मंगलवार, 23 मार्च 2010

वे लोग किस खुशी की बात करते थे ?

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भगत सिंह
राजगुरु
सुखदेव
श्रद्धांजलि, सभी चित्र साभार: http://www.shahidbhagatsingh.org
बलिदान दिवस: 23 मार्च 1931
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं।
वे लोग किस खुशी की बात करते थे ? ऐसा क्या था उस 'खुशी' में जो  जीवन तक निछावर कर गए?
.. आज स्वयं से, सब से यह पूछ रहा हूँ, "हम 'खुश' तो हैं न ?"
     

सोमवार, 22 मार्च 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 4

पहला भाग
दूसरा भाग
तीसरा भाग
लौटते हुए सोचता हूँ - सढ़ुआन का यह रिश्ता अभी एक पीढ़ी पहले तक गौण सा रिश्ता माना जाता था। बहनापा बना रहता था लेकिन साढ़ुओं में कहीं भाइचारे का ईर्ष्यालु पक्ष ही प्रबल रहता था। बढ़ते शहरीकरण ने परिवारों को केन्द्रिक बनाया है तो साथ ही परिवार में नारी का रसूख भी बढ़ा है। परिणाम यह हुआ है कि बहनापे ने अपने आगोश को बढ़ा कर साढ़ुओं में भाइचारा भी बढ़ा दिया है। आज यह रिश्ता विशिष्ट है, अलग ही महत्त्व रखता है।..
.. सूरज ढल रहा है और पडरौना में उत्सव पूर्व का सन्नाटा पसरता दिखाई देता है। उत्सव पर्व के दिन के उल्लास और चहल पहल इस सन्नाटे के ही कारण तो हो पाते हैं। बाद का सन्नाटा जीवन का सामान्य होता है लेकिन पर्व के बाद का दिन कितना उदास लगता है !..
हमलोग धर्मसमधा देवी दुर्गा के प्राचीन स्थान से गुजर रहे हैं। मिथक याद आता है - शापित राजा, विवाह के पश्चात बाघ द्वारा मृत्यु की भविष्यवाणी, चारो तरफ पोखरे से घिरे कोहबर कक्ष का निर्माण, हजामिन का उबटन की झिल्ली से बाघ बना कर राजा को डराने का हास्य उद्योग और उसका सचमुच बाघ हो जाना, राजा की मृत्यु और नवविवाहिता का सती हो जाना ... सती पूजन स्थल। कितना सच होता है इन कथाओं में? मनुष्य की आस्था जाने क्या क्या सिरजा देती है। देवी को मन ही मन प्रणाम करता हूँ - या देवी सर्वभूतेषु .. मेरा अस्तित्व तुम्हारे आशीर्वाद से भी जुड़ा हुआ है।
.. दुखिया को लेकर टाउन आता मास्टर। गर्भस्थ शिशु बैलगाड़ी के हिचकोलों से आड़ा हो गया। असहनीय पीड़ा। कोई उपाय न देख मास्टर ने स्वयं उदर पर हाथ फेरा था - मन में प्रार्थना के स्वर गूँज उठे थे। देवी धर्मसमधे ! क्या इस बार भी ? ..देवी ने प्रार्थना सुन ली। शिशु एक झटके से सीधा हो गया था ...
संजय को भी इस स्थान का महात्म्य पता है। रुकने को कहता है.. मैं किसी और दुनिया में हूँ। कुछ बहुत पवित्र सा भीतर घट रहा है, सम्भवत: जन्म के बाद शिशु का क्रन्दन। रुकना विघ्न होगा। मेरा मौन गाड़ी के शोर के साथ जारी रहता है। हम नहीं रुकते हैं ...
.. 'उसका' चचेरा भाई। संजय पता लगा लेता है। उसकी ससुराल गोपालगंज, बिहार में है। संजय हँसता है। पता भी चला तो ..मैं कहता हूँ, अबे! विवाहिता है। न तुम किशोर रहे और न ही वह किशोरी .. एक अनकही और अनघटी प्रेमकथा का अवसान..
संजय के बहाव के साथ अपने को छोड़ देता हूँ। बौराया सा वह घूमता है - थाने के भीतर, यहाँ हम लोग डेढ़ महीने रहे, यहाँ पिटाई होती थी, यहाँ जन्माष्टमी की सजावट होती थी...
मुमताज कहाँ है ? कहाँ मिलेगा? रामकोला की जानी पहचानी इस बुलेट सवार 'हस्ती' को मैंने भी बहुत दिनों से नहीं देखा। ग़जब का पियक्कड़ और एक बार मरण सेज तक पहुँच गया था। उम्रदराज हो ही गया था, मर वर गया होगा। मैं घोषित कर देता हूँ, लेकिन वाह रे संजय ! ऐसे कैसे मान ले ? उसे चौराहे पर तहकीकात करता छोड़ देता हूँ। कुछ मिनटों में ही वह ढीली परिचय कड़ियाँ इधर उधर उछाल देता है। जीवित होगा तो अवश्य बँधा आएगा। धन्य मोबाइल ! ...
संजय वहाँ भी जाता है जहाँ वे लोग रामकोला प्रवास के दौरान रहे थे। विशाल लौह गेट वैसे ही है लेकिन घर दरक रहा है। पुराने लोग चले गए। बँटवारे ने गेट के बगल में एक और पतला द्वार क्या खोला, घर की रौनक ही चली गई। सब कुछ छीज रहा है। घर उजड़ते हैं तो दूसरे बसते हैं। इस घर का बेटा एक प्रशासनिक अधिकारी है। कहीं घर ले लिया होगा, पुस्तैनी घर के द्वार तो बस स्मृतियों के प्रेत घूमते हैं और रखे हुए सामान ढूढने आते हैं.. सामान भी कैसे कैसे.. संजय को बताया जाता है अरे! तोहार बाबूजी हमरे बाबूजी के बहुत गरियावें, जीजा साला के रिश्ता मानत रहें.. संजय अपने मृत माता पिता की स्मृतियों को सहज ही जिए जा रहा है। वक्त ! जाने क्या क्या बताता जाता है..रामकोला में बस एक साल, वह भी बचपन में रहा शख्स.. इस समय सामने बैठे अधेड़ का चरम आत्मीय है और मैं, रामकोला का भी स्थायी निवासी, बस एक साक्षी ...मेरे गले में कुछ फंस रहा है, आँख भर रही है, आँसू रुकते हैं संजय की अब तक की बेचैनी को समझ रहे हैं ..
अपने पारिवारिक मित्र डाक्टर साहब से मिलता हूँ। आत्मीयता के दौर में ढेर सारी बनती मिठाइयाँ उदरस्थ कर लेता हूँ। समय कम है फिर भी हम आचार्य जी से मिलने पहुँच जाते हैं। आचार्य जी इतने वर्षों के बाद भी वैसे ही दिखते हैं। बस केश श्वेत हो गए हैं। दुनियादार राजनैतिक मनुष्य हैं। एक और सज्जन साथ बैठे हैं। तमाम सत्कारों और आत्मीयता प्रदर्शन के बावजूद मुझे उस ऊष्मा का अनुभव नहीं होता जो डाक्टर साहब के यहाँ हुआ था.. यह कैसा संप्रेषण है जो अनकही को भी समझा देता है ? छठी इन्द्रिय के तार कैसे कहाँ कहाँ ?..
सामने वैद्य जी की विशाल मकान है और लगे हुए वे क्वार्टर हैं जिनमें से एक में मेरा जन्म हुआ था। वैद्य जी का घर सूना है। वैद्य जी की अधेड़ संतानें एक एक कर असाध्य बीमारियों से मर चुकी हैं। संजय का हाथ पकड़े उधर को चल देता हूँ। पहुँच कर मुड़ते ही ठिठक जाता हूँ - सामने क़्वार्टरों की पंक्ति खंडहर हो चुकी है !
janmsthan भारी कदमों से उस जगह पहुँचता हूँ जहाँ हमलोग रहे थे ... खंडहर ! एक तरफ के खंडहर क़्वार्टर में कुछ मज़दूर रह रहे हैं। बाकी के करीब ..गिनने की कोशिश करता हूँ .. नहीं हो पाती, सब खंडहर हो चुके हैं। किससे पूछूँ ? क्या पूछूँ संजय क्या ? दुमंजिली छत से दो लड़कियाँ झाँक रही हैं, उनसे पूछूँ ? क्या ? ...
.. बगल के क़्वार्टर में हँसमुख कामदार सुपरवाइजर रहते थे। बीच की अधूरी दीवार पर एक बल्ब लटकता था। प्रकाश के साथ उन भले लोगों की आपसी चुहुल भी घर में आती थी । दोनों घरों के लिए एक बल्ब काफी था । क्या दिन थे ! ..
ओसारे की चौकी पर जाने कितने शिष्यों को अनवरत चलती मुफ्त अंग्रेजी शिक्षा से लाभ हुआ था । कितने ही बच्चों का जन्म इस क़्वार्टर में हुआ। जटिल से जटिल मरीज ठीक हो कर गए । दक्षिणमुखी गरीब क़्वार्टर में रहता मास्टर कौन सी विद्या जानता था – लोग लाद कर लाए गए, अपने पैरों चल कर गए। कोई नहीं मरा – मास्टरनी के अक्षय पात्र में अमृत था शायद ।..
याद आता है बिना जात पात की परवाह किए अम्मा का पढ़ने आते शिष्यों के सिर पर कड़ुवे तेल की चम्पू मालिश और उनकी माताओं के लिए ढेर सारी नसीहतें । क्या वे घर जा कर बताते होंगे ? आश्चर्य नहीं कि आज भी मास्टर को सड़क पर रोक कोई अपरिचित चरण स्पर्श करता है, अपना परिचय देता है, तृप्त हो चला जाता है और मास्टर को कुछ याद नहीं आता !..
समय ठहर गया है। नहीं, अपनी चाल भूल गया है । जाने कितनी घटनाएँ, कितनी बातें सारी सीमाएँ सारे बन्धन तोड़ कर इकठ्ठे हो आए हैं – तवे पर उल्टा रेंगता करैत साँप, सामने के खेतों में रहता अजगर, वह गूलर का पेंड़ जिसके दूध से आँव का इलाज होता था, गुप्ता जी के सामने का अमरूद पेंड़, एक बार चढ़ कर हमलोगों ने गाँव से आए चाचा को नाम ले बुलाया था – राम जी, राम जी । बाद में बहुत पिटाई हुई थी। ... नए घर में जाने से पहले जर्जर दीवार से पैर मार कर प्लास्टर गिराता मैं और पिताजी का झापड़ ! इस घर में मैंने अपने स्वर्णिम वर्ष बिताए, यहाँ तुम्हारा जन्म हुआ और तुम.. ?
.. आँसू अब छ्लक आए हैं । संजय ! इस जगह को खरीद लूँ ? किससे खरीदूँ – इस विवादित टुकड़े को ! ...
सहन में सफाई हुई दिखती है । एक अनार किसी ने कभी रोप दिया होगा । उस पर फूल आए हैं । हमारे स्वागत में ? संजय! किसी को पता था क्या कि हम लोग आ रहे हैं ? सारे प्रश्न घुट कर रह जाते हैं..
.. पीड़ा को दबा कर हास्य का पुट दे कहता हूँ हिन्दी से जुड़े महापुरुषों के जन्मस्थान खंडहर होने को अभिशप्त हैं । हिन्दी के एक महान ब्लॉगर की जन्मधरा भिन्न कैसे हो सकती है? आज से पचासएक वर्षों के बाद लोग आएँगे – हिन्दी के महान ब्लॉगर का जन्म स्थान देखने और यह अनार का पेंड़ उनका स्वागत करेगा। अनार कितने वर्ष जी सकता है ?..
शायद कुछ नहीं मिलेगा जिसे पहचाना भी जा सके। शायद कोई नहीं आएगा । शायद वह ब्लॉगर इतना महान भी नहीं होगा ... (जारी)

रविवार, 21 मार्च 2010

कुछ लिखना है लेकिन मन नहीं बन रहा इसलिए यह लिख दिया :)

(1 ) पोस्ट छपने के बाद से लेकर पहली टिप्पणी आने तक ही लेखक को यह सुविधा मिलनी चाहिए कि वह पोस्ट में परिवर्तन कर सके। उसके बाद नहीं। आदर्श स्थिति तो यह हो कि छपने के बाद से ही यह सुविधा बन्द कर देनी चाहिए,  आखिर ऐसे भी पाठक हैं जो पढ़ते तो हैं लेकिन टिप्पणी नहीं करते। लेकिन चूँकि वे दुबारा से पढ़ सकते हैं और वापस बिना टिप्पणी किए जा भी सकते हैं इसलिए उनके सापेक्ष कोई नियम बनाना ठीक नहीं है। 
टिप्पणी के मामले में बात अलग हो जाती है। आप ने कुछ पढ़ा, टिप्पणी किया और बाद में लेखक ने पोस्ट ही बदल दी ! ऐसी स्थिति से निपटने के लिए टिप्पणीकार को यह सुविधा मिलनी चाहिए कि वह अपनी पुरानी टिप्पणी में भी परिवर्तन कर सके। न न ! टिप्पणी मिटाना हल नहीं है। मिटाने के बाद भी सब कुछ उपलब्ध रहता है - कहीं न कहीं।
यह भी किया जा सकता है कि पोस्ट में किए गए परिवर्तन फुटनोट में स्वचालित रूप से नीचे समय के साथ अंकित होते रहें। 
 (2) आम जीवन में यूँ ही स्थापित हो जाने वाली टिप्पणी जब ब्लॉग जगत में आती है तो उसे अपने को स्थापित करने के लिए अधिकतम तीन स्तरों से गुजरना होता है। 
एक - जब पाठक टिप्पणी कर देता है तो वह केवल उसकी रहती है। 
दो - जब ब्लॉग स्वामी उसे देख समझ लेता है तो वह दो जनों की हो जाती है।
तीन - जब ब्लॉग स्वामी उसे प्रकाशित कर देता  है तो वह सारे ब्लॉग जगत की हो जाती है। 
मेरे जैसे कुछ आलसी टिप्पणी को इतनी दुरूह प्रक्रिया से नहीं गुजारते। मॉडरेशन नहीं लगाते। परिणामत: टिप्पणी बस पहले स्तर से ही गुजर कर सारे ब्लॉग जगत की हो जाती है। केवल ऐसी दशा में ही ब्लॉग स्वामी को यह अधिकार होना चाहिए कि वह टिप्पणी को मिटा सके। 
मॉडरेशन वालों को यह सुविधा नहीं मिलनी चाहिए। वे तो पहले ही देख सुन, सोच समझ कर प्रकाशित कर चुके हैं। 
यह सारी बकवास इसलिए कर रहा हूँ कि रविवार है। मन नहीं लग रहा और जो लिखना है वह इतनी दक्षता की माँग कर रहा है कि कँपकँपी छूट रही है। ब्लॉग जगत के महारथी, अतिरथी, सारथी, रथविरती, व्रती, पैदल ... वगैरह सबने टिप्पणियों पर कुछ न कुछ अवश्य लिखा है। मुझे लगा कि मेरा यह संस्कार तो अभी तक हुआ ही नहीं ! इसलिए सम्पूर्ण ब्लॉगर बनने की दिशा में एक और पग बढ़ाते हुए यह लेख लिख रहा हूँ। 
 उपर जो लिखा है वह इसलिए लिख पाया कि परोक्ष रूप से मुफ्त प्लेटफॉर्म उपलब्ध है। अगर इस काम के लिए पैसे अंटी से निकलते प्रत्यक्ष दिखते तो शायद न लिखता, संयम रखता। मुफ्त के प्लेटफॉर्म पर मुफ्त की सलाह देना अपराध नहीं एक कर्तव्य है - उसे मानने वाले की अंटी से हजारो नोट निकल जाँय तो भी। 
 अर्थ  यानि की धन बहुत महत्वपूर्ण है। 'सूरज का सातवाँ घोड़ा' में यह सिद्ध किया जा चुका है कि प्रेम के प्रस्फुटन और उसको प्रवाहशील बनाने में भी धन का योगदान होता है। आखिर इतना धन न हो कि भैंस रखी जा सके तो दूध लेने कोई क्यों आएगी ? जब नहीं आएगी तो प्रेम पूर्व ताकाझाँकी नैन मटक्का कैसे होंगे? न होंगे तो प्रेम कैसे होगा ? ... सारांश यह है कि प्रेम के लिए धन परमावश्यक है। 
 पैकेट के दूध बेचने वाला गेट पर पुकार रहा है। आधुनिक युग ने प्रेम की तमाम सम्भावनाओं की हत्या कर दी है। पैकेट के दूध ने जाने कितनी प्रेम कथाओं को घटित होने से पहले ही समाप्त कर दिया होगा ! बड़ी त्रासदी है। 
 आप ने इसे पढ़ा यही बहुत है। टिप्पणी दे सकें तो और भी बड़ी बात होगी। दूध लेते समय दो लीटर उठौना महत्त्वपूर्ण नहीं होता, बाद में दूधवाला जो घलुआ देता है वह परम महत्त्वपूर्ण होता है भले 50 मिलीलीटर ही हो !     

बुधवार, 17 मार्च 2010

एक और कुकर्म की भूमिका

मेरे कुकर्मों की निन्दा न करो
मेरे कुकर्म निम्नतर हैं 
मेरे कुकर्म तुम्हें स्वीकार्य होने चाहिए: 
उसने बलात्कार किया - तुम चुप रहे 
उसने घोटाला किया - तुम चुप रहे 
उसने देश को समझौते के नीचे दफन कर दिया - तुम चुप रहे 
आज मेरे निम्नतर कुकर्म पर 
तुम इतने प्रगल्भ क्यों हो?
तुम पक्षपाती हो 
तुम उसके साथी हो
तुम्हारे मन में चोर है - 
तुम्हें याद दिलाता हूँ
तुम्हारी कसौटी ।
तुम्हें दुनिया में हो रहे
हर कुकर्म , हर अत्याचार, हर घपले
से गुजरना होगा
उन पर लिखना होगा - 
इसके बाद ही तुम लिख सकते हो मेरे स्याह कर्म 
कराह सकते हो
मेरे कुकर्मों की तपिश से झुलसते हुए -
बेहतर है चुप रहो जैसे पहले रहे थे 
तुम्हारा मौन  तुम्हारा कवच है
गारंटी है
कि
तुम निरपेक्ष हो इस सापेक्ष दौर में - 
बोलने पर तुम्हें सफाई देनी होगी :
उसने बलात्कार किया - तुम चुप रहे
उसने घोटाला किया - तुम चुप रहे
उसने देश को समझौते के नीचे दफन कर दिया - तुम चुप रहे
क्यों ? 
.. अब देखो न तुम्हें इस 'क्यों' पर टाँग 
मैंने अपनी टाँगे फैला दी हैं
एक और कुकर्म की भूमिका में - 
उम्मीद है कि टँगे हुए तुम 
चुप रहोगे। 

मंगलवार, 16 मार्च 2010

नवसंवत्सर पर प्रार्थना

आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वत:।

संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम

देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते

समानीव आकू पि: समाना हृदयानि व:

समानमस्तु व मनो यथा व: सुसहासति।

धूप!
आओ,अंधकार मन गहन कूप
फैला शीतल तम ।मृत्यु प्रहर
भेद आओ। किरणों के पाखी प्रखर
कलरव प्रकाश गह्वर गह्वर
भर दो विश्वास सबल ।
तिमिर प्रबल माया कुहर
हो छिन्न भिन्न। सत्त्वर सुरूप
आओ। अंधकार मन गहन कूप
भेद कर आओ धूप।

सोमवार, 15 मार्च 2010

यहाँ थूकते जाइए

यह माला फूलों से नहीं हजार हजार के करेंसी नोटों से बनाई गई है।
जरा अनुमान लगाइए कितना रुपया !
थूकते भी जाइए।
मुझे आपत्ति नहीं होगी।  

रविवार, 14 मार्च 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 3

... सरेह में दूर दिखते हैं - पोखरे के किनारे । नंगे हैं। वह घनापन गायब है जो कभी सिहरा देता था - पोखरा पर के बाबा अब नहीं रहे । गाजर घास को देखते हुए दीठ ठहर जाती है - कोलतार की सड़क पर दूब की पंक्ति उग आई है लम्बी - दूर तक । दूब - बचपन में कभी सुना था बारह बरस तक चील की पीठ पर रह कर भी अगर धरती पर गिर जाय तो फिर से जी उठती है, पसर जाती है।
.. सड़क में कोलतार की परत का दुबलापन भ्रष्टाचार की मोटाई के समानुपाती होता है। सत्ता के विकेन्द्रीकरण के तहत पूँजी और सामग्री का समतामूलक बँटवारा हुआ।भ्रष्टाचार के जाने कितने केन्द्र बन गए। जो जितना नालायक हो सकता था हुआ। ठीकेदार ने तो पहले ही अपना कट काट लिया था। बचे में से किसी दबंग ने घर के स्लैब के लिए रातो रात गिट्टी उठवा ली तो आम रियाया ने कोलतार की ढोवान की - सूपा, घर के दरवाजे, खाँची, चेचरा ... जिस किसी चीज पर कालिख पुत सकती थी, पुत गई। बच गया तो बस आदमी का मुँह - गाँव में मूँहे करिख्खा लगना मतलब बहुत बेइज्जती होना। इसमें कैसी बेइज्जती -ठीकेदार बैनचो को ही अकले कैसे माल उड़ाने दे सकते थे ?नतीजा यह हुआ कि सड़क पर कोलतार की परत बहुत दुबरा गई...
दूब पसरनी ही थी सो पसरी !  इतनी सी जबरी को बेधने के लिए थेथरई का गुण जरूरी नहीं है। ... हमलोग कांक्रीट की सड़क पर मुड़ जाते हैं। इसकी ढलाई होते मैंने देखा था। कहते हैं कि, मुझे इस तरह नहीं कहना चाहिए आखिर विद्वान सिविल इंजीनियर हूँ, ढंग के कांक्रीट की उम्र 75 साल होती है। यह सड़क दस साल भी चल जाय तो मुझे खुश होना पड़ेगा।
मिडिल स्कूल का विशाल मैदान ताजा भरान की सफाई लिए दिखता है। भैया बताते हैं कि क्रिकेट टूर्नामेंट हुआ था, भूतपूर्व सांसद जी उद्घाटन करने आए थे। धन्य नरेगा, रेगा रेगा .. पग घुँघरू बाँध मीरा नाची थी, नाची थी... सब नाच रहे हैं। मिट्टी की माया, पैसा रुपया हाथ का मैल। मिट्टी, मैल, माया ... भैया घपले का आँकड़ा कूतने लगते हैं और मुझे दिखते हैं - बरम बाबा और काली माई के स्थानों के गड्ढे। थोड़ा भ्रष्ट मिट्टी का छिड़काव वहाँ भी करवा दिया होता हरामखोरों ! ..पुण्य मिलता।
.. योगी, पाप क्या है? चित्रलेखा तुम्हारे प्रश्न यहाँ ?
.. मैदान के आगे किसी कर्मठ युवक की छोटी सी गुमटी है। बन्द है। सामने की बेंच को साइकिल की टूटी चेन द्वारा गुमटी से बाँध कर ताला जड़ दिया गया है। चोरी और होलिका में उठा ले जाने का डर है। फोटो लेते सोचता हूँ अगर पाँच छ: जुट जाँय तो गुमटी और बेंच दोनों होलिका में पहुँच जाँय - फिर भी गुमटी मालिक ने अपने चैन को टूटी चेन के भरोसे रख छोड़ा है। .. 

paakheeखलिहान आ गया है और दिखते हैं दो ऐतिहासिक पाकड़ पेंड़। ऐतिहासिक इसलिए कि यह वही खलिहान है जहाँ कभी हजार की बारात रुकी थी। सम्भवत: ये पेंड़ तब जवान रहे होंगे या नए नए लगाए होंगे  लेकिन रहे होंगे जरूर । खलिहान उदास सा लगता है। शायद खिली धूप और पृष्ठभूमि के बागीचों का उजड़ जाना इसके कारण हों। एक पेंड़ की नई फुनगियों ने उसे अलग ही रंगत दे दी है जब कि दूसरा अभी पतझड़ को ही सहेजे हुए है। ऐसा क्यों? क्या दूसरा मर रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक ने दूसरे को लुभाने के लिए सुनहरी चादर ओढ़ ली है ! चित्र लेता हूँ और पाता हूँ कि कॉंक्रीट की सड़क ने भूदृश्य के पुराने रहस्य और सम्मोहन को खत्म कर दिया है। बाउ तुम्हारे प्रेत, ब्रह्मराक्षस, आधी रात में पोखरे पर नाचती लपटें ... सब जाने कभी के गायब हो चुके हैं, मैं क्यों उस भूत के सम्मोहन को ढूढ़ता सा रहता हूँ जिसे बस सुना भर देखा कभी नहीं ?    
.. वापस घर। बड़े साढ़ू ने गाड़ी भेजी है। दोनों साले, सलहजें वही हैं, नई बनी मकान में होली की जुटान है। साढ़ू भैया डाक्टर हैं और पडरौना में रहते हुए भी लन्दन के सपने देखते हैं और सर्जते भी हैं। बच्चे देहरादून और ग्वालियर में पढ़ते हैं । मकान ऐसी आधुनिक बनी है कि पडरौना में वैसी मकान आज नहीं है। संजय के साथ चल देता हूँ। वह मगन है - 'उसका' पता मिलेगा, मुमताज मिलेगा, आचार्य जी मिलेंगे, थाने पर घूमेंगे, जाने क्या क्या ...   
पडरौना में बने उस आधुनिक घर में प्रवेश करते मुझे वह दिन याद आता है जब सामने की जमीन पर हॉस्पिटल की स्लैब पड़ी थी। सपनों के साथ चलते पैरों में दम हो तो देर भले हो जाय उन्हें हक़ीकत बनना ही होता है। ड्रॉइंग हाल का इंटीरियर मिनिमलिस्ट सुरुचि से साक्षात्कार कराता है। मेरी दृष्टि पॉलिश किए गए संगमरमरी फर्श पर अटक जाती है। बहुत दिनों बाद अच्छी पॉलिश देखी है - टू द बेस्ट स्पेसिफिकेशन। इंजीनियर मन प्रसन्न होता है। एक जगह लाल धब्बा सा दिखता है। पूछने पर पता चलता है कि पूजा के दिन की रोली है। मैं सलाह दे डालता हूँ - इस पत्थर में सोखने का गुण होता है। धब्बे वर्षों तक नहीं जाते। गृही और गृहिणी के चेहरों के भाव से सांत्वना मिलती है - गीले रंग तो यहाँ अब नहीं पड़ने वाले। किसी लोकल संवाददाता का फोन आता है और डाक्टर साहब गीले और रासायनिक रंगों के हजार दोष गिना जाते हैं। नए घर के प्रेम से उत्पन्न उत्साह ने उनके स्वर में और शक्ति भर दिया है।..
छोटे साले की शादी के अलबम देखते देखते बात भ्रुण हत्या पर आ जाती है। डाक्टर साहब बताते हैं कि अनधिकृत रिपोर्टों के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश में लिंग अनुपात 750 से 800 के बीच रह गया है। भ्रुण हत्या के गुप्त कारोबार पर प्रकाश डालते हैं और भी बहुत कुछ पता चलता है जिसे लिख नहीं सकता। ...
तीन बहनें - एक का 'पुरुषार्थ' सामने है, जी हाँ यह घर, वह हॉस्पिटल सब के निर्माण के पीछे मेरी सढ़ुवाइन का उतना ही श्रम लगा है जितना साढ़ू का। इंटीरियर के लिए इनकी लखनऊ यात्राओं का मैं साक्षी रहा हूँ। हॉस्पिटल से लेकर घर और बच्चों की शिक्षा सबका प्रबन्धन इनके हाथ में है। कभी डाक्टर भैया को मैंने सलाह दी थी कि एक प्रबन्धक रख लीजिए। सढ़ुवाइन की सामर्थ्य को नहीं जानता था। दूसरी बहन मेरे जैसे महाआलसी और टालू व्यक्ति के साथ रहते हुए घर को सँभाले है - चलता फिरता स्तम्भ। तीसरी के अर्थ-प्रबन्धन का लोहा सभी मानते हैं।.. नारी इतनी अवांछित क्यों है? लोग इतने अन्धे क्यों हैं? ..क्या केवल दहेज के कारण? या जाति व्यवस्था के कारण या उस मानसिकता के कारण जो नारी को 'इज्जत' मानती है, दूसरी जाति में बेटी नहीं देनी और न लेनी। उलझ कर रह जाता हूँ। यह उलझाव नारी ही तोड़ेगी।..
डाक्टर भैया बताते हैं कि भ्रुण हत्या का सारा खेल झोला छाप या सन्दिग्ध डिग्री धारक डाक्टरों के रैकेट का है।  भ्रुण हत्या के विरोध में पडरौना में डाक्टरों ने मिल कर जुलूस निकलवाया था। अब उन लोगों को सम्मानित करने की तैयारी है जिन्हों ने स्वेच्छा से एक या दो बेटियों के बाद ही परिवार नियोजन अपना लिया था। ऐसे लोग मिलेंगे? ..
.. प्रकृति का बदला शुरू हो चुका है। एक आँधी सी आ रही है जिसे कोई रोक नहीं सकता। नारी पूरी शक्ति से और कभी कभी प्रतिक्रियावादी हो कर भी इस सड़े गले सामाजिक संगठन को चिन्दी चिन्दी कर उड़ा देने को तैयार है, लगी भी हुई है। मुझे लगता है कि हमारे जीवन काल में ही क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा जब लड़की के पंख लगेंगे, उड़ेगी चिड़िया चहचह नील आकाश के नीचे बिना किसी की परवाह किए ...
.. छोटी सलहज अभी नवेली है। एच आर इक्जेक्यूटिव है । एक संकोच रोक सा है। शायद मैं कुछ अधिक ही एक्स्ट्रापोलेट कर रहा हूँ। बड़ी सलहज बहुत सहज है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनकी उमंगें इतनी निर्दोष और स्वाभाविक होती हैं कि संक्रामक हो जाती हैं।..
  गीले रंगों से तो मुक्ति थी लेकिन अबीर गुलाल तो लगने ही थे। जम कर धमाल होता है- कई दफा किश्तों में। संजय भी रंग जाता है।
SS
ड्राइवर को होली की पूर्व सन्ध्या पर ही घर चले जाना है इसलिए हमलोग बिना विलम्ब किए रामकोला की ओर चल पड़ते हैं। संजय तो बस इतना प्रगल्भ कि पूछिए मत! बचपन और कैशोर्य कितने लपेटू होते है ! वर्षों बाद भी लिपटे रहते हैं । (जारी)

शनिवार, 13 मार्च 2010

किस क़ुफ्र की सजा मुझे दी तुमने ज़िहादी !

zihad
लाहौर बम धमाकों में घायल 18 महीने का ज़ाहिद शाहिद
चित्र साभार: इंडियन एक्सप्रेस 
क़ाफिर नहीं, ईमान भी नहीं अल्लाताला पर -
किस क़ुफ्र की सजा मुझे दी तुमने ज़िहादी ! 
अगली बार बम फोड़ो तो खयाल रखना ज़िहादी
क़ाफिर मरें, ईमानदार मरें, घायल हों बेईमान
पर न घायल हों यूँ चन्द महीनों की साँसें ।
मर जाएगा कुछ, हो जाएगा सीने में दफन
याद आएगा हमेशा माँ की लोरियों पर
याद आएगा हमेशा माशूक की बोलियों पर
एक इंसान जो दफन हुआ अस्पताल की गोद में
बस याद आएगा ।
जवान हो जब मैं उठाऊँगा ए के 47
वो: जो याद आएगा - न क़ाफिर था न ईमान वाला
मारा गया मर गया बस इसलिए कि वह कुछ न था
बचता वही है जो क़ाफिर हो या ईमान वाला
बचने के लिए कुछ होना जरूरी है,
बस इंसान होना नाकाफी है।

मंगलवार, 9 मार्च 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 2

पिछले भाग से जारी ...

राजमार्ग से होते हुए हम क़स्बे और फिर खेतों के बीच रेंगती पक्की सड़कों पर दौड़ रहे हैं । हवा से सुर मिलाते सर र र ... आवाजें आ रही हैं । लंठ युवा होलिका दहन की तैयारियों में लगे हैं और मैं अम्माँ के चूल्हे पर चढ़े तवे की आँच का अनुभव कर रहा हूँ। इन रास्तों से  कितनी बार ग़ुजरा हूँ, ऐसा क्या है जो हरदम नया सा लगता है ! अपनी माटी और अपनी माँ शायद हमेशा नए रहते हैं या यूँ कहें इनमें नए पुराने सा कुछ नहीं होता - बस कुछ होता है जो अकथनीय है.. 
गाड़ी घर के गेट के आगे खड़ी है। गेट पिछले सप्ताह पछेलते ट्रैक्टर ट्रॉली की ठोकर से गिर गया था - सँकरा था सो पिताजी ने दो फीट बढ़वा कर दुबारा लगवा दिया है। खम्भे कच्चे हैं इसलिए द्वार बन्द है और बगल में चहारदीवारी तोड़ कर आने जाने के लिए जगह बना दी गई है.. अम्माँ की आवाज आती है, "बगले से चलि आवजा ! अभइन गेटवा कच्चा बा ।" 
.. सँकरा द्वार ध्वस्त हुआ - मुझे प्रसन्नता हुई। पट्टीदार भी प्रसन्न हुए। प्रसन्नता प्रसन्नता में अंतर होता है। आदमी की खुशियाँ मन की जाने कितनी सँकरी गलियों में उलझी हुई हैं, राजमार्ग की तरफ द्वार कब खुलेंगे ? .. अपनी आशंका को सही मान बैठे थे - पिताजी भोजन कर चुके हैं। अब हमलोगों को भोजन कराने हेतु व्यग्र हैं - संजय प्रगल्भ हो चला है, कुछ कुछ बच्चे जैसा। सोचता हूँ जब ये लोग नहीं रहेंगे तो मैं संजय बना किस गिरिजेश के माता पिता में इनकी छवि ढूढ़ूँगा ? मच्छरदानी लगाते सिर झटकता हूँ। इस विचार मसक से क्यूँ डँसवाना? अभी तो बरम-पीपल के साये में बने घर में वृद्ध युगल का स्नेह वितान है। संजय की नाक बज रही है और मैं अपने धीमे खर्राटों को स्वयं सुन रहा हूँ - मुझे नींद आ रही है...
.. प्रातबेला। पीपल पाखी बोल रहा है। हैण्डपम्प को चलाते हुए सुनता हूँ - लगता है जैसे समय ठहर गया है। पीता (बगल के चाचा) बताते हैं इस पंछी का बोलना ग्रीष्म ऋतु के आने का संकेत है। मुझे हँसी आ जाती है - किसे फुरसत है सुनने की पीता? जाने कितने कोलाहलों को शहर अरसे से गाँव में उड़ेलता रहा है - कौन सुनेगा पाखी को ? कैसे सुनेगा पाखी को ? सुबह सुबह उच्छृंखलता - जोर जोर से कहीं सी डी प्लेयर बज रहा है - "आहूँ आहूँ आहूँ ..." यह पंजाबी तड़के वाला मुम्बइया कचरा शहरी मुहल्ले तक में कोई सबेरे नहीं बजाता । .. चैती की धुन गुनगुनाता हूँ - शब्द याद नहीं रहे।..
संजय जिद करता है। अपने से 24 दिन बड़े चचेरे भैया और संजय के साथ खेतवाही करने निकल पड़ता हूँ। इन खेतों से कैसा लगाव - बटाई पर हैं लेकिन पिताजी छोड़ कर कहीं और रह नहीं सकते। मैं जब भी आता हूँ, इन मेड़ों पर घूमते अजीब सा सुकूँ पाता हूँ। हम दोनों शायद दिल से किसान हैं । खेतों की मेड़ों के लिए किसान दिलों में मेंड़ बनाने तक से नहीं चूकता - मेंड़ बनते बिगड़ते रहे लेकिन खेतों का दिल पर राज क़ायम रहा।.. भैया पूछते हैं - गन्ना खाओगे? संजय हँसता है - बंगाल तो नहीं यह धरती, चाय खाबो, पानी खाबो ! यहाँ गन्ना चूसने को गन्ना खाना कहते हैं। सरेह गन्ने से खाली हो चुका है। कहीं कहीं खेत दिख रहे हैं जो शायद बीज के लिए छोड़े गए हैं। दो लड़कियाँ छील रही हैं, भैया उनसे मँगाते हैं। तीन गन्ने - तीन लौंडे। भाभी का फोन आता है और संजय हाल बताता है - गन्ना चूस रहा हूँ। गन्ने का शहरी अर्थशास्त्र - गाजीपुर वासी को उधर से बताया जाता है लखनऊ में तीस रूपए में एक बिकता है। हमारे हाथ नब्बे रूपयों की सम्पदा है - फोकट में। मैं मना करता हूँ - बचपन में खाते हुए मुँह चिरा जाता था, जबड़ा दुखने लगता था। मिठास पाने को उस यातना से दुबारा गुजरने का मेरा कोई मूड नहीं है।
 .. खेत खाली हैं, जाने फिर कब इस सरेह का गन्ना खाने को मिलेगा ! मूड की ऐसी तैसी। मैं माँगता हूँ.. खाना शुरू करता हूँ। शुद्ध प्राकृतिक मिठास - भाटिन के फूलों की गन्ध सी दौड़ जाती है, जीभ से मस्तिष्क तक .. मीठी गन्ध ..भाटिन तुम दिखती क्यों नहीं? .. हम मुड़ते हैं और ..और मोथा, दूब, भाँग के बीच भाटिन की बेसूल साल की पंक्तियाँ दिख जाती हैं, मन आह्लादित हो उठता है। उन बेडौल अनाकर्षक पत्तियों के बीच कलियाँ सीना ताने आसमान की ओर देख रही हैं। फूलने की तैयारी है - इस बार होली जल्दी आ गई है। भाटिन ! तुम्हारे फूल नहीं दिखेंगे।..
 संजय भाँग और भाटिन को देख कर मेरी बच्चों जैसी बकवास से शायद चिढ़ कर पूछता है, अच्छा बताओ, वह क्या है ? मुझे नाम भूल गया है। भैया को भी याद नहीं। विजयी अन्दाज में बताता है - भँगरइया। भाटिन, भाँग, भँगरइया - वनस्पतियों का किसानी परिवार। मजदूरों के भेभन लपेटे अधनंगे गन्धाते बच्चे - भँगरइया जैसे। पिताजी मना करने पर भी गोद में उठा कर उन्हें दुलरा दिया करते थे, अब रोगी हैं, काम के समय खेतिहर सुलभ श्रम उनके बस का नहीं रहा - आह सी उठती है।   ... अनगढ़ कुरूप सी भाटिन खेतों में रोपनी करती औरतों की याद दिलाती है। बज्र दुपहरी में गमछे में रोटी बाँधे मेंड़ पर पनपियाव की तैयारी करती धनिया की याद दिलाती है। कोई क्यारी नहीं, कोई माली नहीं लेकिन बैगनी रंग के केन्द्रक लिए भाटिन के शुभ्र फूल मेड़ों पर फूलते रहे हैं। जब फूलती है तो सरेह गमक उठता है - अनूठी सी सुगन्ध कुछ अधिक ही देहाती सी। मुझे एलर्जी है लेकिन भाटिन के फूलों से कभी नहीं उपटी .. भाँग सरीखा किसान क्यों न अकड़े ! ..
अचानक वह दिखती है जिसकी कत्तई कल्पना नहीं की थी। ... गोहरे को घेरे भाँग से गुथ्थमगुथ्था गाजर घास! यहाँ तक पहुँच गई !! ... पेट, भूख जो न करा दें। भारत की मनुष्य जनित भूख से ही तो निपटना था जो इन्दिरा गान्धी ने मेक्सिकन गेहूँ मँगाया था और साथ में आई थी गाजर घास ... वह घास जो सभी खर पतवारों पर भारी पड़ी। ऐसी वनस्पति जिसमें कोई गुण नहीं - सर्वग्रासी भुक्खड़ रोगदायिनी। क्या कर रहे थे उस समय हमारे वनस्पतिशास्त्री? इन्दिरा तूने एक बार तो उस गेहूँ का परीक्षण करा लिया होता ! ...
 मैं बड़ा खुश रहता था और उस क्षण तक था कि मेरे सरेह में गाजर घास नहीं! गिरिजेश! कब तक बँचेंगे सरेह? यह तो होना ही था ... देखता हूँ गाजर घास अपने बचपन में बहुत सुन्दर दिखती है - गाजर के पत्तों सी, सुन्दरता भाँग की पत्तियों से किसी मामले में कम नहीं। मूर्तिमान छलना, बहुरुपिया सी - लगता ही नहीं कि बिदेसी है लेकिन धीरे धीरे जब सिर उठाती है तो बस सब चट कर जाती है, कभी सात समन्दर पार से आए गोरों की तरह.. सफेद छोटे छोटे फूल दमे के मरीजों के लिए शूल .. वयस्क गाजर घास पौधे ऐसे दिखते हैं जैसे अनावृत्त कंकाल खड़े हों...
शहर भी गाँव में कभी ऐसे ही आया होगा। सुन्दर सा गाजर घास के पत्तों जैसा और धीरे धीरे उजड़ते गए नाद, घोठ्ठे, भुसौले, पीपल के नीचे की बैठकें, गाय, भैंस, बैल सब गायब होते चले गए। आज शहर में दूध गाँव की तुलना में सुगमता से मिल जाता है।  .. गाँव से जवान गायब होने लगे, शहर उन्हें लीलने लगा, लीले जा रहा है...गाजर घास! क्या मैं वाकई भूतकाल को जिए जा रहा हूँ, बेकार ही भावुक रोमान हो रहा हूँ ?.. तुम वाकई बहुत कमीनी हो, भूख की सहोदर.. (जारी)      

गुरुवार, 4 मार्च 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 1

.. आठवीं से मित्र संजय के साथ होली में गाँव के लिए निकल पड़ा हूँ। हम दोनों के परिवार लखनऊ में ही रहेंगे - परीक्षाएँ होली के अगले दिन से ही प्रारम्भ जो हो रही हैं। होली में पत्नियों को अकेला छोड़ चल देने का साहस बिरलों में होता है। मानव मन की तरंगें और उमंगें उसे साहसी बना ही देती हैं, इस बार तो परिस्थितियाँ भी पक्ष में हैं।...  वृद्ध पिता का आग्रह मुझे खींच रहा है तो संजय का मन किशोरावस्था की वीथियों में एक बार पुन: भ्रमण करने को उतावला है - रामकोला की गलियाँ, वह मुमताज जिसने बुलेट चलाना सिखाया और भी ढेर सारी स्मृतियाँ .. और वह लड़की जिसने पहली बार उस खास नेह को जगाया.. मैं छेड़ता हूँ - अबे 27 वर्षों के बाद वो कहाँ मिलेगी? अपनी ससुराल में बाल बच्चों के साथ मोटी सोटी होकर मस्त होगी !
..अपने दिवंगत हो चुके माता पिता की छवियों को मेरे माता पिता में देखने के भाव में वह मगन है। फिसल चुकी रेत को फिर हथेलियों में सँजोने का सम्मोहन या भ्रम ! नहीं दोनों नहीं - तरल भाव आकार ले चुके हैं - ठोस।  बीता समय प्रक्षेपित हो साथ चलने लगा है दैनिन्दिन  सा। उसका उत्तर आता है - चल, देखेंगे...वोल्वो चल देती है..चलती जाती है...
  गोविन्दा की राजा बाबू फिल्म और दो मित्रों की मौजूँ बकबक बच्चन की क्या भूलूँ क्या याद करूँ पर भारी पड़ते हैं ..जगह जगह पथांतरण को देख अपनी गाड़ी से न आने के निर्णय की सराहना करने के लिए ही बकबक थमती है नहीं तो बकबक और बस की गतियों में जुगलबन्दी है.. 6 घंटे की राह 8 घंटे में पूरी होती है लेकिन पता नहीं चलता। दूरियाँ छलिया होती हैं या चंचला या ईर्ष्यालु? यूँ समय का साथ क्यूँ छोड़ देती हैं ? छोड़ देती हैं या मारे डाह के सिमट जाती हैं ? डाह में कोई सिमटता है भला ?...
मोबाइल में गिनता हूँ - पिताजी ने 14 बार बात किया - कहाँ तक पहुँचे? गोरखपुर में अधिक रुकना नहीं, मैंने सब सामान मँगा लिया है।.. मैं उनके स्वर में छिपी आशंका को पहली काल से ही समझ रहा हूँ - शाम हो गई है, ससुराल की गाड़ी से आना है, साले सलहज भी रात में ही आने वाले हैं .. आज कहीं ससुराल में ही न रुक जाय ! ..आत्मज -कलेजे का टुकड़ा, नेह आशंकित है। समय भाग क्यों नहीं रहा? ...
कुछ फल, मेवे और पुआ के लिए होमोनाइज्ड दूध का पैकेट मोल लेता हूँ। संजय कोंचता है - ससुराल के लिए मिठाई तो ले लो! वह बताता है उसके बैग में अम्मा पिताजी के लिए गोंद के लड्डू पड़े हैं। मैं बताता हूँ दोनों मधुमेह ग्रस्त हैं - तुम्हारी मिठाई पट्टीदार खाएँगे और मैं ससुराल हमेशा से हाथ झुलाते ही जाता रहा हूँ। मन में हास्य उपजता है जो हाथ वहाँ थामे थे वो गले में पड़े झूल ही रहे हैं, मिठाई किस बात की !
वह कहता है - अबे! मेरा तो खयाल कर! ..मोहद्दीपुर में मिठाई लेने के लिए रुकते हैं और संजय अपनी कारस्तानी शुरू कर देता है - 25 वर्ष पुराने दोस्त को आने को बोल देता है। मैं कोस रहा हूँ - साँझ घिर रही है और यह प्रतीक्षा !
..उसका मित्र आता है अपार आत्मीयता लिए, मेरा भी सहपाठी रहा शायद आठ नौ महीने ही लेकिन बस सहपाठी ही। अब बड़ा आदमी हो गया है लेकिन उसकी सहज ऊष्मा में अपरिचय पिघलने लगता है। गाली गलौज और कुछ पुराने विशिष्ट मित्रों की गालीमय खोज खबर के बाद वापसी में बैठकी की बात पक्की कर हम लोग चल पड़ते हैं ..
ससुराल की नवनिर्मित मकान प्रभावित करती है। ससुर के जीवट की प्रशंसा करता हूँ। गाँव में भी आधुनिक वास्तु, साजो सामान और सारी सुविधाएँ .. संजय मगन है। सास ससुर का आग्रह है कि साँझ हो ही गई है, वह लोग भी आने वाले हैं, आप लोग रुक जाइए, भेंट मुलाकात के बाद कल सुबह चले जाइएगा। डॉन के आतंक की उन दोनों लोगों को याद दिला ही रहा हूँ कि डॉन मोबाइल पर ऑनलाइन होते हैं - खाना बन गया है, तुम लोग जल्दी पहुँचो। समवेत अट्टाहस के बीच हरी मटर और पकौड़ी भकोसते मैं उन्हें अपनी स्थिति के बारे में बताता हूँ, साथ ही आश्वस्त करता हूँ कि हमलोग अभी चल देंगे। उधर से आवाज आती है - ठीक है।...
काल कट गई है लेकिन 'ठीक है' में छिपे आशंका और किंचित अवसाद मुझे खड़ा कर देते हैं - पिता की ममता सास ससुर की ममता ! .. ये ममताएँ हर दौर में मनुष्य को दुविधा में डालती रही हैं। ... लेकिन मैं तो जब चला था उसी समय से निश्चित था .. ससुराल की कार हम लोगों को लादे हाइवे पर दौड़ रही है, ऑपरेशन के बाद मोतियामुक्त दो जोड़ी आँखों का प्रकाश उसे अपनी ओर खींच रहा है। क्या सचमुच यह यात्रा प्रकाशयात्रा है ? ... (जारी)