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रविवार, 14 जुलाई 2019

गुरु आधारित संवत्सर चक्र एवं पञ्चाङ्ग संशोधन की आवश्यकता - दैत्यगुरु शुक्र, देवगुरु बृहस्पति एवं शनि


गुरुपत्नी राजपत्नी मित्रपत्नी तथैव च ।
पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैताः मातरः स्मृताः ॥  
(गुरु, राजा, मित्र, पत्नी की मातायें एवं अपनी माता, इन पाँच को माता माना जाता है।) 
... 
सुदर्शन एवं दिव्यरूपधारी चन्द्र ने अपने गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा को लुभा लिया। वह आश्रम तज अपने प्रेमी के घर आ गई। बड़ी पञ्चायतों एवं देवासुर सङ्ग्राम के पश्चात चंद्र ने उसे लौटाया तो वह गर्भवती पाई गई। पूछने पर उसने बताया कि भावी संतान के पिता बृहस्पति नहीं, चंद्र हैं। उसके गर्भ से बुध का जन्म हुआ। बुध से ही आगे चन्द्रवंश चला।
(इस कथा को अभिधात्मक सत्य मानने वाले आगे न पढ़ें क्योंकि उनका मन नहीं रमेगा, व्यर्थ के प्रश्न उठेंगे। )
...
बृहस्पति का वर्ष पृथ्वी के लगभग बारह वर्षों के तुल्य होता है अर्थात वह किसी नक्षत्र पर लगभग 27/12 = सवा दो वर्ष रहते हैं। चंद्र के दैनिक नक्षत्र परिवर्तन की दृष्टि से या सूर्य के किसी नक्षत्र पर मात्र सवा दो महीने रहने की दृष्टि से यह लम्बी अवधि है।
कथा किसी ऐसे नाक्षत्रिक कूट की है जब बृहस्पति किसी नक्षत्र तारा के साथ पतिभाव में थे तथा अपनी दैनिक गति में चंद्र वहाँ पहुँचा। यह वह समय था जब सामान्यतया सूर्य से बहुत निकट होने के कारण आँखों से ओझल बुध का अभिज्ञान पूर्ण हुआ था। उस समय ही धरा पर सूर्यवंशियों अर्थात पूर्णत: सूर्यकेंद्रित वर्ष ज्योतिष अनुसार चलने वाले राजाओं के साथ साथ सूर्य एवं चंद्रसमन्वित वर्ष ज्योतिष मानने वाले चंद्रवंशियों का भी अभ्युदय हुआ। विमर्शों के लम्बे एवं अनेक सत्र चले होंगे, मतभेद आदि भी हुये होंगे।
तारा कौन हो सकती है? अनुमान लगायें?
पुष्य नक्षत्र के देवता गुरु बृहस्पति हैं तथा स्वामी शनि। बृहस्पति देवों की प्रज्ञा को दर्शाते हैं तो शनि स्थिरता का। राजन्यों में पुष्य की प्रतिष्ठा थी तथा महत्त्वपूर्ण अभियान पुष्य नक्षत्र देख कर किये जाते थे। रामायण एवं महाभारत में भी इसके संदर्भ हैं।
एक अन्य नक्षत्र ज्येष्ठा ध्यान में आता है जिसक देवता देवराज इन्‍द्र हैं तथा स्वामी बुध। मूल एवं ज्येष्ठा, इन दो नामों से परोक्ष रूप से किसी बहुत ही पुरातन काल में नक्षत्रमाला के आरम्भ के संकेत मिलते हैं। 'तारा' का अभिज्ञान स्वतन्‍त्र अध्ययन की माँग करता है किन्‍तु मेरा अनुमान पुष्य या ज्येष्ठा में से किसी के होने का है। 
कहा गया है कि चंद्र ने लालन पालन हेतु बुध को रोहिणी एवं कृत्तिका को सौंप दिया।
महाभारत युद्ध के समय वसंतविषुव रोहिणी पर था।
यदि आप नक्षत्रों के प्रारम्भ परिवर्तन को देखेंगे तो पायेंगे कि 'प्रागैतिहासिक' आरम्भ नक्षत्रों मूल एवं ज्येष्ठा के पश्चात पहला वैदिक प्रमाण इस उक्ति में मिलता है कि वत्सर आरम्भ श्वान नक्षत्र से है। आरम्भ नक्षत्र का अगला परोक्ष उल्लेख मिलता है मृगशिरा में। यह भी सम्भव है कि तब श्वान एवं मृग तक एक बड़ा नक्षत्रक्षेत्र माना जाता रहा हो।
मृगशिरा के पश्चात स्पष्ट प्रमाण रोहिणी छोड़ कृत्तिका के मिलने लगते हैं। उससे आगे भरणी तज आज कल अश्विनी से आरम्भ है। बीच बीच के छोड़े नक्षत्र सङ्क्रमण काल को दर्शाते हैं। वेदविभाजन एवं पुराण 'पुनर्रचना' वाला महाभारत काल सङ्क्रमण काल तो था ही।
बुध को रोहिणी एवं कृत्तिका को सौंपा जाना भी एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है। धरा एवं आकाश को मिला कर कहने की पौराणिक प्रवृत्ति के कारण ऐसी कूट कथायें प्रचलित हुईं।
शुक्र ग्रह एवं पृथ्वी के वर्षों में लगभग स्वर्णिम अनुपात का सम्बंध है।
कथित स्वर्णिम अनुपात होता है, φ = (√5+1)/2 ≈ 1.6180.
π तो जानते ही हैं ≈ 3.1416।
इन दोनों का लगभग सम्बन्ध है,
π ≈ 6/5×φ²
...
स्वर्णिम अनुपात की व्युत्पत्ति इससे है कि ऐसी संख्या जो अपने विलोम में एक जोड़ने पर पुन: अपना रूप प्राप्त कर ले :(1/φ)+1=φ
..
स्वर्णिम अनुपात में आकार आँखों को तुलनात्मक रूप से अधिक भाते हैं किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल उसी अनुपात में होने पर ही आकार अच्छे लगें।
इस अनुपात को ले कर आधुनिक काल में बहुत टण्टा किया जाता रहा है, खींच तान, मिथ, असत्य, छल आदि सब। परन्तु इस अनुपात का प्रयोग कर वस्तुयें सुगढ़ तो बनाई ही जा सकती हैं यथा यदि घर बना रहे हों तो शयन कक्ष की लम्बाई एवं चौड़ाई का अनुपात 1.6 के निकट रखें।
जितने समय में पृथ्वी सूर्य की आठ परिक्रमायें करती है, उतने में शुक्र तेरह कर लेता है। पृथ्वी एवं सूर्य के मध्य केवल दो ग्रह हैं - बुध एवं शुक्र। बुध सूर्य के अति निकट होने के कारण प्रेक्षण दुर्लभ है जब कि प्रात: (भुरकुवा, भोर का तारा) एवं साँझ के 'तारे' के रूप में दैदीप्यमान सुंदर शुक्र सबका परिचित है।
पृथ्वी से देखने पर शुक्र एक ऐसा चक्र दर्शाता है जिससे रहस्यमय पञ्चकोण बनता है। इस पञ्चकोण की भुजायें भी एक दूसरे को स्वर्णिम अनुपात में बाँटती हैं।
शुक्र, स्वर्णिम अनुपात एवं इनके अनुसार ज्योतिषचक्र पर दृष्टि  रखने दितिपुत्र दैत्य (कालांतर के असुर) थे। वास्तु एवं शिल्प आदि सुंदर रचनाओं में ये निष्णात होते थे। इनकी संततियाँ इसाइयत द्वारा लुप्त कर दी गयी पगान जनसंख्या में थीं।
इसके विपरीत अपेक्षतया स्थिर बृहस्पति हैं, देवगुरु। इनके अनुसार संवत्सर पर दृष्टि रखने वाले देव। बृहस्पति की सूर्यपरिक्रमा अवधि के बारह पृथ्वीवर्ष देव सभ्यता में बड़े महत्त्वपूर्ण रहे। बारह वर्ष तपस्या, बारह वर्ष पश्चात संन्यासी का अपने जन्मस्थान पर एक बार लौटना, बारह वर्ष के प्रयाण अभियान आदि आज भी जाने जाते हैं।
शनै: चर शनैश्चर सूर्य की परिक्रमा लगभग तीस पृथ्वी वर्ष में करता है। इन दोनों का ल.स. है साठ अर्थात यदि आज शनि एवं गुरु किसी नक्षत्र पर एक साथ हैं तो साठ वर्षों पश्चात पुन: उसी पर एक साथ होंगे या आज उनकी जो सापेक्ष स्थिति है, साठ वर्ष पश्चात यथावत होगी।
यह बड़ा चक्र गणना संशोधन एवं प्रेक्षण की दृष्टि से बड़ा उपयोगी है। इसमें सौर अधिवर्ष संशोधन के पंद्रह चक्र पूरे हो जाते हैं तथा चंद्र मेटॉनिक उन्नीस वर्षीय चक्र के तीन, यद्यपि दो से तीन वर्ष शेष रहते हैं किंतु उसे अन्य प्रकार से समायोजित किया जा सकता है।
कलियुग सोया है, द्वापर उठ बैठा, त्रेता खड़ा हुआ एवं कृत चल पड़ा!
प्रत्येक ४ वर्ष पर अधिवर्ष वैदिक वाङ्मय में भी है। 365 दिन तथा एक बटे चार और अर्थात 6 घण्टे।
कलि आरम्भ सूर्यास्त से - साँझ से 6 घण्टे आगे आधी रात तक शयन।
वर्ष बीतने के पश्चात आगे 6 घण्टे और अधिक, द्वापर, अर्द्धरात्रि से प्रात:काल तक दूसरा पाद, उठ बैठा। दूसरे के पश्चात तीसरा वर्ष त्रेता, 6 घण्टे आगे बढ़ा, उठ खड़ा हुआ प्रातःकाल से मध्याह्न तक।
तीसरा वर्ष बीता चौथा आया, मध्याह्न पश्चात चलता रहा साँझ तक, चक्रपूर्ति कर ली गयी - कृतयुग।
विष्णु के त्रिविक्रम को समझें कि तीन चरण पश्चात बलि रूपी सिर से चक्र पूरा हुआ।
प्रत्येक 19 वर्ष पर सौर दिनांक एवं चन्द्र तिथि का सम्पात अपने को दुहराता है।
कलि-द्वापर-त्रेता-कृत; प्रत्येक 4 वर्ष पर सौर अधिवर्ष होता है।
19×4=76, 76 वर्षों पर दुहराव और सटीक होना चाहिये। इस चक्र के पूर्ण होने के अगले 19 वर्ष पश्चात 95 वर्षों का एक वैदिक चक्र पूरा होता है। कहाँ लिखा यह?
76 का एक गुण देखें।  76ⁿ ≈ φ, जहाँ n = 1/9

साठ वर्षों का आज भी प्रचलित बृहद संवत्सर चक्र इस प्रकार गुरु प्रेरित है, बारह पचे साठ! अनेक जटिल समांतर परम्पराओं के कारण साठ वर्षीय संवत्सर चक्र का आरम्भ भी अब जटिल हो चला है, दक्षिण एवं उत्तर में अंतर हैं तथा चक्र आरम्भ का भौतिक प्रेक्षण रूप से गुरु-शनि वास्तविक युति का उन आरम्भों से मेल नहीं लगता। क्यों न नये से पुनरारम्भ करें?
वैदिक वाङ्मय में इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि एक साथ दो संवत्सर पद्धतियाँ चलती थीं। जन सामान्य हेतु सूर्य का उत्तरायण होना नववर्ष आरम्भ होता तथा ज्योतिर्विदों हेतु वसन्तविषुव का दिन।
आगामी 21 दिसम्बर 2020 ग्रे. को जब कि मूल नक्षत्र विराजमान सूर्य वार्षिक उत्तरायण यात्रा आरम्भ करेंगे, गुरु एवं शनि साठ वर्षों के पश्चात एक साथ उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर होंगे तथा दोनों छायाग्रह क्रमश: मृगशिरा एवं ज्येष्ठा पर, क्यों न पञ्चाङ्ग संशोधन सहित नये संवत्सर चक्र की आधारशिला रखी जाय!

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(चित्र में  गत तेरह जुलाई की रात बृहस्पति एवं चन्द्र पास पास! निकट ही जो वृश्चिक राशि का तारा दिखता है वह है - Antares (α scorpii), वैदिक ज्येष्ठराजा इन्द्र इसके देवता हैं।)

शनिवार, 14 जुलाई 2018

हथिया के पेटे जाड़ - नक्षत्र, सूर्य, चंद्र, पृथ्वी प्रेक्षण - लोकगिरा, वर्ष, ऋतु, माह

सूर्य पृथ्वी का निकटमत तारा है जहाँ से प्रकाश को तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकण्ड की गति से पहुँचने में मात्र आठ मिनट लगते हैं अर्थात किसी भी समय हमारी आँखों से देखा जाने वाला सूर्य आठ मिनट पुराना होता है अर्थात यदि सूर्य पर कुछ घटित हो तो हमें आठ मिनट पश्चात दिखेगा। 
प्रॉक्जिमा सैंटौरी तारा हम से दूसरा निकटतम तारा है जो कि लगभग सवा चार प्रकाशवर्ष की दूरी पर है अर्थात वहाँ से चले प्रकाश को हम तक पहुुँचने में सवा चार वर्ष लगेंगे अर्थात उसे जब भी हम देखेंगे, सवा चार वर्ष पुराना ही देखेंगे। 
अब उन तारों, निहारिकाओं, मंदाकिनी इत्यादि की सोचें जो हमसे लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं, उनका वर्तमान तो हम जान ही नहीं सकते ! दिक्काल की सीमायें यही हैं।
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विराट ब्रह्माण्ड में यदि हम अपने क्षुद्र सौरमण्डल को देखें तो पृथ्वी अपने अक्ष पर जितने समय में एक चक्र पूरा करती है, उससे लगभग 365 गुना समय में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है। सूर्य भी अपने समस्त ग्रहों के साथ तीव्र गति से भागता जा रहा है किंतु हमें तो स्थिर प्रकाश पिण्ड ही लगता है जिसकी परिक्रमा हम कर रहे हैं। कारण है, तुलनात्मक रूप से हमारा अति लघु रूप। हमें दिन रात जो कि पृथ्वी के अक्षीय घूर्णन के कारण होते हैं, प्रति दिन पता चलते हैं, दिन की इकाई बनी ही उससे है किंतु उससे क्रमश: बढ़ने में समस्यायें होने लगती हैं। 
By LucasVB [Public domain], from Wikimedia Commons
ऋतुयें इस कारण होती हैं कि पृथ्वी का घूर्णन अक्ष लट्‍टू की भाँति झुका हुआ है जिसका शीर्ष एक वृत्त में घूमता  रहता है, आकाश के जिस क्षेत्र की सीध में किसी समय उसकी शिरोरेखा पड़ती है, उसे ध्रुव कहते हैं, धुरी की भाँति अटल जो कि वस्तुत: लगभग 21 से 26 हजार वर्षों के आवर्तकाल से परिवर्तित होता रहता है। उसकी दिशा ही उत्तर दिशा है - ऊपर, उदीचि, उत्तर। चूँकि यह एक धीमी गति है, इसका प्रेक्षण सभ्यताओं के विद्वान ज्योतिषी ही कर पाये, जनसामान्य के लिये तो ध्रुव धुरी बने स्थिर ही रहे।
इस गति के कारण ही सूर्य देव पूरब पश्चिम में क्रमश: उदित अस्त दिखते हुये भी उत्तर दक्षिण दिशाओं में झुकते, सीधे होते, पुन: झुकते एक आवर्ती गति करते प्रतीत होते हैं। झुकाव के अल्प एवं अधिक होने से विकिरण, ऊष्मा आदि की प्राप्ति में हुये एवं उनसे जुड़े अन्य परिवर्तनों के कारण विविध नाटकीय परिवर्तन धरा पर दिखते हैं, कभी फूल ही फूल, कभी सब पत्ते लुप्त, कभी वर्षा ही वर्षा तो कभी तपती धूप। ये परिवर्तन सहसा नहीं हो जाते, उनका पता हमें अपेक्षतया मंद गति से शनै: शनै: पड़ता है।
ये परिवर्तन एक लय में होते हैं - संस्कृत का ऋत, अंग्रेजी का rhythm. ऋतु अनुकूल आहार विहार से स्वास्थ्य ठीक रहता है, rhythm में विविध ध्वनियाँ सङ्गीत हो जाती हैं, जीवन सङ्गीत यही तो है ! आवर्ती लय।     
इन दो घूर्णन गतियों के साथ साथ पृथ्वी द्वारा सूर्य की वार्षिक परिक्रमा है ही। चूँकि ये सारी गतियाँ लयबद्ध हैं, इनमें कोई यादृच्छ या अनिश्चित या सहसा परिवर्तन नहीं हो सकते; सूर्य सापेक्ष सबसे बड़े परास वाली गति 365 दिनों के वर्ष विभाजन के सापेक्ष हम शेष दो को व्यवस्थित कर सकते हैं। यही तो है अभियांत्रिकी एवं प्रबंधन की एक प्रिय कार्यविधि - सकल से सूक्ष्म की दिशा में, from WHOLE to PART
चंद्रमा को आप प्राकृतिक कैलेण्डर मान सकते हैं जो कि भीति पर टँगा होने के स्थान पर आकाश में टँगा कलाओं के माध्यम से तिथियाँ बताता रहता है। आज सामान्य जन भले चंद्र को देख तिथि न बता पायें, एक पीढ़ी पूर्व तक लोग देख कर बता देते थे - अन्हार या अँजोर, चौथी या पञ्चमी ! 
उसकी सोलह कलाओं में से आरम्भ एवं अंत को हटा दें तो चौदह चौदह दिन की दो अवधियाँ हुईं अट्ठाइस एवं वे दो मिला कर एक अवधि हुई तीस दिन की। मा, चंद्रमा से मास, moon से month. 365 को जब इन तीस दिनों में बाँटा गया तो बारह इकाइयाँ हो गयीं, बारह नामों वाले महीने। बचे खुचे दिनों का समायोजन विविध रीतियों से कर लिया गया। एक दूसरा गणित, अधिक सटीक 'पक्ष' वाला हुआ - जब चंद्र घट रहा हो तो अन्हार, बढ़ रहा हो तो अँजोर - क्रमश: कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष। माह में दो पक्ष हो गये मानोंं मास रूपी उड़ते पक्षी के दो पंंख हों ! 
दो महीने मिला कर हो गयी एक ऋतु जब कि परिवेश का समेकित सकल प्रभाव निश्चित प्रकार से पारिभाषित किया जा सकता है। बारह अद्धे छ: ऋतुयें हुईंं। 
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इनके अतिरिक्त जो भी गतियाँ हैं, उनके लिये हमें विशेष यंत्र, प्रेक्षण, विद्या इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। उन्हें हम इनके बिना नहीं जान सकते, अतिशय मेधावी जन अनुमान मात्र लगा सकते हैं। 
रात में आकाश देखें तो हमें भिन्न भिन्न तारामण्डल दिखाई देते हैं जो विविध आकृतियों में सहस्राब्दियों से यथावत मानव को दिखते रहे हैं। इस कारण ही अनेक कल्पनाओं एवं कहानियों का सृजन हो पाया किंतु उन ताराओं में भी सापेक्ष गतियाँ हैं जो कि अतिशय दूरी के कारण हमें कोरी आँखों से पता नहीं चल पातीं। लाखों वर्षों के पश्चात उनके आकार वही नहीं रहने जो आज दिखते हैं, सप्तर्षि पूँछ वाली पतंग की भाँति उड़ते नहीं दिखेंगे, आकार परिवर्तित हो जायेगा।  
कल्पना करें कि पृथ्वी की परिधि पर एक वृत्तीय पथ बना हुआ है जिस पर हम किसी वाहन में सवार अबाध गति से चल रहे हैं। पहला परिक्रमण पूरा होते ही हमें खिड़की से वही संरचनायें दिखने लगेगीं जो आरम्भ में दिखी थीं। बाह्य परिवेश हमारा स्थिर संदर्भ बिंदु हो जायेगा जिसके सापेक्ष हम गतिमान होंगे, कहेंगे यहाँ पहुँच गये, अब आगे वह वृक्ष आयेगा, सरोवर पीछे छूट गया आदि आदि। 
इसी प्रकार पृथ्वी की गति अंतरिक्ष में है। वे विविध तारामण्डल स्थायी स्थिर संरचनाओं की भाँति संदर्भ बिंदु हैं, स्थिर stationary station, स्‍थिर स्थानक हैं जिनके सापेक्ष गाड़ी की गति का लेखा जोखा रखा जाता है। अंतर इतना ही है यह गाड़ी विलम्ब नहीं करती, न कभी समय से पहले चल पाती है। लगभग स्थिर मान का वर्ष उसकी इस समयबद्धता के कारण ही है। गति में विविध सूक्ष्म अंतर हैं किंतु उनकी उपेक्षा की जा सकती है या उन्हें जटिल बृहद गणित में समोया जा सकता है। बृहस्पति का साठ वर्षीय चक्र, सप्तर्षि का 2700 वर्षीय आदि ऐसी ही व्यवस्थायें हैं। 
हमारी गति के कारण वर्ष भर सूर्य जिस पथ पर चलता दिखाई देता है, उस पर सम दूरी पर विविध तारों एवं तारामण्डलों के 27 स्थानक मान लिये गये जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। 27 ही क्यों? 
यहाँ पुन: चंद्रमा रूपी प्राकृतिक कालेन्‍द्र calendar काम आया। सूर्य के साथ समस्या यह है कि जब वह दिखता तो कोई अन्य तारे या नक्षत्र नहीं दिखते। चंद्रमा के साथ यह समस्या नहीं है। वह नक्षत्रों के साथ साथ रात में दिखता है, सबसे प्रभावी दिखता है। इसी कारण से उसे नक्षत्र रूपी स्त्रियों का स्वामी मान लिया गया। देखा यह गया कि वह किसी नक्षत्र की सीध में 27 से 28 दिनों के बीच की अवधि में बारम्बार आ जाता है, चंद्र के रूप में मानव को सूर्य गति के प्रेक्षण हेतु एक स्वतंत्र मापनी मिल गयी !  
ऋतु कोई हो, सूर्य पृथ्वी कुछ भी कर रहे हों, चंद्रमा अपनी यह 27 दिवसीय यात्रा निरपेक्ष भाव से करता रहता है। चूँकि पृथ्वी की परिक्रमा के साथ साथ वह सूर्य की भी परिक्रमा कर रहा है, वह निरपेक्ष होते हुये भी इनके सापेक्ष सत्यापन की युक्ति हो सकता है। 
वह आभासी पथ जिस पर सूर्य अपने समस्त ग्रहादि एवं उनके उपग्रहों के साथ गतिमान प्रतीत होता है, उसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। क्रांतिवृत्त को 27 स्थानकों या नक्षत्रों में बाँट दिया गया - सूर्य जी जब इस स्थानक आये थे तो चंद्र जी अपनी फला कला में फला स्थानक पर थे ! घड़ी की व्यवस्था हो गयी। 
आकाश में चलते चलते सूर्य जब किसी नक्षत्र पर पहुँचता है अर्थात जिसकी सीध में दिखता है, उसे उस समय का सूर्य नक्षत्र कहते हैं या इस भाँति कहते हैं कि अभी सूर्य उस नक्षत्र पर है। ऐसा ही चंद्र के साथ है। इस कारण ही किसी दिन सूर्य नक्षत्र एवं चंद्र नक्षत्र, दो होते हैं। दोनों का एक साथ एक ही नक्षत्र पर होना बहुत सुलभ घटना नहीं है।  
365.25 दिनों की पृथ्वी की वार्षिक गति को 27 नक्षत्रों से भाग दें तो सूर्य एक नक्षत्र पर साढ़े तेरह दिनों से किञ्चित अधिक समय तक रहेगा। 
(कभी यह भी था कि मानव निर्मित ये विभाजन समान नहीं थे किंतु हमें तो अब  का देखना है।)
ग्रेगरी का अंग्रेजी कैलेण्डर शुद्ध सौर है अर्थात उसमें चंद्रमा की कलाओं, मास, दिन, तिथि आदि के संयोजन नहीं होते, न उस उद्देश्य से गणितीय संशोधन किये जाते हैं; इस कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित इस कैलेण्डर के दिनाङ्कों को सौर गति अर्थात उसके विविध नक्षत्रों में प्रवेश से जोड़ा जा सकता है। उदाहरणतया :                 
अगस्त मास में 18 को सूर्य मघा नक्षत्र में प्रवेश कर 30 तक रहते हैं,  31 को पूर्व फाल्गुनी में, 14 सितम्बर को उत्तर फाल्गुनी में एवं 28 सितम्बर को सूर्य रूपी गाड़ी हस्त स्थानक अर्थात नक्षत्र पर पहुँचती है। 
(दिन सूर्योदय से गिनते हैं अत: रात्रि में या सूर्योदय के पश्चात हुये परिवर्तनों के लिये +/- 1 दिन की परास रहेगी।
स्पष्ट है कि इसी प्रकार ऋतु आरम्भ एवं अंत के दिनाङ्क भी बताये जा सकते हैं जो वर्षो वर्ष एक ही रहेंगे। तमिळ कैलेण्डर भी पूर्णत: सौर है, भारतीय मानक शक संवत भी। इनमें भी ऋतुओं की आरम्भ तिथियाँ निश्चित एवं स्थिर होंगी। 
24 अगस्त को शरद ऋतु का आरम्भ हो जाता है, 26.50 उत्तरी अक्षांश के निकटवर्ती क्षेत्रों में इसी दिन के निकट अगस्त्य का उदय होता है अर्थात सूर्य की ओट में अपनी कांति खो चुके अगस्त्य उससे मुक्त हो पुन: भोर में दिखना आरम्भ करते हैं। (यहाँ समस्या यह है कि इस प्रकार के उदय अस्त अक्षांश आधारित होते हैं। क्यों ? कभी समझायेंगे।
अक्षांश आधारित स्थानीय प्रेक्षण भारत में बहुत हुये एवं कृषि आधारित समाज में उन्हें ऋतुओं से जोड़ कर एक मौखिक परम्परा के ढीले ढाले लोक-कैलेण्डर के रूप में बारहो महीनों, छहो ऋतुओं के लिये सँजो लिया गया। पीढ़ियों तक इस कला में निष्णात 'घाघ भड्ढरी' प्रकार के जन किसानों का मार्गदर्शन तो करते ही रहे, उन्हें शिक्षित कर एक स्वतंत्र सशक्त वैज्ञानिक परम्परा को भी सुरक्षित सम्वर्धित करते रहे। 
ऐसे प्रेक्षणों के साथ समस्या यह है कि ये सार्वदेशिक नहीं लागू किये जा सकते। कोल्लम का प्रेक्षण काशी में काम नहीं आयेगा। हाँ, यदि दोनों स्थानों के औपचारिक ज्योतिर्विद एक साथ बैठें तो अपने अपने क्षेत्रों के लोकज्ञान के संयोग से जाने कितने रहस्य उद्घाटित कर सकते हैं।  
उत्तर भारत में अगस्त्य दर्शन को वर्षा ऋतु का अन्त माना जाता है। वर्षा इससे आगे भी होती है किन्‍तु अवसान वाली। लगभग महीने भर पश्चात जब 28 सितम्बर को सूर्य हस्त नक्षत्र में होते हैं तब अंतिम वर्षा के झँकोरों के साथ ही जाड़े की भूमिका हो जाती है। 
लोक में कहते हैं - हथिया के पेटे जाड़हस्त नक्षत्र हाथ के आकार में समाता चार तारकों का समूह है जो कि लोकगिरा में हस्त से हाथ, हाथ से हाथी हो गया है (हाथी या हस्ति को यह नाम इस कारण दिया गया है कि चौपाया होने पर भी उसकी सूँड़ ऐसे काम करती है जैसे मनुष्य का हाथ।)  
देखें तो बारह महीनों में छ: ऋतुओं हेतु प्रति ऋतु दो माह ही पड़ते हैं किंतु संधि काल का ध्यान लोक में रखा गया है। शरद है किंतु उसमें हो रही वर्षा को अगस्त्य तारे से जोड़ कर सँजो लिया गया। 
शरद है किन्‍तु उसमें हो रही अंतिम वर्षा के साथ हेमन्त (हिम का अंत अर्थात हिमपात अब ठहर जायेगा, पिघलेगा तो दाँत कड़कड़ाने वाले शिशिर का आगम होगा) अर्थात जाड़े की पूर्वऋतु से जोड़ कर स्मृतिबद्ध कर लिया गया। 
वस्तुत: शरद-हेमन्त-शिशिर की तिकड़ी ऐसी रही कि उनमें ऋतुओं का संक्रमण उतना स्पष्ट न होने के कारण पाँच ऋतुओं की भी संकल्पना करनी पड़ी। 
इसके अनेक उदाहरण वैदिक वाङ्मय में उपलब्ध हैं।
शतपथ ब्राह्मण में वर्षा एवं शरद को मिला कर पाँच ऋतुओं की बात की गयी है: 
लोको॑वसन्त॑ऋतुर्य॑दूर्ध्व॑मस्मा॑ल्लोका॑दर्वाची॑नमन्त॑रिक्षात्त॑द्द्विती॑यम॑हस्त॑द्वस्याग्रीष्म॑ऋतु॑रन्त॑रिक्षमेवा॒स्य मध्यमम॑हरन्त॑रिक्षमस्य वर्षाशर॑दावृतू य॑दूर्ध्व॑म्न्त॑रिक्षादर्वाची॑नं दिवस्त॑च्चतुर्थम॑हस्त॑द्वस्य हेमन्त॑ऋतुर्द्यउ॑रेवा॒स्य पञ्चमम॑हर्द्यउ॑रस्य शि॑शिर ऋतुरि॑त्यधिदेवतम्।
ऐसा क्यों? इसमें उस समय की स्मृति है जब वर्ष का आरम्भ वर्षा से था। शरद मिला देने पर शरद विषुव (23 सितम्बर) जो कि वसंत विषुव (21 मार्च) से छ: महीने के अंतर पर पड़ता है, वर्षा के साथ आ जाता है, नाक्षत्रिक एवं ऋत्विक प्रेक्षणों के सम्मिलन से सुविधा हो जाती है (विषुव अर्थात जब उत्तर दक्षिण में दोलन करता सूर्य माध्य स्थिति में दिखे, ठीक पूरब में उगे, ठीक पश्चिम में अस्त हो)
ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत एवं शिशिर को मिला दिया गया है: 
हेमन्‍तशिशिरयो: समासेन तावान्‍संवत्सर: संवत्सर: प्रजापति: प्रजापत्यायतनाभिरेवाभी राध्नोति य एवं वेद। 
आजकल के आधे कार्त्तिक से आधे फाल्गुन तक के इस कालखण्‍ड में माघ महीना पड़ता है जो कभी संवत्सर का आरम्भ मास था, वही शीत अयनांत वाली उत्तरायण अवधि जिसे अब लोग संक्रांति के रूप में मनाते हैं।
... 
आगे लिखते रहेंगे। हमारी मान्यताओं में जाने कितनी सहस्राब्दियों के अवशेष छिपे हुये हैं। सावधान विश्लेषण करें तो ! 

रविवार, 24 मई 2009

राजमहल की डिनर टेबल से (भाग - 3) : तैलाख्यान

भाग - 1 और 2 से आगे...

.. तेल का जैसा प्रयोग आप अपनी धुरखेल पार्टी में देखने के अभ्यस्त हैं, वैसा भाग-जा पार्टी में नहीं होता. सही कहें तो उनके यहाँ इसका इस बार बड़ा ही विलक्षण प्रयोग देखने में आया है. भाग-जा शासित प्रांतों में विज्ञान को ज्योतिष का दर्जा दे दिया गया है और ज्योतिष को विज्ञान का. 

-बेदी, असल बात पर जल्दी आओ.

- हुकम, थोड़ा धीरज रखें. चुनाव पूर्व अनुसन्धान से यह पता चला कि भाग-जा पार्टी पर मंगल और शनि दोनों टेढ़ें चल रहे थे. रही सही कसर सारे चुनाव गुरुवार और बुधवार को कराने की घोषणा कर हमनें पूरी कर दी. सो वैज्ञानिकों ने यह व्यवस्था दी कि पार्टी के प्रधान पद के उम्मीदवार रोज रात को सिन्दूर और तेल का मिश्रण अपने सिर पर लगाएँ और उस समय पार्टी प्रधान डफली पर शनि कीर्तन गाएं तो संकट कट जाएगा.

- लेकिन प्रधान पद के उम्मीदवार न होते हुए भी मारदेई क्यों ऐसा काम करवा रहे थे? रिजल्ट आ जाने के बाद भी ऐसा क्यों चल रहा था?
(जनमर्दन ने तेल लगाने का मौका देख झट से उत्तर दिया)

- वाह राजकुमार, क्या प्रश्न हैं! आप में राज रक्त है तभी तो मस्तिष्क इतना जागृत है ! 
हुआ ये कि लालादानी को यह सब नहीं जँचा और उन्हों ने इनकार कर दिया. उधर भाँजहाथ ने भी डफली बजाने से इनकार कर दिया. लिहाजा यह तय हुआ कि प्रधान पद के लिए मारदेई के नाम से संकल्प कर दिया जाय और जनता की आँख में धूल झोंकने के लिए लालादानी का नाम आगे कर दिया जाय. डफली न बजाने की क्षतिपूर्ति भाँजहाथ और रुग्ण डफली की जुगल बन्दी से की जाएगी. 

-लेकिन उसके बाद भी भाग-जा की हार कैसे हो गई?

- हुकम, पहले पुराने बचे सवाल का जवाब. रिजल्ट आने के बाद भी ऐसा जारी था क्यों कि वैज्ञानिकों ने कहा था कि किसी भी परिस्थिति में इस प्रयोग की पूर्णाहुति परिणाम आने के बाद करनी ही होगी नहीं तो पार्टी का विनाश हो जाएगा. वह पूर्णाहुति का दिन था. 
भाग-जा और उसके साथी गणों की हार के कारण धूल में छिपे हुए हैं. 

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- जनता की आँखों में धूल झोंकने की जो महारत हमें सैकड़ों वर्षों के अभ्यास से हासिल हुई है उसे भाग-जा कभी मैच नहीं कर सकती. पिछ्ली हार से घबराए हुए इन लोगों ने मजबूती और कमजोरी का धूल पाठ किया और खूब किया. आँख में धूल झोंकना एक कला है जो केवल राजपरिवार को ही आती है. इस नाचीज ने आप लोगों के साथ रहते हुए जो थोड़ा बहुत सीखा है, उसके आधार पर कह सकता है कि अपनी आँख बचाए रखना और चौकन्नी खुली रखना बहुत महत्त्वपूर्ण है. इस भयानक धुरखेल में जिसे लोग चुनाव भी कहते हैं, भाग-जा के लोग अपनी आँखे खुली तक नहीं रख सके, चौकन्ने कहाँ से रहते? 
परम पूजनीया आप की दादी जी कहा करती थीं, जो खेल न आए उसे सोचना भी नहीं चाहिए. उन्हें दुर्गा की उपाधि देकर भी भाग-जा वालों ने उनसे कुछ नहीं सीखा. हार तो होनी ही थी.

राउल को पहली बार यह लगा कि इस अदने दरबारी में दम है. मन ही मन माँ के च्वायस की तारीफ करते हुए उन्हों ने उस रात का अंतिम सवाल पूछा:

- बेदी, सेकुलरखोदी लालादानी के कानों में तेल क्यों डाल रहे थे?

- हुकम, थोड़ा धीरज रखें. वास्तव में मारदेई सरकार के समय गान्धार देश में जो अपहरण काण्ड हुआ था, उस समय बड़ी ही सफाई से मारदेई ने लालादानी को ऑपरेशन थिएटर भेज दिया था. उन्हें यह बताया गया था कि वैज्ञानिकों ने एक ऐसी विधि विकसित की है जिससे एक छोटे से ऑपरेशन से उनमें इतनी ताकत आ जाएगी कि वे अकेले ही सारे दहशतगर्दों से निपट लेंगे. चूँकि लालादानी घरेलू सिपहसालार थे और परदेश विभाग के सिपहसालार बोलते कम और अपने गालों को अन्दर से जिभियाते ज्यादा थे, लिहाजा सेना न भेज पाने की सूरत होने के कारण लालादानी को यह युक्ति बेहतर लगी.

राउल को जम्हाई लेते देख जनमर्दन ने तेल का तड़का लगाया:

- राजकुमार ऐसी गहन चर्चा इस भारत भू पर आज तक नहीं हुई. मैं तो चाणक्य सरीखा नहीं लेकिन आप अवश्य चन्द्रगुप्त के समान हैं. 

- ये दोनों कौन हैं?

- बड़े महान लोग थे. 

राउल को माँ का महानता पर दिया गया भषण याद आ गया. सहम से गए. नींद तुरंत काफूर हो गई, बोले, आगे बताओ.

- हुकम, वह एक गहरी चाल थी जिसे मारदेई के अलावा भाग-जा में सिर्फ सेकुलरखोदी ही जानते थे. वो भी इसलिए कि वह विधि और वैज्ञानिक सभी पाखण्डीनगर के थे. नए विज्ञान का आरम्भ वहीं हुआ था. उस ऑपरेशन के दौरान लालादानी की रीढ़ निकाल कर उसकी जगह रक्षासूत्रों से बनी रस्सी डाल दी गई थी. तभी से लालादानी की सोचने समझने की ताकत आधी रह गई. मारदेई ने इस प्रकार अपने उत्तराधिकारी के रूप में सेकुलरखोदी की राह एकदम आसान कर दी.
भला बताइये ऐसा आदमी हमारे आगे कहाँ टिकता?

जो तेल सेकुलरखोदी लालादानी के कानों में डाल रहे थे, उसे भी पाखण्डीनगर के वैज्ञानिकों ने ही डेवलप किया है. इस तेल के राज का हमारी खुफिया एजेंसी ने जिसे 'कच्चा' भी कहा जाता है, पता लगाया है. इसे जिसके कानों में डाला जाता है उसे केवल वही बातें सुनाई देती हैं जो उसे अच्छी लगें. पिछ्ले पाँच सालों से लालादानी के कानों में यह तेल डाला जा रहा है. अब उनके कान एकदम बेकार हो चुके हैं.

राजकुमार, जिसे राजा बनना हो उसे अच्छी नहीं बल्कि जमीनी सचाइयों से जुड़ी बातों को सुनना और गुनना लाजमी होता है. राजा को एक अच्छा अभिनेता भी होना होता है लेकिन दिखावा करते समय भी इस बात का ध्यान हमेशा रखना होता है. 

सिंहासन पाने के बाद अगर राजा इस पर अमल नहीं करता तो उसका भी विनाश हो जाता है.

जनमर्दन के मुँह से ऐसी बात सुनकर राउल स्तब्ध रह गए. अपने आप ही उनके हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए. जनमर्दन ने गदगद हो कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भावी राजा के सिपहसालार होने के अपने सपने को सँजोते हुए उन्हों ने घर की राह पकड़ी. (समाप्त)