नीचे लिखे ब्लॉगरान इस पहेली को बूझने में भाग नहीं ले सकते:
(1) डा. अरविन्द मिश्र
(2) हिमांशु पाण्डेय
(3) श्रीश पाठक 'प्रखर'
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प्रहेलिका बुझौवल अब समाप्त: समय: भारतीय 22:55, दिनांक: 06/01/10
खाली प्लेट लिए मैं हूँ यानि गिरिजेश
लालची निगाहों से ताकते भए अमरेन्द्र
तन्मयता से भकोसते भए महफूज ।
विजयी हुए:
(1) परम आदरणीय समीर लाल 'समीर'
(2) परम आदरणीया स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' ( ' आदरणीया' के प्रयोग पर क्षमाप्रार्थी हूँ ;))
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अवधी कै अरघान और कुछ औरों की , कुछ अपनी ... के रचयिता अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी से मेरी पहली मुलाकात महफूज अली के सौजन्य से मेरे आवास पर हुई। अचानक ही फोन आया था और मैं फोन पर अमरेन्द्र जी को पहचान नहीं पाया था। श्रीमती जी के हाथ के बने गोभी के पकौड़े, धनिए की चटनी और सॉस के साथ भकोसते हुए हम लोगों ने खूब गपोष्ठी की। रात में 10 बजे अमरेन्द्र जी की दिल्ली के ट्रेन थी सो 9 बजे के आसपास विदा हुए।
इस मुलाकात को यादगार बनाने के लिए इस पहेली का आयोजन हुआ। मैं सभी प्रतिभागियों का हृदय से आभारी हूँ।
विजेताओं को ढेर सारी बधाइयाँ।
वैसे इन लोगों के विजयी होने में मुझे कुछ गड़बड़ी की आशंका भी हो रही है। शक की सुई स्वामी अरविन्दानन्द सरस्वती उई ! शरारती और बाबा महफूजानन्द की ओर संकेत कर रही है।
सबूतों के अभाव में दोनों बाबाओं को माफी दी जा रही है।
हम भी प्रथम पहेली के सफल आयोजन पर अपनी पीठ थपथपा ले रहे हैं। अब ताऊ, उड़नतश्तरी, तसलीम और अन्य पहेली आयोजकों से दहशत खाने की कोई आवश्यकता नहीं रही।
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अमरेन्द्र जी से अत्यधिक प्रभावित हुआ। उतनी ही देर में सहजता और विद्वता के एक साथ दर्शन हुए। इतनी सरलता से अवधी के काव्य उदाहरण और संस्कृत के भी उद्धरण देने वाले किसी व्यक्ति से बहुत दिनों के बाद मुलाकात हुई। मुझे अपने संस्कृत के पूज्य आचार्य शास्त्री जी याद आ गए। हाँ, अरविन्द जी के समर शेष है पर भी चर्चा हुई।
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अवधी कै अरघान और कुछ औरों की , कुछ अपनी ... के रचयिता अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी से मेरी पहली मुलाकात महफूज अली के सौजन्य से मेरे आवास पर हुई। अचानक ही फोन आया था और मैं फोन पर अमरेन्द्र जी को पहचान नहीं पाया था। श्रीमती जी के हाथ के बने गोभी के पकौड़े, धनिए की चटनी और सॉस के साथ भकोसते हुए हम लोगों ने खूब गपोष्ठी की। रात में 10 बजे अमरेन्द्र जी की दिल्ली के ट्रेन थी सो 9 बजे के आसपास विदा हुए।
इस मुलाकात को यादगार बनाने के लिए इस पहेली का आयोजन हुआ। मैं सभी प्रतिभागियों का हृदय से आभारी हूँ।
विजेताओं को ढेर सारी बधाइयाँ।
वैसे इन लोगों के विजयी होने में मुझे कुछ गड़बड़ी की आशंका भी हो रही है। शक की सुई स्वामी अरविन्दानन्द सरस्वती उई ! शरारती और बाबा महफूजानन्द की ओर संकेत कर रही है।
सबूतों के अभाव में दोनों बाबाओं को माफी दी जा रही है।
हम भी प्रथम पहेली के सफल आयोजन पर अपनी पीठ थपथपा ले रहे हैं। अब ताऊ, उड़नतश्तरी, तसलीम और अन्य पहेली आयोजकों से दहशत खाने की कोई आवश्यकता नहीं रही।
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अमरेन्द्र जी से अत्यधिक प्रभावित हुआ। उतनी ही देर में सहजता और विद्वता के एक साथ दर्शन हुए। इतनी सरलता से अवधी के काव्य उदाहरण और संस्कृत के भी उद्धरण देने वाले किसी व्यक्ति से बहुत दिनों के बाद मुलाकात हुई। मुझे अपने संस्कृत के पूज्य आचार्य शास्त्री जी याद आ गए। हाँ, अरविन्द जी के समर शेष है पर भी चर्चा हुई।
आश्वस्त हुआ कि ब्लॉगरी में हिन्दी साहित्य का भविष्य उज्जवल है। साथ ही निश्चिन्त भी हुआ कि एक और अपनी कटेगरी का लंठ मिला।
महफूज जी के बारे में क्या कहें ! प्याज के छिलके उतारने के बाद बताएँगे।
महफूज जी के बारे में क्या कहें ! प्याज के छिलके उतारने के बाद बताएँगे।