गुरुवार, 14 जनवरी 2016

जल्लिकट्टु और बरद के बहाने

...रोरवती सरस्वती नदी का विस्तीर्ण क्षेत्र। समय पश्चिम का उष:काल। वृष साँड़ पीठ पर उत्तुंग कुकुद और गले से लटकती प्राकृतिक माला लिये मस्त हो चोकर रहे हैं। कविगण को धरा सींचने वाले आकाशी इन्द्र की गर्जना, मस्ती और सौन्दर्य के लिये इनसे अच्छे रूपक नहीं मिलते। धरती पर बीज वर्षा कर उसे गर्भिणी बनाने वाले इन्द्र वृषभ बन ऋचाओं में पूजित होते हैं। जिनके कन्धों पर व्यापार तंत्र टिका है, खेती का भार है उन्हें अपनी सुन्दर दिनांक और बैच वाली मुद्राओं पर सेठ लोग स्थान देते हैं। 

दान दक्षिणा पा कृतकृत्य पुरोहित वर्ग के लिये सारे देवता ही कृपा बरसाने वाले वृषभ हो जाते हैं जो जजमान का भी बराबर कल्याण करते हैं। भरत रूपी अग्नि को आगे रख उनके कन्धों पर जुआठा चढ़ा खेती का विस्तार करता क्षेत्र भारत होता जाता है।

... वन वन अपने श्वान और शस्त्रास्त्र के साथ भटकता कभी वनदेवी अरण्यानी से तो कभी ग्रामदेवी से आहार की भीख माँगता औघड़ लाल रुद्र किसी पर्वतीय वनप्रांतर में अपनी गोरी से मिलता है। ढेर सारी खट पट और मान मनव्वल वाले जीवन में रुद्र पर धीरे धीरे गौरी का रंग चढ़ने लगता है। घर बसता है, व्याध का त्रिशूल जाने कब खेतिहर का हल हो जाता है, गौरा पार्वती जाने कब आम घरनी हो घर घर की खबर रखने लगती हैं और सूरज की ताप से झँउस कर लाल हुये रुद्र, लाल शिव घर की छाँव में कर्पूर गौर शम्कर हो जाते हैं – जो सब बाधाओं का शमन कर देवी अन्नपूर्णा को इस योग्य बनाये रखे कि उसके द्वार से कोई खाली न लौटे । उनकी लाली गोलवा बैल में समा जाती है!
जिसके आँगन खर पतवार से ले कर साँप बिच्छू तक सबको ठाँव है और जिसके खेतों पर रात में सोम अमृत उड़ेल समस्त प्रजा को अमृतस्य पुत्रा: कर देता है। यह गृहस्थ गँवई भारत है जो ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी सबका पेट भरने वाला सबसे ऊँचा महादेव है। 

...वर्षा है, वन प्रांतर है, वनस्पतियाँ हैं, उपज है लेकिन पेट भरने को पर्याप्त नहीं। धरती तो माँ है उसके साथ छेड़छाड़ कैसे हो सकती है, वह अहल्या है! बिना छेड़छाड़ के उपज कैसे बढ़े? गोतम प्रकृति के साथ बरजोरी के समर्थक नहीं।  वर्षों से भूमि को हेरते तप कर रहे हैं कि कोई राह मिले। प्रजा का संयम टूटने को है।
खेती का विस्तार करने वालों का नायक इन्द्र किंचित प्रलोभन द्वारा और किंचित बलपूर्वक अहल्या पर हल चला ही देता है। कुपित गोतम दोनों को शाप देते हैं – ऐसी भूमि का त्याग करो, यह विधि कोई न अपनाये। बैल की सहायता से अहल्या पर हल चला। उस वृषभरूप को हल चलाने योग्य बनने के लिये अपने पुंसत्त्व अर्थात वृषण अंडकोष से मुक्त होना पड़ा, बधिया होना पड़ा, बरदा बलिवर्द बनना पड़ा। जनता ने उसे भी इन्द्र स्वरूप वृषभ पर गोतम के शाप की तरह समझा – आँड़ी थुरा गे!
अहेरी शिव के धनुष को अपने यहाँ रखवा कर शिकार बन्द करवाने वाले और कृषियज्ञ में स्वयं हल चलाने वाले राजा हैं जनक। अपनी पुत्री को भूमिजा कह सीता नाम दिये हैं, सीता अर्थात खेत का घोहा! उनकी राह में गोतम का शाप वर्षों से खड़ा है – खेती बढ़ नहीं रही! प्रतीक तोड़ने और नये प्रतीक गढ़ने का समय आ गया। राजा घोषणा करते हैं – मेरी पुत्री सीता वीर्यशुल्का है, जो वीर शिवधनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा मेरी पुत्री उसी का वरण करेगी।
प्रतापी इक्ष्वाकु वंश। वनस्पतियों की अथर्वण परम्परा का पोषक। वह वंश जिसमें कभी पुरंजय हुये जिन्हों ने देवताओं का साथ देना तब स्वीकार किया जब उनका राजा वृषभ इन्द्र उन्हें अपने कुकुद (भारतीय बैल के पीठ का उभार) पर बैठा कर उनकी सवारी बनने पर तैयार हुआ। इस कारण वे काकुत्स्थ कहलाये। उसी वंश में हुये प्रतापी रघु और दशरथ नन्दन राम।
बैल की सवारी करने वाले काकुत्स्थ का कोई वंशज ही दूसरे बरद के सवार का निवारण कर सकता था। कथायें गुंफित हुईं। राम जनक क्षेत्र पहुँचे। आश्रम की वर्षों से बंजर पड़ी अहल्या धरा का स्पर्श कर खेती की विधि को शापमुक्त किया, उसकी जनस्वीकारता सुनिश्चित की;  शिव का धनुष तोड़ अहेरी वनचारियों को सदा सदा के लिये तिरस्कृत बनच्चर बना दिया और सीता का वरण कर गाँव गाँव के वह रघुवा किसान बन जन जन में रम गये जिसकी घरवाली सीता थीं। सुदूर दक्षिण दंडकारण्य से भी आगे तक उनके रामराज्य का मॉडल आदर्श मान अपना लिया गया। एकराट राम के अनुशासन वाला भारत इस तरह उभरा। 

...किसी और कालखंड में पशुचारण और कृषि के बीच समन्वय की कमी को पहचाना एक काले कन्हैया ने। उन्हों ने इन्द्र को ठेंगा दिखा कृषि द्वारा आक्रांत होती गोचारण भूमि को सम्मान दिया – गोवर्धन पूजा उनकी पहचान हुई। पशुचारी कृष्ण के साथ उनके बड़े भाई गौर राम हलधर बने - चरवाहे और कृषक की आपसी खटपट के बीच भातृभाव बनी रहा। गोवंश और कृषि के आपसी सम्बन्ध के वे 'अन्नकूट' थे। दोनों ने जब अलग अलग राहें पकड़ीं तो महाविनाश हुआ – महाभारत। 
... इन सबके पश्चात ऐसा संश्लिष्ट गँवई भारत विकसित हुआ जिसकी पोषण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था गोवंश पर टिकी थी, जिसकी उपज और रसोई का जुआठा दुआर के बैलों के कन्धों पर था।
 उसकी कथाओं, कहानियों, नाटकों, लोरियों, सोहर, नृत्य, झूमर, कजरी, जन्मपत्री, हास परिहास, धर्म, स्मृति, पुराण, लोकोक्ति, पर्व आदि आदि सबमें वही शिव, वही राम, वही कन्हैया, वही गौरा, वही सीता जाने कितने रूप बदल पगते चले गये:

रामाद् याञ्चय मेदिनिम् धनपते बीजम् बलालांगलम्।
प्रेतेशान महिष: तवास्ति वृषभम् त्रिशूलेन फालस्तव।।
शक्ताहम् तवान्न दान करणे, स्कन्दो गोरक्षणे।
खिन्नाहम् तवान्न हर भिक्ष्योरितिसततं गौरी वचो पातुव:।।    
   
पार्वती जी शंकर जी को उनकी दरिद्रता पर उलाहना दे रही हैं। आप का भिक्षाटन ठीक नहीं है इसलिए आप भगवान राम से थोड़ी सी भूमि, कुबेर से बीज और बलभद्र से हल माँग लीजिए। आप के पास एक बैल तो है ही, यमराज से भैंसा माँग लीजिए। त्रिशूल फाल का काम देगा। मैं आप के लिए जलपान पहुँचाऊँगी। कार्तिकेय पशुओं की रक्षा करेंगे। खेती करिए, आप के निरंतर भिक्षाटन से मैं खिन्न हूँ। 
  
परुवा के दिन कहीं यह भारत अपने बैलों को सजाता, उनकी सेवा करता है और उनसे कोई काम नहीं लेता है तो कहीं उनकी दौड़ आयोजित करता है। 

दूर पश्चिम में उनकी पूजा होती है तो दक्षिण में बैलगाड़ियों की दौड़ होती है। 
संक्रांति में जलिकट्टु के बहाने बैल को नियंत्रित करने की जोर आजमाइश कर जवानों के वीरता और कौशल की परीक्षा होती है। 



हृष्ट पुष्ट बैल किसान की मजबूती का प्रमाण होते हैं। कहना नहीं होगा कि इन सबके बहाने उस भारतीय गोवंश को सुरक्षित और शुद्ध रखा गया जिसकी धाक कभी सुमेरिया तक थी। 

 जलिकट्टु पर प्रतिबन्ध गँवई ‘देव’ भारत की वैज्ञानिक सोच और जीवनपद्धति पर उन ‘अ-सुर’ शहरातियों का प्रहार है जो भूमि और जड़ से कटे, आयातित मेधा और बोतलबन्द पानी पर जी रहे हैं; जिन्हें इतना भी नहीं पता कि साँड़ के अंडकोश नष्ट कर मनुष्य ने अपनी संतति की बाढ़ और सभ्यता सम्स्कृति का प्रसार सुनिश्चित किया। जिन्हें नहीं पता कि बली बलिवर्द की वासना कहीं न कहीं उसके संरक्षण और किसान की अर्थव्यवस्था से जुड़ती है।  
 जिन्हें नहीं पता कि किसान का लाड़ प्यार नकली पशु ‘अधिकारों’ के घेरे से बहुत बाहर तक फैला है और जिन्हें यह भी नहीं पता कि ट्रैक्टर और कल्टिवेटर के इस युग में भी बरदा बाबा उस उपज को अपने कन्धों पर धारण किये हुये हैं जिसके बीज ‘ऑर्गेनिक उत्पादों’ के पैकेट में बन्द उन विराट बाजारू मालों में मिलते हैं जिनकी वायु तक जीवनहीन और प्रदूषण से भरी होती है!
 जिन्हें यह भी नहीं पता कि चावल धान नामक एक घास से उपजाया जाता है और रिफाइंड राइस ब्रान ऑयल किसी छत्ते से नहीं टपकता!            

सोमवार, 11 जनवरी 2016

महापरिनिब्बानसुत्त: सुजाता की खीर और चुन्द का सूकरमद्दव

महापरिनिर्वाण सूत्र (महापरिनिब्बान सुत्त) में बुद्ध ने कहीं भी शूद्र शब्द का प्रयोग नहीं किया है। अपनी भावी मृत देह के संस्कार के लिये वह खत्तियपंडित, ब्राह्मणपंडित और गहपतिपंडित पर विश्वास जताते हैं। 
बुद्ध ने अंतिम भोजन पावा के चुन्द कम्मारपुत्त के यहाँ किया। अनुवादकों ने कम्मारपुत्त का अनुवाद लोहार किया है। हमारी ओर एक हिन्दू जाति आज भी पायी जाती है - कमकर। समृद्ध चुन्द उसी गण से सम्बन्धित रहा होगा। चुन्द का अपना आम्रवन अर्थात बागीचा था जिसमें बुद्ध ठहरे थे। सम्पूर्ण सुत्त में भोजन के अनेक एक समान प्रकरण हैं जिसके लिये दो शब्द साथ साथ प्रयुक्त हैं - खादनीयम भोजनीयम। विद्वानों ने इनका अनुवाद क्रमश: कठोर और मृदु पदार्थों के रूप में किया है। चुन्द के यहाँ अलग बात मिलती है। इन दो शब्दों के साथ अलग से सूकरमद्दव का भी उल्लेख आता है - खादनीयम भोजनीयम पटियादापेत्वा पहूतञ्च सूकरमद्दवं। मामला और रोचक तब हो जाता है जब बुद्ध चुन्द से कहते हैं - "यं ते चुन्द सूकरमद्दवं पटियत्तं तेन मं परिविस। यं पनञ्ञं खादनीयम भोजनीयम पटियत्तं तेन भिक्खुसंघं परिविसा"ति अर्थात चुन्द! ये जो सूकरमद्दव है न वह तू मुझे परोस दे। जो अन्य मृदु और कठोर पदार्थ हैं उन्हें भिक्षुसंघ को परोस दे। भोजन सम्पन्न हुआ।
 बुद्ध पुन: चौंकाते हैं - चुन्द! यह जो बचा हुआ सूकरमद्दव है उसे तू गड्ढा खोद कर उसमें डाल कर दबा दे। इस भोजन को तथागत ही पचा सकते हैं, कोई ब्रह्म, श्रमण, ब्राह्मण, देव, मानव, तपी, पुजारी या मार(कामदेव) नहीं! ("नाहं तं चुन्द पस्सामि सदेवके लोके समारके सब्रह्मके सस्समणाब्राह्मणिया पजाय सदेवमनुस्साय, यस्स तं परिभुत्तं सम्मा परिणामं गच्छेय्य अञ्ञात्र तथागतस्सा" ति।)
उसके पश्चात बुद्ध को प्रबल वेदना होने लगती है, रक्त अतिसार हो जाता है - लोहितपक्खन्दिका मारणंतिका। कहते हैं न मरणांतक वेदना! 
बुद्ध चुपचाप सहते हैं। 
अंतिम समय निकट है और बुद्ध को चुन्द की चिंता है - यह जानकर कि उसका भोजन पा कर तथागत मृत हुये, वह अपराधबोध से ग्रसित हो जायेगा, लोग भी उसे अच्छी दृष्टि नहीं देखेंगे, ताने मारेंगे। करुणा से भरे बुद्ध चुन्द के लिये सन्देश देते हैं - दो भोजनदान समान पुण्यदायी और गुणी हैं और अन्यों से बहुत ही ऊँची श्रेणी के भी हैं - एक जिसे पा कर तथागत संबोधि प्राप्त करते हैं और दूसरा जिसे पा कर महापरिनिर्वाण... 
इस प्रकार सुजाता की खीर से चुन्द के सूकरमद्दव को जोड़ बुद्ध उसे आयुष्य, वंश, सुख, यश, स्वर्ग और आधिपत्य इन विभूतियों से संपृक्त कर देते हैं। 
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मुझे लगता है कि सूकरमद्दव के साथ भी वैसा ही अनर्थ हुआ जैसा कतिपय वैदिक ऋचाओं के साथ। ब्राह्मण परम्परा की तरह ही श्रमण परम्परा में भी शाकाहार और मांसाहार को ले वितंडा है। उनकी एक शाखा के अनुसार सूकरमद्दव सूअर का मृदु मांस था। सबसे पुराने भाष्य में इसके तीन अर्थ बताये गये हैं: आयुर्वेदिक रसायन, पंचगव्य में बना भात और बाँस के नर्म कोपड़ से बना व्यंजन।  
 परवर्ती शोधकारों ने इसका अर्थ ऐसे फँफूद या कवक(मशरूम) से लगाया जो वनैले सूअर को पसन्द होता था। कवक खाने की मनाही भारत में बहुत पुरानी है। उस समय खाया जाता रहा हो, असम्भव है। 
दूसरों ने इसका अर्थ ऐसे 'विशेष व्यञ्जन' delicacy से लगाया जो वनैले सूअर को पसन्द किसी दुर्लभ कन्द या वनस्पति से बनता हो तो कुछ ने आयुर्वेद में सूकर संज्ञा से वर्णित अनेक वनस्पतियों में से किसी एक से। 
 सूकर+मद्दव का एक अर्थ यह भी होता है - जो सूअर को मृदु या प्रिय लगे। हमलोगों की ओर एक दुर्लभ कन्द की तरह की वनस्पति होती है जिसे भुँइफोरा कहते हैं। दुर्लभ है और किसी समय उसकी तरकारी बहुत विशिष्ट मानी जाती थी। दिवंगत नाना की मानूँ तो इसका एक प्रकार भूमि खोदने वाले बनैले सूअरों का प्रिय माना जाता था। यह तब की बात है जब ये सूअर उधर मिल जाते थे। 
इसे delicacy मानने को इस लिये भी मन कर रहा है कि पूरे सुत्त में अनेक भोज प्रकरण हैं और उनमें से किसी में भी भोजनीयम खादनीयम से इस तरह किसी दूसरे व्यंजन को अलग से नहीं बताया गया है। सूअर का मांस ऐसी दुर्लभ चीज नहीं जो अलग से बताई जाय और न ही ऐसी कि जिसे देवता या मनुष्य, दोनों के देव, सामान्य लोग, कामदेव, ब्रह्म, श्रमण, ब्राह्मण और प्रजा इनमें से कोई न पचा सके। भोजन के बासी होनेअरुवाने या बिगड़ जाने का यहाँ प्रश्न ही नहीं है क्यों कि बनाने और ग्रहण करने के बीच समयांतराल ऐसा था ही नहीं। 
 बुद्ध का उसका अपने लिये विशेष चयन भी इसके विशिष्ट पक्ष की ओर इंगित करता है। भुँइफोरे के कुछ प्रकार विषैले भी होते थे। बुद्ध खाने के पश्चात समझ गये होंगे इसलिये बचे खुचे को भूमि में गड़वा दिये और यह भी कहे कि उसे पचाना उनके अतिरिक्त किसी के लिये सम्भव नहीं! 

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

... I don't hate Pakistan

'Blah blah ..... I don't hate Pakistan'.
कुछ चमका? नहीं?? 
कुछ भारतीय हिन्दू युवतियाँ तख्ती पर ये नारे लिखे फेसबुक पर प्रकाशित हैं, आप ने देखा होगा तो संभवत: संदर्भ भी पता हों। पाकिस्तान द्वारा पठानकोट टाइप की हरकतों के पश्चात अमन की आशा वालों के प्रभाव में ये ऐसी प्रगति-फीलतायें करती रहती हैं।

इनके ‘दक़ियानूसी’ माँ बाप कल्पना भी नहीं कर सकते कि उनकी प्यारी बिटिया कैसे मानसिक प्रक्षालन का शिकार हो libtard हो रही है। इस्लाम की नज़र हमेशा काफिरों के माल-ए-गनीमत अर्थात ज़र, जना और ज़मीन पर रही है। उन्हें हासिल करना अलाई हुक्म है। इस उपमहाद्वीप में पाक से बड़ा कोई इस्लामी मुलुक नहीं। मानसिक प्रक्षालन द्वारा इन 'जनाओं' को मानवतावाद के दरवज्जे दीनियों के लिए आसान चारे के रूप में ऐसे तैयार किया जा रहा है! ... न, न, न रिएक्ट मत कीजिये। ठंडा पानी पी शांत मन से विचार कीजिये।

... आज ऐसे ही सोचा कि पाकिस्तान हो आते हैं कि वहाँ क्या हाल है, मुहब्बत का सोता तो देखना चाहिए कि नहीं? विश्वविद्यालयों के चक्कर लगाने लगा तो पता चला कि वहाँ के सभी प्रमुख विश्वविद्यालय 1970 से 2000 में समाप्त दशक के बीच स्थापित हुये। उस मुल्क की जहालत का एक बड़ा कारण यह भी है। केवल सिंध विश्वविद्यालय जो कि पाकिस्तान के सबसे पुराने विश्वविद्यालय होने का सही दावा करता है, 1947 में वजूद में आया।
तमाम में भाषा के नाम पर उर्दू, अङ्ग्रेज़ी और अरबी के ही विभाग हैं, लाहौल बिला कुव्वत! मैं संस्कृत ढूंढने चला था, वहां तो सिन्धी, पश्तो, बलूची, वगैरह भी नदारद हैं। लाहौर विश्वविद्यालय में पंजाबी का विभाग तक नहीं!
I don't hate Pakistan, I love them for implementing their native progressive Islamic त्रिभाषा formula in such a brilliant way! We Indians failed on this front.
सिंध विश्वविद्यालय में सिन्धी संस्कृति के अध्ययन के लिए एक अलग विभाग है इसलिए सिन्धी और फारसी का नाम देख आस बंधी कि पाकिस्तान को प्यार करने के लिए इससे अच्छी जगह नहीं। प्यारी खवातीन के लिए एक अलग journal section है – The Women. मुझे तुरंत अंतिम किताब का चैप्टर याद आया – The Cow!
चूंकि हमारे यहाँ की कुछ ख़वातीन अर्थात प्रगति-फील युवतियाँ पाकिस्तान को un-hate करने के मामले में बुद्ध को भी पीछे छोड़ने को व्याकुल हैं तो सोचा कि वहाँ प्रचलित कारो-कारी प्रथा के बारे में तपास कर लें। कारो-कारी बोले तो Honour Killing (न, न ... पश्चिमी भारत की तुलना में बहुत वृहद है, कन्या भ्रूण हत्या का कीड़ा कुडमुड़ा रहा हो तो समझिए कि पाकिस्तान के पास उसका प्रगतिशील तरीका उपलब्ध है, बड़ा कर के मारो!) बहुत विधि सम्मत तरीके से स्त्री को पहले ‘कारी’ घोषित किया जाता है। जना इज्ज़त होती है इसलिए घर वालों द्वारा ही बलात्कार कर उसे मार दिया जाता है।
  कारण कुछ भी हो सकते हैं – बचपन में अपने चचेरे भैया से तय शादी से इनकार हो, प्रेम हो, जायदाद हो या खाबिंद की मुखालफत हो; एक बार ‘कारी’ सिद्ध कर दी गई तो उसे निजाम-ए-मुस्तफा अल्ला सल्ला कोई बचा नहीं सकता। चूंकि वहाँ की सालन में नमक भी इस्लाम से प्रमाणित किए बिना नहीं डाला जाता इसलिए सोचा कि इस मामले में कैसे ...?
उत्तर मिला ख़वातीन द्वारा प्रकाशित एक अङ्ग्रेज़ी लेख में – अपना घर देखना नहीं दूसरे का पिछवाड़ा जरूर घूमना की तर्ज पर हिंदुओं में व्याप्त सती प्रथा का जिक्र कर लेख को इस्लामियत की पाक गजवा-ए-हिन्द ख़्वाहिश की तरी में डुबो दिया गया है।
लेख है -
THE ORIGIN OF HONOUR KILLING (KARO-KARI) IN SINDH PAKISTAN: A DISCUSSION ON ISLAMIC CONTEXT लेखिकायें - Hasina Jamali, Dr. Nasreen Aslam Shah
अर्थात इस पर विचार के लिए भी इस्लाम का संदर्भ आवश्यक है। बहुत प्रगतिशील है पाकिस्तान! I don’t hate Pakistan!
200 case studies पर आधारित लेख में लिखती हैं:
(1) धूर्तता नंबर 1:
कारो-कारी के लिए इस्लाम जिम्मेदार नहीं, कबाइली रवायतें हैं। सबसे बड़ा जोक - Islam forbids killing of mankind. यहां तक तो ठीक लेकिन किस तर्क से यह प्रथा सती प्रथा से जुड़ती है, अल्ला जानें!
The study has highlighted the main and important reasons and factors of honour killings in Sindh. Honour killing is not only limited to karo-kari, it has many other forms. Islam forbids killing of mankind. Therefore, karo kari contradicts with the teaching of Islam. The roots of honour killings can be traced in time and space. Hindu society used practice a custom, named sati. According to this custom when husband died, a woman used to burn herself with her husband.
(2) धूर्तता नम्बर 2:
इस्लाम इसके लिए जिम्मेदार नहीं! psychology of society है और यह सोसाइटी इस्लामी है, नहीं? I really love Pakistani progressive women!
… As a common rule a women is usually not allowed to go outside of her home without the male family member. Generally the concept of shame is used as an instrument to control over the women. Women stand for shame and men for prestige. It is well accepted norm and very much exists in the psychology of society.
(3) धूर्तता नंबर 3:
तमाम कारणों मे से एक - Lack of Religious Knowledge:
Original sprit of the religion has been lost because in most of the mosques and especially in village mosques, Imams are unqualified and untrained in religious as well as in secular education. These imams should be qualified and trained from Islamic universities so that they should deliver such sermons, which may clear the concept of honour killing in Islam.
हा, हा, हा ... Amusing! I love Pakistan. पाकिस्तान जिंदाबाद।
(4) धूर्तता नंबर 4:
सती प्रथा को दुहराते हुये यह भी बताती हैं कि यह बीमारी 17 वीं सदी में सिंधियों के अंदर उन अरबों द्वारा लायी गई जो सीमावर्ती बलूचिस्तान में आ कर बस गए थे। मरहब्बा! इसे कहते हैं एक तीर से कई शिकार। आज ही अन्यत्र किसी को सतर्क किया – सलाद चटनी के साथ कोरमा ऐसे ही आहिस्ते से परोस दिया जाता है!
मेरे मुलुक की प्रगतिफ़ील बालाओं! इनके सामने तुम लोग एक क्षण भी न ठहर सकोगी। सैकड़ो वर्षों तक इस्लाम इन्हें सभ्य नहीं बना सका फिर भी इसके उन्मूलन को Islamic Context आवश्यक है! ये जो भारतीय मौलवी और तबलीगी वगैरह लिख कर अभियान चला रहे हैं न कि ISIS वाले ‘सच्चे इस्लामी’ नहीं हैं, वे धोखाधड़ी की तकिया से यूं जुड़ते हैं!

The historians say that the custom reached in the sub-continent in the 17th century. It was a time when Arab descendants came to settle in Baluchistan. The Sindhi culture has adopted honour killings from tribal Balochi culture. The Mazaris, Bughties, Jakhrasi, Khosas, Maries and Jatoi tribes who are said to have adopted this custom and practice it, are living very close to this tribal Baluch belt (Hussain, 2006: 226; Khan, 1999)… The practice of this custom is continued from very long time. In the backward Hindu society there used to be a custom, named “sati.”
Backward Hindu society की बालाओं! प्रगतिफ़ील बुरके में लिपट कर तख्ती उठाओ तो – I don’t hate Pakistan! इस प्रथा के विरुद्ध 2004 तक कोई कानून भी नहीं था।
अंतिम जोक:Muhammad PBUH very clearly declared the equal rights of women and forbids killing of humankind. The prophet PBU had a lot of respect for women. Women enjoyed equal rights as men in times of the Prophet Muhammad PBUH… They were allowed to meet the Prophet PBUH whenever they wanted.

इसको समझ लो हिन्दू खवातीन! इतनी अङ्ग्रेज़ी तो आती है न? इसी लेख से लिया है जिसे दो खवातीन ने लिखा है:
Holly Quran in Sura 4:34 says: If you fear high-handedness from your wives, remind them, then ignore them when you go to bed, then hit them. If they obey you, you have no right to act against them. Allah is most high and great.और यह भी कि कत्ल कब जायज है, गो कि Honour Killing अपने आप में गलत नहीं, इसलिए गलत है कि अन्तिम दूत ने उसका जिक्र जायज कत्ल के समूह में नहीं किया:
Messenger of Allah Hazrat Mohammad (P.B.U.H) said: The blood of a Muslim may not be legally spilt other than in one of three’ instances’ (1) the married person who commits adultery: (2) A life for a life; and, (3) one who forsakes his religion and abandons the community (Imam,1993). Karo-kari (honour killings) does not fall into anyone of the above mentioned categories and has no justification at all for such killings in Islam.

तो मेरे भले देश की भोली प्रगतिफ़ील हिन्दू युवतियों!
पाकिस्तान माने इस्लामी निज़ाम होता है, और I don’t hate Pakistan वह पगडंडी है जो तुम्हें माल-ए-गनीमत बना कर बुरकापरस्ती के उस हाइवे से जोड़ती है जिसके किनारे बलात्कारियों की मांदें हैं। कुछ अक्ल लगाओ, पढ़ो लिखो ताकि सूअरों की लफ़्फ़ाजियों को समझ सको।
तुम्हारे पास पाकिस्तान को तब तक Hate करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं जब तक उसका खात्मा नहीं हो जाता।

रविवार, 13 दिसंबर 2015

केतु पेषियत


तुलसीदास राम के लिये प्रयोग करते हैं - रघुकुलकेतु। केतु शब्द का अर्थ उच्चस्थ या ध्वजा से है अर्थात रघुकुल का झंडा बुलन्द!तमिळ ज्योतिष परम्परा में केतु को इन्द्र का रूप माना गया है। इन्द्र शुभ कर्म और श्रेष्ठ बुद्धि का समन्वय है। हारा हुआ इन्द्र सूक्ष्म रूप ले केतु हो जाता है अर्थात सितार-ए-गर्दिश श्रेष्ठ।
ऋग्वेद के प्रथम मंडल के छठे सूक्त में प्रथम से तीसरी ऋचा के देवता हैं इन्द्र। इस सूक्त की एक विशेषता है कि यहाँ इन्द्र सूर्य रूप हैं। पहली ऋचा के रोचंते रोचना दिवि - समस्त दिशाओं को प्रकाशित करने वाले से अर्थ स्पष्ट हो जाता है। तीसरी ऋचा में प्रेरणा है कि भीतर ऐसे इन्द्र को विकसित करो जो सूर्यसमान अपेशसे (आकार और सौन्दर्य से हीन) को पेशो (सुन्दर आकारयुक्त) प्रकाशित कर देता है। आकार वह भी जो कि सुन्दर हो। पेश शब्द इसी कारण आगे चल कर आभूषण अर्थ में प्रयुक्त होने लगता है। जब ऐसा होगा तो अकेतवे (शुभ कर्म और श्रेष्ठ बुद्धि से हीन) केतु (श्रेष्ठता) को प्राप्त होगा। ऐसा कैसे होगा? उष: अर्थात सुसंग से (सूर्य की चमक उषा की संगति का लाभ है।) यहाँ काव्य में उषा सूर्य का प्रभाव नहीं, वह संक्रमण काल है जब मनुष्य साधना में होता है। बड़ी बात यह कि सम्बोधन में मनुष्य मात्र के लिये मर्या शब्द प्रयुक्त हुआ है। जैसे अमृतपुत्रा: वैसे ही मर्य्या:।

शुभकर्म से हटने पर उसकी दैहिक परिणति भक्त कवियों का प्रिय विषय रही है। तुलसीदास भी बलतोड़ के फोड़े को राम से विमुखता का परिणाम मानते हैं। कैसा परिणाम है? रोम रोम देह का अलंकार बन निकल रहा है - ताते तनु पेषियत घोर बरतोर मिस! ऋग्वैदिक पेश का श कोसली मूर्धन्य हो ष हो गया है।
असन-बसन -हीन बिषम-बिषाद-लीन
देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को।
तुलसी अनाथ सा सनाथ रधुनाथ कियो,
दियो फल सीलसिंधु आपने सुभायको॥
नीच यहि बीच पति पाइ भरूहाइबो,

बिहाइ प्रभु-भजन बचन मन कायको।
तातें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस,
फूटि-फूटि निकसत लोन रामरायको॥
- हनुमान बाहूक

कहीं 'पेशवा' का सम्बन्ध भी तो 'पेश' से नहीं?

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

मुर्दे को कलमा नहीं

ननकाना से करीब दस मील दूर के उस गाँव में बस एक हिन्दू दीवानराय का परिवार बचा रहा। कारण था तुग्गन खाँ। तुग्गन की दीवानराय से छनती थी। तुग्गन ने न हाँ बोला, न ना लेकिन उसकी दहशत ही कुछ ऐसी थी कि दीवानराय बच गया। वक़्त गुजरता गया, करीब नौ साल बाद एक दिन अच्छे भले तुग्गन का अपने घर में ही इंतकाल हो गया। किसी ने सबसे अधिक मातम मनाया तो दीवानराय ने, और तो और उसकी मौत पर सवाल खड़ा कर खुद पर भी सवालिया निशान लगा लिया उसने। गाँव वालों ने एक बात नोटिस की - उस दिन के बाद दीवान के घर की खवातीन ने घर से बाहर निकलना छोड़ दिया। पैंसठ की लड़ाई के दौरान ही दीवानराय चल बसा। अर्थी तैयार करते उसके बेटे केशव को बड़े बुजुर्ग सलामत ने रोक दिया - आग में जलाना कुफ्र है। केशव के ऊपर बिजली गिरी - लेकिन हम तो ... उसकी बात को अधूरा ही रोक सलामत मियाँ गरजे - बहुत हो गया, अब बस्स! केशव ने बाकी गाँव वालों की ओर देखा और खामोशी के पीछे झाँकती नफरत को भाँप गया। उसने हाथ जोड़े, बूढ़े जवानों के पाँव पड़ा लेकिन बात नहीं सुलझी।

दिन ढल गया तो गाँव वाले अपने अपने घर चले गये। बाप की देह के पास सारी रात केशव खामोश बैठा रहा। सुबह सलामती का सन्देश पहुँचा - दीन कुबूल कर लो तो दफना सकते हो। केशव ने न हाँ कहा और न ना। तिजहर को चुपचाप कलमा पढ़ने पहुँच गया। शुकराना सलामी वगैरह के बाद नये मियाँ कसाब ने बाप का जनाजा उठाने की बात कही तो सलामत मियाँ फौरन तैयार हो गये लेकिन तौफीक ने एक पेंच पेश कर दिया - दीवान तो काफिर ही मरा, उसको अपने कब्रिस्तान में कैसे दफना सकते हैं, हिन्दू कब्रिस्तान तो है नहीं? सलामत मियाँ चुप हो गये। गाँव तो जैसे पहले चुप था, अब भी बना रहा। कसाब ने पूछा - मुर्दे को कलमा नहीं पढ़ा सकते क्या? जवाब का इंतजार किया और चुप्पी को और गहरा बनाते घर की ओर लौट पड़ा।

उस रात तब जब कि सब मीठी नींद में सो रहे थे, कसाब मियाँ ने अपने पहले और आखिरी कुफ्र को अंजाम दिया। उनींदा गाँव जागा और इकठ्ठा हुआ - घर धू धू कर जल रहा था, न तो लाश का पता था, न कसाब का और न घर की खवातीन का। माहौल में बस उसी सवाल की चट चट थी - मुर्दे को कलमा नहीं पढ़ा सकते क्या?

अगर आप हाल फिलहाल पाकिस्तान जाने वाले हों तो मुझसे उस गाँव का पता लेते जाइयेगा। वहाँ जहाँ मस्जिद दिखेगी न, वहीं केशव का घर था। दीनी कसाब को तो न घर मयस्सर हुआ और न कब्रिस्तान ही।