रविवार, 14 जून 2015

योग दिवस, ग्रीष्म अयनांत, तीन देवियाँ और माँ की आँख

IDY_Logo_in_English(1)इस वर्ष ग्रीष्म अयनांत 21 जून रविवार के दिन जब कि भुवन भाष्कर उत्तरी गोलार्द्ध में अपने सर्वोच्च स्तर पर प्रखरतम स्थिति में होंगे, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का शुभारंभ होगा। इस दिन शुक्ल पक्ष की पंचमी होगी।

इसके आधिकारिक चिह्न का वर्णन ऐसा बताया गया है:

जुड़े हाथ वैयक्तिक चेतना का वैश्विक चेतना से योग, शरीर और मस्तिष्क एवं मनुष्य और प्रकृति में आदर्श संतुलन और स्वास्थ्य और नैरोग्य के प्रति समेकित सम्पूर्ण पद्धति के प्रतीक हैं। भूरी पत्तियाँ पृथ्वी, हरी पत्तियाँ प्रकृति, नीला रंग जल तत्त्व, कांति अग्नि तत्त्व और सूर्य ऊर्जा एवं प्रेरणा को अभिव्यक्त करते हैं। यह चिह्न मानवता के बीच सामंजस्य और शांति को दर्शाता है जो कि योग का सत्त्व है।

idy logoप्रतीकों के साथ एक समस्या रही है। आधुनिक समय में जब हम प्राचीन पद्धति से जुड़ा कोई आयोजन करते हैं तो अवचेतन में युगों युगों से अनवरत प्रवाही संस्कार और सूचनायें सामने आ जाते हैं। समानतायें अपना अवगुंठन हटा देती हैं।

कभी अरब पठार से ले कर भारत तक इस धरती पर मिलते जुलते संस्कारों वाली सभ्यतायें जीवित थीं। इन सभ्यताओं में मातृपूजा का भी प्रचलन था। तीन देवियों के रूप में यदि मिस्र में मुत, वाड्जेट और बस्त थीं तो एशियाई अरब में apri_thumb[13]उज़्ज़, अल-मनात और अल-लात। भारतीय सारस्वत सभ्यता की तीन देवियाँ थीं इळा, भारती और सरस्वती जिन्हें ऋग्वैदिक आप्री मंत्रों में सभी ऋषि कुलों ने पुकारा और सम्मान दिया।

IDY_Logo_1वाड्जेट निचले मिस्र की भूमि से जुड़ी देवी थीं जिनकी संगति भारती और अरबी उज़्ज़ से लगाई जा सकती है। भूमि को धारण करने वाले भारतीय शेषनाग की तरह ये भी सर्पों से जुड़ी उन के द्वारा भी अभिव्यक्त होती थीं। इस देवी से जुड़े आयोजनों में महत्त्वपूर्ण था ग्रीष्म अयनांत 21 जून का आयोजन जब कि पृथ्वी पर रक्षक दृष्टि रखने वाले रा देवता सूर्य अपने चरम पर होते। सूर्य के पुत्र देवता होरस की आँख का प्रतीक वाड्जेट से जुड़ा था, माँ की आँख सब पर दया दृष्टि रखती थी। साथ ही उनके लिये चन्द्रमास की पाँचवी तिथि का पाँचवा घंटा आरक्षित था। नहीं पता कि योग दिवस के कर्ता धर्ता इन तथ्यों से अवगत हैं या नहीं। कुछ भी हो संयोग बड़बोले हैं! आधिकारिक चिह्न और होरस की आँख में समानता देखिये। कथित पुराने संसार का दीर्घवृत्तीय मानचित्र योगाभ्यास करते मनुष्य के दीर्घवृत्तीय लम्बवत सिर और हाथों के घेरे से जुड़ होरस की आँख सा हो जाता है!

Mohammed_kaaba_1315यह ध्यान रखना होगा कि आज का मिस्र कथित अंतिम मजहब का अनुयायी है और यह भी कि मजहब से पहले के समय का संग-ए-मूसा काला पत्थर आज भी पूजनीय है। उस पत्थर के वर्तमान रूप की होरस की आँख से समानता उल्लेखनीय है।

जिस तरह से मिस्र के लिये दिन से जुड़ी देवी वाड्जेट महत्त्वपूर्ण थी वैसे ही एशियाई अरबों के लिये रात में सबसे चमकीले शुक्र की रूप देवी उज़्ज़। उनके अनुयायी नेबाती जन हर वर्ष एक बार काबा की तीर्थयात्रा करते जहाँ यह पत्थर स्थापित था। वहाँ श्वेत, रक्त और अन्य रंगों के पत्थर भी स्थापित थे जिनका सम्बन्ध अन्य देव देवियों से था और उनमें देवी उज़्ज़ का पत्थर अत्-ताइफ भी था। आठवीं हिज़री में स्वघोषित अंतिम दूत ने खालिद इब्न अल-वालिद को भेज कर देवी उज़्ज़ मन्दिर नष्ट करवा दिया। काबा की 360 देव प्रतिमाओं में से एक संग-ए-मूसा को छोड़ सभी नष्ट कर दिये गये। उस एक पत्थर को छोड़ देने के पीछे व्यवसायिक, धार्मिक और राजनैतिक कारण भी थे।

कथित अंतिम मजहब ने स्वयं द्वारा पारिभाषित कुछ एक को छोड़ कर किसी अन्य के लिये किसी भी तरह के सम्मान या पूजा भाव का निषेध किया है। मूर्तिपूजा और प्रतीकों के प्रति उनकी भयावह हिंसायुक्त घृणा सबको पता है। अब यदि कोई चिह्न अनजाने ही सही उन मूलों से जुड़ता हो जो कि उन्हें अपने हिंस्र, विनाशी और नैषधिक परिपाटियों से युक्त इतिहास की स्मृति दिलाते हों तो विश्व के इस सबसे कट्टर और जड़ मत के अनुयायियों के लिये उसे या उससे जुड़े किसी आयोजन को स्वीकारना लगभग असम्भव ही होगा। यदि कुछ स्वीकार कर रहे हैं और समय के स्वस्थ प्रवाह के साथ चलने को तैयार हैं तो उनका समुचित स्वागत होना चाहिये साथ ही जड़मतियों के लिये सहानुभूति और प्रार्थना भी – तमसो मा ज्योतिर्गमय।

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चित्राभार: http://www.cgiguangzhou.gov.in/ और https://en.wikipedia.org

बुधवार, 10 जून 2015

पुन: घर बसेगा?

घर गिरा है कोई
निखर आया है भूमा का एक टुकड़ा
पियराया जैसे पहली वर्षा में निकला बेंग
अबेर उगी दूब लटजीरे की लघु छाँव 
झिंगुर ने लिया नया वास
ऋतुविरुद्ध टेरता हर रात
अगोरता नये सहवास को
बरसेगा नेह मेह
पुन: घर बसेगा?    

रविवार, 15 मार्च 2015

गाय और उसके पालन पर निबन्ह - भाग 1

(1)
गाय पालना एक कठिन काम होता है। भोर भिंसहरे ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर मशीन पर छाँटी काटनी पड़ती है, बहुत श्रम का काम होता है। अगर बिजली नहीं हुई तो ढेबरी लनटेन जरा के करना पड़ता है। नाद अर्थात उसका फीडिंग बाउल साफ कर दाना पानी भरना होता है। उसके बाद गोबर गोथार। गायें अपना पॉटी स्वयं साफ तो कर नहीं सकती तो आप को गोबर को हाथ से उठा कर खाँची में भर कर कपारे पर रख घूरे में फेंकना होता है। गाय जब तक खाये तब तक एक गृहिणी की तरह उसकी ताक झाँक की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, गाय कह तो सकती नहीं कि तस्मई और लाओ और दो चम्मच तरकारी भी! इस दौरान आप को भी झाड़ा फिरने के बाद दतुवन मंजन कर लेना होता है वरना चना चबेना समय से पाने से रहे।  खिलाने पिलाने के बाद गाय को साफ सुथरे किये घारी में बाँध कर दुहना होता है। गायें मोदी जी की तरह बहुत सफाई पसन्द होती हैं। गन्दे स्थान पर दूध नहीं देतीं। मस, कुकरौंछी, अँठई आदि से निस्तार के लिये धुँअरहा कर उसे सहलाते हुये परजीवी निकालने होते हैं। गाय अगर मरखही हुई तो इस पूरी क्रिया के दौरान सींग प्रसाद से स्वयं को बचाना भी होता है। अगर गोड़ चहलने वाली हुई तो और सतर्कता की माँग करती है। जब उसका मूड सही हो जाय तो धीरे से दोनो पिछले गोड़ रस्सी से छानने होते हैं। इस क्रिया में दुलत्ती का प्रसाद न मिले तो आप स्वयं को भाग्यशाली समझ सकते हैं। बछरू या बछिया को छोड़ कर उसे थन चूसते हुये देखना होता है कि अब दूध की धार उतरी की तब, इस क्रिया को पेन्हाना कहते हैं। पेन्हा जाने के बाद जबरन उसकी संतान को दूध पीने से हटाना होता है, उसे खींच कर खूँटे से गाय के सामने बाँधना होता है ताकि गइया देखती रहे वरना दूध की धार टूट सकती है। दोनो पैरों में बाल्टी दबा के दूध गर्र गों गर्र गों दुहना होता है। दूध दुहना सबको नहीं आता,, इसके विशेषज्ञ हर गाँव में अलग अलग होते हैं। कोई दूध अधिक निकाल लेता है लेकिन थन पर नाखून लगा देता है तो कोई इतना दयालू होता है कि आधा दूध बछरू को ही पिला देता है। कोई अधूरा ही छोड़ देता है जिसके कारण गाय को थनैली हो सकती है या वह असमय ही बिसुक भी सकती है। इसलिये गाय दुहना स्वयं आना चाहिये। इस क्रिया में बाजुओं का अच्छा व्यायाम हो जाता है अर्थात आप को स्वस्थ शक्तिशाली भी होना होता है।  दूध दुहने के बाद थन में थोड़ा सा छोड़ देना होता है ताकि अंत में बछरू बछिया को उस पर छोड़ा जा सके। यह गाय के वात्सल्य की पूर्ति करता है। इस मामले में गाय मनुष्य समान ही होती है।
(2)
परयाग जी में रहते थे तो कुछ भयानक बातें पता चलीं। पाड़ा बड़ा होने पर भैंसा हो कर गर्भाधान करने के अलावा किसी काम का नहीं होता। पूरब में उसे न तो जोता जाता है और न ही भारवाही के रूप में काम में लाया जाता है। भँइस पाड़ा बियाती थी तो पालक नाले में फेंक आते थे। उसके बाद इंजेक्शन दे पेन्हाने का काम संपन्न करते थे। कुछ के बारे में ये भी सुना गया कि दूहने के समय मरे पाड़े की खाल में भूसा भर कर भैंस के सामने पुतला खड़ा कर देते थे ताकि पेन्हा सके।
टट्टर और कम्बइन के आ जाने के कारण अब बैलों की आवश्यकता भी बहुत कम रह गयी है तो बछरू का भी इनडाइरेक्टली लगभग यही हाल होता है। कुछ नहीं तो भर पेट दूध ही कुछ दिन पीने देते हैं ताकि किरा कर गोलोकवासी हो जाय! गाय भैंस से दूध या तो इंजेक्शन लगा कर निकाला जाता है या दूर पश्चिम में प्रचलित वह पुरानी फूँके की क्रिया द्वारा जिसके कारण गन्ही बाबा ने गाय भैंस का दूध पीना छोड़ दिया था! 
(3)
हमारे यहाँ गाय नहीं पाली जाती थी। तीन कारण थे: 
(एक) बड़के बाबू जी को गायें पसन्द नहीं थीं। उनके दूध और घी से बास आती थी। 
(दो) गायें गुहखइनी होती हैं अर्थात चराते समय आप को ध्यान देना होता है कि मानव मल पर मुँह न मार दें। (नोट - स्वच्छ भारत अभियान के पीछे यह भी एक कारण है) 
(तीन) गाय पवित्र होती है। उसे नाथा नहीं जाता। नाथा हुआ पशु यदि उसी अवस्था में किसी कारण मर जाय तो पाप लगता है। गाय के लिये ऐसे ही बाहर से पगहा जुगाड़ कर दिया जाता है ताकि संकट में समय नियंत्रित की जा सके। ऐसे में भी यदि पगहा समेत गाय मर जाय तो गोहत्या महापातकं! कौन रिक्स ले
नाथना किसे कहते हैं? जनावर के नथुनों के बीच की कोमल हड्डी को छेद कर उसमें रस्सी पहना कर घुमाते हुये बाँध दिया जाता है। केतनो मरखाह मवेशी हो, नाथ पकड़ते ही नियंत्रण में आ जाता है। इसे आजकल ऐसे समझें कि कुछ कूल ड्यूड ड्यूडी ढोंढ़ी, ओठ, आँख, गाल आदि गतर गतर छेदवा कर मिनी झुलनी जैसा पहने होते हैं। अगर उनसे भिड़ंत हो तो टीप कर वही पकड़ लें फिर देखिये कैसे चोकरते हुये वे नियंत्रण में आ जाते हैं! मानव को जनावर बनने का नवा शौक चढ़ रहा है। पहिले के युग में भी झुलनी, बाली, कुंडल आदि होते थे लेकिन उनमें बहुत मरजाद होती थी सो ऐसा नुस्खा कोई सोचता भी नहीं था, अब भी खंडहरों में सोमयाग के कुछ मंत्र बचे हैं सो झुलनी आदि को छूट दे रहा हूँ। 
हइ देखिये! हमरी निबन्ह गइया तो बहक गयी, फिर से लैन पर लाते हैं। 
(4)
पूर्वांचल के महानगरों (अगर कह सकें तो) में गौ पालन प्रकल्प नगरनिगम के आलस्य पर फलता फूलता है। गोपाष्टमी के दिन गो रक्षा आन्दोलनकारियों को इस क्षेत्र के हर नगर निगम आयुक्त को 'गौद्योगश्री' की उपाधि से सम्मानित करना चाहिये। 
आवारा संतानों को आजकल बाइक/बाइकी, मोबाइल और पेटरोल अलाउंस दे कर घर से हाँक दिया जाता है। पालित गायों को तो वह भी देने की आवश्यकता नहीं। दूहने के समय ढूँढ़ कर ले आइये बकिया टैम पॉलीथीन, पेपाइरस, गू मूत, सड़े भोजन आदि के पौष्टिक आहार का भोग लगाने के लिये राजमार्ग पर छोड़ दीजिये, एक सौ आठ बैकुंठ का पुण्य रोज चित्रगुप्त के खाते में लिखा जाता है! सर्वदा उदररोग पीड़ित ऐसी गायें गोबर नहीं देतीं, गुह छेरती हैं जिसकी दुर्गन्ध मानव मल को भी मात करती है। भारत की राष्ट्रीय गन्ध रेलवे प्लेटफार्म पर मिलती है और राष्ट्रीय देन ऐसे नगरों की सड़कों पर! 
एक बार पैर पड़ जाये तो जूते चप्पल को पंचस्नान करा गुलाबरी से नहलाने के पश्चात ही गन्ध दफा होती है। पुराने युग के गँवई बैद उजाला होने पर निपटने को जाते थे। खेत में गुह के रंग, आकार, प्रकार, अवस्था आदि को देख गाँव के ओवरआल स्वास्थ्य का अद्यतन रखते और तदनुसार पथ्य कुपथ्य बताते। आज भी अगर अच्छे होमियोपैथ के यहाँ आप जायें तो वह आप से आप के गुह के बारे में इतने प्रकार के प्रश्न पूछेगा कि आप हैराँ हो जायेंगे - यह व्यक्ति मास्टर शेफ प्रतियोगिता में क्यों नहीं जाता

तो गायों की छेर देख कर ही आप उनके और उनका दूध पीने वालों के स्वास्थ्य के बारे में पता कर सकते हैं। इसलिये ज्ञानी जन कहते हैं कि नगर में दूध पंचमेल पॉश्चुराइड ही पियो! (जारी)

शनिवार, 7 मार्च 2015

अकेली जरा का पर्व

नीम झरे दुअरा पर सूखी, चौकी पर है धूर। 
शमी गाछ की छाँह कँटीली, स्वामी घर से दूर॥
सोने के पिजड़े में सुगना, ना दाना ना ठोर। 
रामनाम की टेर लगी है, जाना है उस छोर॥
गइया सब को कौरा पहुँचे, चिरई सब को नीर। 
मनपूओं की बात अधूरी, ज्यों स्मृतियों की खीर॥
सूगर फ्री में बनी तस्मई, देवकुर पाकड़ घाट। 
गदबेरा अबीर में सुत की, मइया जोहे बाट॥
सन्नाटा है घर के आँगन, सिमटा सकल वितान। 
भीगी आँखों बुढ़िया देखे, बासी सब पकवान॥  

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

ऋग्वेद में गंगा

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ऋग्वेद और गंगा का सम्बन्ध रहस्यसंकेती है। दसवें मंडल के 75 वें नदी सूक्त में गंगा का स्पष्ट वर्णन है लेकिन उसके अतिरिक्त जो भी संकेत हैं, वे पहेली से लगते हैं। जैसा कि मैं पहले भी संकेत करता रहा हूँ, पूर्वी सभ्यता संहिता रचयिताओं की नहीं थी लेकिन संहिताओं से पुरानी थी। वाल्मीकि आदि कवि हैं इसलिये नहीं कि पहली कविता रचे, इसलिये कि 'आदि कथा' के लोकस्वरूप को छन्दबद्ध काव्य का रूप दिये। भारतीय परम्परा यदि राम और कृष्ण में एक युग का अंतर बताती है और राम को कृष्ण से पुराना बताती है तो तो यूँ ही नहीं बताती।

पूरब की सभ्यता राम वाली थी, सूर्यवंशियों की, इक्ष्वाकु अथर्वणों की। पश्चिमी सभ्यता चन्द्रवंशियों की थी, कुरुओं की, पांचालों की। पूरब और पश्चिम में आपसी व्यापारिक और वैवाहिक सम्बन्ध तो थे लेकिन अधिक औपचारिक और किंचित प्रतिद्वन्द्विता भी लिये हुये।

कौशिक गोत्री विश्वामित्र का वंश इन दोनों के बीच सेतु का कार्य करता है, इसलिये कि विश्वामित्र यायावर हैं, सप्तसैंधव को लाँघ सुदूर पश्चिम की और जाते हैं तो धन और सोम के सन्धान में पूरब के गांगेयों से भी सम्बन्ध रखते हैं। सूर्यवंशियों और चन्द्रवंशियों की आपसी प्रतिद्वन्द्विता और लड़ाइयों के ध्वंस सूत्र आज भी राजपूत कुलों में दिख जाते हैं।

 सरस्वती के सूखने के पश्चात जब गंगा ने सिन्धु के समांतर उनका स्थान ले लिया तब घनघोर सम्मिलन हुआ। सरस्वती प्रयाग 'स्थापित' हुईं। गंगा के साथ सूर्यवंशी भगीरथ कुल का नाम जुड़ा हुआ है। समृद्ध राज्य में एक विकराल अकाल, ऋषि शाप, 60000 पुरखों का भस्म होना, तपस्या, भगीरथ प्रयत्न से गंगा को मैदान में उतारना, जह्नु ऋषि की रोक, कैलाशी शिव का भी साथ में आना आदि आदि उन पुरा कथाओं के रूपक हैं जो संहिताओं से भी पुरानी है। जह्नु ऋषि द्वारा मुक्त किये जाने के कारण गंगा जाह्नवी कहलायीं।

ऋग्वेद में गंगा को लेकर जह्नु का क्षेत्र चर्चित है। स्पष्टत: इनके द्रष्टा भी उद्योगी ऋषि हैं जैसे आंगिरस, बृहस्पति और विद्रोही विश्वामित्र कुल। अश्विनों को सम्बोधित इन ऋचाओं में समृद्धि की चर्चा है, धन की चर्चा है, थल और जल मार्ग में चलने वाले रथों की चर्चा है जिनमें क्रमश: वृषभ और शिंशुमार (गंगा डॉल्फिनें) जुते हुये हैं और स्तुतियों में भी धन (द्रविण) है।

यदयातं दिवोदासाय वर्तिर्भरद्वाजायाश्विना हयन्ता। रेवदुवाह सचनो रथो वां वृषभश्च शिंशुमारष्च युक्ता॥

रयिं सुक्षत्रं स्वपत्यमायुः सुवीर्यं नासत्या वहन्ता। आ जह्नावीं समनोप वाजैस्त्रिरह्नो भागं दधतीमयातम्॥

(1.116.18-19, कुत्स आंगिरस)

इन ऋचाओं में जह्नु की संतानों द्वारा अश्विनकुमारों का दिन में तीन समय यजन वर्णित है और साथ ही उनके द्वारा धन ले कर राजा दिवोदास के घर जाने की बात है। दिवोदास पश्चिमी राजा हैं और अन्यत्र भी वर्णित हैं।   

तीसरे मंडल के 58 वें सूक्त में विश्वामित्र अश्विनद्वय की प्रशंसा में उनके ‘पुरातन सर्वशिवकारी सख्य’ की बात करते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि आप का धन जह्नव्याम (जह्नु के क्षेत्र में स्थित) है। आप दोनों की ‘मित्रता’ से हम पुन: लाभान्वित हों और ‘सह नू समाना’ मधुर हों।

                                    पुराणमोकः सख्यं शिवं वां युवोर्नरा द्रविणं जह्नाव्याम् ।

                   पुनः कृण्वानाः सख्या शिवानि मध्वा मदेम सह नू समानाः॥ (3.58.6, विश्वामित्र गाथिन)

इस सूक्त के प्रारम्भ में प्राची में उषा का दर्शन कर सूर्य के लिये ‘पुत्रश्चरति दक्षिणाया:’ कहा गया है और यह भी कि अश्विनों का स्तोत्र गायन तो उसी समय होता है। इस सूक्त से स्पष्ट ही पूरब के साथ पुराना भौतिक सम्बन्ध सिद्ध होता है।      

 

छठे मंडल के 45 वें सूक्त में किसी बृबु की बड़ी प्रशंसा है क्यों कि वह धन का दानी पणि (व्यापारी) है। कहा गया है कि वह दान कर्म द्वारा पणियों में मूर्धन्य हुआ। गंगा के ऊँचे तटों जैसा महान हुआ। कक्ष प्रयोग से ही आज का गंगा कछार तो नहीं हुआ!

अधि बृबुः पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्। उरुः कक्षो न गांग्यः॥ (6.45.31, शयु बार्हस्पत्य)