रविवार, 15 मार्च 2015

गाय और उसके पालन पर निबन्ह - भाग 1

(1)
गाय पालना एक कठिन काम होता है। भोर भिंसहरे ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर मशीन पर छाँटी काटनी पड़ती है, बहुत श्रम का काम होता है। अगर बिजली नहीं हुई तो ढेबरी लनटेन जरा के करना पड़ता है। नाद अर्थात उसका फीडिंग बाउल साफ कर दाना पानी भरना होता है। उसके बाद गोबर गोथार। गायें अपना पॉटी स्वयं साफ तो कर नहीं सकती तो आप को गोबर को हाथ से उठा कर खाँची में भर कर कपारे पर रख घूरे में फेंकना होता है। गाय जब तक खाये तब तक एक गृहिणी की तरह उसकी ताक झाँक की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, गाय कह तो सकती नहीं कि तस्मई और लाओ और दो चम्मच तरकारी भी! इस दौरान आप को भी झाड़ा फिरने के बाद दतुवन मंजन कर लेना होता है वरना चना चबेना समय से पाने से रहे।  खिलाने पिलाने के बाद गाय को साफ सुथरे किये घारी में बाँध कर दुहना होता है। गायें मोदी जी की तरह बहुत सफाई पसन्द होती हैं। गन्दे स्थान पर दूध नहीं देतीं। मस, कुकरौंछी, अँठई आदि से निस्तार के लिये धुँअरहा कर उसे सहलाते हुये परजीवी निकालने होते हैं। गाय अगर मरखही हुई तो इस पूरी क्रिया के दौरान सींग प्रसाद से स्वयं को बचाना भी होता है। अगर गोड़ चहलने वाली हुई तो और सतर्कता की माँग करती है। जब उसका मूड सही हो जाय तो धीरे से दोनो पिछले गोड़ रस्सी से छानने होते हैं। इस क्रिया में दुलत्ती का प्रसाद न मिले तो आप स्वयं को भाग्यशाली समझ सकते हैं। बछरू या बछिया को छोड़ कर उसे थन चूसते हुये देखना होता है कि अब दूध की धार उतरी की तब, इस क्रिया को पेन्हाना कहते हैं। पेन्हा जाने के बाद जबरन उसकी संतान को दूध पीने से हटाना होता है, उसे खींच कर खूँटे से गाय के सामने बाँधना होता है ताकि गइया देखती रहे वरना दूध की धार टूट सकती है। दोनो पैरों में बाल्टी दबा के दूध गर्र गों गर्र गों दुहना होता है। दूध दुहना सबको नहीं आता,, इसके विशेषज्ञ हर गाँव में अलग अलग होते हैं। कोई दूध अधिक निकाल लेता है लेकिन थन पर नाखून लगा देता है तो कोई इतना दयालू होता है कि आधा दूध बछरू को ही पिला देता है। कोई अधूरा ही छोड़ देता है जिसके कारण गाय को थनैली हो सकती है या वह असमय ही बिसुक भी सकती है। इसलिये गाय दुहना स्वयं आना चाहिये। इस क्रिया में बाजुओं का अच्छा व्यायाम हो जाता है अर्थात आप को स्वस्थ शक्तिशाली भी होना होता है।  दूध दुहने के बाद थन में थोड़ा सा छोड़ देना होता है ताकि अंत में बछरू बछिया को उस पर छोड़ा जा सके। यह गाय के वात्सल्य की पूर्ति करता है। इस मामले में गाय मनुष्य समान ही होती है।
(2)
परयाग जी में रहते थे तो कुछ भयानक बातें पता चलीं। पाड़ा बड़ा होने पर भैंसा हो कर गर्भाधान करने के अलावा किसी काम का नहीं होता। पूरब में उसे न तो जोता जाता है और न ही भारवाही के रूप में काम में लाया जाता है। भँइस पाड़ा बियाती थी तो पालक नाले में फेंक आते थे। उसके बाद इंजेक्शन दे पेन्हाने का काम संपन्न करते थे। कुछ के बारे में ये भी सुना गया कि दूहने के समय मरे पाड़े की खाल में भूसा भर कर भैंस के सामने पुतला खड़ा कर देते थे ताकि पेन्हा सके।
टट्टर और कम्बइन के आ जाने के कारण अब बैलों की आवश्यकता भी बहुत कम रह गयी है तो बछरू का भी इनडाइरेक्टली लगभग यही हाल होता है। कुछ नहीं तो भर पेट दूध ही कुछ दिन पीने देते हैं ताकि किरा कर गोलोकवासी हो जाय! गाय भैंस से दूध या तो इंजेक्शन लगा कर निकाला जाता है या दूर पश्चिम में प्रचलित वह पुरानी फूँके की क्रिया द्वारा जिसके कारण गन्ही बाबा ने गाय भैंस का दूध पीना छोड़ दिया था! 
(3)
हमारे यहाँ गाय नहीं पाली जाती थी। तीन कारण थे: 
(एक) बड़के बाबू जी को गायें पसन्द नहीं थीं। उनके दूध और घी से बास आती थी। 
(दो) गायें गुहखइनी होती हैं अर्थात चराते समय आप को ध्यान देना होता है कि मानव मल पर मुँह न मार दें। (नोट - स्वच्छ भारत अभियान के पीछे यह भी एक कारण है) 
(तीन) गाय पवित्र होती है। उसे नाथा नहीं जाता। नाथा हुआ पशु यदि उसी अवस्था में किसी कारण मर जाय तो पाप लगता है। गाय के लिये ऐसे ही बाहर से पगहा जुगाड़ कर दिया जाता है ताकि संकट में समय नियंत्रित की जा सके। ऐसे में भी यदि पगहा समेत गाय मर जाय तो गोहत्या महापातकं! कौन रिक्स ले
नाथना किसे कहते हैं? जनावर के नथुनों के बीच की कोमल हड्डी को छेद कर उसमें रस्सी पहना कर घुमाते हुये बाँध दिया जाता है। केतनो मरखाह मवेशी हो, नाथ पकड़ते ही नियंत्रण में आ जाता है। इसे आजकल ऐसे समझें कि कुछ कूल ड्यूड ड्यूडी ढोंढ़ी, ओठ, आँख, गाल आदि गतर गतर छेदवा कर मिनी झुलनी जैसा पहने होते हैं। अगर उनसे भिड़ंत हो तो टीप कर वही पकड़ लें फिर देखिये कैसे चोकरते हुये वे नियंत्रण में आ जाते हैं! मानव को जनावर बनने का नवा शौक चढ़ रहा है। पहिले के युग में भी झुलनी, बाली, कुंडल आदि होते थे लेकिन उनमें बहुत मरजाद होती थी सो ऐसा नुस्खा कोई सोचता भी नहीं था, अब भी खंडहरों में सोमयाग के कुछ मंत्र बचे हैं सो झुलनी आदि को छूट दे रहा हूँ। 
हइ देखिये! हमरी निबन्ह गइया तो बहक गयी, फिर से लैन पर लाते हैं। 
(4)
पूर्वांचल के महानगरों (अगर कह सकें तो) में गौ पालन प्रकल्प नगरनिगम के आलस्य पर फलता फूलता है। गोपाष्टमी के दिन गो रक्षा आन्दोलनकारियों को इस क्षेत्र के हर नगर निगम आयुक्त को 'गौद्योगश्री' की उपाधि से सम्मानित करना चाहिये। 
आवारा संतानों को आजकल बाइक/बाइकी, मोबाइल और पेटरोल अलाउंस दे कर घर से हाँक दिया जाता है। पालित गायों को तो वह भी देने की आवश्यकता नहीं। दूहने के समय ढूँढ़ कर ले आइये बकिया टैम पॉलीथीन, पेपाइरस, गू मूत, सड़े भोजन आदि के पौष्टिक आहार का भोग लगाने के लिये राजमार्ग पर छोड़ दीजिये, एक सौ आठ बैकुंठ का पुण्य रोज चित्रगुप्त के खाते में लिखा जाता है! सर्वदा उदररोग पीड़ित ऐसी गायें गोबर नहीं देतीं, गुह छेरती हैं जिसकी दुर्गन्ध मानव मल को भी मात करती है। भारत की राष्ट्रीय गन्ध रेलवे प्लेटफार्म पर मिलती है और राष्ट्रीय देन ऐसे नगरों की सड़कों पर! 
एक बार पैर पड़ जाये तो जूते चप्पल को पंचस्नान करा गुलाबरी से नहलाने के पश्चात ही गन्ध दफा होती है। पुराने युग के गँवई बैद उजाला होने पर निपटने को जाते थे। खेत में गुह के रंग, आकार, प्रकार, अवस्था आदि को देख गाँव के ओवरआल स्वास्थ्य का अद्यतन रखते और तदनुसार पथ्य कुपथ्य बताते। आज भी अगर अच्छे होमियोपैथ के यहाँ आप जायें तो वह आप से आप के गुह के बारे में इतने प्रकार के प्रश्न पूछेगा कि आप हैराँ हो जायेंगे - यह व्यक्ति मास्टर शेफ प्रतियोगिता में क्यों नहीं जाता

तो गायों की छेर देख कर ही आप उनके और उनका दूध पीने वालों के स्वास्थ्य के बारे में पता कर सकते हैं। इसलिये ज्ञानी जन कहते हैं कि नगर में दूध पंचमेल पॉश्चुराइड ही पियो! (जारी)

शनिवार, 7 मार्च 2015

अकेली जरा का पर्व

नीम झरे दुअरा पर सूखी, चौकी पर है धूर। 
शमी गाछ की छाँह कँटीली, स्वामी घर से दूर॥
सोने के पिजड़े में सुगना, ना दाना ना ठोर। 
रामनाम की टेर लगी है, जाना है उस छोर॥
गइया सब को कौरा पहुँचे, चिरई सब को नीर। 
मनपूओं की बात अधूरी, ज्यों स्मृतियों की खीर॥
सूगर फ्री में बनी तस्मई, देवकुर पाकड़ घाट। 
गदबेरा अबीर में सुत की, मइया जोहे बाट॥
सन्नाटा है घर के आँगन, सिमटा सकल वितान। 
भीगी आँखों बुढ़िया देखे, बासी सब पकवान॥  

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

ऋग्वेद में गंगा

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ऋग्वेद और गंगा का सम्बन्ध रहस्यसंकेती है। दसवें मंडल के 75 वें नदी सूक्त में गंगा का स्पष्ट वर्णन है लेकिन उसके अतिरिक्त जो भी संकेत हैं, वे पहेली से लगते हैं। जैसा कि मैं पहले भी संकेत करता रहा हूँ, पूर्वी सभ्यता संहिता रचयिताओं की नहीं थी लेकिन संहिताओं से पुरानी थी। वाल्मीकि आदि कवि हैं इसलिये नहीं कि पहली कविता रचे, इसलिये कि 'आदि कथा' के लोकस्वरूप को छन्दबद्ध काव्य का रूप दिये। भारतीय परम्परा यदि राम और कृष्ण में एक युग का अंतर बताती है और राम को कृष्ण से पुराना बताती है तो तो यूँ ही नहीं बताती।

पूरब की सभ्यता राम वाली थी, सूर्यवंशियों की, इक्ष्वाकु अथर्वणों की। पश्चिमी सभ्यता चन्द्रवंशियों की थी, कुरुओं की, पांचालों की। पूरब और पश्चिम में आपसी व्यापारिक और वैवाहिक सम्बन्ध तो थे लेकिन अधिक औपचारिक और किंचित प्रतिद्वन्द्विता भी लिये हुये।

कौशिक गोत्री विश्वामित्र का वंश इन दोनों के बीच सेतु का कार्य करता है, इसलिये कि विश्वामित्र यायावर हैं, सप्तसैंधव को लाँघ सुदूर पश्चिम की और जाते हैं तो धन और सोम के सन्धान में पूरब के गांगेयों से भी सम्बन्ध रखते हैं। सूर्यवंशियों और चन्द्रवंशियों की आपसी प्रतिद्वन्द्विता और लड़ाइयों के ध्वंस सूत्र आज भी राजपूत कुलों में दिख जाते हैं।

 सरस्वती के सूखने के पश्चात जब गंगा ने सिन्धु के समांतर उनका स्थान ले लिया तब घनघोर सम्मिलन हुआ। सरस्वती प्रयाग 'स्थापित' हुईं। गंगा के साथ सूर्यवंशी भगीरथ कुल का नाम जुड़ा हुआ है। समृद्ध राज्य में एक विकराल अकाल, ऋषि शाप, 60000 पुरखों का भस्म होना, तपस्या, भगीरथ प्रयत्न से गंगा को मैदान में उतारना, जह्नु ऋषि की रोक, कैलाशी शिव का भी साथ में आना आदि आदि उन पुरा कथाओं के रूपक हैं जो संहिताओं से भी पुरानी है। जह्नु ऋषि द्वारा मुक्त किये जाने के कारण गंगा जाह्नवी कहलायीं।

ऋग्वेद में गंगा को लेकर जह्नु का क्षेत्र चर्चित है। स्पष्टत: इनके द्रष्टा भी उद्योगी ऋषि हैं जैसे आंगिरस, बृहस्पति और विद्रोही विश्वामित्र कुल। अश्विनों को सम्बोधित इन ऋचाओं में समृद्धि की चर्चा है, धन की चर्चा है, थल और जल मार्ग में चलने वाले रथों की चर्चा है जिनमें क्रमश: वृषभ और शिंशुमार (गंगा डॉल्फिनें) जुते हुये हैं और स्तुतियों में भी धन (द्रविण) है।

यदयातं दिवोदासाय वर्तिर्भरद्वाजायाश्विना हयन्ता। रेवदुवाह सचनो रथो वां वृषभश्च शिंशुमारष्च युक्ता॥

रयिं सुक्षत्रं स्वपत्यमायुः सुवीर्यं नासत्या वहन्ता। आ जह्नावीं समनोप वाजैस्त्रिरह्नो भागं दधतीमयातम्॥

(1.116.18-19, कुत्स आंगिरस)

इन ऋचाओं में जह्नु की संतानों द्वारा अश्विनकुमारों का दिन में तीन समय यजन वर्णित है और साथ ही उनके द्वारा धन ले कर राजा दिवोदास के घर जाने की बात है। दिवोदास पश्चिमी राजा हैं और अन्यत्र भी वर्णित हैं।   

तीसरे मंडल के 58 वें सूक्त में विश्वामित्र अश्विनद्वय की प्रशंसा में उनके ‘पुरातन सर्वशिवकारी सख्य’ की बात करते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि आप का धन जह्नव्याम (जह्नु के क्षेत्र में स्थित) है। आप दोनों की ‘मित्रता’ से हम पुन: लाभान्वित हों और ‘सह नू समाना’ मधुर हों।

                                    पुराणमोकः सख्यं शिवं वां युवोर्नरा द्रविणं जह्नाव्याम् ।

                   पुनः कृण्वानाः सख्या शिवानि मध्वा मदेम सह नू समानाः॥ (3.58.6, विश्वामित्र गाथिन)

इस सूक्त के प्रारम्भ में प्राची में उषा का दर्शन कर सूर्य के लिये ‘पुत्रश्चरति दक्षिणाया:’ कहा गया है और यह भी कि अश्विनों का स्तोत्र गायन तो उसी समय होता है। इस सूक्त से स्पष्ट ही पूरब के साथ पुराना भौतिक सम्बन्ध सिद्ध होता है।      

 

छठे मंडल के 45 वें सूक्त में किसी बृबु की बड़ी प्रशंसा है क्यों कि वह धन का दानी पणि (व्यापारी) है। कहा गया है कि वह दान कर्म द्वारा पणियों में मूर्धन्य हुआ। गंगा के ऊँचे तटों जैसा महान हुआ। कक्ष प्रयोग से ही आज का गंगा कछार तो नहीं हुआ!

अधि बृबुः पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्। उरुः कक्षो न गांग्यः॥ (6.45.31, शयु बार्हस्पत्य)

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

संत रविदास, मीराबाई और गबरू चमार

अब कैसे छूटे राम, नाम रट लागी।
प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी,
जाकी अंग अंग बास समानि।
प्रभुजी तुम घन बन हम मोरा,
जैसे चितवत चन्द चकोरा।
प्रभुजी तुम दीपक हम बाती,
जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभुजी तुम मोती हम धागा,
जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा,
ऐसी भक्ति करै रैदासा।

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आज रविदास जयंती है। 'प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी' के रचनाकार को नमन। बनारस के सीर गोवर्धन में जन्मे इस संत ने 'बेग़मपुरा' की अवधारणा भी दी - दुखहीन, समानता और निर्भयता को समेटे एक आदर्श नगर। बनारस से बेग़मपुरा एक्सप्रेस उसी की स्मृति में चलती है। इस संत की सरल रचनायें सुदूर पंजाब और महाराष्ट्र तक में लोकप्रिय हैं।

चित्तौड़ की संत रानी मीराबाई इनकी शिष्या रहीं। गुरु ग्रंथ साहिब में दादू, कबीर की तरह ही इनकी भी रचनायें संग्रहीत हैं।
पंजाब में सवर्ण श्रेष्ठता की 'गबरू जाट' छवि के विरुद्ध 'गबरू चमार' का जो पॉप कल्चर चला है, उस पर भी भीम के अतिरिक्त इस चमार संत का प्रभाव है। समाज में अहंकार का वर्ग संतुलन बनाये रखने में भी वह कारगर होंगे, बेग़मपुरा निवासी रविदास ने कभी सोचा भी नहीं होगा!
यह पंजाबी पॉप रचना भले आप को अच्छी न लगे लेकिन 'जट्ट' के समकक्ष पढ़ते लिखते आगे बढ़ते 'चमार' का आत्मविश्वास तो सराहना की माँग करता ही है!

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आभार: http://www.ghumakkar.com/chittaurgarh-fort-an-enigma-with-a-thin-line-between-history-and-mythology-i/

रविवार, 4 जनवरी 2015

नवग्व दशग्व

भूमा को सिंचित करते पर्जन्य को देख कर जो आह्लाद वैदिक ऋचाओं में बरसता है वह मानसूनी जलवायु से ही साम्य रखता है, भैया काहें बुद्धि का दुरुपयोग कर रहे हो?
[यह विवेचना उस दावे को काटने के लिये है जो इन्द्र द्वारा वृत्र के वध और वर्षा के प्रारम्भ को लेकर यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि कथित आर्य मध्यएशिया के स्तेपी घास के मैदानों से भारत में आये थे।] 
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ऋग्वैदिक सत्रों में दो महाविभूति समूहों की बड़ी प्रतिष्ठा है। वे हैं नवग्व और दशग्व। ये दोनों बड़े रहस्यमय हैं। टिळ्क ने इनका प्रयोग यह दर्शाने में किया कि वैदिक जनों का आदि देश आर्कटिक क्षेत्र था जिसे बाद में खारिज कर दिया गया जब कि मार्क्सवादी डॉ. भगवान सिंह इन्हें 'गौ' अर्थात धन, खनिज आदि की खोज में देश विदेश की यात्रायें करने वाले विशिष्ट आंगिरस कुल का नाम दे पहचानते हैं जो कि साहित्यिक साक्ष्यों से पुष्ट भी होता है (कभी सप्तर्षि आंगिरस कुल के ही थे! और सप्तर्षियों की प्रतिष्ठा जग जाहिर है)। 
सम्भव है ये दो समूह वर्ष के दो और तीन उन महीनों को छोड़ यात्रा करते रहे हों जिनमें जलवायु यात्रा योग्य न रहती हो। 
छ: ऋतुओं से दो दो ले कर आम जन के समझ योग्य तीन लगभग (+/-एक पक्ष) समूह बने: जाड़ा - हेमंत(नवम्बर दिसम्बर), शिशिर(जनवरी फरवरी); गर्मी - बसंत (मार्च अप्रैल), ग्रीष्म (मई जून); बरसात - वर्षा (जुलाई अगस्त), शरद (सितम्बर अक्टूबर)। दो, तीन महीनों से आगे आते परवर्ती काल में हम चातुर्मास अर्थात बरसात के चार महीनों में साधकों के एक ही स्थान पर निवास से परिचित होते हैं।
शरद अर्थात सितम्बर विषुव के पश्चात सूर्य प्राचीन पितृयान(तब का दक्षिणायन) में चले जाते और महाविषुव अर्थात संवत्सर के प्रारम्भ के दिन से देवयान में प्रवेश करते जो कि उत्तरायण माना जाता। तब देवयान की दो ऋतुओं बसंत और ग्रीष्म को ले कर कभी समस्या नहीं रही। समस्या जाड़े के समय अर्थात पितृयान में है। इसकी तीन ऋतुयें शरद, हेमंत और शिशिर श्रौत सत्रों के आयोजकों के लिये कठिन थीं। शतपथ ब्राह्मण में सन्धि ऋतु वर्षा को लेकर शरद के साथ संयुक्त कर पाँच ऋतुयें कर दी गईं और पुरुषमेध में पाँच अंगों से इन्हें पहचाना गया। शतपथ के पुरुषमेध का प्रारम्भ पाँव से होता है और पाँव है ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ बसंत! 
ऋग्वैदिक ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत और शिशिर ऋतुओं का समास कर पाँच ऋतुयें बना ली गईं। स्पष्ट है कि 5x2=10 महीनों में ही श्रौत सत्रों की गतिविधियाँ उठान पर रहतीं और बचे दो महीनों अर्थात एक ऋतु के बराबर समय में दशग्व सहित सब मिल कर सत्र अवसान करते। एक पक्ष आगे और पीछे मिला कर विराम पर रहने वाले नवग्व भी सम्मिलित होते। शतपथ का वर्षा और शरद को मिलाना उस ऋग्वैदिक कूट कथ्य से भी जुड़ता है जिसमें इन्द्र वृत्र को मार कर सूर्य और वर्षा दोनों को नया जीवन देते हैं। उल्लेखनीय है कि इन दो ऋतुओं को को मिलाने पर सितम्बर का विषुव भी इस कालखंड में पड़ जाता है। संवत्सर प्रारम्भ के लिये एक और आदर्श कालखंड। आश्चर्य नहीं कि पुरुषमेध में यह देह का केन्द्रीय भाग अर्थात कटि है। तो ऐतरेय ब्राह्मण के हेमंत+शिशिर का क्या करें? विश्वामित्र को याद करें जो कि नये संसार के साथ वैकल्पिक संवत्सर के भी जन्मदाता माने जाते हैं।  J

स्पष्ट है कि वैदिक युग के श्रौत समाज में एक साथ कई पद्धतियाँ प्रचलित थीं जिन्हें न समझने के कारण निरूपण में बहुत सी भूलें हुई हैं।