शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

चुपचाप चले

शहर में भीड़ अकेली शोर में चुपचाप चले
उठे नारे जब यंत्रणा में हम रहे कराह भले

कुछ यूँ हैं तनहा सड़क पर मोड़ पर भी
पहने जिस्म कोई अतर रूह बेनकाब चले
(पहन कर जिस्म कोई रूह बेनकाब चले)  

फिकर थी न जब उजाले की न अँधेरे की
बँटवारे हुये मुकम्मल मेड़ पर साँझ ढले

बसर हो रही है खास यूँ भलमनसाहत में
मन में खुदकुशी दामन विषधर नाग पले

अब के आना तो जहर काफिये ले आना
गायेंगे साथ यूँ कि चख लेंगे उतार गले

~गिरिजेश राव~
बनारस, 201309130744 

5 टिप्‍पणियां:

  1. कोलाहल से, हमने चाहा, मुक्ति मिले,
    हम पहुँचे एकान्त, मनस यादें ले आया।

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  2. 'कुछ यूँ हैं तनहा सड़क पर मोड़ पर भी
    पहन कर जिस्म कोई रूह बेनकाब चले'

    ---बहुत ही उम्दा शेर है!वाह,वाह और बस वाह!

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  3. मेरा पसंदीदा ये रहा:

    फिकर थी न जब उजाले की न अँधेरे की
    बँटवारे हुये मुकम्मल मेड़ पर साँझ ढले

    वैसे - ऐसे कैसे?

    मात्र चार मिनट में पोस्ट - सीधे टाइप ही किये लगते हैं।

    उत्तर देंहटाएं

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