गुरुवार, 14 मई 2009

मुल्ला तो मस्त है

पाकिस्तान में सिखों पर लगे जजिया और उसके बाद उनके पलायन के बारे में आप ने पढ़ा होगा. इस घटना की निन्दा सब ने की और हमारे यहाँ के कठमुल्लों ने भी उसमें अपना योगदान दिया जिसे बहुत प्रमुखता से अखबारों ने छापा भी और अब इन घटनाओं को सभी भूल भी गए हैं. वैसे ही जैसे बर्षों पहले कश्मीर से लाखों हिन्दुओं के पलायन और अपने ही देश में शरणार्थी होने को भूल गए. हम अपनी आँखों के सामने हुई इतनी विशाल त्रासदी को भी भूल गए हैं. . यह भूलना दैनिक भूलने की आदत जैसा नहीं है. यह विस्मृति अपने अस्तित्त्व को ही ख़तरे में डालने वाली है. ! लानत है.

जो पाकिस्तान या कश्मीर में हुआ वह कहीं भी हो सकता है. सेकुलरी घुट्टी पी पी कर मतवाले हुए लोगों को यह असम्भव लग सकता है लेकिन है सम्भव. कश्मीरी हिन्दुओं ने कब सोचा होगा कि एक दिन उन्हें अपनी जन्मभू छोड़्नी होगी?

कभी आप ने सोचा है कि इस्लाम में ऐसा क्या है जो इसे ऐसा हमलावर बनाता है? मैं इस्लाम की बात कर रहा हूँ उसके अनुयाइओं की नहीं.. वास्तव में इस्लाम एक अरब राष्ट्रवादी आन्दोलन था जिसकी प्रासंगिकता उसके मूल रूप में एकदम समाप्त हो चुकी है. कठमुल्ले अपने स्वार्थ के लिए उसके रूप में कोई परिवर्तन नहीं चाहते. परिवर्तन की बात सोचनी भी कुफ्र मानी जाती है. अपनी इस रणनीति के तहत कि जब तक कम रहो साम, दाम, दण्ड या भेद किसी भी तरह से विस्तार के लिए सहूलियतें लेते रहो, विस्तार करते रहो और जब समर्थ हो जाओ तो वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति कर डालो; कठमुल्ले समय समय पर ऐसे बयान देते रहते हैं जो हमारी सेकुलरी जमात के कानों को शहद जैसे लगते हैं लेकिन उन बयानों में भी कथनी और करनी के अंतर्विरोध सामने आ जाते हैं. मुझे आश्चर्य होता है कि बाल की खाल तक निकाल देने में समर्थ सेकुलरी लोगों को ये अंतर्विरोध समझ में क्यों नहीं आते? क्या घुट्टी में इतना दम है कि वह सोच समझ को ही कुन्द कर दे? नहीं यदि ऐसा होता तो दिमाग एक दम नहीं चलता. वास्तविकता यह है कि वे डरते हैं. डरते हैं कि कोई फतवा न जारी हो जाय, डरते हैं कि उनकी चमकती सेकुलरी छवि पर कोई दाग़ न लग जाय और उनकी दुकानदारी ही बन्द हो जाय; वे डरते हैं कि फिर से शून्य से सोचना और अपने आप को बदलना न पड़ जाय ! बडे ही खतरनाक आलसी हैं ये !!

सिखों पर जजिया के मामले में मुल्ले ने फरमाया है कि:

  1. यह ग़लत है क्यों कि जजिया हमेशा हमला कर जीती गई जमात पर सुरक्षा गारण्टी के तौर पर लगाया जाता है !

  2. यह गलत है क्यों कि जजिया का उपयोग दीन को कुबूल कर चुकी जनता की शिक्षा और कल्याण के कामों में लगाया जाना चाहिए और तालिबान ऐसा नहीं कर रहा.

मुल्ले की सोच देखिए. वह जजिया को गलत नहीं कहता. पाकिस्तान में उसको लगाने के तरीके और परिस्थितियों पर उसे कोफ्त हो रही है! उसे आज के जमाने में भी हमला कर लोगों पर जुल्म करने और उन्हें खत्म करने की परिपाटी पर कोई उज़्र नहीं है.

जजिया गलत नहीं है, इसकी पुष्टि उसके दूसरे बयान से भी हो जाती है. जजिया की रकम से वह क़ठमुल्ली जनता की शिक्षा और कल्याण की बात करता है. मतलब कि मेहनत कर कोई और कमाए, मज़ा हम करेंगें. क्यों? भइ ऐसा ही लिखा गया है, ऐसा ही सबसे बड़ी हुकूमत ने खुद कहा है. हम तो सिर्फ़ पालन कर रहे हैं !

अब मुल्ले को कौन बताए कि हमले के तरीके छठी सदी के मुक़ाबले आज बदल चुके हैं. अमेरिका ने जो इराक में किया वह हमला ही था. कश्मीरी मुसल्मानों ने जो घाटी में किया वह हमला ही था. नक्सली जो कर रहे हैं वह हमला ही है, दंगों में जो होता है वह हमला ही होता है और दिन प्रतिदिन की छोटी छोटी ऐसी घटनाओं में भी जो होता है वह एक बहुत बड़े हमले का ही भाग है... मुल्ला चालाक है. वह सब समझता है, . वह बड़ी चालाकी से ध्यान मुख्य मुद्दे से कहीं और ले जा रहा है. आप के चेतन और अवचेतन दोनों को बड़ी सफाई से वह कुन्द कर रहा है. मन ही मन वह प्रसन्न है कि एक फतह और हुई.

अब आप के उपर है कि आप क्या सोचते, समझते और करते हैं. मुल्ला तो मस्त है..

3 टिप्‍पणियां:

  1. अपाको हलत फ़हमी है जी . सेकुलर कठमुल्ले जजिया के फ़ेवर मे प्रचार करने और इसे सही ठहराने ( न्याय और तर्क संगत) बताने मे लग गये है यहा देखिये http://kabaadkhaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_12.html

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  2. लतखोर हैं सब!
    वैसे आप नाम के साथ पोस्ट करें. इतना तो साहस रखें

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