शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

कुत्तों के चरवाहे


जिस तरह से गोरू और बकरियों के चरवाहे होते हैं वैसे ही कुत्तों के भी होते हैं। जिस तरह से समाज के हर वर्ग में श्रेणीबद्धता पाई जाती है वैसे ही चरवाहों में भी होती है। सबसे निचले स्तर पर बकरियों के चरवाहे होते हैं और गाय, भैंस से होते हुए कुत्तों तक आते आते श्रेणी इतनी उच्च हो जाती है कि चरवाही के मायने ही बदल जाते हैं। चूँकि कुत्तों में दूसरे पशुओं की तुलना में इंसानियत अधिक पाई जाती है, उनकी चरवाही वी आई पी श्रेणी में आती है। कुत्तों का चरवाहा स्वयं को आम इंसानों से उच्च समझने लगता है भले वह नौकर ही क्यों न हो!

असल में कुत्ते इस दौरान चरते नहीं, उसके उलट काम करते हैं। वे उत्सर्जन करते हैं। यह शब्द हगने मूतने के लिये अकादमिक अर्थों में प्रयुक्त होता है और इस कारण पशुता या इंसानियत के गड़बड़झाले से मुक्त है।
बहुत से कुत्तों के स्वामी अपने कुत्तों के लिये पशुचित सम्बोधन उचित नहीं मानते। वे उन्हें पशु नहीं मानते। ऐसे जन असल में कुत्ते के स्वामी नहीं होते, कुत्ता उनका स्वामी होता है जो कि उन्हें टहलाने ले जाता है। ऐसे लोगों को कुत्तों के लिये चराने और चरवाही जैसे शब्द प्रयोग भी आपत्तिजनक लगेंगे। वे टहलाना कहना अधिक उपयुक्त मानेंगे हालाँकि इस शब्द से पशु और मनुष्य के बीच का अंतर झीना होता है।

गोरू को एकाध दिन न चराओ तो चल जाता है। उनका विरोध बस पगहा तोड़ने और रँभाने तक सीमित रहता है लेकिन कुत्ता? न टहलाओ तो वह आप को घर से बाहर निकाल देगा। सही भी है घर का स्वामी वही है, आप तो चरवाहे हैं। कुत्ते हमेशा दूसरों की गली में चराये जाते हैं। कोई चरवाहा अपने बेल्टदार कुत्ते के साथ आसमान सूँघता और उसका साथी जमीन सूँघता दिखे तो समझ जाइये कि वे दोनों उस गली में नहीं रहते, पीछे वाली या सड़क के उस पार वाली गली में रहते हैं। इसका कारण इलाकायी है। इलाकायी इस अर्थ में कि कुत्ता हमेशा अपने रहवास की तुलना में बहुत बड़े दायरे को उस उत्सर्जन द्वारा चिह्नित कर के रखना चाहता है जिसे आप मूत्र समझते हैं। यह विशुद्ध कुत्ता प्रवृत्ति है जिसकी झलक मुहल्ले के दादा लोगों में दिखती है। यह शोध का विषय है कि यह वृत्ति किधर से किधर को प्रवाहित हुई।

कुत्ते हमेशा साफ जगह पर चरना पसन्द करते हैं। उस जगह की गन्ध भी उत्सर्जन के लिये उपयुक्त होनी चाहिये और ‘चारू’ टाइप के कुत्तों को मानव मल से सख्त घृणा होती है। वे भले उसे कभी कभी सही अर्थ में ‘चर’ लेते हों लेकिन जब निपटने की बात आती है तो उन्हें उसकी गन्ध विरक्त करती है। चरने के दौरान वे अपने चरवाहों का सामान्य ज्ञान भी बढ़ाते चलते हैं। चरवाहा धीरे धीरे ज्ञानी और चुप्पा होता जाता है। मौन ज्ञानी का लक्षण है। आप ने ध्यान दिया होगा कि चरते हुये कुत्ते कभी नहीं भोंकते और चरवाहे बात करना पसन्द नहीं करते। उस समय वे ज्ञानाश्रयी भाव भूमि में होते हैं जो कि धर्म की ओर ले जाती है। इससे धर्मराज के कुत्ते वाली कथा का मर्म समझ में आ जाता है। यह नहीं लिखा कि युधिष्ठिर चरवाहे थे या नहीं लेकिन प्रेक्षण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे अवश्य रहे होंगे और बहुत क्लास टाइप के चरवाहे रहे होंगे। आश्चर्य होता है कि उनके समकालीन एक चरवाहे के ऊपर इतना कुछ लिखा, पढ़ा, गाया और बजाया गया लेकिन युधिष्ठिर के मामले में शून्य बटे सन्नाटा! सम्भवत: उस समय तक कुत्तों की चरवाही वी आई पी श्रेणी में नहीं आई थी। वैसे भी वह समय धर्म के विरुद्ध था। इतना विरुद्ध था कि धर्म को कुत्ता कहा जाता था और उस दिव्य चरवाहे को पैना, बंसी छोड़ चक्करबाजी में लगना पड़ा! (यह बस अनुमान है, कुत्तों या धर्म या धर्मराज का अपमान करने का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष इरादा नहीं है। यदि आप को लगता है तो आप की समझ में समस्या है)।

चराते समय जब कुत्ता उस वास्तविक क्रिया में सन्नद्ध होता है जिसके लिये उसे चराया जाता है तो उस समय एकाग्रता दर्शनीय होती है – कुत्ते की नहीं उसके चरवाहे की। जग विदित है कि निपटते समय एकाग्रता अपने चरम पर होती है लेकिन इस पक्ष पर बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया होगा कि उस दौरान चरवाहे क्या करते हैं? वे एकाग्रचित्त होते हैं। या तो कहीं दूसरी ओर दृष्टि जमाये देखते रहते हैं – दीवार का पलस्तर कितना झड़ गया है! यह पेंड़ कितना बढ़ गया है!! आदि आदि या वे पॉटी की क्रिया को ही एकाग्र चित्त हो कर देखते रहते हैं। उस दौरान दो बातें मार्के की होती हैं। पहली, उनसे कुछ पूछिये तो वे पहले तो सुनेंगे ही नहीं लेकिन यदि सुनेंगे तो उत्तर हमेशा सच देंगे। यह कुत्ते की संगत के प्रभाव का चरम होता है। पशुओं के यहाँ सच या झूठ नहीं होता, उनके यहाँ बस होता है। सच और झूठ इंसानी फितरत हैं। लिहाजा हम यथावत कहने को सच कहना कहते हैं और परिणामस्वरूप तमाम दार्शनिक विमर्शों के बावजूद भी आज तक नहीं जान पाये कि सच क्या है?

तो एक दिन कुत्ते को पॉटी कराती हुई आंटी जी से मैंने पूछा – क्या उमर होगी? पहले तो उन्हों ने अनसुना कर दिया लेकिन दुबारा पूछने पर खोये से स्वर में कहा – ग्यारह। मेरे मुँह से अ-एकाग्र स्वर में जोर से निकल पड़ा - हाँय!! स्वर की तीव्रता से वह भी अ-एकाग्र हुईं और मुझे घूरते हुये बोलीं – मैंने ‘मीठू’ की उमर बताई थी, अपनी नहीं! मेरे यह कहने पर कि मैंने तो स्पष्टीकरण नहीं माँगा था, वह कुत्ते के साथ रौद्र रूप धारण किये, पैर पटकते चली गईं और मेरा दूसरा प्रश्न अनपूछा ही रह गया – मीठू आप के पोते का नाम है क्या?  वैसे वह उस प्रश्न का उत्तर भी सच ही देतीं।

दूसरी बात यह होती है कि मानव मल और कुत्ते के मल में विभेद करना चरवाहों को बखूबी आ जाता है। आप किसी शहर, देहात, हाइवे वगैरा पर निकल जाइये, आबादी के पास पीले, ललछौंहे, कभी कभी धूसर, सलेटी, ठोस, द्रव, अर्धठोस, संकुचित, पसरे, गोलाकार, लम्बाकार, बेलनाकार, एकमंजिला, बहुमंजिला आदि आदि प्रकार की मानव उत्सर्जित वे अस्थायी संरचनायें दिखेंगी जिन्हों ने उस गन्ध का निर्माण किया और उसे प्रसिद्धि दी जिसे किसी यूरोपीय पर्यटक ने ‘Indian national smell’ यानि कि ‘भारतीय राष्ट्रीय गन्ध’ कहा था। एक दिन प्रात: गेट खोलते ही मुझे सामने सड़क पर मल दिखा और एक कुत्ते के चरवाहे भी मयकुत्ते दिखे। मैंने उनसे अपना दुखड़ा गाया  – कहाँ तो लोग सुबह सुबह किसी अच्छी शक्ल को देखना चाहते हैं कि दिन अच्छा गुजरे और मैं क्या देख रहा हूँ? अभी तो आईना भी नहीं देखा। मैंने मल की ओर इशारा कर दिया था नहीं तो वे कुछ और समझ जाते। चूँकि उस समय तक कुत्ता निपट चुका था इसलिये वे सच बोलने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी उन्हों ने मेरा ज्ञानवर्धन किया और बताया कि वह मल मनुष्य का न होकर किसी कुत्ते का था। ‘किसी कुत्ते’ में छिपे अर्धसत्य को मैं समझ गया और मन ही मन धर्मराज युधिष्ठिर का स्मरण किया कि दिन अच्छा गुजरे। उनसे पूछ बैठा कि आप को कैसे पता? इस पर उन्हों ने टेक्सचर, आकार प्रकार, मात्रा, कंसिस्टेंसी आदि गुणों के हवाले से मुझे अच्छा खासा ज्ञानात्मक लेक्चर पिला दिया और साथ ही अंत में जोड़ दिया मनुष्य का होता तो आप नाक पर हाथ धरे स्वयं सफाई कर रहे होते। कुत्ते की पॉटी में बहुत हल्की गन्ध होती है जो कि एकदम ऑबजेक्शनेबल नहीं होती। मैं गलदश्रु हो गया और बस यह समझिये कि किसी तरह से अपने भीतर साष्टांग दन्डवत करने की उठती चरमेच्छा को नियंत्रित किया।      

कुत्ते अपने चरवाहे को संशयी बनाते हैं। संशय के बिना ज्ञान नहीं होता। संशय की स्थिति में आदमी विचित्र व्यवहार करता है। पड़ोस के शर्मा जी तब तक एकदम श्योर रहे कि दूसरों की गली में कुत्ता चराना, दूसरों के द्वार उसे हगाना और बिजली पोलों पर निशान छिड़कवाना जघन्य कर्म हैं, जब तक कि उनके यहाँ कुत्ता नहीं आया लेकिन जब से उनके यहाँ कुत्ता आया है वे संशयी हो गये हैं। मिलने पर अब उस बावत कोई चर्चा नहीं करते। वे हमेशा आसमान निहारते रहते हैं, गो कि परमात्मा से पूछ रहे हों – प्रभु! धर्म के साथ संशय की संगति क्यों है? पिछले हफ्ते तो हद हो गई। उनके कुत्ते ने मेरे पैर को पोल समझने की भूल की तो उनकी तन्द्रा टूटी। उन्हों ने गूढ़ शब्दों में ज्ञान दिया – मनुष्य की संगति में कुत्तई का गुण विलुप्त होने लगता है। देखिये न इसे पोल और टाँग में अंतर ही नहीं पता चल रहा! इस संभाषण के समाप्त होते होते कुत्ते महराज मुझे चिह्नित कर चुके थे। तब से मैं चाहे पैदल निकलूँ या कार से, कुत्ते मेरे पीछे पीछे घूमने और दौड़ने लगते हैं। मैं कइयों का इलाका बन गया हूँ।

इस संकट से मुक्ति के लिये मैं जब शर्मा जी से गुहार लगाने गया तो उन्हें कुत्ते ने घर से बाहर कर दिया। रुआँसे चेहरे के साथ उन्हों ने बताया कि कुत्ते से ब्रह्मचर्य पालन की साधना को लेकर लड़ाई हो गई है। वह चरना नहीं, अड्डाबाजी करना चाहता है, टहलना चाहता है जब कि मैं उसके बाद के दृश्य की कल्पना से ही सिहर उठता हूँ।

मैं उलटे पाँव वापस आ गया। ब्रह्मचर्य व्रत काल के समापन की प्रतीक्षा में हूँ। तब तक कुत्तों से ज्ञान प्राप्त करने में कोई बुराई नहीं। अपनी इंसानियत से कुछ तो निजात मिलेगी।
                   

21 टिप्‍पणियां:

  1. यह बस एक व्यंग्य भर है। कृपया दिल पर न लें।

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  2. प्रभाते श्वान चर्चा....

    इलाकाई मानसिकता है, आदमी से सीखी है, हर जगह गन्दगी फैलाने की।

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  3. कुत्ते पर ऐसा लेख। अच्छा है और कुत्तों के स्वामियों…नहीं…नहीं…नौकरों के लिए भी।

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  4. एक बार एक कुत्ते से कटवाए जा चुके हो चरवाहे द्वारा ...फिर भी लिख मारा यह चिंतन :-)
    मगर भरोसा रखें न ये कुत्ते सुधरेंगे न उनके सेवादार !
    हार्दिक शुभकामनायें, जगाये रखने के लिए !

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  5. @ यह बस एक व्यंग्य भर है। कृपया दिल पर न लें।'
    ये जरूर आपने मेरे लिए लिखा होगा :)
    देखिये तो गलती सारी चरवाहों की होती है और कोसे जाते हैं बेचारे कुत्ते :)
    @ एक बार एक कुत्ते से कटवाए जा चुके हो चरवाहे द्वारा ...फिर भी लिख मारा यह चिंतन'
    मुझे लगता है कि जो लोग कुत्तों से प्यार नहीं करते, कुत्तों को भी उनसे कुछ खास लगाव नहीं होता और वो निवृत्ति के लिए उनकी टांगों या घर की ओर टाक लगाए बैठे रहते हैं :)

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  6. पोस्ट में से कुछ चुनिन्दा पहरे पार्क में चस्पा दिए जायेंगे...

    जहाँ सुबह सुबह कुत्ते के चरवाहे आते हैं...:)

    और साथ में ४० पॉइंट बोल्ड में ये पंक्ति भी
    "यह बस एक व्यंग्य भर है। कृपया दिल पर न लें।"

    मस्त.

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  7. :)
    वैसे - सिर्फ जानकारी - अमेरिका में ऐसा क़ानून है - कि इन "चरवाहों" को साथ एक थैली रखनी होती है , और कुत्ते जो भी कार्यक्रम करें, उसकी सफाई कर के dustbin आदि में फेंकना होता है | cctv से यदि पकडे गए कोई "चरवाहे" कि गन्दगी कही छोड़ी गयी है - तो अच्छा भला fine होता है | मेरे ' ये ' गए थे (अपने भाई के घर)|एक महीने रहे तो घूमने जाते थे - तब ये देखा |

    तो ऐसे ही नहीं साफ़ सुथरा रहता है कोई देश | आपकी वो पोस्ट भी याद आ रही है - जिसमे किसी ऑस्ट्रेलियन ने हमारे देश को सफाई के सिलसिले में कुछ कहा था |

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  8. निश्चय ही एक बेहतरीन कुत्ता चिंतन .....मगर इन दिनों यहाँ बहुत कुत्ता कुत्ता कुत्ती कुत्ती हो उठा है ..लगता है कुत्ता आपका वैसा ही प्राणी आब्सेसन है जैसा हुसैन का घोडा था ...यह जब देखो तब आपके चिंतन से झांकता रहता है ..
    यह पूरी दुनिया ही दो टाईप लोगों में विभाजित है -कुत्ता प्रेमी और कुत्ता द्वेषी -एक ठो काम करिए इन दिनों नेशनल जियोग्राफी पर ९-१० बजे रात डाग व्हिस्परर नामक एक बेहतरीन कार्यक्रम आ रहा है जिसमें विशेषज्ञ रोजर मिलन कुत्तों ही नहीं कुत्ता द्वेषियों /प्रेमियों /आतंकितों के व्यवहार को सकारात्मक बना रहे हैं -आप विज्ञानं प्रेमी हैं -इसलिए आपको प्रबल सिफारिश कर रहा हूँ ....अवश्य देखिये ,देखन योगू!
    मैं समझता हूँ मानव जीवन की परिपूर्णता तब तक नहीं है जबतक एक कुत्ते /कुत्ती का सानिध्य न हो .....आप युधिष्ठिर से ही सीख ले सकते हैं या फिर मुझसे या आराधना से भी ..जिन्होंने अपना जीवन एक कुत्ता /कुत्ती सानिध्य से धन्य किया है .....

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  9. गंदी लगी पोस्ट।
    दिल जाये भाड़ में, मगज खराब हो गया।

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  10. यह मेरी व्यथा आपने कबसे देख रखी थी जिसे शब्द दे दिए,आर्य ?

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  11. शिल्पा जी के "ये" की बात एकदम सही है। सबूत के तौर पर आज ही हमने यह चित्र लगाया है। वैसे यह पोस्ट पढकर याद आया कि हिन्दुस्तान में मामूली हैसियत के कुत्ते भी अक्सर मुझे पसन्द नहीं करते थे। यहाँ आकर देखा तो अति-प्रभावी, खूबसूरत, विशालकाय हर प्रकार का कुत्ता मित्रवत है।

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  12. @स्मार्ट इन्डियन,
    वहां कुत्तों को मित्रवत रहने की ट्रेनिंग जो दी जाती है ....वहां कटखने कुत्ते का मुहावरा भी नहीं होगा !

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  13. व्यंग्य भी है और दिल पर भी न लें ...
    बड़ी नाइंसाफी है!

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  14. अक्सर करीबी मित्रों में पंजाबीपने वाले अंदाज में हंसी ठिठोली के बीच खुश होकर कहा जाता हैं - यार तू बडी 'कुत्ती चीज' है :)

    उसी अंदाज में कहा जा सकता है कि - बड़ी 'कुत्ती पोस्ट' है :)

    मस्त राप्चिक!

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  15. @ अरविन्द मिश्रा “... यह पूरी दुनिया ही दो टाईप लोगों में विभाजित है -कुत्ता प्रेमी और कुत्ता द्वेषी... -

    मैं तो इन दोनो श्रेणियों में से किसी में नहीं आ सकता। मैं जब किसी कुत्ता प्रेमी को देखता हूँ तो आश्चर्य होता है कि वे कैसे इतना नाज उठा पाते हैं। मैं तो बड़ा अक्षम हूँ। एक डॉक्टर साहब का मुँह उनके कुत्ते द्वारा चाटा जाता देखकर मुझे उबकाई आते-आते रह गयी। वह रोज उनका घर आने पर ऐसे ही स्वागत करता है। वे भी वैसे ही जवाबी कार्यवाही करते हैं। उफ़्फ़्‌..। वहीं कुत्ता द्वेषियों को भी एक भला आदमी मानने में मुझे हिचक होती है। एक जीव के प्रति विद्वेष की भावना क्यों पालना? यदि पसन्द नहीं है तो न सही, लेकिन जो पसन्द करते हैं उनकी पसन्द का सम्मान तो किया ही जा सकता है।

    एक तीसरी श्रेणी भी बनायी जाय - ‘श्वान असंपृक्त’

    वैसे आलेख जोरदार है।

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  16. @ सतीश पंचम:
    जुलम भयो रामा - मेरी एक भावी पोस्ट का चीरहरण कर दिया:)

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  17. वैसे घरेलु कुत्ते से बड़ा 'डिप्लोमेटिक' कोई नहीं,
    अनजान लोगों को दरवाजे पर देखकर भोंकना और पूंछ हिलाना साथ-साथ होता है -आचार्य रजनीश। बढ़िया पोस्ट

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