सोमवार, 19 अगस्त 2013

पिता की सीख

जो दिखता है, जो मिलता है वह अवशिष्ट है, उच्छिष्ट। उत्कृष्ट का भोग हुआ तब ही वह बचा और हमें मिला जिसे हम इतना चाहते हैं, मान देते हैं।

 तुम्हें प्रार्थना के विश्राम की आवश्यकता है। एकाध घड़ी बुद्धि को परे रख समर्पित हो। वह वैसा ही होगा जैसे कुँये से पानी खींचते खींचते रुकना, साँसों को सम करना। तुम्हारी साँसें कुँये की जगत पर पड़ी रस्सियों के निशान से नहीं, हाथों के छालों से जुड़ती हैं।

11 टिप्‍पणियां:

  1. प्रार्थना के विश्राम की आवश्यकता है।

    प्रार्थना कैसी हो पिताजी? अधिकतर तो जो प्रार्थनाएँ होती हैं उनमें ईश्वर से मांगना ही रहता है। और और और...और सुख और समृद्धि। कष्ट से मुक्ति..क्या मांगते रहने से विश्राम मिलता है?

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    1. मेरे विचार से जिस प्रार्थना की बात उन्हों ने की वह मौन आत्मनिवेदन जैसा कुछ है। माँगने देने से इतर है। 'विश्राम' महत्त्वपूर्ण है।

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    2. ’मौन आत्मनिवेदन जैसा कुछ, माँगने देने से इतर है’

      ऐसी प्रार्थना ब्रह्मांड के साथ खुद की ट्यूनिंग करने जैसा है, to synchronize with the universe power.

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  2. you are fortunate to have him... say a prayer of gratitude to whatever / whoever is responsible for it...

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  3. यह ऐसी सीख के जिसे कभी कोई चुरा नहीं सकता, पिता धर जाते हैं पूरा जीवन बेटे के अन्दर इस एक बात से।

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