गुरुवार, 24 मई 2018

नारद पुराण में राम उपासना

नारद पुराण में विविध आराध्यों की उपासना विधियाँ बीज मन्‍त्रों, न्यासादि के साथ दी हुई हैं। फेसबुक पर श्री विशाल वर्मा ने 'र' अक्षर की महत्ता पर लिखा तो सहज ही ध्यान में आया कि तन्‍त्र में शारदा लिपि की अक्षर-मात्रायें देवी विग्रह के रूप में भी जानी जाती हैं।

वैदिक शब्द 'भरत' अग्नि अर्थ में भी प्रयुक्त है, 'र' वर्ण को अग्नि से सम्बद्ध बताने के संदर्भ उपलब्ध हैं। मैंने सोचा कि पुराण अध्ययन क्रम में नारद पुराण में ढूढ़ूँ तो सम्भवत: कुछ मिल जाये। क्या संयोग है! मिल ही गया। 
रामोपासना का मन्‍त्र 'रामाय नम:' वैष्णव मन्‍त्रों में सर्वाधिक फलदाता है, गाणपत्यादि मंत्रों से कोटि कोटि गुना प्रभावी।... 
वैष्णवेष्वपि मन्त्रेषु राममन्त्राः फलाधिकाः । गाणपत्यादिमन्त्रेभ्यः कोटिकोटिगुणाधिकाः ॥ १,७३.३ ॥

विष्णुशय्यास्थितो वह्निरिन्दुभूषितमस्तकः । रामाय हृदयान्तोऽयं महाघौधविनाशनः ॥ १,७३.४ ॥

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दूसरे श्लोक में 'र' वर्ण की विवेचना स्पष्ट होती है।वह्नि अर्थात अग्नि रूपी अक्षर 'र' विष्णु शय्या पर अवस्थित है। 'म' रूपी सोम (चन्द्र) इसके मस्तक पर विराजमान है तथा यह 'आय' से अंत होता है -
रामाय नम:।

बीज रूप में राम को वर्णन अनुसार 'राँ' लिखा जाना चाहिये। एकाक्षर रघुपति मन्त्र, मानों दूजा कल्पवृक्ष। 
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वह्निः शेषान्वितश्चैव चन्द्रभूषितमस्तकः । एकाक्षरो रघुपतेर्मन्त्रः कल्पद्रुमोऽपरः ॥

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वह्नि: - अग्नि स्वरूप 'र'
शेषान्‍वित - शेष अर्थात 'आ' की मात्रा [लक्ष्मण को शेष का अवतार भी कहा जाता है]
चन्द्रभूषित मस्तक: - सिर पर चन्द्रबिन्दु
(ँ चिह्न तन्‍त्र में विविध अर्थ रखता है, शक्ति से भी सम्बंधित, जाने क्यों चंद्रवदनी सीता देवी ध्यान में आने लगती हैं, 'राँ' अरण्य में रमते राम, सीता एवं लक्ष्मण का प्रतीक तो नहीं?)

मुझसे बहुत पहले किसी ने पूछा था कि सूर्यवंशी राम 'रामचंद्र' क्यों कहे जाते हैं। प्रतीत होता है कि आज उत्तर मिल गया।
यह मंत्र महापापों का विनाश करने वाला है। राम बीज है, नम: शक्ति। इसकी महत्ता ऐसे लिखी गयी है:
सर्वेषु राममन्त्रषु ह्यतिश्रेष्ठः षडक्षरः ।
ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञाताज्ञातकृतानि च ॥ १,७३.५ ॥

स्वर्णस्तेय सुरापानगुरुतल्पायुतानि च ।

कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपापानि यानि वै ॥ १,७३.६ ॥

मन्त्रस्योञ्चारणात्सद्यो लयं यान्ति न संशयः ।
ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छन्दो रामश्च देवता ॥ १,७३.७ ॥
आद्यं बीजं च हृच्छक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये ।
षड्दीर्घभाजा बीजेन षडङ्गानि समाचरेत् ॥ १,७३.८ ॥


श्रीराम राजसभा में हनुमान जी का ध्यान प्रभु के आगे पुस्तक बाँचते हुये करना चाहिये - वाचयन्तं हनूमन्तग्रतो धृतपुस्तकम्। 

लोक में र एवं म के इन स्वरूपों की स्मृति भी है। पं. छन्नूलाल मिश्र के गायन में सुनिये : 


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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन रास बिहारी बोस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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