद्धि शांति निरामयता' की स्थापना एवं दीर्घजीविता है जिससे समस्त समाज एवं राज्य तंत्र कल्याणकारी हो, वृद्धिपरक हो - राजन् [राज्-कनिन् रञ्जयति रञ्ज्-कनिन् नि ˚]। इसके साथ ही रक्षण है जो दुष्टों का दलन एवं सज्जनों की सुरक्षा है, क्षत से सुरक्षा करने वाला क्षात्र कर्म। राजा एवं राजन्य वर्ग में ये दोनों समाहित किये गये जिसके कारण ही अच्छा राजा विष्णु रूप माना गया, वह जो पोषण करता है, वह जो अत्याचारियों से रक्षा करता है, उसके लिये चाहे जो करना पड़े ! 
शब्द देखें तो यह सूक्ष्म संकल्पना उद्घाटित होती है। अच्छे राजा द्वारा शासित प्रदेश 'राजन्‍वत्'  है किंतु सामान्य राजा, जिसमें कि कोई उत्कृष्टता नहीं, द्वारा शासित प्रदेश 'राजवत्' है। एक अर्द्ध 'न' के अंतर से वरेण्य एवं रूढ़ में अंतर स्पष्ट कर दिया गया है। 
सामान्य प्रजा पहले विश् कहलाती थी, वैश्य उसी से है - कृषि, पशुपालन एवं शिल्प इत्यादि में रत रहने वाला बहुसंख्यक समाज। इसी से विशेषज्ञता एवं शिल्प कुशलता वाले कुशीलव निकले जिनका सामान्य स्तर सेवा करने वाला शूद्र हुआ। प्रजा से ही रक्षा करने वाले क्षत्रिय हुये एवं उन्हें निर्देशित करने वाले, विधि विधान के संयोजक पुरोहित ब्राह्मण। राजा या क्षेत्र विशेष का मुखिया  विश्पति कहा गया, उसकी पत्नी विश्पत्नी - जो विश् अर्थात प्रजा का पालन करने के कारण पूज्य है, आदरणीय है। 
अनेक प्रकार से कु-व्यञ्जित पुरुष सूक्त में राजन्य रूपी बाहु एवं वैश्य रूपी ऊरू अर्थात जानु (जंघे) पर ध्यान दें। राजन्य का आजानुबाहू होना शुभ लक्षण माना गया। इसके मूल में वही भाव है कि राजन्य वह जिसकी परास वैश्य तक हो। 
ऐसा राजा उत्कृष्टता को सुनिश्चित करता है, धरती पर विष्णु का रूप होता है। इस आदर्श ने प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता सुनिश्चित की। व्यापारी, सार्थवाह गण, कुशीलव उपनिवेश इत्यादि इतने शक्तिशाली थे कि राजसभा में उनका सम्माननीय प्रतिनिधित्व था। राजा मनमानी करते हुये निरङ्कुश नहीं हो सकता था। जो हुये, उनकी दुर्गति सुनिश्चित की गयी। राजा का कोश ही उसकी शक्ति है जो कि कराधान से भरता है। कराधान तब ही बढ़ेगा जब कृषक, वैश्य, शिल्पी, समृद्ध होंगे, फले फूलेंगे। 
स्पष्ट होता है कि 'उत्कृष्टता एवं कुशलता' इस व्यवस्था की देन थे एवं यह भी कि कोई भी जाति अपने पर लज्जित नहीं थी। इस्लामी आक्रान्‍ताओं ने इस शक्ति से सामञ्जस्य कर ही राज्य किया एवं अंग्रेजों की चतुर वणिक बुद्धि ने इस शक्ति को भारत को उपनिवेश बनाये रखने के मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा पाया। इस शक्ति को विविध उपायों द्वारा जिनमें कि दमन, दुष्ट कराधान एवं वैमनस्य वपन प्रमुख थे, उन्हों ने नष्ट कर दिया जिससे भारत आज तक उपरा नहीं पाया है। 
जाति आधारित आधुनिक मञ्चों में किसी को भी इसकी समझ है, प्रतीत नहीं होता। उत्कृष्टता की साधना के स्थान पर प्रयास जातिवादी राजनीतिक समूह प्रभाव सुनिश्चित करने की है जिसकी भीड़ आधारित लोकतन्‍त्र में सुनी जाय। ध्यान इस पर अधिक है जो कि प्रगति की मूलभूत आवश्यकता के विरुद्ध जाता है। पुराने का गौरव गान करते हुये वर्तमान स्थिति को विस्मृत कर देना हानिकारक है। प्रत्येक जाति अपने गौरव पुरुष ढूँढ़ने, बनाने एवं स्थापित करने में लगी है, बिना इस पर विचार किये कि सहस्राब्दियों के भारतीय इतिहास में किसी भी समूह को ऐसा करने की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ी, अब क्यों पड़ रही है? 
ब्राह्मणों पर बहुत लिखा गया, लिखा जा रहा है किन्तु उस राजन्य वर्ग का क्या जिसे कि ब्रह्मविद्या का पोषक माना गया, जिसे कि कभी ब्राह्मण ग्रंथों ने ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ घोषित किया? यह वर्ग भी पतनोन्मुख है। तामस, अनावश्यक उग्रता, मद्यपता एवं क्षुद्रता इसके लक्षण हो गये हैं। महाराणा का घोष करने वाले जानते तक नहीं कि महाराणा ने अपने अल्प शासन काल में ही उत्कृष्टता के कितने आयामों का स्पर्श किया। राजपूत का पूत उस संतति परम्परा हेतु है जो पुरखों की थाती सँभाले, उत्कृष्टता में उनसे आगे बढ़े अन्यथा काहे का राज,  काहे का राजपूत?  ज्ञान के अभाव में झूठा गर्व हास्यास्पद तो लगता ही है, युवाओं को दिशा भी नहीं देता, उल्टे गर्त में ही ढकेलता है। 
राज शब्द राजति, प्रकाशित होने का भी अर्थ रखता है, उत्कृष्टता होगी तो प्रकाशित होगी ही। किसी भी जाति ने निकृष्टता को आदर्श नहीं बनाया, बड़ी सामान्य सी बात है किन्‍तु वही आँखों से ओझल है। 
ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य; जो भी अपने को इन तीन जातियों में मानते हैं, यदि जाति आधारित मञ्चों को ही सब कुछ मान बैठे हैं तो भयानक भूल कर रहे हैं। स्वीकार कर रहे हैं कि वे चुक गये, उनके पुरखों का प्रभाव मर गया। 
ऐसे मञ्च अनुपयोगी हैं, ऐसा नहीं है किन्‍तु एक देश के रूप में, एक समाज के रूप में उत्कृष्टता सुनिश्चित करने में गौण भूमिका ही रखेंगे। यदि आप ऐसे किसी मञ्च से जुड़े हैं तथा वहाँ जय परशुराम, जय रावण, जय महाराणा; जैसी जय जय मात्र है तो बाहर आयें। जाति का गौरव तब ही बढ़ेगा जब उत्कृष्टता होगी, देश का भी नाम होगा जो कि द्विजता का अर्हण होगी। प्रतिद्वन्द्विता में शूद्र न बनें। भार्गव राम ने या महाराणा ने या अग्रसेन महाराज ने जय जाति, जय जाति उद्घोष कर अपने को स्थापित नहीं किया था। 
चेतें ! आप की सन्‍तानों के लिये आगत समय कठिन होने वाला है। अब्राहमी पंथ वैधानिक संरक्षण में आप को दिन प्रतिदिन काटने में लगे हुये हैं। जाति से जुड़े रहते हुये भी दृष्टि को व्यापक विराट बनायें, सूक्ष्म आक्रमणों पर ध्यान दें एवं उत्कृष्टता में लग जायें। एक साथ उठें, खण्ड खण्ड नहीं। ऐसे उदाहरण हैं जहाँ विविध जाति समूह एक उद्देश्य के साथ व्यापक एवं सूक्ष्म, दोनों स्तरों पर एक साथ लड़ते हैं, उपाय भले भिन्न हों, उद्देश्य एक है। दूजा कोई मार्ग नहीं।