क़ाफिर नहीं, ईमान भी नहीं अल्लाताला पर -
किस क़ुफ्र की सजा मुझे दी तुमने ज़िहादी !
अगली बार बम फोड़ो तो खयाल रखना ज़िहादी
क़ाफिर मरें, ईमानदार मरें, घायल हों बेईमान
पर न घायल हों यूँ चन्द महीनों की साँसें ।
मर जाएगा कुछ, हो जाएगा सीने में दफन
याद आएगा हमेशा माँ की लोरियों पर
याद आएगा हमेशा माशूक की बोलियों पर
एक इंसान जो दफन हुआ अस्पताल की गोद में
बस याद आएगा ।
जवान हो जब मैं उठाऊँगा ए के 47
वो: जो याद आएगा - न क़ाफिर था न ईमान वाला
मारा गया मर गया बस इसलिए कि वह कुछ न था
बचता वही है जो क़ाफिर हो या ईमान वाला
बचने के लिए कुछ होना जरूरी है,
बस इंसान होना नाकाफी है।