रविवार, 24 मई 2009

राजमहल की डिनर टेबल से (भाग - 3) : तैलाख्यान

भाग - 1 और 2 से आगे...

.. तेल का जैसा प्रयोग आप अपनी धुरखेल पार्टी में देखने के अभ्यस्त हैं, वैसा भाग-जा पार्टी में नहीं होता. सही कहें तो उनके यहाँ इसका इस बार बड़ा ही विलक्षण प्रयोग देखने में आया है. भाग-जा शासित प्रांतों में विज्ञान को ज्योतिष का दर्जा दे दिया गया है और ज्योतिष को विज्ञान का. 

-बेदी, असल बात पर जल्दी आओ.

- हुकम, थोड़ा धीरज रखें. चुनाव पूर्व अनुसन्धान से यह पता चला कि भाग-जा पार्टी पर मंगल और शनि दोनों टेढ़ें चल रहे थे. रही सही कसर सारे चुनाव गुरुवार और बुधवार को कराने की घोषणा कर हमनें पूरी कर दी. सो वैज्ञानिकों ने यह व्यवस्था दी कि पार्टी के प्रधान पद के उम्मीदवार रोज रात को सिन्दूर और तेल का मिश्रण अपने सिर पर लगाएँ और उस समय पार्टी प्रधान डफली पर शनि कीर्तन गाएं तो संकट कट जाएगा.

- लेकिन प्रधान पद के उम्मीदवार न होते हुए भी मारदेई क्यों ऐसा काम करवा रहे थे? रिजल्ट आ जाने के बाद भी ऐसा क्यों चल रहा था?
(जनमर्दन ने तेल लगाने का मौका देख झट से उत्तर दिया)

- वाह राजकुमार, क्या प्रश्न हैं! आप में राज रक्त है तभी तो मस्तिष्क इतना जागृत है ! 
हुआ ये कि लालादानी को यह सब नहीं जँचा और उन्हों ने इनकार कर दिया. उधर भाँजहाथ ने भी डफली बजाने से इनकार कर दिया. लिहाजा यह तय हुआ कि प्रधान पद के लिए मारदेई के नाम से संकल्प कर दिया जाय और जनता की आँख में धूल झोंकने के लिए लालादानी का नाम आगे कर दिया जाय. डफली न बजाने की क्षतिपूर्ति भाँजहाथ और रुग्ण डफली की जुगल बन्दी से की जाएगी. 

-लेकिन उसके बाद भी भाग-जा की हार कैसे हो गई?

- हुकम, पहले पुराने बचे सवाल का जवाब. रिजल्ट आने के बाद भी ऐसा जारी था क्यों कि वैज्ञानिकों ने कहा था कि किसी भी परिस्थिति में इस प्रयोग की पूर्णाहुति परिणाम आने के बाद करनी ही होगी नहीं तो पार्टी का विनाश हो जाएगा. वह पूर्णाहुति का दिन था. 
भाग-जा और उसके साथी गणों की हार के कारण धूल में छिपे हुए हैं. 

- ?

- जनता की आँखों में धूल झोंकने की जो महारत हमें सैकड़ों वर्षों के अभ्यास से हासिल हुई है उसे भाग-जा कभी मैच नहीं कर सकती. पिछ्ली हार से घबराए हुए इन लोगों ने मजबूती और कमजोरी का धूल पाठ किया और खूब किया. आँख में धूल झोंकना एक कला है जो केवल राजपरिवार को ही आती है. इस नाचीज ने आप लोगों के साथ रहते हुए जो थोड़ा बहुत सीखा है, उसके आधार पर कह सकता है कि अपनी आँख बचाए रखना और चौकन्नी खुली रखना बहुत महत्त्वपूर्ण है. इस भयानक धुरखेल में जिसे लोग चुनाव भी कहते हैं, भाग-जा के लोग अपनी आँखे खुली तक नहीं रख सके, चौकन्ने कहाँ से रहते? 
परम पूजनीया आप की दादी जी कहा करती थीं, जो खेल न आए उसे सोचना भी नहीं चाहिए. उन्हें दुर्गा की उपाधि देकर भी भाग-जा वालों ने उनसे कुछ नहीं सीखा. हार तो होनी ही थी.

राउल को पहली बार यह लगा कि इस अदने दरबारी में दम है. मन ही मन माँ के च्वायस की तारीफ करते हुए उन्हों ने उस रात का अंतिम सवाल पूछा:

- बेदी, सेकुलरखोदी लालादानी के कानों में तेल क्यों डाल रहे थे?

- हुकम, थोड़ा धीरज रखें. वास्तव में मारदेई सरकार के समय गान्धार देश में जो अपहरण काण्ड हुआ था, उस समय बड़ी ही सफाई से मारदेई ने लालादानी को ऑपरेशन थिएटर भेज दिया था. उन्हें यह बताया गया था कि वैज्ञानिकों ने एक ऐसी विधि विकसित की है जिससे एक छोटे से ऑपरेशन से उनमें इतनी ताकत आ जाएगी कि वे अकेले ही सारे दहशतगर्दों से निपट लेंगे. चूँकि लालादानी घरेलू सिपहसालार थे और परदेश विभाग के सिपहसालार बोलते कम और अपने गालों को अन्दर से जिभियाते ज्यादा थे, लिहाजा सेना न भेज पाने की सूरत होने के कारण लालादानी को यह युक्ति बेहतर लगी.

राउल को जम्हाई लेते देख जनमर्दन ने तेल का तड़का लगाया:

- राजकुमार ऐसी गहन चर्चा इस भारत भू पर आज तक नहीं हुई. मैं तो चाणक्य सरीखा नहीं लेकिन आप अवश्य चन्द्रगुप्त के समान हैं. 

- ये दोनों कौन हैं?

- बड़े महान लोग थे. 

राउल को माँ का महानता पर दिया गया भषण याद आ गया. सहम से गए. नींद तुरंत काफूर हो गई, बोले, आगे बताओ.

- हुकम, वह एक गहरी चाल थी जिसे मारदेई के अलावा भाग-जा में सिर्फ सेकुलरखोदी ही जानते थे. वो भी इसलिए कि वह विधि और वैज्ञानिक सभी पाखण्डीनगर के थे. नए विज्ञान का आरम्भ वहीं हुआ था. उस ऑपरेशन के दौरान लालादानी की रीढ़ निकाल कर उसकी जगह रक्षासूत्रों से बनी रस्सी डाल दी गई थी. तभी से लालादानी की सोचने समझने की ताकत आधी रह गई. मारदेई ने इस प्रकार अपने उत्तराधिकारी के रूप में सेकुलरखोदी की राह एकदम आसान कर दी.
भला बताइये ऐसा आदमी हमारे आगे कहाँ टिकता?

जो तेल सेकुलरखोदी लालादानी के कानों में डाल रहे थे, उसे भी पाखण्डीनगर के वैज्ञानिकों ने ही डेवलप किया है. इस तेल के राज का हमारी खुफिया एजेंसी ने जिसे 'कच्चा' भी कहा जाता है, पता लगाया है. इसे जिसके कानों में डाला जाता है उसे केवल वही बातें सुनाई देती हैं जो उसे अच्छी लगें. पिछ्ले पाँच सालों से लालादानी के कानों में यह तेल डाला जा रहा है. अब उनके कान एकदम बेकार हो चुके हैं.

राजकुमार, जिसे राजा बनना हो उसे अच्छी नहीं बल्कि जमीनी सचाइयों से जुड़ी बातों को सुनना और गुनना लाजमी होता है. राजा को एक अच्छा अभिनेता भी होना होता है लेकिन दिखावा करते समय भी इस बात का ध्यान हमेशा रखना होता है. 

सिंहासन पाने के बाद अगर राजा इस पर अमल नहीं करता तो उसका भी विनाश हो जाता है.

जनमर्दन के मुँह से ऐसी बात सुनकर राउल स्तब्ध रह गए. अपने आप ही उनके हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए. जनमर्दन ने गदगद हो कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भावी राजा के सिपहसालार होने के अपने सपने को सँजोते हुए उन्हों ने घर की राह पकड़ी. (समाप्त)

1 टिप्पणी:

  1. ऐसे हालात में घर की राह पकड़ना ही सही है, क्या भरोसा कब तेल खत्म हो जाए। :)

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