रविवार, 24 फ़रवरी 2013

जाते माघ की बारिश

हल्की हरजाई बारिश प्रेम में विघ्न डालती है। ऐसे अनमोल समय जब कि भुगतानी अतिथिगृह  की छ्त के नीचे से चेहरे को हल्के मेकअप से हसीन कर और पीछे केशों पर चढ़ाये जाते शक़ के विग को झटक कर निकलने का साहस करे युवती लेकिन खराब बाइक को घसीटता प्रेमी युवक मौसम पर गालियों की बरसात को मजबूर हो तो सिवाय शाप के कुछ और बयाँ नहीं हो सकता।

रेस्ट्रॉ में चिपिर चिप चिप है। चमकती सड़क और खुले में लगे स्टेनलेस स्टील के फर्नीचर पर रोशनी चमकती है। रुकती होती बारिश से त्रस्त इश्क़ को कहाँ चैन कि देखे ऊपर असम्भव चाँद है और नीचे छ: मीटर ऊँचाई पर टँगी हैं तीखी प्रस्फुर लड़ियाँ? कालिख जबर है – वात में, आवरण में और सड़क पर भी!  
सीली टेबल पर आमने सामने कोहनियों से कलाई तक हाथ चिपके हुये हैं, अँगुलियाँ किस्सी किस्सी खेल रही हैं। कल तक कोला में मिला कर पीती थी, आज लड़की व्हिस्की के पैग को स्ट्रा से चूस रही है, वह खफा है मौसम पर! उस मौसम पर जो कि टीवी से चिल्ला चिल्ला खून के छींटे मार रहा है। ह्विस्की के कड़वे रंग पीले में लाली लिपिस्टिक नहीं हो सकती। चिपचिपा अनुभव है कि आँखों को आँखें पी नहीं सकती, होठ चूमने लायक अन्धेरा भी नहीं। सत्यानाश है, कितनी बेहूदा शाम है! नशा हिरन है।

टाइम दिखा कर भगाते रेस्ट्रॉ मालिक पर लड़की ने पहली बार एक गाली आजमाई है – ऐसहोल! मालिक ने समझा ही नहीं है और प्रेमी ने उमड़ती खिलखिलाहट दबाई है, ओले गिरने लगे हैं, चाँद जाने कहाँ चला गया है? कोने मोड़ पर लड़के ने खींच कर चूमना चाहा है और लड़की के मन में सोडियम सनसना उठा है – रेप!

घुटना ऊपर उठा है- टाँगों के बीच जोर से आघात। बिलबिलाते लड़के ने धमकी सुनी है – मैं चिल्लाऊँगी! शटर गिराते पणि ने केवल सुन कर देख लिया है। कड़वी मुस्कान और फिर तान ये इश्क़ इश्क़ है, इश्क़ इश्क़! बाइक ठीक हो गयी है, एक साथ हजार हॉर्स पॉवर – यूँssss बूम्म्म्म! लड़की ने पहली बार शाम के नशे का अनुभव किया है – कल की कल देखेंगे।  

 

 रात वातायन की प्लास्टिक छत से रह रह कर धमाके आते रहे और घर वाले उनमें बम, बन्दूकें, पटाखों और चीखों को ढूँढ़ते रहे। ओले श्वेत होते हैं, ऐसी ध्वनियाँ तो लाली से आती हैं! मैं अकारण ही उदास होता रहा। इसे वे ऑफ लाइफ मानने को मन करता है और आर्ट ऑफ लिविंग की कक्षाओं की इबारतों में इस उदासी को लपेटने को मन करता है लेकिन मन माने तब न?

सबेरा धुला है। रात भर आसमान से पिघले और ठोस गीलेपन गिरते रहे, बूँदे और ओले बरसते रहे। शीत ऋतु के सीले कपड़े सा सबेरा सूखने को सूरज की सेंक चाहता है और हवा है कि सिहराये दे रही है। दुर्घटनाओं के प्रमाण मार्गों पर डिवाइडर नालियों की ढह गई भित्तियों में हैं, बहना रुक गया है लेकिन धरती की लाली धुल बह कर इन नालियों में जमा है। कुत्तों में इस बात पर बहस है कि रुके पानी में लहू इतना है क्या कि उतर कर जीभ लपलपा दी जाय?

लैपटॉप से आते ध्यान संगीत और चिड़ियों की चटर चूँ पर बहसी श्वान ध्वनियाँ चढ़ी हुई हैं कि आखिर पानी में रक्त है कितना? ये कैसी वर्षा कि नालियाँ उफनी नहीं, नगर निगम को गालियाँ मिली नहीं, क्रोध निकल कर दयनीय हुआ नहीं और जीवन थमा नहीं?

सोने के समय तक चन्द्रमा आजकल खमध्य पर होता है। ऐसी चमक जिसका आभास हो, पता हो, पर स्रोत दिखे नहीं। अन्धेरों से लड़ते हम ऐसे ही जिये जा रहे हैं, प्रेम किये जा रहे हैं।

 स्त्रियाँ कहती हैं कि ब्याह के बाद इश्क़ या तो इस्स रह जाता है या बीते वर्षों के शक़ जैसा। पुरुष कहते हैं मद उतर जाता है और इलाके के सिमट जाने से मर्दानगी खो जाती है, मूतने तक की हदबन्दी हो जाती है। ऐसे बेहूदे वातावरण में भी स्त्री पुरुष जिये जा रहे हैं, बच्चे पैदा किये जा रहे हैं। उनके होने से ही धरा पर वात का आवरण है, एक भ्रम है कि जीवन है और ऐसा ही है!

1 टिप्पणी:

  1. हदों के बेहद होने का मौसम है। शाम के नशे का अनुभव लेने से रोकना(टोकना भी) अन्याय होगा, इसलिये कल की कल देखेंगे :)

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