बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

एक था गाँव


एक गाँव था जिसमें बच्चे, जवान और बूढ़े सभी रहते थे। रोज सुबह चार बजे के करीब गाँव जग जाता। मर्दों की आँखों से रोशनी हो जाती और वे गोरुओं के लिये छाँटी काटने लगते, गोबर फेंकते, दुवार बहारते। घरों की बुढ़िया सब जनानियों को जगा शौच सफाई को सरेह में निकल जातीं और रास्ते में दिन भर का काम काज तय हो जाता - धान का भुजिया, साहुन की तोरी, सलोनी का बियाह और नर्बदा का गौना सब। जब वो लौटतीं तो उनके साथ लक्ष्मी भी घरों में आ पहुँचती। टहल काका तब तक गाँव भर का चक्कर लगा रात भर की खोज खबर ले चुके होते और अपने मितऊ जन से लदनी के बारे में तय तड़ाबा भी।

चन्दन की नींद ठीक उस समय खुलती जब परसाद बाबा गोरुओं को नाद पर लगा भुअरी भैंस का दूध दुहने बैठते । वह दौड़ता पीछे से उनकी पीठ पर सवार हो जाता। बाल्टी में गर्र गोंय गर्र गोंय भरते फेन को देखता रहता। उसे भूख महसूस होती और आगे आ मुँह बा देता। बाबा उसे बरजते कि कहीं मरखही लात मार उसे घाव न लगा दे लेकिन चन्दन माने तब न! बाबा दूध की धार चन्दन के मुँह की ओर कर देते और वह थाने तर के दूध से तर हो जाता। भर पेट लिये दूध नहाया भीतर जाता तो अम्मा बड़बड़ाते हुये उसका मुँह धोतीं। उस समय वह मुस्कुरा भी रही होतीं।

 इन सबसे बेखबर बहिना चौखट पर बैठी अपनी पुतरी के तिलक की चिंता में घुल रही होती जो चोटी पूरने के लिये काकी के हाथ लगाते ही फुर्र हो जाती। चन्दन दौड़ता हुआ गाँव में निकल जाता और घर घर से उठते धुँओं की तुलना करता – किसके दुवार का धुँअरहा बड़ा है तो किस रसोई का धुँआ काला तो किसका उजला? उसे पता ही नहीं चलता कि कब वह मदन के साथ गुल्ली डंटा खेलने लगता। उसे पता होता कि बाबू के खेत जाने तक उसके खेल में कोई बाधा नहीं। जिस समय उसके धूल में लोटने की परवाह किये बिना बहिना उसे खींच कर घर ले जा रही होती उस समय बाबू किसी खेत में खर पात का अन्दाज ले रहे होते। उस समय परसाद बाबा धौरा गोलवा जोड़ी को नाध कर खेत जोत रहे होते और पास ही टहल काका के मोर हरिहें कलेस रे बिदेसिया गा रहे होते।

दुपहरिया में लौटे बाबू कनिया को पूछते क्यों कि कनिया को यह पता होता कि किस तरह की पियाज बाबू खाते हैं और उसे किस तरह काटना है लेकिन कनिया उस समय बगीचों में टिकोरों की गिनती में लगी होती। बाबू महतारी पर भुनभुनाते खाने बैठते तो चन्दन उनकी थाली के भात और परसाद की थाली के भात के अंतर पर अगले सवाल की तैयारी पर लग जाता। अंतिम ग्रास के कुछ पहले ही कनिया थालियों में टिकोरा, मिर्चा, नमक और नींबू की चटनी ला कर रख देती। बाबू रीस भूल और भात माँगने लगते। बाबू खाना खा और सोये चन्दन को एक नज़र निहार वापस खेत चले जाते। वह चन्दन को साथ खेत ले जाने के खयाल को झटक देते – क्या रखा है इस खेती में?

साँझ होती और गाँव में अलग सुनगुन शुरू हो जाती। जमंती काकी के इहाँ से आग लेने के बहाने एक एक कर बुढ़िया निकलतीं और रस्ता, खिरकी, दुआर कभी दो कभी तीन की गोल में बात छेड़ देतीं। कुछ ही मिनटों में सबका हाल चाल हो जाता, खोज खबर लग जाती। माई दीया ले सब ओर रोशनी बिखेर आतीं – नाँद, भुसउला, कोठरी, इनार, तुलसी, बरम, कुलदेवी, नीबि और छत के नौगोल में भी। परसाद बाबा गोरुओं के लिये धुँअरहा जला रहे होते, छाँटी भूसे का हिसाब ले रहे होते और चन्दन पीछे पीछे। उसे चिरई, खूँटा और बढ़ई की कथा सुननी होती जब कि बाबा मलकिन की धिरवन सँजो रहे होते – जब तक खा न ले तब तक कथ्था कहानी न सुनाया कीजिये। सुनते सुनते सो जाता है। उपास पेट सोना ठीक नहीं। जगा कर खिलाना मान का नहीं। दिया बारने की बेला के कुछ देर बाद परसाद की गोद में सोया चन्दन दाना और चिरई के मिलन की खुशी सपनों को बाँट रहा होता।

रात के खाने के बाद सब छ्त पर जमा हो जाते। कनिया आसमान को निहारती ईया से सितारों के सवाल पूछती। ईया के उत्तर बर्म्हाबरमंड की दूरियों को कनिया के बालों में टाँकने लगते – सलमा एक, सितारा दो, नदी किनारे तीन, पोखरा बारी चार, नैहर नारी पाँच ...कनिया खर्राटे लेने लगती। ईया उसे मन ही मन मुँहझौंसी कहतीं – मर्दाना नींद सोती है!

परसाद बिरझाभार की टेर लेते – एकिया हो रामा, कवने करनवा ... और अगल बगल, छत, दुआर, भँड़सार सब तरफ सन्न हो जाता। बाबू सुरती थूक चौकी से उठ जाते – उन्हें गीत गवनई पसन्द नहीं। वह इयार से हिसाब करने दुसरे दुवार चल देते। माई जल्दी जल्दी घर से बाहर निकलतीं। सुद्धा गोलवा बैल के मुँह में उसे दुलराते हुये कौरा खिलातीं और मरखाह धवरा के आगे थाली का भात सरका देती। दोनों उस समय तक रसोई की ओर टकटकी लगाये खड़े रहते। माई जाने को मुड़तीं तो गोलवा चूनर को मुँह में दबाना नहीं भूलता और धवरा फुफकारना। कढ़ुआर की गोहटी अंतिम छपाका लेती और सब सो जाते ...

वहाँ अब वृद्धाश्रम है जिसमें कनिया और चन्दन भी हैं लेकिन न पुतरी है और न परसाद की टेर। बाबू जैसे जन शहर कमाते हैं। मोबाइल पर गीत बजाते हैं। जिनके पास खेत हैं वे सरेह नहीं शहर की खाक छानते हैं और जिनके पास नहीं हैं, वे मजूरी करते सड़कों पर रात को सोते हैं। गोलवा, धौरा की जगह कहानियों में है। हर घर में अगिन को पाला मार गया है, बुढ़ियों के पास बीमारी के अलावा कोई काम ही नहीं बचा। खरिहाने की पाकड़ तले बचे खुचे जवान नरेगा की बोटी तोड़ते हैं, हवा में गाँजा उड़ाते हैं और गले को दहकती आग से तर करते हैं।   
                      
आत्मा का चोला तो बदलता ही रहता है लेकिन चोला बदलने वाले शहर की सूरत बदलने में लगे हैं। वह गाँव मर गया। उसकी आत्मा मर गई। रातों में अब टहल काका का प्रेत घूमता है। वह पूछते रहते हैं – अब का होई?
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(यह बस नोस्टालजिया में हेर फेर और हेन तेन है। ढेर दिन से परा था, सोचा आज छाप ही दूँ)     

7 टिप्‍पणियां:

  1. अब का होई?

    कठिन प्रश्न है.... खेती के प्रति अरुचि/असुरक्षा और शहरों की ओर पलायन गाँव का गंवई पन खा जा रहा है।

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  2. ye chandan ki nazar hai....larakpan main sab achha lagta hai. Aur ladakpan ki yaaden nostalgic hoti hi hain.Agar us samay bhi Babu ke paas vikalp hota to we katai kheti nahin kar hote.Jis chandan ko ye sab achha lagta tha wo bhi kheti nahin karega ....life to shaharon main hai...bhale hi haalat daal se tute patton ki tarah ho.....gaon main baat bigha \acres main hoti thi shahar main square foot main.Aadmi aur kitna reduce kare apne ko ...lekin jab jaro se he ukhad gaye hain to aukaat kya hamari....khone ka gam nahin hai,lekin jo tathakathit prapti hai usi se apne ko glorify kar rahen hain. Issue bahut marmik hai ...kaas! Chandan ke wo din fir wapas aate.........Bau ka deewana.

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  3. वो भी ज़माना था, ये भी ज़माना है
    वो वक़्त खज़ाना था, ये खाक उड़ाना है

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  4. भाई आपकी यह टिप्‍पणी हमलोग अपने दैनिक कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस में छाप रहे हैं ,आप अच्‍छे होंगे आपका सहयोगाकांक्षी मुकुल

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    1. मुकुल जी,
      आप ने इस लायक समझा इसके लिये आभार। परंतु बहुत विनम्रता के साथ यह कहना चाहूँगा कि आप को सूचना देने के बजाय अनुमति लेनी चाहिये। दूसरी बात यह कि यदि आप इस लेख को टिप्पणी कह रहे हैं या काट छाँट कर टिप्पणीनुमा प्रकाशित करना चाह रहे हैं तो मेरी अनुमति नहीं है।
      आशा है आप ड्राफ्ट के मेरे द्वारा पूर्वानुमोदन के पहले इसे नहीं छापेंगे।

      सादर,
      गिरिजेश

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