मंगलवार, 19 मई 2009

राजमहल की डिनर टेबल से (भाग - 1)

प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर दूँ कि राजमहल में मेरा कोई आना जाना नहीं है. मैं आप ही की तरह राजमहल के पास भी नहीं फटक सकता. असल में वहाँ का एक रसोइया मेरा यार है जिससे मुझे खबरें मिलती रहती हैं. हमारे मिलने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है.
हम दोनों का शेयर मॉर्केट दलाल एक ही बन्दा था. उसी के यहाँ हमारी मुलाक़ात हुई. हुआ ऐसा कि उस दौरान मॉर्केट की हालत थोड़ी पतली थी और हमारा ये दोस्त अपने सारे शेयर घाटे में बेंचने कि ज़िद पर अड़ा हुआ था. हमारा दलाल जिसके बारे में यह मशहूर था कि यदि रिक्शे वाले को भी उसके पास भेज दो तो वह उससे मॉर्केट में इनवेस्ट करा दे, इसे अपनी तौहीन मान कर उसे ऐसा करने से मना कर रहा था.
मैं भी हैरान था और उससे पूछ बैठा अरे भाई ऐसी भी क्या ज़ल्दी है?
दलाल के यह दिलासा देने पर कि मैं एक निहायत ही गउ किस्म का आदमी हूँ, रसोइये ने सारी खिडकियाँ दरवाजे बन्द करा कर राज़ बताया....
उसे पैसे स्विटजरलैण्ड के किसी बैंक में जमा करने थे. ज़ाहिर है इस रहस्योद्घाटन से हम दोनों चौंकने की सीमा लाँघ कर भकुआ बनने के कगार पर पहुँच गए. अधिक कोंचने पर उसने विस्तार से बताना शुरू किया और हम लोगों की आँखें फैलने लगीं. जब उसने देखा कि फैलते फैलते हमारी आँखें निकलने को आ गई थीं तो उसने दया कर प्रकरण वहीं रोक दिया.
प्रभावित हो कर दलाल ने उसी दिन सब कुछ बेंच बाँच कर स्विटजरलैण्ड की राह पकड़ी और मैंने उसकी दयालुता देख उसके सामने दोस्त बनने का प्रस्ताव रख दिया. जिसे उसने मुझ दरिद्र पर कृपा कर स्वीकार कर लिया. दलाल आज तक गायब है और उसके बारे में तरह तरह की बातें सुनने को मिलती हैं जिसे मैं फिर कभी सुनाउँगा. अस्तु....
राजमहल में एक परम्परा है कि डिनर टेबल पर हिन्दी में ही बात होती है. इस परम्परा के जनक राजवंश के संस्थापक माननीय जमा-हर-ला थे. ऐसा उन्हों ने अपनी इंग्लिश परस्त ज़ुबान को 'हिन्दीयाहिन' बनाने के लिया किया था. वर्तमान महारानी मोनियो की बानी कमज़ोर है और प्रचण्ड आँधी में भी लिखे हुए भाषण पढ़्ने के लिए वह कुख्यात हैं. उनकी कही हुई बात का हिन्दी में शुद्धिकरण कर रसोइए ने बताया है. डिनर टेबल पर महारानी और राजकुमार राउल की बातचीत कुछ इस प्रकार हुई:
- माँ, इस बार भी तुमने प्रधान पद के लिए धनदोहन सिन का नाम आगे कर दिया. मुझे अच्छा नहीं लगा.

- अच्छा, मैं भी तो जानूँ मेरा लाल किस को प्रधान बनाना चाहता है?
(महारानी ने राजबल्लरी नामक जगह से चुनाव जीता है. चुनाव लड़ना और जीतना प्रधान को ऑपरेट करने के लिए अत्यावश्यक है. रियाया के साथ कुछ दिन रहने से महारानी ने जो नए शब्द सीखे हैं उनमें 'मेरा लाल' पहला है.)
- माँ, तुम्हीं इसे सँभालो ना. आखिर महारानी के होते हुए प्रधान की जरूरत ही क्या है?
अब देखो न, दादी और परदादा ने भी तो राजकाज और प्रधानी दोनों खुद सँभाली थी कि नहीं? प्रात:स्मरणीय पिता जी ने भी ऐसा ही किया था.
- बेटा, वे महान लोग थे. मेरा मतलब यह है कि रियाया उन्हें महान समझती थी और रहेगी. तुम्हारे पिताजी के उपर तो ज़बरदस्ती महानता लाद दी गई थी. जब कि वे बेचारे आखिरी समय तक उससे इनकार करते रहे.
- तो उस से क्या? तुम भी तो महान हो! पिछली बार जब तुमने रियाया के बार बार कहने और यहाँ तक कि विद्रोह की सीमा तक उतर आने पर भी प्रधानी नहीं स्वीकारी तो मैं भी तुम्हारी महानता का कायल हो गया था. एक बार ऐसा करना जरूरी था. लेकिन इस बार भी वैसा ही क्यों? मुझे तो हैरानी इस बात पर है कि इस बार रियाया तुम्हारे इस निर्णय पर हंगामा भी नहीं कर रही!

- बेटा, तुम अभी कच्चे हो. जिसे तुम रियाया समझ बैठे थे वे हमारे चमचे थे. वक्त बदल गया है बेटा. अब यह जरूरी है कि रियाया और राज खानदान के बीच प्रधान कोई और रहे. जमाना तो उसी दिन खराब हो गया था जब राजवंश के लोगों को भी गली गली वोट की भीख माँगना लाज़मी हो गया था. दिखावे के लिए ही सही कभी कभी रियाया को इस भ्रम में भी रखना पडता है कि राजघराने को राज काज से कुछ लेना देना नहीं.
आखिर तुम्हें भी इस बार कितनी गलियों की धूल और कितनी झोपड़ियों की भूख फ़ाँकनी पड़ी. फूल सा चेहरा मउला गया है रे.
(मेरे परम प्रिय दोस्त ने बताया है कि ऐसा सुनते ही राउल ने कटे हुए सारे खीरे अपने चेहरे पर सजा लिए और जल्दी जल्दी अनुलो - बिलो करने लगे. महारानी को झटका लगा. उन्हों ने ज़ोर से डांटा)

- राउल क्या कर रहे हो? डिनर टेबल का एटीक़ेट भूल गए? जानती तो तुम्हें झोपड़ी में कभी खाने नहीं देती.
- माँ, जैसा तुमने कहा वक़्त बदल रहा है. मैं भी अब रियाया के तौर तरीके जानने के कोशिश कर रहा हूँ. खीरे से खाल निर्मल हो जाती है और अनुलो - बिलो तो आज कल राष्ट्रीय खेल का दर्जा पा चुका है. देखो तो इसके प्रताप से क्रिकेट भी विदेश में होने लगा है.

- ये प्रताप कौन है? बेटा राजगद्दी सँभालने का तुम्हारा समय बहुत नजदीक आ रहा है. अपनी कम्पनी सुधारो. जहां तक रियाया के तौर तरीके जानने की बात है तो, हमारे दरबारी जनमर्दन बेदी ने तुम्हें पंचतंत्र पढाने की पेशकश की है.
हाँ तो तुम्हें धनदोहन सिन के नाम पर ऑबजेक्सन क्यों है?

(राजकुमार राउल डांट से सहम से गए थे. जनमर्दन और पंचतंत्र नाम सुनते ही उन्हें कोफ्त हो गई थी. सामने थाली में पड़ा कोफ्ता उन्हें करैले जैसा लगने लगा था. जल्दी से अपने को सँभालते हुए बोले)
- माँ मुझे कोई ऑबजेक्सन नहीं है. जब तक तुम महारानी हो कोई भी प्रधान रहे क्या फर्क पड़ता है? रिमोट तो तुम्हारे पास ही रहेगा.

- बेटा, उस रिमोट को भूल जाओ. मैंने नया अमेरिका से मँगाया है. उसमें वायरलेस कंट्रोल है जिसे तुम भी अपने मोबाइल से या लैप टॉप से ऑपरेट कर सकोगे और मेरे पास तो वह हमेशा रहेगा ही. इतना ही नहीं, अमेरिका ने स्विटजरलैण्ड वगैरह से बैंक खातों की जो जानकारी प्राप्त की है वह उसमें प्री लोडेड है.

(इतना सुनते ही राजकुमार राउल ने उछल कर महारानी के पाँव पकड़ लिए)

- माँ, तुम महान हो. रियाया चाहे जो समझे तुम वाकई महान हो. लेकिन एक पेंच है माँ. अगर रिमोट की ऐसी वैसी जानकारी धनदोहन जी या किसी और के पास पहुँच गई तो?

- बेटा, धनदोहन जी अपने खास सिपहसालार हैं. उन्हें सब पता है. वैसे भी रिमोट में आँकड़े अपडेट होते रहेंगें. पहले उसे हम जानेंगें फिर यह हमारे उपर होगा कि धनदोहन जी को उसका एक्सेस दें या नहीं....

मेरे दोस्त ने बताया है कि स्विटजरलैण्ड और बैंक की बात सुनते ही उसे एक जरूरी फोन करने की याद आ गई और बात को बीच में ही छोड़ वह फोन करने चला गया. वैसे भी डिनर समाप्ति की ओर था और राजपरिवार अब जिस एक खास यूरोपियन अन्दाज लिए अंग्रेजी में बात करने वाला था वह उसके पल्ले कम ही पड़ती थी.

राजधानी में रहते हुए मेरे दोस्त ने राष्ट्रीय शव-तांत्रिक दलदल के बारे में जो कुछ जाना सुना है, रोचक है. फिर कभी बताउँगा. फिलहाल विदा दें.. (अगला भाग)

10 टिप्‍पणियां:

  1. मजबूत व्यंग्य है। मजा आ गया। इसे जारी रखें।

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  2. लगता है मेरी शैली आपको भा गयी है। आपने इसको ‘इम्प्रूव’ भी किया है। अच्छा व्यंग्य है। बधाई!
    www.samwaadghar.blogspot.com

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  3. धनदोहन सिन की तो बल्ले-बल्ले हो गयी। अगले पाँच साल तक मौज करेँ। अगले चुनाव से थोड़ा पहले राउल बाबा मुकुट पहनेँगे।

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  4. @sanjaygrover

    धन्यवाद सन्जय जी, व्यंग्य लेखन की यह शैली जोशी, हरिशंकर परसाई, धूमिल आदि की परम्परा से जुडती है. ब्लॊग पर भी इस शैली में बहुत अच्छा लिखा जा रहा है. उदाहरण के लिए यह ब्लॊग देखें:
    http://anvarat.blogspot.com

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  5. बहुत मजेदार व्यंग्य है, अगली कड़ी का इन्तजार है।

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  6. ये पोस्ट पढ़ कर खुशी हुई.

    गलत जगह दिल नहीं लगाया.....
    गलत जगह दिन खराब नहीं किया.

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  7. धांसु व्यंग्य, राजमहल के वाच डॉग से भी दोस्ती बनाईए, वह भी बहुत कुछ भोंकेगा। अंदर की बात बाहर आएगी।

    मजा आ गया गिरजेश भाई

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  8. एक बात तो तय है कि इस लेख को कोई समाचार पत्र यूं ही मुफ़्त में उड़ा कर छापने की कोशि‍श्‍ा नहीं करेगा :) बल्‍कि उसकी कोशिश होगी कि वह पहले आपसे एक एफ़ीडेवि‍ट साइन करा ले कि मैं होशोहवास में घोषणा करता हूं कि इस लेख के बारे में समाचार पत्र की कोई ज़िम्‍मेदारी बिल्‍कुल नहीं होगी बल्‍कि मैँ स्‍वयं इसका उत्तरदायी हूँ.

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