रविवार, 8 फ़रवरी 2015

ऋग्वेद में गंगा

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ऋग्वेद और गंगा का सम्बन्ध रहस्यसंकेती है। दसवें मंडल के 75 वें नदी सूक्त में गंगा का स्पष्ट वर्णन है लेकिन उसके अतिरिक्त जो भी संकेत हैं, वे पहेली से लगते हैं। जैसा कि मैं पहले भी संकेत करता रहा हूँ, पूर्वी सभ्यता संहिता रचयिताओं की नहीं थी लेकिन संहिताओं से पुरानी थी। वाल्मीकि आदि कवि हैं इसलिये नहीं कि पहली कविता रचे, इसलिये कि 'आदि कथा' के लोकस्वरूप को छन्दबद्ध काव्य का रूप दिये। भारतीय परम्परा यदि राम और कृष्ण में एक युग का अंतर बताती है और राम को कृष्ण से पुराना बताती है तो तो यूँ ही नहीं बताती।

पूरब की सभ्यता राम वाली थी, सूर्यवंशियों की, इक्ष्वाकु अथर्वणों की। पश्चिमी सभ्यता चन्द्रवंशियों की थी, कुरुओं की, पांचालों की। पूरब और पश्चिम में आपसी व्यापारिक और वैवाहिक सम्बन्ध तो थे लेकिन अधिक औपचारिक और किंचित प्रतिद्वन्द्विता भी लिये हुये।

कौशिक गोत्री विश्वामित्र का वंश इन दोनों के बीच सेतु का कार्य करता है, इसलिये कि विश्वामित्र यायावर हैं, सप्तसैंधव को लाँघ सुदूर पश्चिम की और जाते हैं तो धन और सोम के सन्धान में पूरब के गांगेयों से भी सम्बन्ध रखते हैं। सूर्यवंशियों और चन्द्रवंशियों की आपसी प्रतिद्वन्द्विता और लड़ाइयों के ध्वंस सूत्र आज भी राजपूत कुलों में दिख जाते हैं।

 सरस्वती के सूखने के पश्चात जब गंगा ने सिन्धु के समांतर उनका स्थान ले लिया तब घनघोर सम्मिलन हुआ। सरस्वती प्रयाग 'स्थापित' हुईं। गंगा के साथ सूर्यवंशी भगीरथ कुल का नाम जुड़ा हुआ है। समृद्ध राज्य में एक विकराल अकाल, ऋषि शाप, 60000 पुरखों का भस्म होना, तपस्या, भगीरथ प्रयत्न से गंगा को मैदान में उतारना, जह्नु ऋषि की रोक, कैलाशी शिव का भी साथ में आना आदि आदि उन पुरा कथाओं के रूपक हैं जो संहिताओं से भी पुरानी है। जह्नु ऋषि द्वारा मुक्त किये जाने के कारण गंगा जाह्नवी कहलायीं।

ऋग्वेद में गंगा को लेकर जह्नु का क्षेत्र चर्चित है। स्पष्टत: इनके द्रष्टा भी उद्योगी ऋषि हैं जैसे आंगिरस, बृहस्पति और विद्रोही विश्वामित्र कुल। अश्विनों को सम्बोधित इन ऋचाओं में समृद्धि की चर्चा है, धन की चर्चा है, थल और जल मार्ग में चलने वाले रथों की चर्चा है जिनमें क्रमश: वृषभ और शिंशुमार (गंगा डॉल्फिनें) जुते हुये हैं और स्तुतियों में भी धन (द्रविण) है।

यदयातं दिवोदासाय वर्तिर्भरद्वाजायाश्विना हयन्ता। रेवदुवाह सचनो रथो वां वृषभश्च शिंशुमारष्च युक्ता॥

रयिं सुक्षत्रं स्वपत्यमायुः सुवीर्यं नासत्या वहन्ता। आ जह्नावीं समनोप वाजैस्त्रिरह्नो भागं दधतीमयातम्॥

(1.116.18-19, कुत्स आंगिरस)

इन ऋचाओं में जह्नु की संतानों द्वारा अश्विनकुमारों का दिन में तीन समय यजन वर्णित है और साथ ही उनके द्वारा धन ले कर राजा दिवोदास के घर जाने की बात है। दिवोदास पश्चिमी राजा हैं और अन्यत्र भी वर्णित हैं।   

तीसरे मंडल के 58 वें सूक्त में विश्वामित्र अश्विनद्वय की प्रशंसा में उनके ‘पुरातन सर्वशिवकारी सख्य’ की बात करते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि आप का धन जह्नव्याम (जह्नु के क्षेत्र में स्थित) है। आप दोनों की ‘मित्रता’ से हम पुन: लाभान्वित हों और ‘सह नू समाना’ मधुर हों।

                                    पुराणमोकः सख्यं शिवं वां युवोर्नरा द्रविणं जह्नाव्याम् ।

                   पुनः कृण्वानाः सख्या शिवानि मध्वा मदेम सह नू समानाः॥ (3.58.6, विश्वामित्र गाथिन)

इस सूक्त के प्रारम्भ में प्राची में उषा का दर्शन कर सूर्य के लिये ‘पुत्रश्चरति दक्षिणाया:’ कहा गया है और यह भी कि अश्विनों का स्तोत्र गायन तो उसी समय होता है। इस सूक्त से स्पष्ट ही पूरब के साथ पुराना भौतिक सम्बन्ध सिद्ध होता है।      

 

छठे मंडल के 45 वें सूक्त में किसी बृबु की बड़ी प्रशंसा है क्यों कि वह धन का दानी पणि (व्यापारी) है। कहा गया है कि वह दान कर्म द्वारा पणियों में मूर्धन्य हुआ। गंगा के ऊँचे तटों जैसा महान हुआ। कक्ष प्रयोग से ही आज का गंगा कछार तो नहीं हुआ!

अधि बृबुः पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्। उरुः कक्षो न गांग्यः॥ (6.45.31, शयु बार्हस्पत्य)

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

संत रविदास, मीराबाई और गबरू चमार

अब कैसे छूटे राम, नाम रट लागी।
प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी,
जाकी अंग अंग बास समानि।
प्रभुजी तुम घन बन हम मोरा,
जैसे चितवत चन्द चकोरा।
प्रभुजी तुम दीपक हम बाती,
जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभुजी तुम मोती हम धागा,
जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा,
ऐसी भक्ति करै रैदासा।

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आज रविदास जयंती है। 'प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी' के रचनाकार को नमन। बनारस के सीर गोवर्धन में जन्मे इस संत ने 'बेग़मपुरा' की अवधारणा भी दी - दुखहीन, समानता और निर्भयता को समेटे एक आदर्श नगर। बनारस से बेग़मपुरा एक्सप्रेस उसी की स्मृति में चलती है। इस संत की सरल रचनायें सुदूर पंजाब और महाराष्ट्र तक में लोकप्रिय हैं।

चित्तौड़ की संत रानी मीराबाई इनकी शिष्या रहीं। गुरु ग्रंथ साहिब में दादू, कबीर की तरह ही इनकी भी रचनायें संग्रहीत हैं।
पंजाब में सवर्ण श्रेष्ठता की 'गबरू जाट' छवि के विरुद्ध 'गबरू चमार' का जो पॉप कल्चर चला है, उस पर भी भीम के अतिरिक्त इस चमार संत का प्रभाव है। समाज में अहंकार का वर्ग संतुलन बनाये रखने में भी वह कारगर होंगे, बेग़मपुरा निवासी रविदास ने कभी सोचा भी नहीं होगा!
यह पंजाबी पॉप रचना भले आप को अच्छी न लगे लेकिन 'जट्ट' के समकक्ष पढ़ते लिखते आगे बढ़ते 'चमार' का आत्मविश्वास तो सराहना की माँग करता ही है!

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आभार: http://www.ghumakkar.com/chittaurgarh-fort-an-enigma-with-a-thin-line-between-history-and-mythology-i/

रविवार, 4 जनवरी 2015

नवग्व दशग्व

भूमा को सिंचित करते पर्जन्य को देख कर जो आह्लाद वैदिक ऋचाओं में बरसता है वह मानसूनी जलवायु से ही साम्य रखता है, भैया काहें बुद्धि का दुरुपयोग कर रहे हो?
[यह विवेचना उस दावे को काटने के लिये है जो इन्द्र द्वारा वृत्र के वध और वर्षा के प्रारम्भ को लेकर यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि कथित आर्य मध्यएशिया के स्तेपी घास के मैदानों से भारत में आये थे।] 
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ऋग्वैदिक सत्रों में दो महाविभूति समूहों की बड़ी प्रतिष्ठा है। वे हैं नवग्व और दशग्व। ये दोनों बड़े रहस्यमय हैं। टिळ्क ने इनका प्रयोग यह दर्शाने में किया कि वैदिक जनों का आदि देश आर्कटिक क्षेत्र था जिसे बाद में खारिज कर दिया गया जब कि मार्क्सवादी डॉ. भगवान सिंह इन्हें 'गौ' अर्थात धन, खनिज आदि की खोज में देश विदेश की यात्रायें करने वाले विशिष्ट आंगिरस कुल का नाम दे पहचानते हैं जो कि साहित्यिक साक्ष्यों से पुष्ट भी होता है (कभी सप्तर्षि आंगिरस कुल के ही थे! और सप्तर्षियों की प्रतिष्ठा जग जाहिर है)। 
सम्भव है ये दो समूह वर्ष के दो और तीन उन महीनों को छोड़ यात्रा करते रहे हों जिनमें जलवायु यात्रा योग्य न रहती हो। 
छ: ऋतुओं से दो दो ले कर आम जन के समझ योग्य तीन लगभग (+/-एक पक्ष) समूह बने: जाड़ा - हेमंत(नवम्बर दिसम्बर), शिशिर(जनवरी फरवरी); गर्मी - बसंत (मार्च अप्रैल), ग्रीष्म (मई जून); बरसात - वर्षा (जुलाई अगस्त), शरद (सितम्बर अक्टूबर)। दो, तीन महीनों से आगे आते परवर्ती काल में हम चातुर्मास अर्थात बरसात के चार महीनों में साधकों के एक ही स्थान पर निवास से परिचित होते हैं।
शरद अर्थात सितम्बर विषुव के पश्चात सूर्य प्राचीन पितृयान(तब का दक्षिणायन) में चले जाते और महाविषुव अर्थात संवत्सर के प्रारम्भ के दिन से देवयान में प्रवेश करते जो कि उत्तरायण माना जाता। तब देवयान की दो ऋतुओं बसंत और ग्रीष्म को ले कर कभी समस्या नहीं रही। समस्या जाड़े के समय अर्थात पितृयान में है। इसकी तीन ऋतुयें शरद, हेमंत और शिशिर श्रौत सत्रों के आयोजकों के लिये कठिन थीं। शतपथ ब्राह्मण में सन्धि ऋतु वर्षा को लेकर शरद के साथ संयुक्त कर पाँच ऋतुयें कर दी गईं और पुरुषमेध में पाँच अंगों से इन्हें पहचाना गया। शतपथ के पुरुषमेध का प्रारम्भ पाँव से होता है और पाँव है ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ बसंत! 
ऋग्वैदिक ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत और शिशिर ऋतुओं का समास कर पाँच ऋतुयें बना ली गईं। स्पष्ट है कि 5x2=10 महीनों में ही श्रौत सत्रों की गतिविधियाँ उठान पर रहतीं और बचे दो महीनों अर्थात एक ऋतु के बराबर समय में दशग्व सहित सब मिल कर सत्र अवसान करते। एक पक्ष आगे और पीछे मिला कर विराम पर रहने वाले नवग्व भी सम्मिलित होते। शतपथ का वर्षा और शरद को मिलाना उस ऋग्वैदिक कूट कथ्य से भी जुड़ता है जिसमें इन्द्र वृत्र को मार कर सूर्य और वर्षा दोनों को नया जीवन देते हैं। उल्लेखनीय है कि इन दो ऋतुओं को को मिलाने पर सितम्बर का विषुव भी इस कालखंड में पड़ जाता है। संवत्सर प्रारम्भ के लिये एक और आदर्श कालखंड। आश्चर्य नहीं कि पुरुषमेध में यह देह का केन्द्रीय भाग अर्थात कटि है। तो ऐतरेय ब्राह्मण के हेमंत+शिशिर का क्या करें? विश्वामित्र को याद करें जो कि नये संसार के साथ वैकल्पिक संवत्सर के भी जन्मदाता माने जाते हैं।  J

स्पष्ट है कि वैदिक युग के श्रौत समाज में एक साथ कई पद्धतियाँ प्रचलित थीं जिन्हें न समझने के कारण निरूपण में बहुत सी भूलें हुई हैं।

रविवार, 21 दिसंबर 2014

उत्तरायण के दिन अब मकर संक्रांति नहीं होती!

कल के सूर्योदय के साथ उदया तिथि में 22 दिसम्बर को सूर्य उत्तरायण होंगे अर्थात दक्षिण की ओर के अपने अधिकतम झुकाव से उत्तर की ओर पहला पग लेंगे। उस समय सूर्य मूल नक्षत्र पर होंगे अर्थात आकाश में जिस अयन क्षेत्र में सूर्योदय होगा, वह मूल नक्षत्र (वृश्चिक राशि के डंक का अंतिम बिन्दु) वाला होगा। 

उत्तर दिशा को शून्य मान कर यदि दक्षिणावर्त चलें तो पूरब दिशा 90 अंश पर आती है। अपने अधिकतम दक्षिणी झुकाव में सूर्योदय लगभग 116 अंश पर होता है और वहाँ से पुन: धीरे धीरे घटाव प्रारम्भ होता है - 115, 114, 113 ...। महाविषुव अर्थात 21 मार्च के आसपास मधुमास में सूर्योदय पुन: 90 अंश अर्थात ठीक पूरब दिशा में होगा।

हिन्दुओं में उत्तरायण को मकरसंक्रांति अर्थात सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण तिथि 14/15 जनवरी से जोड़ कर माना जाता है। कभी ऐसा था किंतु आज ऐसा नहीं है। 

अब 14 जनवरी को सूर्य उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर होते हैं। उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर उत्तरायण सूर्योदय लगभग छठी सदी में होता था जब कि आर्यभट आदि ने अंतिम बार पंचांग का मानकीकरण किया। तब मकर संक्रांति और उत्तरायण सम्पाती थे। लगभग 25920 वर्षों की आवृत्ति के साथ धरती के घूर्णन अक्ष के शीर्ष बिन्दु की वृत्तीय गति के कारण यह खिसकन होती है।


 अयनवृत्त पर सूर्य का वार्षिक संचरण अथर्ववेद (19.7) अनुसार 28 नक्षत्रों में विभाजित है (संभवत: महाभारत काल में व्यासपीठ के संशोधनों में अभिजित को हटा कर यह विभाजन 27 नक्षत्रों में कर दिया गया)। 
वैदिक युग में यह विभाजन समान नहीं था। समान विभाजन पश्चिम के 12 राशि तंत्र को अपनाने और उसके भीतर नक्षत्र आधारित काल गणना को समायोजित करने के साथ प्रारम्भ हुआ। 
 आधुनिक विद्वानों ने वैदिक समय की मान्यता के अनुसार 25920 वर्ष के समय अंतराल को महाविषुव के दिन सूर्य के किसी नक्षत्र पर होने से इन अवधियों में बाँटा है:

मृगशिरा - 363, आर्द्रा 1761, पुनर्वसु 1116, पुष्य 354, अश्लेषा 1164, मघा 828, पूर्व फाल्गुनी 741, उत्तर फाल्गुनी 1572, हस्त 748, चित्रा 30, स्वाति 1500, विशाखा 1257, अनुराधा 519, ज्येष्ठा 1068, मूल 720, पूर्वाषाढ़ 561, उत्तराषाढ़ 213, अभिजित 1185, श्रावण 1047, धनिष्ठा 1818, शतभिषा 858, पूर्व भाद्रपद 1128, उत्तर भाद्रपद 771, रेवती 1017, अश्वायुज 1026, भरणी 849, कृत्तिका 705, रोहिणी 1002।


इस समय महाविषुव पूर्वभाद्रपद नक्षत्र पर है जिसके 455 वर्ष बीत चुके हैं। महाविषुव की खिसकन के कारण पर्वों को मनाने में अब 23 दिनों का अंतर आ चुका है, पर्व पंचांग में संशोधन होने चाहिये।

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

शत शरद जियो

कुहरे भरी कुनकुनी प्रातधूपों के प्रारम्भिक दिन। इन दिनों जब कि गोरखपुर आँखें फाड़ कुहरे को भेदने के प्रयास कर रहा होता है, मँड़ुवाडीह स्टेशन पर बनारसी लोग लुगाइयाँ नारंगी धूप गंगा में नहा रहे होते हैं। 

आने वाला दिल्ली से आ रहा था, उसे रिसीव करना था सो प्रात:काले शिवगंगा दर्शन को मँड़ुवाडीह स्टेशन जाना पड़ा। एक स्टेशन पहले या आउटर सिगनल पर समय से चलती ट्रेन को भी खड़ा कर डिले कर देने की भारतीय रेलवे की उज्जवल परम्परा का निर्वाह उस दिन भी हुआ था, शिवगंगा जी अगवानी द्वार पर पवना घंटे से खड़ी आरती थाल को अगोर रही थीं जब कि नरायन गेरुआये चमक रहे थे। मैं प्लेटफार्म पर भटकने और लोगों को परखने लगा। पूर्वी उत्तरप्रदेश में साफ सुथरा स्टेशन मिलना यूँ ही आप को भौंचक कर देता है, भीड़ भी कम हो तो दोषदर्शी के लिये कुछ देखने को रहता ही नहीं, इसलिये बहुत शीघ्र ही बोर हो कर एक बेंच पर बैठ गया।

कुछ पल में ही पीछे से एक बालक स्वर उभरा – अंकल जी, अंकल जी! बच्चे का स्वर इतना संभ्रांत और पॉलिश्ड!!  आश्चर्य में मैंने दृष्टि फेरी –केश करीने से कढ़े हुये, साधारण सी स्कूल यूनिफॉर्म में आत्मविश्वास से भरा मन्द स्मित साँवला सलोना बौद्धिक और गरिमामय तीखे नैन नक्श वाला चेहरा। नाटा सा मासूम लड़का, अधिक से अधिक छ्ठी कक्षा में पढ़ता होगा। उसने पूछा – अंकल, यह जो सामने ट्रेन खड़ी है, एक्सप्रेस है न?  मैंने इधर उधर चेहरा घुमाया कि कोई अभिभावक साथ में है या नहीं? कोई नहीं था। बच्चे के हाथ में एक पॉलीथीन बैग था जिसमें टिफिन रखा हुआ था। मैं सतर्क हो गया – क्या मामला हो सकता है?
चौरीचौरा एक्सप्रेस को देखते मैंने उत्तर दिया – हाँ, एक्सप्रेस ही है।
बच्चे ने उत्तर दिया – भाई जी को छोड़ने आया था। उन्हें पैसेंजर ट्रेन से एक स्टेशन आगे जाना है, यह तो वहाँ शायद रुके भी नहीं। किसी वयस्क पुरुष की तरह उसने अपनी चिंता जताई और मुस्कुराते हुये थैंक यू बोल कर आगे बढ़ गया। 
 मेरे मन में बवंडर उठने लगे – क्या इसके घर कोई अभिभावक नहीं है? सातवीं में पढ़ते अपने बालक को हमें बस स्टॉप तक छोड़ कर आना पड़ता है कि कहीं इतने समय में ही कुछ ऐसा वैसा न घट जाय! जब कि यह बच्चा अकेले,  भाई को ट्रेन पर चढ़ाने आया है! मैं धीरे धीरे उसके पीछे चल पड़ा। दूर दिखा कि वह एक विकलांग से बच्चे को छोड़ने आया था जो रह रह अपनी लाठी के सहारे उठ खड़ा होता और अपने सलोने भाई के कुछ कहने पर पुन: बैठ जाता।

 शिवगंगा आ पहुँची थी, मैं यात्री को साथ ले वापस घर की और चल पड़ा। मन के कुहरे में किरणें फूट रही थीं। संसार ऐसे ही छोटे छोटे अच्छे जन से रहने लायक बना हुआ है। हो सकता है कि बच्चे का पिता न हो या ग़रीबी के कारण कहीं उस समय भी बझा हो या नालायक हो। उसकी माँ के साथ भी ऐसा ही कुछ हो लेकिन वह बच्चा अपने साथ कितनी ऊष्मा, ऊर्जा और प्रकाश लिये जी रहा है! 

माथे पर सूरज देव की तौंक पड़ी। उसमें से बच्चे के लिये किरण भर मौन आशीर्वाद ले कर मैं बुदबुदाया – शत शरद जियो पुत्र! स्टेशन से घर तक की यात्रा टाइम मशीन की यात्रा से कम नहीं थी, मैं एक आयाम से दूसरे आयाम तक जो पहुँच गया था।