बुधवार, 7 मई 2014

कुर्सियों पर इकराम

बहुत ढूँढ़ने के बाद कुर्सियों की फैब्रिक साफ करने वाला कोई मिला। पूछने पर नाम 'इकराम' बताया। यह नाम अरबी शब्द 'करम' का बहुवचन है जिसका अर्थ अनुग्रह या कृपा होता है। बहुवचन में इसका अर्थ प्रतिष्ठा या सम्मान की वृद्धि करने वाले अनुग्रह हो जाता है। जिन्हें ढूँढ़ते इतने दिनों से हैरान परेशान था, उनके मिल जाने से लग रहा है कि मेरे ऊपर किसी देव की कृपा हुई है किंतु मेरे ये नये कृपालु स्वयं के नाम की विपरीत स्थिति में हैं। श्रमिक के लिये कहावत का प्रयोग मुझे श्रम का अपमान लग रहा है, इसलिये नहीं कर रहा।

मैंने इकराम से घूम कर काम कितना है यह समझ लेने को कहा। लगभग आधे घंटे पश्चात लौटे तो पर्याप्त प्रफुल्लित थे। मैं समझ गया कि कमाई अच्छी जान खुश हैं। उसके बाद हमारा वार्तालाप कुछ यूँ हुआ:

"आप के चार्जेज क्या हैं?"
"कुर्सी का अस्सी रुपया और सोफे का सौ रुपया पर सीट ... आप के लिये सत्तर और नब्बे कर दूँगा।"
"काम देख लिया?"
"हाँ, बहुत है, कुछ नयी कुर्सियों को भी सफाई की आवश्यकता है। लोग इज्जत से नहीं रखते न!"
"अच्छा! ... और क्या कर सकते हैं?"
"हम रिपेयर भी करते हैं... देख लिया है। कुल चौदह व्हील, चार हाइड्रॉलिक और तीन बेस भी बदल दिये जायँ तो कुर्सियाँ ठीक हो जायँ। रेट की चिंता मत कीजिये, एकदम जेनविन लगाऊँगा - व्हील का साठ रुपया, बेस तीन टाइप का आता है। फाइबर का चाइनीज क़्वालटी के हिसाब से ढाई सौ से तीन सौ। मेटलिक देसी साढ़े चार सौ। हाइड्रॉलिक ओरजिनल साढ़े पाँच से लगाई सवा छ: सौ तक।"

कुर्सियाँ अरसे से न साफ हुईं और न रिपेयर की गयीं। आने वाले आते रहे, जाने वाले जाते रहे। आदमियों के बजाय इस बार कुर्सियों को ही ठीक कर दिया जाय, यह सोच मैंने हामी भर दी। इकराम भाई जोश से लग गये। सधे हाथ - थोड़ा सा केमिकल, पानी, स्पंज और दमदार वैक्यूम क्लीनर। कुछ कुर्सियाँ ही चमक पायी थीं कि अचानक कुझे कुछ याद आया। मैंने उन्हें बुलावा भेजा:

"आप के पास TIN है?"
"अरे साहब! आप को पक्का बिल देंगे। पेरमेंट कराते आप को तकलीफ नहीं होगी।"
“TIN जानते हैं कि नहीं? सर्विस टैक्स रजिस्ट्रेशन?"
इकराम के श्रम उत्फुल्ल साँवले चेहरे पर परेशानी के बादल घिर आये।
"कहाँ साहब! इतनी कमाई कहाँ होती है? ... जितनी होती है उसमें टैक्स भरने की जरूरत ही नहीं!"
 
"कितनी होती है ... साल भर में?"
"यही कोई एक सवा लाख।"
"बस?...यह तो बस दस हजार रुपये महीना हुआ?"
"इतना ही है साहब... आगे काम बढ़ाऊँ या ..."
"अरे नहीं नहीं... काम खत्म करिये। पेमेंट हो जायेगा... आप स्टैम्प पेपर पर लिख कर दे देंगे न कि आप की सालाना इनकम इतनी ही है? बैंक खाता है न?"
"चाहे जो लिखवा लीजिये। सच है तो है! ... खाता तो है लेकिन ज्यास्ती यूज में नहीं है। कैश पर ही काम करते हैं साहब! इतने में बैंक में क्या रखें और जियें क्या?"
"कोई बात नहीं। आप काम करिये। पेमेंट हो जायेगा।"
....
इकराम भाई काम में लगे हैं और चुनावी माहुर लिये मेरा मन खुराफात में - कुर्सियों पर लोग आते रहे, जाते रहे। कुछ खानदानी तो कब्जा ही जमा लिये। बकिये सात पुश्तों के लायक कमाई में लगे हुये हैं। कुर्सियों की साख गिर गई है। वे मैली हो गयी हैं, उन्हें रिपेयर की जरूरत है। उन पर हम जैसों की जाने कब करम होगी! जाने कब कोई इकराम मिलेगा। इकराम का मिलना कठिन है।

पसीने का, ईमानदारी का काम डरा डरा सा भी रहता है। उसे उन नियम क़ानूनों की समझ भी कम ही है जिनकी आड़ में पसीने के टैक्स भरे जाते हैं और कुर्सियाँ मैली होती गन्धाती हैं। कुर्सियों की धुलाई और मरम्मत मेहनती और कम फायदे का काम है, नियम क़ानून के अड़ंगे अपनी जगह हैं ही।     
उन्हें नेकदिल, प्यार और जतन से काम करने वालों की दरकार है। उनकी सफाई के लिये सर्विस टैक्स भरने को तैयार जाने कब मिलेंगे! कुर्सियों पर इकराम में अभी देर है।  

5 टिप्‍पणियां:

  1. एक बार फिर एक साधारण सी घटना आपके वर्णन से असाधारण हो गयी!!

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  2. बहुत खूब...उत्तम प्रस्तुति।।।

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  3. * पसीने का, ईमानदारी का काम डरा डरा सा भी रहता है। उसे उन नियम क़ानूनों की समझ भी कम ही है जिनकी आड़ में पसीने के टैक्स भरे जाते हैं और कुर्सियाँ मैली होती गन्धाती हैं।
    - वर्तमान भारत का दुखद सत्य ...

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