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शनिवार, 15 अगस्त 2015

2. तमिळ देशे डाभिल संवादं - तमिळ राष्ट्रगान 'तमिळ ताय वाळत्तु'

स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रगान के पहले एक और गान के बजने और उसको उतना ही आदर देने पर मेरा माथा ठनका – और कहीं ऐसा नहीं देखा! मैं डाभिल को ढूँढ़ने लगा। मेरी छठी इन्द्रिय बता रही थी कि इसका सम्बन्ध अवश्य तमिळ बनाम आर्य विवाद से है और इस मामले में उलझाव सुलझाव के लिये डाभिल से अच्छा कौन हो सकता है? मैं ग़लत था। डाभिल छुट्टी मुबारक मना रहे थे। बगल में बैठे एक दूसरे सज्जन से पूछा तो उन्हों ने गीत का नाम बताया – तमिळ ताय वाळत्तु अर्थात तमिळ माँ का वन्दन आह्वान।

मैंने मन ही मन अपनी सराहना की कि अनुमान सही साबित हुआ और उनको खोदना शुरू कर दिया। ऐसा क्यों? राष्ट्रगान से पहले?? उन्हों ने कहा – यहाँ ऐसा ही है। मैंने प्रतिवाद किया – और कहीं नहीं, यहीं क्यों? वह भारतीय से तमिळ हो आये और चिढ़ कर बोले – हम लोग ऐसे ही हैं। तमिळनाडु में ऐसा ही है। We are much older than India. Long before India came into picture, Tamil nation was there!  मुझे लगा कि कोई इलहामी कह रहा है – पहले इलहाम, फिर हिन्दुस्तान, इलहाम सबसे पुराना मजहब है। आश्चर्य नहीं कि इस भूमि से कभी द्रविड़्स्तान की माँग उठी थी। पेरियार और जिन्ना ...   

...भटकते मन को राह पर ला बात बदल कर मैंने रुचि दिखाई – अच्छा! लेकिन यह गीत तो पुराना नहीं लग रहा! I mean tune is modern. किसने रचा यह गाना? तब तक मैं इंटरनेट सर्च में लग चुका था और वे भी। अपनी स्क्रीन देखते हुये वे बोले – मनोनमनियम सुन्दरम पिल्लई ने लिखा और धुन किसी अंग्रेज ने बनाई थी। Why should we give priority to that Hin…? कहते हुये वह रुक गये तो मैंने कहा – राष्ट्रगान तो बँगला में है। वे बोले – हाँ, वही मैं सोचने लगा – यह तो वैसी ही बात हुई कि सारा दक्षिण भारत मदरासी! इन्हें आम उत्तर भारतीय ठीक ही पहचानता है। अस्तु...

... अलप्पुळ में जन्मे पिल्लई महाशय आज केरल कहलाने वाले प्रांत के तिरुअनंतपुरम से जुड़े थे। पश्चिमी साहित्य, विज्ञान और तकनीक से खासे प्रभावित थे। उन्हों ने 1891 में लम्बा गीति काव्य रचा – मनोनमनियम। तमिळ राष्ट्रगीत ‘तमिळ ताय वाळत्तु’ इस काव्य का मंगलाचरण है। ‘भारतीय’ राष्ट्रगान और तमिळ राष्ट्रगान दोनों में समानतायें हैं – दोनों के रचयिता पश्चिमी रंग में रँगे थे और दोनों अंग्रेजी रचनाओं को बहुत सूक्ष्म और नायाब ढंग से अनुदित, परिवर्तित, सृजित आदि कर अपना नाम देने में महारत रखते थे।

पिल्लई जी ने लॉर्ड बुलवेर लिट्टन की लम्बी कविता ‘The Secret Way’ का पुनर्संस्करण कर उसे 'मनोनमनियम' नाम दिया और यह ग़जब घोषणा की,

 “Among the rich and varied forms of poetic composition extant in the Tamil language, the dramatic type, so conspicuous in Sanskrit and English, does not seem to find a place. The play here submitted to the public is a humble attempt to see whether the defect may not be easily removed.”

 तब तक मैक्समूलर की आर्य परिकल्पना 'बहुत पढ़े लिखों' में पैठ बना चुकी थी। भारोपीय भाषाओं की अग्रणी के रूप में छान्दस और साहित्यिक संस्कृत की चर्चा भी स्थापित हो चुकी थी। कांग्रेस के रूप में ‘उत्तर के आर्यों’ का वर्चस्व भविष्य के गर्भ में था लेकिन तमिळ गौरव को आँच लगने लगी थी। ऐसे में पिल्लई महाशय ने यह गीत रचा जिसमें सम्भवत: पहली बार, प्राचीन चोल-चेर-पांड्य शासकों की सामरिक साम्राज्यवादिता से इतर, साहित्यिक साम्राज्यवाद का बीज वपन किया गया। अपने मूल रूप में इस गीत में ‘आर्य’ भाषाओं के प्रति तिरस्कार तो था ही, परोक्ष रूप से उन्हें मृत और मिश्रित घोषित कर अक्षतयोनि पवित्र देवी के रूप में तमिळ भाषा को चिरयौवना बता उसे प्रतिष्ठित किया गया था।

 

 

நீராரும் கடலுடுத்த நிலமடந்தைக் கெழிலொழுகும்

சீராரும் வதனமெனத் திகழ்பரதக் கண்டமிதில்

தெக்கணமும் அதிற்சிறந்த திராவிடநல் திருநாடும்

தக்கசிறு பிறைநுதலும் தரித்தநறும் திலகமுமே!

அத்திலக வாசனைபோல் அனைத்துலகும் இன்பமுற

எத்திசையும் புகழ்மணக்க இருந்தபெரும் தமிழணங்கே!

பல்லுயிரும் பலவுலகும் படைத்தளித்து துடைக்கினுமோர்

எல்லையறு பரம்பொருள்முன் இருந்தபடி இருப்பதுபோல்

கன்னடமுங் களிதெலுங்கும் கவின்மலையாளமும் துளுவும்

உன்னுதரத் தேயுதித்தே ஒன்றுபல வாகிடினும்

ஆரியம்போல் உலகவழக்கழிந் தொழிந்து சிதையாவுன்

சீரிளமைத் திறம்வியந்து செயன்மறந்து வாழ்த்துதுமே

सब भाषाओं की जननी 
वन्दन हे तमिळ माता!


उफनता सागर वस्त्र सम लिपटा है ऊर्जस्वी महि से!
सुन्दर वदन, उदात्त भारतीय उपमहाद्वीप! 
दक्षिण! द्रविड़ देश विशेष!


सुन्दर तिलक है तुम्हारे सुन्दर वक्र ललाट
तिलक सुगन्ध से हर्षोन्मत्त संसार 
देवी तमिळे!

सब दिशाओं में भी फैलता तुम्हारा ऊष्म उत्साह।

 
अनेक जीवन! अनेक संसार, सब तुम्हारे रचे और तुमसे विनशे भी!
सर्व श्रेयस्करी रचयिते! तुम सदा बनी रहो,
जैसे कि अब तक हो!

 
कन्नड़, आनन्दी तेलुगू, तुलु के साथ नन्हीं प्यारी मलयालम!
सब तुमसे ही उपजीं! तुम्हारी सरजीं! तुमसे निकसीं! तुम्हारी रूप!   

आर्य भाषाओं से इतर,
जिन्हें न कोई बोलता, जो हैं गत और मृत।

 
तुम बनी रहो सदा चिरयौवना नवीन,
अकेली तुम बनी रहो शुद्ध भी सदा!
मैं प्रसन्न, तुम्हारी प्रशंसा में सुन्दर तमिळ सदा अक्षतयोनि!
मैं विस्मित अचरज भर! मैं तुम्हें सराहूँ, तुम्हें सराहूँ।
 
 

इस पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता आन्दोलन तेज होता गया, उत्तर 'हाबी' होता गया और 'बौद्धिक' तमिळों की सामूहिक हीनता ग्रंथि बढ़ती गयी। मद्रास प्रेसीडेंसी में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सन् 1937 में पहली सरकार बनी तब राजगोपालाचारी ने विद्यालयों में हिन्दी का पठन पाठन अनिवार्य कर दिया। ई.वी. रामास्वामी पेरियार और जस्टिस पार्टी ने हिंसक विरोध का नेतृत्त्व किया। तमिळ भूमि में अब तक वायवीय रही भाषिक और जातीय घृणा का ठोस बीज बो दिया गया। 1940 में कांग्रेस सरकार के हटने पर ब्रिटिश सत्ता ने हिन्दी का 'आरोपण' हटा लिया।

स्वतंत्र भारत के संविधान में हिन्दी और अंग्रेजी को साथ साथ 15 वर्षों तक बना रहने वाला राजभाषा का दर्जा द्रविड़ दबाव समूहों के कारण दिया गया। 26 जनवरी 1965 से एक दिन पहले जब कि अंग्रेजी को हट जाना था, मदुरै में हिंसक विरोध ने जन्म लिया और देखते देखते पूरा तमिळ प्रांत सुलग उठा। दो वर्षों तक चले सिंचन के पश्चात चुनावों में फसल काटी विजयी द्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी ने। तमिळ गौरव को पुनर्स्थापित करने के प्रयास तो बहुत पहले से जारी ही थे। 1966 में कुआलालम्पुर, मलेशिया में पहला विश्व तमिल सम्मेलन आयोजित किया गया। तब से चेन्नई, पेरिस. जाफना, मदुरइ, कुआलालम्पुर, पोर्ट लुइस, तंजावुर आदि नगरों से होते हुये नवें तक आयोजन हो चुके हैं।

इन्हीं के समांतर जून 1970 में  तमिळ ताय वाळत्तु को राज्यगान बना दिया गया। तमिळ 'राष्ट्रीयता' के उफान में इसे हर राजकीय अवसर पर भारतीय राष्ट्रगान से पहले गाया जाता है। इसका संगीत रचा प्रसिद्ध तमिळ संगीतकार 'मेल्लिसई मन्नार' MSV अर्थात मनयंगत सुब्रमनियन विश्वनाथन ने। चूँकि मूल गीत स्पष्टत: भाषिक अहंकार और तिरस्कार से भरा था इसलिये उसे संशोधित कर वैसे वाक्य निकाल दिये गये और गीत को संगीत अनुरूप करने के लिये पुनर्व्यवस्थित भी कर दिया गया:

நீராரும் கடல் உடுத்த நில மடந்தைக் கெழிலொழுகும்
சீராரும் வதனமெனத் திகழ்பரதக் கண்டமிதில்
தெக்கணமும் அதிற்சிறந்த திராவிட நல் திருநாடும்
தக்கசிறு பிறைநுதலும் தரித்தநறும் திலகமுமே!
அத்திலக வாசனைபோல் அனைத்துலகும் இன்பமுற,
எத்திசையும் புகழ்மணக்க இருந்த பெரும் தமிழணங்கே!
தமிழணங்கே!
௨ன் சீரிளமைத் திறம்வியந்து
செயல் மறந்து வாழ்த்துதுமே!
வாழ்த்துதுமே!
வாழ்த்துதுமே!


https://youtu.be/cfghItANhUU

भाषा के समांतर ही जातीय आन्दोलन भी चलते रहे। उनके लिये संस्कृत उन आक्रमणकारी आर्यों की भाषा है जिन्हों ने विश्व की सबसे पुरानी 'द्रविड़' सिन्धु सभ्यता का नाश कर दिया। हिन्दी उन ब्राह्मणों की आधुनिक हथियार है जो उत्तर से आते राजनैतिक वर्चस्व के अश्व पर सवार हैं। तमिळ से जुड़े किसी भी आन्दोलन के लिये कम्बन की रामायण सांस्कृतिक प्रतीक नहीं क्यों कि वह हिन्दू आर्य का प्रतिनिधित्त्व करती है। उसके स्थान पर सेकुलर तिरुक्कुराल को प्रतिष्ठा दी गयी है ताकि तमिळ जन को धार्मिक के बजाय 'भाषिक' और 'जातीय' आधार पर ध्रुवित किया जा सके।

पूरे इतिहास को जानने के पश्चात तमिळ को संस्कृत के प्रदूषण से मुक्त करने के अभियान, उत्तर भारतीय भाषाओं के प्रति तिरस्कार भाव और 'मृत' संस्कृत के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में संसार की एकमात्र जीवित 'क्लासिक' भाषा के रूप में तमिळ की स्थापना के आन्दोलन के कारण समझ में आ जाते हैं। साथ ही यह भी कि ऐसी क्षति हो चुकी है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता...

... डाभिल की अनेक बातें मन में चल रही हैं। पता चल गया है कि कहाँ से उधारी ली है! जाने मोइन-जो-दड़ो के जन मृत किस कारण हुये लेकिन ये तो सच हैं ही कि तमिळ राष्ट्रगान भी भरतवंशी आर्यों के नाम से ही इस देश को भारत பரதக் बताता है और एक दूसरे आर्य भरतमुनि के सृजन भरतनाट्यम से तमिळनाडु अपने को कभी अलग नहीं कर पायेगा, आर्य दूषण बना रहेगा!
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Although Tamil and a few other languages such as Greek, Latin and Sanskrit enjoy the status of classical language in the academic world thanks to their antiquity and rich literary heritage, Tamil is the first living language to be given the official status of a classical language. – Karunanidhi
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The politics of Tamilnadu during the twentieth century, as fascinating as it is complex, has been the subject of numerous studies. In Tamil politics, we find a textbook case of how issues of language and cultural identity can become prime factors in the political process.

I have already suggested that the hallmark of Tamil nationalism is vigorous opposition to linguistic and economic domination by the north. While no serious politician any longer argues that Tamilnadu should secede from the Indian union, the political rhetoric heard in Madurai during the conference week proved that language is far from a dead issue in the Tamil political scene.

All politicians who hold the slightest hope of success in Tamilnadu are obliged to take a strong stand against Hindi imposition, a sentiment that was voiced openly and loudly at the many ancillary conference events.
– From a Report on Tamil World Conference, 1981

(http://www.tamilnation.co/conferences/cnfMA81/index.htm)

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

तमिळ क्षेत्रे डाभिल संवादं - 1

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वे रामायण की एक बात के पक्के समर्थक हैं – बिना पंगे के कोई ‘आर्य’ दक्षिण नहीं आता।
इस प्रकार वह मुझे राम की परम्परा से जोड़ते हैं। आनन्ददायी सज्जन हैं क्यों कि उनके
पास सब कुछ कसौटी कसा है, शालिग्राम ऐसे ही नहीं कहा मैंने? उत्तर कभी नहीं गये
लेकिन इतना खूब जानते हैं कि वहाँ अभी भी बर्बर बसते हैं जिन्हें हगने तक का सहूर नहीं!
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उनका नाम मैं डाभिल रख देता हूँ, ‘द्रविड़’ से ध्वनि साम्य है और वैदिक युग की पवित्र वनस्पति दर्भ के भोजपुरी संस्करण डभिला से भी। शालिग्राम शिला सम वर्ण और The Core चलचित्र के Mr. Rat जैसा चेहरा अर्थात डी एम के के समर्थक ये सज्जन स्वयं को घनघोर द्रविड़ मानने के बावजूद ‘अनास’ नहीं, मेरी सूँड़ की तरह ही लम्बी नाक वाले हैं। देह बिचुके घेंवड़े जैसी है अर्थात पेट अच्छा खासा निकला हुआ किंतु ऊपर नीचे धड़ पतला।

जिस दिन से आया हूँ उस दिन से बहुत उत्सुक रहते हैं – मेरा दायित्त्व क्या है? कार्यभार कितना है और कौन सा? कहीं मैं अतिरिक्त तो नहीं? रामायण की एक बात के पक्के समर्थक हैं – बिना पंगे के कोई ‘आर्य’ दक्षिण नहीं आता। इस प्रकार वह मुझे राम की परम्परा से जोड़ते हैं। आनन्ददायी सज्जन हैं क्यों कि उनके पास सब कुछ कसौटी कसा है, शालिग्राम ऐसे ही नहीं कहा मैंने? उत्तर कभी नहीं गये लेकिन इतना खूब जानते हैं कि वहाँ अभी भी बर्बर बसते हैं जिन्हें हगने तक का सहूर नहीं!

गंगा प्रदूषण समस्या का हल पहले दिन ही बता दिये थे – दोनो ओर एक किमी तक के पाट क्षेत्र में मनुष्यों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाय! मेला और स्नान जैसे ढकोसलों के लिये गंगा का पानी पम्प कर स्थान स्थान पर टोटियाँ लगा दी जायँ। बाकायदा पेपर पर प्लान बना कर मुझे समझाये भी। मैंने पूछा – आप विज्ञान स्नातक हैं? (विज्ञान पढ़े मित्र कोहनायें नहीं, कॉमन सेंस की कमी वैज्ञानिकों में होती ही है। वैसे मैं भी विज्ञान का ही विद्यार्थी रहा हूँ।) वह प्रसन्न हो कर उत्तर दिये – केमिस्ट्री में पी जी हूँ, आप को कैसे पता? मैंने कहा – उत्तर में ऐसे बहुत से वैज्ञानिक पाये जाते हैं। इस पर चिढ़ गये और दक्षिण की वैज्ञानिकता के गुण गाने लगे। मैं आनन्दित होने लगा। बहुत बाद में समझ पाये कि मैं मजे ले रहा हूँ तो उठ कर चले गये।

आज बड़ी विचित्र बात हुई। संसद का हंगामा मेरी टेबल तक ले आये जैसे कि उनकी गाढ़ी कमाई के 300 करोड़ रुपयों की बरबादी का मैं ही जिम्मेदार हूँ! मैंने बस इतना कहा – देखिये, बरबादी भी रसूख के हिसाब से होती है। आप हल्ला काटेंगे, ऑफिस में काम करने के बजाय इधर उधर डोलेंगे तो बरबादी हजार में सिमट कर रह जायेगी। वह संसद है, पूरे भारत का कार्यालय। वहाँ काम नहीं होगा तो...। मैंने बात जान बूझ कर अधूरी छोड़ दी कि देखें अब क्या करते हैं? दाँव उल्टा पड़ गया। उत्तर में कार्यालय के डाभिल बमकते हैं तो उठ कर चाय पीने चले जाते हैं लेकिन ये तो कुर्सी खींच जम गये। मैंने भी गोदऊपर का फाटक नीचे दबाया और कागज कलम ले कर गांधी वंश के पाड़ा के गुरु की तरह सुन्दर अक्षरों में नकलनोट बनाने लगा।

उन्हों ने बात शुरू की - Bloody Hell! These RSS goons. एक्स्प्लायट करते हैं। पहले दलितों पिछड़ों को शोषित कर राज करते रहे और इस युग में कल्याण सिंह, गोविन्दाचार्य, बंगारू और अब ये साला मोदी, सबकी बुद्धि खराब कर के मजे ले रहे हैं – शोषक! मैंने छींटा मारते हुये कहा – प्राचीन भारत में आर एस एस कहाँ था? घी की छिड़क से जैसे आग भड़कती है वैसे ही भभक उठे – नाम बदल लेने से क्या होता है? मेंटलिटी तो वही रहेगी न, पिस्सू कहीं के। अचानक उन्हें कुछ याद आया तो एकदम शीतल माइनस चार अंश सेल्सियस हो कर पूछे – You are Brahmin? No… मैंने कहा – अरे नहीं, मैं मूलनिवासी हूँ।

ट्रैक बदल गया जैसे ‘चोरबजारी दो नयनों की गीत’ समाप्त हो और ‘मन तरपत हरि दरसन को आज’ शुरू – How come you call yourself aboriginal? Your skin is fair. मैंने कहा – श्वेत नहीं, गेंहुआ wheatish. क्या आप जानते हैं कि गेहूँ को राक्षस अन्न क्यों कहा जाता था? उनके लिये नयी बात थी। ऐसे मौकों पर वे बहुत ही आनन्ददायी मुद्रा अपना लेते हैं – ओठ गोल कर सीटी बजाने का अन्दाज लिये आगे की ओर झुकते हुये फुसफुसाते हैं – ऐसा क्या? कहो, कहो! उनके बायें पैर की थरथराहट का आप अनुभव कर सकते हैं और साँसों से आती फेकराहिन बू का भी।

मैंने उन्हें विजयी भाव से उत्तर दिया – इसलिये कि गेहूँ का रंग भी यहाँ के मूलनिवासियों की तरह ही स्वर्णिम भूरा था और यहाँ के मूलनिवासी तो राक्षस ही थे न? तो चावल खाने वाले आक्रमणकारी आर्यों ने उनके अन्न को भी राक्षस बता दिया! उनकी आँखें गोल हो फैल गयीं – क्या बकवास कर रहे हो? यूरोप में चावल कहाँ होता है?

मैंने कहा – हजारो साल पहले जब वहाँ आर्य थे तब वहाँ खूब वर्षा होती थी। आप तो जनबे करते हैं कि चावल अर्थात धान पानी का कीड़ा होता है। जब घटा उमड़ती, बिजली कड़कती तो वर्षा के देवता इन्द्र की स्तुति में वे लोग प्रसन्न हो मंत्र पढ़ने लगते। सफेद चावल से प्रेम करने वाले आर्य उसके बिना रह नहीं सकते थे। जलवायु परिवर्तन से वहाँ जब धान होना बन्द हो गया तो वे भारत अर्थात दक्षिण की ओर बढ़े क्यों कि यहाँ पानी ही पानी था - नीचे नदियों का जाल, ऊपर से वर्षा विकराल! धान ही धान खेत खलिहान। वे ही यहाँ धान ले कर आये थे।

उन्हों ने मेरी और ठीक वैसे ही देखा जैसे आप पढ़ते हुये सोच रहे हैं – क्या फालतू आदमी है! हँसते हुये उठ खड़े हुये – सुबह से कोई मिला नहीं था क्या बकवास सुनाने को?

मैंने कहा – अभी बात पूरी नहीं हुई। यहाँ भारत में अर्थात रक्षभूमि में गोधूम होता था। वे लोग उपले जला कर उनमें गेहूँ की लिट्टियाँ पका कर खाते थे। गाय के गोबर यानि गोमय और आग के धुँये का संगम उस भोजन के लिये अति आवश्यक था इसलिये आज का गेहूँ तब गोधूम कहलाता था। आर्यों को वह पसन्द नहीं आया क्यों कि सफेद आटा भी पकने पर राक्षस रंग का अर्थात गेंहुआ हो जाता था।

वे अट्टहास कर उठे – यार तुम हो बहुत मनोरंजक! तुम्हारे पास रोज आना पड़ेगा। अच्छा अब यह भी बता दो कि तुम्हारे आर्यों का रंग कैसा था?

मैंने तरस खाते हुये बता दिया – काला। रंग से देखें तो आप शुद्ध आर्य अर्थात देव हैं। यूरोप के राक्षसों की गोराई देख हीन भावना रखने वाले आर्य जितना प्रेम सफेदी से करते हैं उतना कोई नहीं करता। उनके इस प्रेम के आगे सब फीके – चाहे रामदेव का सफेद धन से हो, चाहे भुअरी भँइस का अपने गोरे पड़वे से ...

... नोट बनाने में तल्लीन मुझ बकवासी को पता ही नहीं चला कि वे कब चले गये। मुझे शंका है कि मेरी अंतिम बात वे सुन पाये होंगे। कोई बात नहीं, अगली बार सुना दूँगा, जब पुष्पक विमान और रंग बिरंगी बिल्लियों की बात बताऊँगा तब!

रविवार, 26 अक्टूबर 2014

उन्माद और अवसाद

उन्माद

'तिष्ठ' माने बैठना सभी जानते हैं। यहाँ बैठने का प्रयोग खड़े होने के विपरीत के अर्थ में नहीं, स्थाणु - जम जाने के अर्थ में है जैसे आग पर रख कर बारम्बार पकाये जाने वाले बरतन की तली में 'जरठा' बैठ जाय। 'प्र' उपसर्ग 'अति, अत्यधिक आदि' के लिये प्रयुक्त होता है, यह भी जानते हैं। इन दोनों के युग्म से बनती है -प्रतिष्ठा। माने की जो बहुत जम के बैठ जाय, मिटाये न मिटे वह प्रतिष्ठा। पुरानी रचनाओं में इसका प्रयोग वांछनीय और अवांछनीय दोनों के लिये हुआ है - नामी चोर की भी प्रतिष्ठा होती थी! कालांतर में इसका विधायी रूप प्रचलित हो गया। जब ऐसा हुआ तो इसका अंतिम महाप्राण व्यंजन 'ठ' बहुत मारू हो गया। जब अल्पप्राण ध्वनियों में 'ह' जुड़ता है तो महाप्राण ध्वनि बनती है जैसे ट+ह = ठ, त+ह = थ आदि। ध्वन्यात्मकता से देखें तो बिना 'महा'प्राण 'ठ' के इस शब्द में ठसक आती ही नहीं!

प्रतिष्ठा के साथ मद भी आता है। मति कहीं स्थिर हो जाय तो मत बनता है। 'मत' जब अड़ने लगता है तो एक 'त्' और जोड़ लेता है और मनुष्य मत्त हो जाता है। जैसे ट से ठ तक पहुँचते पहुँचते शब्द वजनी हो जाता है वैसे ही जब ये डेढ़ 'त' अपने महाप्राण 'थ' पर पहुँचते हैं तो चित्त को मथ देते हैं और ऐसे में 'द' तक पहुँचते देर नहीं लगती, मन मन्मथ हो मदमत्त हो जाता है। ध तक पहुँचते मदांध होना स्वाभाविक है। ऐसे व्यक्ति की तुलना मद बहाते हाथी मतंग या मतंगज से की जा सकती है। उत्त-उन्न परिवार के उपसर्ग का अर्थ भिगोने से है। मन मद से पूरा अस्तित्त्व भीग जाय तो उन्मत्त होना स्वाभाविक है। पहले की ही तरह त से द तक आते आते व्यक्ति उन्मादी अर्थात मद रूपी सुरा(द्रव) के वशीभूत हो जाता है।
साधो! इस प्रकार उन्माद तक की स्थिति आने में कई पड़ाव आते हैं। उन्हें पहचान कर पहले ही उपाय कर लो ताकि भवसागर से तरे रहो।

अवसाद

अवसाद बहुत मायावी शब्द है। इसके लिये पहले साद को समझ लिया जाय। साद मन:स्थिति का अर्थ इस रूपक से समझा जा सकता है जैसे कि चलते चलते रथ का पहिया कीचड़ में गहरे धँस गया हो! मने कि खो जाने का, डूब जाने का, रुक जाने का, गति थम जाने का, गइल भँइसिया पानी में जैसा नैराश्य भरा भाव। 'अव' लग जाने पर यह सहारा पा और सान्द्र हो जाता है। 'अव'लम्ब से समझिये कि किसी थमे स्तम्भ के सहारे स्वयं को ढीला छोड़ दिया जाय, स्तम्भ खुदे डूबशिरोमणि हो तो क्या कीजै!

तुलसी बाबा तो तोड़ मरोड़ कर कहा जा सकता है कि विशिष्ट आश्रय ले अवसाद 'विषाद' हो जाता है। सीता और राम को भुँइया सोये देख निषाद को विषाद भया!

भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी।।

इस साद के आगे 'प्र' जुड़ते ही चमत्कार होता है। मामला एकदम्मे उलटा हो जाता है। प्रसाद - प्रसन्नता, चमक, उत्साह, दयालुता भरा प्रशांत प्रसन्न भाव - प्रसीद प्रसीद परमेश्वरी प्रार्थना वाला। नव्य ढंग से कहें तो अवसाद से मुक्ति पाने के लिये आप को अव का साथ छोड़ प्र का साथ थामना है, pro होना है, बकिया तो सब मन में हइये है।

वैसे कई लोगों को स को श और श को स कहने की आदत होती है (मुझे भी है)। स को श कहा जाय तो साद 'शाद' हो जाता है। फारसी में 'शाद' के अर्थ आह्लाद, आनन्द, सुख आदि हैं। इसी से 'शादी' बनी है, जिसके अनुसार विवाह माने आनन्द और सुख की प्राप्ति। वह सुख दाम्पत्य का सुख होता है, रतिसुख होता है, संतान सुख होता है आदि आदि हालाँकि तमाम मर्द मानुष शादी के पश्चात आनन्द या सुख नाम की धारणा से तवज्जो न रखते हुये उसे कल्पित ही मानते हैं (मानो कल्प भर की ईति गले पड़ गयी हो!), जब देखो तब बेलन जनित अवसाद का रोना रोते रहते हैं। आप किस ओर हैं?

शनिवार, 23 जून 2012

नैहर जाने के पहले ...

पत्नी के नैहर जाने के पहले पति पत्नी संवाद (अगर कह सकें तो) : 

1. पेपर वाला एडवांस ले गया है। फिर से माँगने आये तो भगा दीजियेगा। हो सके तो छुट्टी ही कर दीजियेगा। 
- हूँ। (मन में - पढ़ता ही कहाँ हूँ, फालतू का खर्च। तुम्हें यही दिखता है न?) 
2. कामवाली एक टाइम आ कर कर जायेगी सब काम। आप रोटी तो नहीं बनायेंगे न
- (मुझे अकेले में कामवालियों के साथ  उलझन होती है) अरे मैं खुद कर लूँगा। उसे भी छुट्टी दे दो। 
- नहीं, आ कर कर जायेगी एक ही टाइम 
 
- (मन में) अब कौन समझाये इन्हें
3. रात में पौधों में पानी दे दिया है। शाम शाम को पानी देते रहियेगा। 
- हूँ (मन में - बारिश होगी ही, पानी देने की क्या आवश्यकता? इतना भी नहीं समझती)। 
4.धुले कपड़े बाँध कर रख दिये हैं। धोबी आयेगा तो प्रेस करने को दे दीजियेगा। 
- (मन में) अरे तुम जाओ तो सही! अब कौन टोकने वाला है,"पैंट मैचिंग नहीं। कल ही इस कलर की पहने थे, आज फिर वैसी ही शर्ट उठा लिये! दिमाग है भी या नहीं?"। है यार! लेकिन चलता नहीं है ऐसे मामलों में। 
5. (प्रकट में) बच्चों के लैपटॉप आलमारी में बन्द कर दी हूँ। (निहितार्थ) बेहूदे प्रयोगों के लिये बाहर मत निकालना। 
- हूँ। इसमें बताने वाली क्या बात है
6. आम हैं। दही जमा दी हूँ। चिउड़ा है। दूसरे फल भी हैं। सब्जियाँ, आलू, प्याज भी हैं। चावल उधर नीचे है। फ्रिज में एक दिन का खाना रखा है। सोमवार से पहले खाना बनाने की कोई जरूरत नहीं। 
- हूँ (मन में - सिवाय आम, दही और दूसरे फलों के सब व्यर्थ हैं सुभद्रे! इस भयानक उमस में गैस बारना अपने मान का नहीं)  
7. घर खुला न छोड़ दीजियेगा। छुट्टियों में लैपटॉप के अलावा कभी कभी बाहर निकल कर देख भी लीजियेगा, चाभियाँ वहीं हैं। 
- हूँ (मन में - कौन कारूँ का खजाना रखा है? बाहर क्या देखने निकलूँ?) 
8. दूसरा मोबाइल चार्ज रखियेगा। ये रहा चार्जर।आप के मोबाइल पर तो नेट का कब्जा है, हमेशा इंगेज।  
- हूँ (मन में - आज तक सिवाय इनके किसी को परेशानी नहीं हुई - ऑफिशियल या प्राइवेट कोई भी। विदेशी ब्लॉगर तक मिला कर पछताते हैं कि पकड़ लेता है तो छोड़ता ही नहीं! ...चलो इसी बहाने पुराना मोबाइल तो दिखा। कितने दिनों के बाद इसके दर्शन हुये!सिम बदल कर देखता हूँ कि अब भी इसमें नेट चलता है क्या?)  
9.
 आलमारी खुली मत छोड़ दीजियेगा। एक छोटी चुहिया घूमती दिखी मुझे। 
- हूँ (मन में - चुहिया दिखी होगी तो तुम्हारा क्या हाल हुआ होगा!) 
10. 
किसी भी बरतन का मुँह खुला मत छोड़ियेगा। छिपकलियाँ हैं, कीड़े फतिंगे हैं, बरसात आने वाली है। 
 - हूँ (मन में - तुम जाओ तो यहाँ भी बरसे। बारिश को तुमने ही रोक रखा है।)
11. धुली चादरें रखी हैं। तकिये के कवर भी। बदलते रहियेगा।
 - हूँ (मन में - तीन कमरों में दो दो दिन सोये तो सप्ताह बीत जायेगा। चादरें बदलने की क्या आवश्यकता?)
12. 
मोजे कोने में न फेंक कर धुलते रहियेगा। 
- हूँ (मन में - इसके लिये धन्यवाद। मुझे बदबू सहन नहीं होती) 
13. 
रोज शाम को टंकियों का पानी देख लिया करियेगा। मोटर चलाते रहियेगा। 
- हूँ (मन में - किसी दिन खाली रह गयीं तो ऑफिस गेस्ट हाउस जिन्दाबाद! वैसे भी पानी खर्चने वाले तो जा ही रहे हैं।) 
14. एलर्जी की दवायें रख दी हूँ। ये देखिये - यहाँ। 
- हूँ (मन में - तुम नहीं रहती हो तो एलर्जी भी फरार रहती है।) 
15. बुक शेल्व खुला मत छोड़ियेगा। कितनी धूल जम जाती है। साफ करते अब मुझे भी परेशानी होने लगी है, कामवाली के वश का नहीं। उस वैक्युम क्लीनर को तो हटा ही दीजिये। किसी काम का नहीं। 
- हूँ (मन में - अब तो मैं बहुत कम पढ़ता हूँ। खोलता ही कहाँ हूँ कि धूल जमे? तुम्हें तो बस कहने के लिये कुछ चाहिये।)
16. जाऊँ न
- हाँ, अपना मोबाइल हमेशा ऑन रखना और पास रखना। हा, हा, हा। 
- (मुस्कुरा कर) मुझे पता था कि अंत में यही होने वाला है... 

(सूचनार्थ - तीन दिन बाद नैहर जाने की योजना थी। छोटे चाचा आ गये तो तीन दिन पहले ही जाने की योजना शाम को बनी और प्रात: फरारी भी हो गई! इन्हें योजना आयोग का मेम्बर बना दिया जाय तो देश कितनी तरक्की कर जाय!)  
_______________ 
(जाने के आधे घंटे के बाद) 
निगम चुनावों के वोट के लिये पड़ोसियों की मीटिंग में जाना है।  घर की चाभी मिल नहीं रही कि बन्द कर सकूँ।
श्रीमती जी का मोबाइल 'आउट ऑफ कवरेज एरिया' बता रहा है। धन्य भाई साहब यानि कि बी एस एन एल ...धन्य मैं!
___________
अपडेट - प्रस्थान के एक घंटे ही हुये होंगे और बारिश शुरू हो गई है :) ;) 
...उड़ी बाबा! छत पर कपड़े तो नहीं?
कौन देखने जाय? जाते हुये बताया नहीं तो नहीं ही होंगे।

गुरुवार, 12 मई 2011

बेल का रस

अभी अभी दो गिलास बेल का रस गटके हैं। 
चम्मच से ककोर ककोर गूदा खाये हैं (देखिये कितना साफ कर दिये हैं खपड़ोई को!)।

 बहुत दिनों बाद आज श्रीमती जी को हृदय से धन्यवाद दिये हैं(संडे को पार्टी पक्की - बेल के नाम!)...
बहुत दिनों बाद ईश्वर को याद कर धन्यवाद दिये हैं कि यूरोप जा बसने का प्लान ठंड से डरा कर कैंसिल करा दिया ... वहाँ बेल कहाँ मिलते? गर्मी में भारत कहाँ आ पाते? ;) ...
तृप्त हो गया आज तो! 
तृप्त होकर आदमी आँय बाँय भी बकता है। NRI साथी बुरा न मानें प्लीज!

शुक्रवार, 6 मई 2011

सावधान! ...एक डिस्क्लेमर









ऐसी शिकायतें मिली हैं कि मेरे नाम से लोगों को पुस्तकें भेजी जा रही हैं। अगर आपको मेरे नाम से पुस्तक, पत्रिकादि के पार्सल डाक या कुरियर से मिलें तो जान लीजिये कि उन्हें मैं नहीं कोई और भेज रहा है। 
सावधान! वह व्यक्ति फर्ज़ी और जाली है।

... पुस्तकें भले ही असली हों।



सोमवार, 2 मई 2011

बजरलंठ ब्लॉगर समारोग

प्रस्तावना:
पिछ्ली पोस्ट में मैंने एक फोटो लगा कर उसके किसी ब्लॉगर का फोटो होने की सम्भावना के बाबत पूछा था। अभी पर्याप्त उत्तर आ गये हैं (इससे अधिक मेरे ब्लॉग पर आते भी नहीं :)अब खुलासा करते हैं।
 अपनी गम्भीर छवि (;) हा,हा,हा!) के विपरीत मैं चेहराकिताब (facebook अनुवाद साभार - योगेन्द्र सिंह शेखावत) पर मित्रों को यूँ ही कोंचा करता हूँ। मित्र लोग भी खूब आनन्द लेते हैं। एक नमूना देखिये:

      • Saturday at 12:40pm


  • फेसबुक पर किसी को poke क्यों किया जाता है? Poke Back के क्या मायने होते हैं?
    मासूम प्रश्नों के मासूम उत्तर अपेक्षित हैं। :)
    Saturday at 5:55pm ·  · 

      • Yogendra Singh Shekhawat पोक करने का अर्थ तो कुछ घुसाने या लकड़ी करने से है होता है न |जैसे याहू मैसेंजर में "बज़" करने का रिवाज़ है वैसे ही यहाँ कुछ लकड़ी करने का रिवाज़ है |
        Saturday at 6:44pm ·  ·  2 people

      • Girijesh Rao कुछ अधिक ही 'मासूम' उत्तर है। धन्यवाद :)
        Saturday at 6:46pm via  ·  ·  2 people

      • Rajkumar Singh गिरिजेश जी , चिकोटी ,गुदगुदी ,चुटकी ..........कैसे रहेगी पोक के लिए ? या ज्यादा गंभीर होना है तो ठेल देना !
        Saturday at 7:09pm ·  ·  2 people

      • Girijesh Rao सही हैं सब। समझ में आ गया। धन्यवाद :)
        Saturday at 7:12pm via  ·  ·  1 person

      • Arvind Mishra Bade jaldi samajh gaye;-)
        Magar aisa log bag karte karwate kyon hain?
        Abhi ek FB YAUVANA ne mujhe poke kiya,fb ne sanket kiya ji main ab unhe pok kar dun so kar diya,ab mujhe pataa nahi ki ve poked hui bhi ya nahi!

        Saturday at 7:41pm ·  ·  4 people

      • Yogendra Singh Shekhawat मेरा एक दोस्त बहुत Poke करता है, जब भी वह Poke करता है, फेसबुक कहता है उसको Poke "Back" करो |
        Saturday at 7:42pm ·  ·  2 people

      • Shiv Mishra चलते-फिरते 'खोद' देने का भाव उत्पन्न होता है.
        Saturday at 7:45pm ·  ·  1 person

      • Girijesh Rao ‎@ Arvind Mishra 'लकड़ी' और 'ठेल देना' जब आये गये तो समझ में आ गया बॉस! :)
        Saturday at 7:46pm ·  ·  1 person

      • Yogendra Singh Shekhawat ‎@Shiv Mishra, गुर्र र्रर्र (बांकेलाल कॉमिक्स की शेरनी ) (यहाँ खाम्ख्वाह क्यों गलत अर्थ निकाल कर हम मासूमों को गुमराह किया जा रहा है, Poke से "खोद देने" का भाव है तो फिर Poke Back का क्या अर्थ कीजियेगा ?)
        Saturday at 7:53pm ·  ·  2 people

      • Shiv Mishra ‎@Yogendra Singh Shekhawat ji, उत्तर के मासूम होने की शर्त पर ध्यान दिया जाय. लोगों की मासूमियत पर नहीं:-)
        Saturday at 7:54pm ·  ·  2 people

      • Girijesh Rao ‎@ Yogendra Singh Shekhawat मुझे यह समझ में आया है कि जैसे चलते फिरते किसी को अंगुली से कोंच दिया जाय और बदले में वह शख्स भी ऐसा करे। मित्रों के बीच ऐसा होता ही है (इस क्रिया का 'अंगुल करने' के व्यंजनात्मक अर्थ से लेना देना नहीं है।)
        Saturday at 7:57pm ·  ·  1 person

      • Shiv Mishra और Poke Back से जबाबी खोद का भाव निकाल लेने में क्या हर्ज़ है?
        Saturday at 7:57pm ·  ·  2 people

      • Shiv Mishra गिरिजेश जी, आपने ठीक कहा. 'कोंचना' जो है वह 'पोकने' के एकदम नज़दीक है.
        Saturday at 7:59pm ·  ·  2 people

      • Yogendra Singh Shekhawat ‎(टाईगर स्टाईल पोक बेक कमेन्ट) गुर्र ररर रर्र.. (चलो ठीक है मान लिया, बहुत बढ़िया अर्थ है )
        Saturday at 8:00pm ·  ·  2 people

      • Yogendra Singh Shekhawat लेकिन शेर को पोक बेक मत करना नहीं तो खोद देगा |
        Saturday at 8:01pm ·  ·  1 person

      • Girijesh Rao ‎@ Shiv Mishra गनीमत है 'पोंकना' नहीं हुआ। अनुस्वार का अंतर महत्त्वपूर्ण है।
        Saturday at 8:02pm ·  ·  1 person

      • Girijesh Rao ‎@ Yogendra Singh Shekhawat फेसबुक पर अपनी दोस्ती मनुष्यों तक ही सीमित है इसलिये खतरा नहीं है। वैसे फेसबुक पर अनजान लोगों को तो 'पोका' नहीं जा सकता न?
        Saturday at 8:06pm ·  ·  1 person

      • Rajani Kant P= Pappu
        O= On
        K= Keyboard
        E= Entertained

        Saturday at 8:32pm ·  ·  2 people

      • Prashant Priyadarshi हा हा हा...
        Saturday at 10:39pm · 

      • Rajkumar Singh ‎@अरविन्द जी ,आप खुशनसीब हैं .यहाँ तो इंतजार है ' पोके ' जाने का :) .
        Yesterday at 2:48am · 

        • Yesterday at 2:48am · 

        • Abhishek K. Arjav 
          इस पोकिंग पर कुछ लिखने को मन आया था लेकिन फिर ऐंवें ही छोड़ दिया .
          जब हम छोटॆ कस्बों , गावों मे रहते थे तो खेत की पगडण्डियों से गुजरते हुये ललता चच्चा मिल जाया करते थे , सिर पर ऊख का बोझ रक्खे, जाते हुये, वो रुकते तो नहीं थे , लेकिन पूछ लिया करते थे , का बचवा , का हाल चाल ह !सब नीक त हव न ! यह वही फेसबुक की पोकिंग है.
          शाम को टहलने निकलने पर नहर से होते हुये शिवमूरत हलवायी की दुकान पर चाय पीने के लिये जाते हुये अकेला बाबा वाले चौराहे पर अवनीश , सतीश , फतेह , मिल जाया करते थे , अपने छोटे से इण्टर कालेज की कमेस्ट्री की लैब को "मेंटेन" रखने वाले रामखॆलावन भईया सांझ की तरकारी कीन कर जाते हुये टकरा जाते थे .
          सब अपने अपने रास्ते पर अपनी दिशा में बढ़्ते हुये , बिना रुके , बस एक दूसरे का हाल चाल पूछ लिया करते थे ! साथ के संगी साथी एक दूसरे को कुछ टान्ट मार दिया करते थे, कोंच लिया करते थे, यह वहीं फेसबुकीय पोकिंग है.
          आंचलिकता बदल गयी है , स्थानीयता बदल गयी है ,जो यथार्थ हमें वास्तविक तौर पर जोड़ता है , उसकी प्रकृति बदल गयी है लेकिन कुछ सामूहिक आदतॊं के भेस में बहती रहने वाली , वह एक बहुत ही महत्वहीन , नगण्य परंपरा यहां अन्तर्जाल पर चेहरे की इस किताब पर मौजूद है !
          यह पोकिंग बहुत अच्छी लगती है मुझे.जब भी यहां आता हूं, दो चार लोगों को पोकिया देता हूं

          Yesterday at 11:19am ·  ·  1 person

        • Girijesh Rao ‎@ आर्जव - जीय रजा! जीय।
          Yesterday at 12:02pm ·  ·  1 person

उसी दिन नीरज बसलियाल (उत्तम श्रेणी के बिलागर हैं, काँव काँव करते हैं लेकिन कम। अधिकतर कबाड़ते रहते हैं) का स्टेटस दिखा और मुझे उसमें कबीर टाइप उलटबाँसी दिखी सो 'कोंच दिया' अपनी इस्टाइल में। उनका उत्तर देखने के लिये नीचे ताकिये:


Time wounds all heels

Yesterday at 6:09pm via Mobile Web ·  · 
उनके दिये लिंक पर गया तो दंग रह गया। वहाँ जो फोटो था वह हिन्दी ब्लॉग जगत के एक जाज्वल्यमान(कृपया अर्थ के लिये शब्दकोष देखें। न मिले तो शब्द सम्मिलित करने की सलाह इस ब्लॉग का सन्दर्भ देते हुये प्रकाशक को भेज दें)  नक्षत्र के जैसा दिखता था। मैं अपनी इस नज़र पर बहुत प्रसन्न हुआ। मैंने तुरंत नीरज जी से बात बताई तो उन्हों ने दाँत दिखाने वाला चिह्न चैट पर लगा दिया। मैंने कहा कि इसे ब्लॉग पर लगा कर तपास करता हूँ। इस पर उन्हों ने वादा किया कि वह हस्तक्षेप नहीं मतलब कि टिप्पणी नहीं करेंगे।
 असल में मैं उन टाइप के लोगों के साथ हीनभावना का शिकार हो जाता हूँ जो टटका पैदा हुये बच्चे के भी नाक, नयन नक्श देख पापा, पापी, नाना, नानी, बाबा, बाबी वगैरह के अंगों से साम्यता दिखाने लगते हैं जब कि मुझे कुछ बुझाता ही नहीं :( 
 वयस्क व्यक्ति का ही सही दूसरी बार (पहली बार वाला फिर कभी बताऊँगा ;)) मैंने चेहरे की साम्यता को साफ पहचाना था इसलिये हीनभावना से मुक्त होकर पोस्ट करने को खासा उत्साहित था।
(प्रस्तावना समाप्त) 

मैंने पोस्ट लगा कर आप सबसे पूछ ही लिया। 10 मिनट के अन्दर ही सतीश सक्सेना जी का सटीक गेसनुमा उत्तर आ गया:
सतीश सक्सेना ने कहा…

सिगार के साथ अनुराग शर्मा ??? .....
रविवार, १ मई २०११ ७:५९:०० अपराह्न IST

कुल मिला कर चार सही उत्तर आये: 
 निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

अनुराग शर्मा
रविवार, १ मई २०११ ९:४६:०० अपराह्न IST 

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…


फोटू स्मार्ट क्‌ है:)


रंजना ने कहा…

अनुराग शर्मा (स्मार्ट इंडियन)...???

5.  शब्द कंजूसी सम्मान - प्रवीण पाण्डेय (इनकी टिप्पणियों में शब्दों की किफायत उल्लेखनीय होती है। पिछ्ली पोस्ट पर भी है। अब तक इनके द्वारा यहाँ की गई 106 टिप्पणियों में कुल शब्दों की संख्या प्राचीन काल में मेरे द्वारा की गई किसी एक टिप्पणी की शब्द संख्या से कम होगी।) 


 इस पोस्ट से स्मार्ट इंडियन या नीरज बसलियाल का कुछ लेना देना नहीं है। किसी भी गलतफहमी के लिये दोनों स्वयं जिम्मेदार होंगे।