गुरुवार, 13 अगस्त 2015

तमिळ क्षेत्रे डाभिल संवादं - 1

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वे रामायण की एक बात के पक्के समर्थक हैं – बिना पंगे के कोई ‘आर्य’ दक्षिण नहीं आता।
इस प्रकार वह मुझे राम की परम्परा से जोड़ते हैं। आनन्ददायी सज्जन हैं क्यों कि उनके
पास सब कुछ कसौटी कसा है, शालिग्राम ऐसे ही नहीं कहा मैंने? उत्तर कभी नहीं गये
लेकिन इतना खूब जानते हैं कि वहाँ अभी भी बर्बर बसते हैं जिन्हें हगने तक का सहूर नहीं!
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उनका नाम मैं डाभिल रख देता हूँ, ‘द्रविड़’ से ध्वनि साम्य है और वैदिक युग की पवित्र वनस्पति दर्भ के भोजपुरी संस्करण डभिला से भी। शालिग्राम शिला सम वर्ण और The Core चलचित्र के Mr. Rat जैसा चेहरा अर्थात डी एम के के समर्थक ये सज्जन स्वयं को घनघोर द्रविड़ मानने के बावजूद ‘अनास’ नहीं, मेरी सूँड़ की तरह ही लम्बी नाक वाले हैं। देह बिचुके घेंवड़े जैसी है अर्थात पेट अच्छा खासा निकला हुआ किंतु ऊपर नीचे धड़ पतला।

जिस दिन से आया हूँ उस दिन से बहुत उत्सुक रहते हैं – मेरा दायित्त्व क्या है? कार्यभार कितना है और कौन सा? कहीं मैं अतिरिक्त तो नहीं? रामायण की एक बात के पक्के समर्थक हैं – बिना पंगे के कोई ‘आर्य’ दक्षिण नहीं आता। इस प्रकार वह मुझे राम की परम्परा से जोड़ते हैं। आनन्ददायी सज्जन हैं क्यों कि उनके पास सब कुछ कसौटी कसा है, शालिग्राम ऐसे ही नहीं कहा मैंने? उत्तर कभी नहीं गये लेकिन इतना खूब जानते हैं कि वहाँ अभी भी बर्बर बसते हैं जिन्हें हगने तक का सहूर नहीं!

गंगा प्रदूषण समस्या का हल पहले दिन ही बता दिये थे – दोनो ओर एक किमी तक के पाट क्षेत्र में मनुष्यों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाय! मेला और स्नान जैसे ढकोसलों के लिये गंगा का पानी पम्प कर स्थान स्थान पर टोटियाँ लगा दी जायँ। बाकायदा पेपर पर प्लान बना कर मुझे समझाये भी। मैंने पूछा – आप विज्ञान स्नातक हैं? (विज्ञान पढ़े मित्र कोहनायें नहीं, कॉमन सेंस की कमी वैज्ञानिकों में होती ही है। वैसे मैं भी विज्ञान का ही विद्यार्थी रहा हूँ।) वह प्रसन्न हो कर उत्तर दिये – केमिस्ट्री में पी जी हूँ, आप को कैसे पता? मैंने कहा – उत्तर में ऐसे बहुत से वैज्ञानिक पाये जाते हैं। इस पर चिढ़ गये और दक्षिण की वैज्ञानिकता के गुण गाने लगे। मैं आनन्दित होने लगा। बहुत बाद में समझ पाये कि मैं मजे ले रहा हूँ तो उठ कर चले गये।

आज बड़ी विचित्र बात हुई। संसद का हंगामा मेरी टेबल तक ले आये जैसे कि उनकी गाढ़ी कमाई के 300 करोड़ रुपयों की बरबादी का मैं ही जिम्मेदार हूँ! मैंने बस इतना कहा – देखिये, बरबादी भी रसूख के हिसाब से होती है। आप हल्ला काटेंगे, ऑफिस में काम करने के बजाय इधर उधर डोलेंगे तो बरबादी हजार में सिमट कर रह जायेगी। वह संसद है, पूरे भारत का कार्यालय। वहाँ काम नहीं होगा तो...। मैंने बात जान बूझ कर अधूरी छोड़ दी कि देखें अब क्या करते हैं? दाँव उल्टा पड़ गया। उत्तर में कार्यालय के डाभिल बमकते हैं तो उठ कर चाय पीने चले जाते हैं लेकिन ये तो कुर्सी खींच जम गये। मैंने भी गोदऊपर का फाटक नीचे दबाया और कागज कलम ले कर गांधी वंश के पाड़ा के गुरु की तरह सुन्दर अक्षरों में नकलनोट बनाने लगा।

उन्हों ने बात शुरू की - Bloody Hell! These RSS goons. एक्स्प्लायट करते हैं। पहले दलितों पिछड़ों को शोषित कर राज करते रहे और इस युग में कल्याण सिंह, गोविन्दाचार्य, बंगारू और अब ये साला मोदी, सबकी बुद्धि खराब कर के मजे ले रहे हैं – शोषक! मैंने छींटा मारते हुये कहा – प्राचीन भारत में आर एस एस कहाँ था? घी की छिड़क से जैसे आग भड़कती है वैसे ही भभक उठे – नाम बदल लेने से क्या होता है? मेंटलिटी तो वही रहेगी न, पिस्सू कहीं के। अचानक उन्हें कुछ याद आया तो एकदम शीतल माइनस चार अंश सेल्सियस हो कर पूछे – You are Brahmin? No… मैंने कहा – अरे नहीं, मैं मूलनिवासी हूँ।

ट्रैक बदल गया जैसे ‘चोरबजारी दो नयनों की गीत’ समाप्त हो और ‘मन तरपत हरि दरसन को आज’ शुरू – How come you call yourself aboriginal? Your skin is fair. मैंने कहा – श्वेत नहीं, गेंहुआ wheatish. क्या आप जानते हैं कि गेहूँ को राक्षस अन्न क्यों कहा जाता था? उनके लिये नयी बात थी। ऐसे मौकों पर वे बहुत ही आनन्ददायी मुद्रा अपना लेते हैं – ओठ गोल कर सीटी बजाने का अन्दाज लिये आगे की ओर झुकते हुये फुसफुसाते हैं – ऐसा क्या? कहो, कहो! उनके बायें पैर की थरथराहट का आप अनुभव कर सकते हैं और साँसों से आती फेकराहिन बू का भी।

मैंने उन्हें विजयी भाव से उत्तर दिया – इसलिये कि गेहूँ का रंग भी यहाँ के मूलनिवासियों की तरह ही स्वर्णिम भूरा था और यहाँ के मूलनिवासी तो राक्षस ही थे न? तो चावल खाने वाले आक्रमणकारी आर्यों ने उनके अन्न को भी राक्षस बता दिया! उनकी आँखें गोल हो फैल गयीं – क्या बकवास कर रहे हो? यूरोप में चावल कहाँ होता है?

मैंने कहा – हजारो साल पहले जब वहाँ आर्य थे तब वहाँ खूब वर्षा होती थी। आप तो जनबे करते हैं कि चावल अर्थात धान पानी का कीड़ा होता है। जब घटा उमड़ती, बिजली कड़कती तो वर्षा के देवता इन्द्र की स्तुति में वे लोग प्रसन्न हो मंत्र पढ़ने लगते। सफेद चावल से प्रेम करने वाले आर्य उसके बिना रह नहीं सकते थे। जलवायु परिवर्तन से वहाँ जब धान होना बन्द हो गया तो वे भारत अर्थात दक्षिण की ओर बढ़े क्यों कि यहाँ पानी ही पानी था - नीचे नदियों का जाल, ऊपर से वर्षा विकराल! धान ही धान खेत खलिहान। वे ही यहाँ धान ले कर आये थे।

उन्हों ने मेरी और ठीक वैसे ही देखा जैसे आप पढ़ते हुये सोच रहे हैं – क्या फालतू आदमी है! हँसते हुये उठ खड़े हुये – सुबह से कोई मिला नहीं था क्या बकवास सुनाने को?

मैंने कहा – अभी बात पूरी नहीं हुई। यहाँ भारत में अर्थात रक्षभूमि में गोधूम होता था। वे लोग उपले जला कर उनमें गेहूँ की लिट्टियाँ पका कर खाते थे। गाय के गोबर यानि गोमय और आग के धुँये का संगम उस भोजन के लिये अति आवश्यक था इसलिये आज का गेहूँ तब गोधूम कहलाता था। आर्यों को वह पसन्द नहीं आया क्यों कि सफेद आटा भी पकने पर राक्षस रंग का अर्थात गेंहुआ हो जाता था।

वे अट्टहास कर उठे – यार तुम हो बहुत मनोरंजक! तुम्हारे पास रोज आना पड़ेगा। अच्छा अब यह भी बता दो कि तुम्हारे आर्यों का रंग कैसा था?

मैंने तरस खाते हुये बता दिया – काला। रंग से देखें तो आप शुद्ध आर्य अर्थात देव हैं। यूरोप के राक्षसों की गोराई देख हीन भावना रखने वाले आर्य जितना प्रेम सफेदी से करते हैं उतना कोई नहीं करता। उनके इस प्रेम के आगे सब फीके – चाहे रामदेव का सफेद धन से हो, चाहे भुअरी भँइस का अपने गोरे पड़वे से ...

... नोट बनाने में तल्लीन मुझ बकवासी को पता ही नहीं चला कि वे कब चले गये। मुझे शंका है कि मेरी अंतिम बात वे सुन पाये होंगे। कोई बात नहीं, अगली बार सुना दूँगा, जब पुष्पक विमान और रंग बिरंगी बिल्लियों की बात बताऊँगा तब!

5 टिप्‍पणियां:

  1. वहाँ सही मज़े हो रहे हैं, और यहाँ बैठकर मुझे ईर्ष्या हो रही है। अगली बार शायद वे अपने पूरी तयारी करके आएंगे कि किस तरह तुम आर्यों/ब्राह्मणों/श्रमणों ने इतने साल उनका दमन किया, उनकी श्रेष्ठ गणित को दबाकर त्रुटिपूर्ण दशमलव पद्धति चला दी, और फिर देवनागरी में Tamiz के Z वाली ध्वनि भी तो लापता है। अगर ये गोरे आर्य कृष्ण, विष्णु, बुद्ध वगैरा अनाड़ियों के साथ अन्याय न करते और यूरोप के गिरजों से पैसा और चीन के दुर्गों से हथियार आते रहते तो चार्ल्स एंथनी प्रभाकरण के पापा वेलुपिल्लई तिरुवेंकड़म पीराफरन श्रीलंकन आर्यों (बौद्धों) से एंगलनाडु वापस छीन चुके होते वगैरा, वगैरा ... । इतिहास में नहीं लिखा है तो भूगोल में लिखा होगा। बाकी न सही, हमारे साहित्य का दूसरा शब्द संगम तो संस्कृत में मत चुराओ। और कुछ भी कहो मगर उन्हें कहीं ये तथ्य मत बता देना कि पोलर बीयर की त्वचा का रंग दरअसल काला होता है, ज़िंदगी पर से उनका विश्वास उठ जाएगा।

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  2. अगला बवाल द्रविड़ श्रेष्ठता में आर्यों की भूमिका पर हो सकता है :)

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  3. हा हा हा.. सही बात.. :D
    वैसे मेरे तमिल प्रवास के दौरान ऐसे विषयों पर बहस करने वाले तमिल मुझे कभी मिले नहीं, शायद IT में ऐसे कम ही हों. :)

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  4. आनंद दायक। सही जिंदगी जी रहे हैं। जहां रहो उसी को पढ़ते समझते रहो...वाह! जय हो।

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