रविवार, 12 जून 2016

बढ़ते बदलते

मँगतों और देवतों के देश में
अकाल से मरते थे लोग,
खाते पीतों के बीच भूख से नहीं।
उकताए बुद्ध तक ने
भूख को न माना दुख।
हम उन्नति कर गए
किन्तु आज भी
पचा नहीं पाते
भूख से मरना।
पोस्ट मार्टम और तराजू लगाते हैं
पेट से ककोर ककोर निकालते हैं
पचास ग्राम भात।
वर्ल्ड के सामने,
बैंक के सामने
चिघ्घाड़ते हैं -
नहीं मरा कोई भूख से।
इतिहास में -
वृकोदर सहमता है
पृथा भूल जाती है आधा कौर।
द्रौपदी के अक्षय पात्र
नहीं बचता साग तक
यादव की भूख
अल्सर में तड़पती है।
दुर्वासाओं के शाप फलते हैं
और हम यूं
... इतिहास को झुठलाते
आगे बढ़ते हैं।


शिक्षक हड़ताल प्रवचन हैं
सरकार मंच यात्रा भषण हैं
जनता चरमानन्द चुप पलायन है
विद्यार्थी हताशा मरोड़ धड़कन हैं।
भूले शब्द अर्थ भूलभुलइया में
बदल रहा है भारत
ज्यों कि त्यों रहते हुये।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छा लिखते हैं आप , मेरी शुभकामना और बधाई स्वीकार कीजिये।

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