मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

राजू के नाम एक पत्र


अन्धपुर
दिनांक - 13/12/11

मेरे राजू!
किसी दिन तुम्हें नाम लेकर न बुला पाऊँ तो न हैरान होना और न बुरा मानना। हार्ड डिस्क का वह भाग चुकने लगा है जहाँ नाम, अंक, शब्द आदि अंकित रहते हैं। विचित्र है यह डिस्क! इसे न तो डीफ्रैगमेंट कर सकता हूँ और न फॉर्मेट। क्या करूँ
क्या करूँ जो ढेरों अनावश्यक स्मृतियाँ वैसी ही चमकती हों जैसे कल की बात हो और तुम्हारा नाम ही भूल जाऊँ? इस इंटीग्रेटेड बोर्ड पर प्रॉसेसररैम, ग्राफिक्स कार्ड, नेटवर्क पोर्ट, यू एस बी पोर्ट सब ऐसे सीमाहीन रूप से घुले मिले हैं कि रिपेयर या बदले नहीं जा सकते और यह इतना नाजुक है कि छूने से भी डर लगता है। 
बहुत बार स्वयं को संज्ञा और शब्दों से घिरा पाता हूँ। किसी घनी धुन्ध के पार से वे झाँकते से दिखते हैं, आभास भर होता है लेकिन रूपाकार स्पष्ट नहीं होते। उनकी आँखें तक नहीं चमकतींजैसे चुप टोह लगाये बैठे हों कि अब जीभ पर चढ़ जायेंगे कि तब, लेकिन .... बस वही लेकिन राजू, वही। 
 मैं दो टुकड़ा हो गया हूँ - एक हँसता, खाता, पीता, सामान्य जीता है और दूसरा भयानक रूप से भीत भटकता भरा जा रहा है। जाने वह क्या है जो भरता जा रहा है - गहन एकांत सा कुछ। उससे डर लगता है। जबरन पहला टुकड़ा और हँसने, और मजाक करने, और खाने लगता है लेकिन जीना 'और' नहीं हो पाता। दूसरे के भीतर कोई आतंकवादी प्रविष्ट हो गया है। उसकी छाया मैं कहीं और नहीं पड़ने देना चाहता।
यह तुम जानते हो राजू! कि बाहर से मैं कभी चाहे कितना भी हिंसक या दुष्ट लगूँ, असल में वैसा नहीं होता। 
 इसलिये राजू! अगर तुम्हें फोन न करूँ, सामने पड़ने पर चुप रहूँ, बोलते बोलते अचानक शांत हो जाऊँ या कोई वाक्य अधूरा छोड़ दूँ तो बुरा न मानना। यह एकदम बुरा मानने वाली बात नहीं है। यह मेरा प्यार है, तुमसे ही नहीं उन सबसे जिनके साथ और जिनमें मैं जीता हूँ। मैं किसी को कष्ट नहीं पहुचाना चाहता, मुंडेर पर रहते कबूतरों को भी नहीं।
आज जब कि तुम्हारा नाम याद है, यह पता है कि मैं अन्धपुर में हूँ और आज की तारीख अजीब संयोग वाली 131211 है, तुम्हें पाँच रुपये के लिफाफे में रख कर यह पत्र भेज रहा हूँ, यह सिद्ध करने को (तुमसे अधिक स्वयं को) कि तुम्हारा पता अभी मुझे पता है, कल मेरे लापता होने से पहले तुम लापता हो जाओगे (यह मेरी गुम्मी की अनिवार्य शर्त होगी) !

सुखी रहना और जीवन को कभी गम्भीरता से न लेना। यह इस लायक नहीं। देखो न! मुझे पता ही नहीं कि मैं पहला हूँ या दूसरा

सस्नेह तुम्हारा

मानव चक्रवर्ती (मुझे अभी मेरा कुलनाम याद है)

13 टिप्‍पणियां:

  1. मैं दो टुकड़ा हो गया हूँ - एक हँसता, खाता, पीता, सामान्य जीता है और दूसरा भयानक रूप से भीत भटकता भरा जा रहा है।

    जीवन ऐसे ही बटा बटा सा जीने लगता है कभी कभी।

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  2. मुझसे मेरे बॉस ने कभी कहा था कि तुम अपने काम को सीरियसली नहीं ले रहे हो, तो मेरा जवाब था कि मैंने ज़िंदगी को सीरियसली नहीं लिया, ये नौकरी क्या चीज़ है.. ! और आज २५ साल बाद यही बात आपसे सुन रहा हूँ!!और गुण रहा हूँ!!

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  3. पहला हूँ या दूसरा.....???????

    सत्य है...दोनों साथ साथ ही तो हैं...

    पर जबतक दोनों साथ हैं,चिंता नहीं होनी चाहिए...चिंता की बात तब है जब कोई भी एक खो जाए...

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  4. ब्लॉग जगत छोड़ के मत जाईयेगा बाकी सब संभाल लिया जाएगा !

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  5. जब तक एक, दूजे का हाल लेता है तब तक तो मामला ठीक ठाक है।

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  6. 'सुखी रहना और जीवन को कभी गम्भीरता से न लेना। यह इस लायक नहीं। देखो न '......वाकई एक दम से दिल को छू जाने वाली पोस्ट.

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  7. Aajkal aapka likhna kam kuch kam ho gaya hai. Kam likhte hain lekin bahut khoob likhte hain aap.

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  8. देर से आना हुआ, लेकिन जीवन के इस दर्शन में नहाकर निकले। बहुत सुन्दर शब्द चित्र, मतवाले मन की गुह्यतर वीथिकाओं का...

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