मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

दामिनी और दमन के बीच...

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वे सारे मूल्य जिन पर पश्चिम को श्रेष्ठता का गर्व था, आज ध्वस्त हो गये हैं...इस सरकार ने शासन का नैतिक अधिकार खो दिया है। भारत स्वतंत्र है...


वेब मिलर, एक अमेरिकी रिपोर्टर

[1930 में शांतिपूर्ण नमक सत्याग्रहियों पर बज रही लाठियों पर रिपोर्टिंग करते हुये] 

 

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एक अकेले वेब मिलर के चन्द वाक्यों ने समूचे संसार में व्रिटिश सत्ता को कटघरे में खड़ा कर दिया। 82 वर्षों के बाद ब्रिटिश राज के बनाये राजपथ पर वही हुआ, उससे कई गुनी बर्बरता के साथ हुआ, बार बार हुआ और मीडिया के तमाम शोरगुल में कहीं भी वेब मिलर सा ईमानदार तेज नहीं दिखा।

यह समय सम्वेदनाओं के कुन्द होते जाने का समय है, त्वरा का है जहाँ घटनायें चलचित्र सी आती हैं और बस यूँ ही चली जाती हैं। हमारे पास मीमांसा के लिये समय नहीं है लेकिन व्यर्थ के अपलापों के लिये पर्याप्त समय है।

क्रीतदास बौद्धिक वर्ग अपने अपने एजेंडों के बुलबुलों में बन्दी है। हर वाक्य निवेश पर भविष्य में होने वाली आय की गणना सा नपा तुला होता है।

अर्थहीनता में वे ब्लॉग जगत की चालू और अबूझ टिप्पणियों को भी मात करते हैं!

शब्दों से अधिक मौन मुखर हैं। चुप्पियाँ पढ़ी जा सकती हैं और शोर भी! बलात्कार के भी प्रकार हो गये हैं। बहुत से प्रश्न उठाये गये:

  • गुजरात, छत्तीसगढ़, मणिपुर, कश्मीर ... के बलात्कारों पर आन्दोलन क्यों नहीं?
  • दलित पर बलात्कार पर आन्दोलन क्यों नहीं?
  • इसी समय क्यों?
  • क्या आन्दोलनकारी स्वयं यौन अपराधों में लिप्त नहीं?
  •  

 

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गर्म रजाइयों में सिकुड़े टी वी देखते, गाँव में अलाव तापते, ब्लोवर से गर्म किये कमरे में किसी आओ फाओ पावलो की पुस्तक बाँच निर्वाण प्राप्त करते, किसी फर्जी मुद्दे पर मानवाधिकार का पर्चा पढ़ते ... हर किस्म के फर्जी वैचारिक फौजदारों ने स्वत: स्फूर्त नेतृत्त्वविहीन और निहायत ही नैष्ठिक ईमानदार आन्दोलन को कटघरे में खड़ा किया और वमन किये, किये जा रहे हैं।

वे भूल रहे हैं कि दिल्ली न तो कोलकाता की तरह आमार भालो बांगला है, न तो चेन्नई की तरह मद्रासी और न मुम्बई की तरह जय महाराष्ट्र! शरणार्थियों की दिल्ली इस देश का प्रतीक है। दिल्ली का अपना कोई नहीं और दिल्ली सबकी है।

वे भूल रहे हैं कि पीड़िता सुदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश की है। वे भूल रहे हैं कि लड़की उन सपनों के देश से है जिसमें सपनों की कीमत खेती की जमीन बेंच कर चुकाई जाती है।

वे भूल रहे हैं कि आन्दोलन में चेहरों का बहुलांश उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मणिपुर से भी था। वह आन्दोलन समूचे भारत का था, पूरे देश के युवाओं के उन सपनों का था जिनमें वे अपना भविष्य देखते हैं और जिसे सत्ता के प्रहरियों ने अपने बूटों तले रौंद दिया। 

विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं ने बहुत 'सेफ' खेला। कोई समर्थन में आगे आया तो उसे अवसरवादी का खिताब दे दिया। अरुन्धतियों, थापरों, लाल बुझक्कड़ियों, सनातनियों, तबलीगियों, संघियों और बहुजनियों को किसने रोका था इस आन्दोलन में सम्मिलित होने से? ठंड ने, पानी की तोपों ने या बर्बर बेतों के भय ने या निहित स्वार्थों ने? यह शोध का विषय है।
यदि रामदेव ने आने की घोषणा की और आया भी तो इन सबको भी अलग अलग ही सही, एक समय ही अपने समर्थकों को ले दिल्ली पहुँचना था। सोचिये कि क्या स्थिति होती!

रायसीना का महामुनीम हो या जनपथ सनपथ की महारानी - या तो बिलों से बाहर आते या दिल्ली इतिहास में एक बार पुन: दर्ज हो जाती जबकि सारे मतभेद भुला कर देश ने अपनी नई पौध, अपने युवाओं का साथ दिया, उनके साथ लाठियाँ और गोले खाये और जन संसद ने तमाम लालफीताशाहों और वायसरायी जमात की संसद को धता बताते हुये निर्णय लिया दिया। तब ये बकवासें और 'हमारी भी बेटियाँ हैं' के छ्ल सम्वाद नहीं चल रहे होते।  

चूक गये बौद्धिक और अब झेंप मिटाने को अहिंसक गालियाँ बक रहे हैं।     

'दामिनी' का न्याय उस बलात्कार पीड़ित दलित कन्या का भी न्याय होगा जिसे रक्षक पुलिस वाले भी नहीं छोड़ते, उस वनवासिनी का भी न्याय होगा जिसके यौनांगों में ... और उन मणिपुरी स्त्रियों का भी जिन्हों ने विवस्त्र हो प्रदर्शन किये।

अत्याचार का घड़ा जब भर जाता है तब उफान आता है और उस समय उफान के रंग, नैन नक्श नहीं देखे जाते, उसका लाभ लिया जाता है लेकिन जीते जी नोच खाने वाले महाभोजी तो बस तमाशाई हैं, घड़ा फोड़ने की कोशिश पर स्वयं जल जाने का जो भय है!

एक और अलग तरह का तबका है जो चरित्र और नैतिकता प्रमाण पत्रों के संकलन का शौकीन है। उनके लिये मैं अपना यह फेसबुक स्टेटस पर्याप्त समझता हूँ:

क्षमा कीजिये मैं आप से सहमत नहीं:
- जब युवा अत्याचार और अपराध के विरुद्ध खड़ा होता है और आप उससे नैतिकता प्रमाण पत्र माँगते हैं।
- जब भयानक ठंड में पानी की धार और लाठियाँ खाने को आप रोमांच की चाह पूर्ति मानते हैं।
- जब आप यह कहते हैं कि सब को यानि 100% आन्दोलनकारियों को अहिंसक होना चाहिये। ऐसा संत होना चाहिये जिसकी स्थिति प्राप्त कर आप अपने ड्राइंग रूम में बैठे टी वी देख रहे हैं।
- जब आप षड़यंत्रों को जानते हुये भी आँखें मूँदे यह प्रलाप करते हैं कि बलात्कारी वहशियों और आन्दोलनकारियों में कोई अंतर नहीं।
- जब आप उनमें दिशाहीनता और अभिव्यक्ति की कमी पाते हैं लेकिन उसे दिशा या स्वर देने के स्थान पर मखौल उड़ाते सभ्य गालियाँ बकते हैं।
- ....
ऐसी असहमति की स्थिति में मैं हर उस गुंडे के साथ सहानुभूति प्रकट करता हूँ जो आप के बौद्धिक पिछवाड़े जब तब लात लगा आप की निकल आयी बत्तीसी को सराहता अपना स्वार्थ साध चल देता है। यकीन मानिये कि उसमें और आप में कोई अंतर नहीं। मौका मिलने पर आप भी वही करते हैं।
इसलिये मेरी सहानुभूति आप के भी साथ है।

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भावुक प्रकृति के पुरुष कैसे पीछे रह सकते हैं? उन्हें अपने पुरुष होने पर या अपने पौरुष पर ही शर्म आने लगी है। यह बहुत ही घातक प्रवृत्ति है क्यों कि यह पलायन की राह मुकम्मल करती है। सुविधाजीविता के तर्कों को सुतर्क बनाती है। उनसे मैं यही कहूँगा कि यूँ पुरुषत्त्व पर लज्जित होने का विलाप बन्द कीजिये। याद रखिये कि यदि इस समाज को पितृसत्तात्मक कहा जाता है, पुरुषवादी कहा जाता है तो इसका एक पक्ष यह भी है कि जैसा भी है इसमें आप का ही अधिक चलता है। यह जो कूड़ा कचरा है न, उसमें भी आप का ही योगदान अधिक है।
ऐसे लज्जित हो पलायन वाली गली मत पकड़िये। डटिये, खड़े होइये, अपनी मेधा और शारीरिक शक्ति का उपयोग कर कूड़ा साफ करने की राह प्रशस्त कीजिये।
जब आप लज्जित होने की बात करते हैं तो उन हजारो पुरुषों का अपमान कर रहे होते हैं जिन्हों ने दिसम्बर में ही 'थम कदम ताल' के दमन तले स्वयं को कुचले जाने देकर जनवरी की राजपथ परेडों का रंग भी आगे आने वाले समय के लिये फीका कर दिया।
आप उन स्त्रियों का भी अपमान कर रहे होते हैं जो पुरुषों पर भरोसा कर उनसे कन्धे से कन्धा मिला कर लड़ीं और लड़ रही हैं। उनका सम्मान बढ़े, ऐसा कोई काम कीजिये। बन्द कीजिये यह बकरूदन!

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जो भी राजपथ पर घटित हुआ, वह बहुत बुरा हुआ और उसके दूरगामी परिणाम होंगे। मध्यवर्ग को कोसने वालों! यह वर्ग इस देश की रीढ़ है। परिवर्तन की कोई भी बयार यहीं से आती है और यह 'सुविधाभोगी' वर्ग ही इस राष्ट्र को थामे हुये है, इसे गालियाँ देना बन्द कर आप इसके सद्प्रयासों को सहारा दीजिये। यदि यह वर्ग टूटा तो न तो विश्वविद्यालय की अकादमिक दुकान चलने वाली है और न शेयर मार्केट की दलाली।

नैराश्य के समूह सम्मोहन से निकलिये, जो भी कर सकते हैं, कीजिये। सत्ता के केन्द्र से निकलती सर्वनाशी पानी की तोप और रासायनिक युद्ध के हथियार 'एक्सपायर्ड आँसू के गोले' का अगला शिकार आप भी हो सकते हैं। निज स्वार्थ के लिये ही सही, कुछ कीजिये। प्लीज!

जिसे ड्यूड, र् यूड, यो, या, मोबाइल, गजेट, जिंसिया पीढ़ी बता आप होपलेस करार देते रहे हैं, उसने अपना प्रदर्शन कर दिया, अब आप की बारी है। शांति के इस समय को व्यर्थ न जाने दीजिये। लोहा गर्म है, चोट कीजिये!

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 अमेरिकी मार्टिन लूथर का यह भाषण आज भारत के लिये उपयोगी है, उठिये! उत्तिष्ठ भारत!
We cannot walk alone.
And as we walk, we must make the pledge that we shall march ahead. We cannot turn back.,,, No, no, we are not satisfied, and we will not be satisfied until justice rolls down like waters and righteousness like a mighty stream.... Let us not wallow in the valley of despair.
I say to you today, my friends, that in spite of the difficulties and frustrations of the moment,
I still have a dream...
I have a dream that one day this nation will rise up and live out the true meaning of its creed... I have a dream that one day ... the heat of injustice and oppression, will be transformed into an oasis of freedom and justice.
I have a dream today.
I have a dream that one day every valley shall be exalted, every hill and mountain shall be made low, the rough places will be made plain, and the crooked places will be made straight... This is our hope... With this faith we will be able to hew out of the mountain of despair a stone of hope. With this faith we will be able to transform the jangling discords of our nation into a beautiful symphony of brotherhood. With this faith we will be able to work together, to pray together, to struggle together, to go to jail together, to stand up for freedom together…

8 टिप्‍पणियां:

  1. जब जनता प्रशासन को आँख दिखा कर सामने खड़ी रहे और हिलने से मना कर दे तो समझना चाहिये कि अधिकार क्षीण होकर ढहने वाले हैं। गोद में बैठी छोटी बच्ची और लाठी उठाये दो पुलिस वालों को घूरती युवती इस परिवर्तन के संकेतबीज हैं।

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  2. उनसे क्या कहा जाए जो ---

    * जो आन्दोलन के "उग्र" होने की दुहाई दे रहे हैं, उस दिल्ली में जिसमे इस आद्नोलन के चलते हुए भी रेप हो ही रहे हैं

    * जो इन सत्याग्रहियों को "हिंसक" लेबल कर रहे हैं

    * जो एक वीर सिपाही की "बिना घावों के हुई मृत्यु" का अपमान कर रहे हैं, और उसका फ़ायदा लेकर एक सत्याग्रह को हिंसक आन्दोलन का दर्जा दे रहे हैं (हो सकता है कि बेचारा सरल ह्रदय व्यक्ति न्याय के लिए भटकती युवा पीढ़ी पर अपनी ही फ़ोर्स द्वारा किये जा रहे अन्याय और क्रूरता से इतना आहत हुआ हो कि उसे हार्ट अटेक हो गया हो ? तब तो आला अधिकारी ही उसके मुजरिम हुआ न ? - हो सकता है पोस्ट मार्टम करने वाले डॉक्टर पर भी दबाव बना कर चोटों से मृत्यु की बात लिखवा ली जाय दिल के दौरे के बजाय ?)

    * जो दिल्ली पुलिस हो कर अच्छी तरह जानते हैं कि दिल्ली के ऑटो न तो सवारी की बतायी जगह जाते हैं , न ही सेफ हैं, फिर भी "लड़की बस में क्यों गयी ऑटो में क्यों नहीं" का प्रलाप करते हैं , अवह भी एक लड़के के साथ , अकेली नहीं थी वह ।

    * जो यह भूल रहे हैं की आन्दोलन की शुरुआत होने से पहले ही घटना को 6 दिन गुज़र चुके थे और किसी सरकारी नेता की नींद नहीं खुली थी

    * जो यह जानते हैं कि ये युवा "शनिवार सुबह" से प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति से मिलने को इकट्ठे हुए थे, दिसंबर की ठण्ड में शनिवार की "पूरी रात" वे "ठन्डे पानी की तेज़ धारों" से भिगोये जाने के बाद कुहरे भरी ठिठुरती सडक पर रहे थे, और यह कथित "हिंसा" रविवार शाम की घटना है

    * जिन्होंने बलात्कार पर "आठ दिन" व्यक्तव्य नहीं दिए, और जब दिए तब "इन्क्व्वैरी कमिटियाँ" बिठाएँ (जब की अपराध स्वयं सिद्ध है) और वाही नेतागण एक पुलिसकर्मी की चोट पर उन्हें "2 घंटे" भी नहीं लगे कोंग्रेस विरोधियों पर दोष मढने में

    * जो एस डी एम् को लड़की का बयान नहीं लेने देते और उसकी शिकायत पर उस पर ही कीचड उछ्हालते हैं

    * जिनके स्पोक्स्मेन टीवी शो में दुनिया के सामने स्मृति इरानी जी को "ठुमके लगाने वाली" कह कर, उनके चरित्र पर ऊँगली उठाते हुए उन्हें "शटप" कहते हैं

    * जिनके मंत्री आंध्र में प्रेस कोंफरेंस में TV कमरा के आगे "यह छोटी सी घटना थी और बेकार बवाल मचाया गया" और "आधी रात को लड़की सड़क पर क्यों थी" जैसी बात कह सकते हैं

    * जिनके प्रधानमन्त्री / गृह मंत्री भूल जाते हैं की उनका कर्त्तव्य लिजलिजी भावुकता का नाटकीय प्रदर्शन और घडियाली आंसू बहाना नहीं , बल्कि ठोस कदम उठान है

    * जो इस दुखद स्थिति की असल जिम्मेदार "लापरवाह पुलिस" की प्रेस कोंफरेंस कर पीठ थपथपाते हैं कि ------- उन्होंने "ब्लाइंड केस" अपराधियों को "पकड़" लिया , ----------- यह भूलते हुए कि दिल्ली में पूरे रास्तो / सड़कों पर CCTV सर्विलांस है, और एक बार उन बच्चों द्वारा (साथ वाला लड़का होश में था और सब बता चूका था) बस का रंग, समय, रास्ता और उस पर लिखे शब्द बताये जाने के बाद "सिर्फ आधे घंटे" का काम है CCTV फूटेज से उसका नंबर ले कर ड्राईवर को जान पान, और उससे उसके बाकी दोस्तों का नाम पता लेना

    (क्या क्या कहूं - अनंत फेहरिस्त है)

    उनसे क्या कहा जाए जो उन पर असर कर सके ???????????????????????????????

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    1. कांस्टेबल प्रकरण ने सड़ चुके तंत्र को कई स्थानों से उघाड़ दिया है:
      (1) मृत व्यक्ति के बारे में कुछ कहना ठीक नहीं लेकिन दिखता है कि उसके फिटनेस का स्तर फील्ड ड्यूटी के लायक नहीं था।
      (2) ऐसे व्यक्ति को जो कि फिट नहीं था, ऐसी ड्यूटी पर क्यों लगाया गया? संख्या की कमी कोई तर्क नहीं, विशेषकर दिल्ली के लिये।
      (3) क्या पुलिस तंत्र के सरगना फील्ड फोर्स के फिटनेस स्तर और उसकी दक्षता के प्रति सचेत हैं? लगता है कि फोर्स को यह भी प्रशिक्षण नहीं कि ऐसे मौकों पर ऐसी भीड़ से जो कि पढ़ी लिखी और स्वत: स्फूर्त है, इस तरह नहीं पेश आया जाता।
      (4) आजकल हर अच्छा नियोक्ता, अपने कर्मचारी के लिये मुफ्त स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य किये हुये है। जैसे - चालीस से ऊपर दो वर्ष में एक बार और पचास के ऊपर हर वर्ष। कर्मचारी के स्वास्थ्य कारकों पर समुचित चिकित्सीय कार्यवाही भी की जाती है। तैनाती के समय यह ध्यान रखा जाता है कि रोगी कर्मचारी ऐसे किसी स्थान पर न रखा जाय जो उसके लिये घातक हो।
      इस दृष्टि से भी नियोक्ता की ही लापरवाही लगती है।
      (5) चूँकि उसकी मृत्यु ऐसी तैनाती के दौरान हुई जिसकी पात्रता उसमें नहीं थी, दोष उसके विभाग का अधिक है।
      दिल्ली पुलिस केन्द्र के अधीन है और बात घूम फिर कर गृह मंत्रालय तक पहुँचती है। आप समझ सकते हैं कि आरोप किन किन पर बनता है!
      आप उस त्वरा को भी समझ सकते हैं जिसके कारण इतना शीघ्र आठ लोगों पर मुकदमा कर ध्यान फेर दिया गया। बाकी काम ग्रेसहीन गोयबल्सों और पेड मीडिया ने कर दिया।
      (6) सत्ता किस तरह से अपने हित संसाधनों का उपयोग कर नागरिकों को नागरिकों के विरुद्ध ही कर देती है, यह प्रकरण प्रमाण है।
      (7) फैला हुआ भ्रम प्रचार तंत्र और मीडिया के प्रभाव एवं मस्तिष्क पर छाये कुहासे के कारण है।
      पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का तमाशा तो सामने ही है।

      हटाएं
  3. इन खबरों और चित्रों को देख कर ही दिल दहल उठा.

    बहुत अफ़सोस और दुःख हो रहा है,समय पर आ कर अगर सरकार का कोई एक प्रतिनिधि भी इन आंदोलनकारियों की खबर लेता तो स्थिति दूसरी होती.

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  4. https://www.facebook.com/mailmayanksaxena/posts/10151378410476605

    उस सुबह को भूलना मुश्किल है...और उस चेहरे को भी...वो हमारे साथ शाम से थी...राष्ट्रपति भवन पर हमारा अकेला 100 लोगों का ग्रुप बचा था...रात भर 5 डिग्री पारे के बीच हम कभी कागज़ तो कभी मोमबत्तियां जला कर बैठे थे...मेरे हर गाने पर सबसे आगे आगे वो गाती थी...हां अलबत्ता हिंदी और उर्दू उसकी ज़ुबान तो न थीं...पर वो भोजपुरी गीत पर भी झूम कर गाती थी...फिर उससे बातचीत होने लगी...वो बोली, "नॉर्थ ईस्ट के लोग भी इसी देश के लोग हैं...मैं यहां इसलिए हूं क्योंकि मैं ये बताना चाहती हूं कि हम लोग भी आपके भाई बहन हैं...दिल्ली में पूर्वोत्तर की लड़कियों के साथ जिस तरह का व्यवहार होता है...जिस नज़र से उनको देखा जाता है...उसके खिलाफ़ मैं यहां आई हूं..." मैं सुन रहा था और शर्मिंदा था...
    फिर काफी देर Ila Joshi से उसकी बात होती रही...घर के बारे में...परिवार के बारे में...और न जाने क्या क्या...वो बेहद संजीदा थी...बेहद भावुक...और बेहद समझदार...और फिर हम दोबारा गाने गाने लगे...सुबह हो रही थी और तभी सूरज उगने से ठीक पहले करीब सुबह 6 बजकर 20 मिनट पर...400 के करीब पुलिसवाले आ गए...
    उसने मेरा हाथ पकड़ लिया...मैंने इला का...इला ने एक बिहार के लड़के का...अमित मुझसे लिपट गया...और फिर इला के बाल पकड़े के उनको खींच लिया गया...मैंने उनके पैर पकड़ लिए तो मेरे हाथों पर डंडे बरसाए गए...लेकिन उसने मुझे नहीं छोड़ा...जैसे कोई मां अपने बच्चे से चिपक जाती है...Amit Srivastava भी पुलिस की गिरफ्त में था...लेकिन मैं और वो वहीं थे...पुलिस ने जब मुझ पर लाठियां चलाईं तो बिजली की तेज़ी से वो घूमी और मेरे ऊपर आ कर लेट गई...मेरी ढाल बन गई...लाठियां खाती रही...मुंह से एक शब्द नहीं निकला...मैं चीखा कि अरे बेरहमों एक महिला को पुरुष मिलकर पीट रहे हो...तब महिला कांस्टेबल आगे आई...और उसे खींच कर अलग किया...उसे भी बहुत चोटें आई थीं...लेकिन वो हमारे साथ रही...हम दिल्ली के बाहर छोड़े गए...वहां से फिर इंडिया गेट पहुंचे और फिर हमें और उसे पुलिस ने पीटा...दोपहर में उसके सिर पर चोट आई...लेकिन पट्टी करवा कर वो फिर वापस लौटी...और अगले दिन हमने देखी वो तस्वीर जिसमें पाउलिन सुभाष तोमर का सिर अपनमी गोद में रखे बैठी थी...
    पाउलिन...हमें आप पर नाज़ है...आप सी हिम्मती लड़कियां हमने नहीं देखीं, सिर्फ सुना है कि मणिपुर की बहनें बेहद बहादुर हैं...हम जानते हैं कि ये मणिपुर की बहनों की बड़ी लड़ाई का एक छोटा और अहम हिस्सा है...पाउलिन हम सब पिछले 3 दिन से आपका इंतज़ार कर रहे हैं...मैं, इला, पुष्पा, मोहित और न जाने कौन कौन...पाउलिन हम आपको सलाम करते हैं...हमने पिछले 5 दिनों में इस बड़े शहर में एक छोटा भारत तैयार किया है...हम सिर्फ और सिर्फ इसके लिए भी जान देने को तैयार हैं...
    सलाम दोस्त...सलाम पाउलिन...सलाम...

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  5. https://www.facebook.com/notes/sangeeta-das/i-witness-the-good-people-of-delhi/10151383785584595

    I WITNESS - The good people of DELHI
    by Sangeeta Das on Monday, December 24, 2012 at 1:13pm ·
    I am appalled at the lop-sided relay of events and incomplete images being telecast by some of the NEWS channels on TV, regarding the incident that happened at India Gate yesterday at around 5:30 PM.

    I was there. We were all on the other side of India Gate towards the Dhyan Chand Stadium.

    I think I need to paint the correct picture for the nation. Except for CNN IBN and NEWS X, most other channels are not showing the peaceful gathering. Thus it gives out the wrong message to the nation, to the politicians, to other women that there was violence by the women on our side.

    Please pass on this note to as many people as you can and post it at as many places.

    THERE WAS NO VIOLENCE NO PROVOCATION…THE POLICE ATTACKED WITHOUT ANY WARNING. I have been through section 144 earlier. At least there should have been one warning issued to us to get up and leave, peacefully, before they started hitting us.

    Ms.Naina Kapur, of VISHKHA GUIDELINES fame, was there with me. Ms.Smita Bharti of SAAKSHI, an NGO working on SEXUAL HARASSMENT on women, was there. Ms.Nafisa Ali was standing behind us, Mr.Arvind Kejriwal was sitting just two rows in front of me, Mr.Arvind Gaur of ASMITA THEATER GROUP was there asking all the people to sit down and listen to the talks.

    There were about 200-250 girls and equal or more number of men of all ages. There were young girls, some children, families and some elderly people along with hoards of photographers, journalists and reporters.

    WE WERE ALL SITTING ON THE ROAD PEACEFULLY and listening to the painful account, of the mother of ‘KIRAN NEGI’, a 3 yr old who has been brutally raped and disfigured and killed, by her attackers. Even the sloganeering had stopped.

    Many young and old men of Delhi were standing around us in a 3-4 layer human chain to protect us from any hooligans or nasty elements. It was like a CHAKRAVYUH.

    Members of the ASMITA THEATER GROUP, including Mr.Gaur, were constantly walking around the circle. Young boys and girls of his team were repeatedly requesting and talking to people to not resort to violence, not to panic or run or throw stones, not to damage public property, AND not to hurt or abuse the female protestors.

    There were many volunteers distributing biscuits and water to every protestor.

    We were talking to the ‘AAM JANATA’ of Delhi on how to tackle the violence on women and children starting from ourselves, our homes and communities.

    WE WERE SIMPLY TALKING.

    I had just finished my packet of biscuit when the police, hundreds of them from DELHI POLICE and RAF, charged at us from behind, WITHOUT ANY WARNING.

    They first attacked the men from behind, breaking their CHAKRAVYUH. I stood up to see what the commotion was about, and immediately fell as most girls didn’t get enough time to stand up. I hugged Smitaji as we fell on each other and there was a stampede over us.

    Some of the men from the circle ran for their lives, but most of them ran towards us and hugged us and fell on us and took the initial blows of the LATHI CHARGE.

    I couldn’t see anything; I just heard the two cracks of a SPLIT BAMBOO STICK on my back, butt and thighs. Then I heard the police screaming, HARAMZADIYON, RANDIYON, and then I saw a boot kicking my knees and shin.

    They hit Smitaji on her lower-back and spine. The boys of ASMITA, and some more men pulled us all up and all of them formed protection girdles around the girls to push us out of the range of the water cannons and charging men in KHAKI AND BLUE.
    (CONTD...)

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  6. (CONTD. FROM PREVIOUS COMMENT)
    Visibility was poor due to fog and tear gas; many girls were hit; even when we were running away and saying, “Ham jaa rahen hain, hame mat mariye”,…. they were hitting the boys rampantly, constantly spitting abuses on the girls. Many women reporters were also hit and chased, their vans attacked, equipments broken. Some girls still managed to pull a few lathis and gave it back to the men. I don’t know what happened to the children in the group and how the aunties in saris managed to run. I just hope they are all well.

    There was not a single ambulance in sight; the entire C- Hexagon of India Gate was empty, barring the police. We walked for almost 45 min, as there was no way out from the outer circle. Finally we managed to duck behind press vans and escaped via Shahjahan Road.

    Do I look like a hooligan? Was I armed? Was I provoking the police or creating a nuisance? Was I resorting to violence, by sitting there and listening to, or sharing our personal grievances of Sexual harassment and assault? You judge for yourself.


    Agreed, that in such gatherings, some nasty elements do infiltrate and create a raucous, but the police didn’t seem to have the basic sensibility to differentiate between hooligans and some young girls, children, and elderly people.

    If the Delhi Police and RAF lack the basic cognizance to recognize the good from bad, what protection can we expect from them? Instead I thank the men of Delhi, the boys of Delhi, who helped all the girls to escape from the wrath of THE POLICE.

    I request the people who were present there, to paint the correct picture, so that Mr.Manmohan Singh, Mr.Shinde and others would get the correct picture of what happened on the ground.

    I request the PM and the Home Minister to believe that “I, the woman of India,” am not violent or the ‘Shame of the nation’... that we have to be ashamed that the world is watching. I was not offensive. But I will definitely stand up again to defend myself, my mother, my daughter and my kind. Let the world watch.

    P.S. -- In this melee I forgot to thank the lanky young boy in a black kurta and glasses, who escorted us out and took several blows on his back. It was so bad, that he was bent with pain. He was there with me from the first blow on me...all the while he was screaming, "Didi ko mat mariye, Aunty ko mat mariye, Ladies ko mat mariye"... Where-ever you are...beta, hope you are fine. Thanks a lot for helping us.

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  7. यदि रामदेव ने आने की घोषणा की और आया भी तो इन सबको भी अलग अलग ही सही, एक समय ही अपने समर्थकों को ले दिल्ली पहुँचना था। सोचिये कि क्या स्थिति होती!

    आप रामदेव से इतना चिढ़ते क्यों हैं? कम से कम वे आये तो, जनरल वीके सिंह भी साथ आए। अगर वे अपने समर्थकों को बुला भी लेते तो वही करती जो 4जून 2011 को किया था, 'संघी बजरंगी गुंडों' पर आन्दोलन हाइजैक करने का इलज़ाम लगा देती, और कहती की हमें बल के लिए मजबूर किया। और ये बेचारे उस स्थिति में भी आपकी गाली ही खाते।

    पता नहीं क्यों रामदेव से लोग इतना चिढ़ते हैं? वह इन्सान वीवीआईपी टेलीएवेंग्लिस्ट योगगुरु बन मस्त पावर ब्रोकर बना रह था, दुकान तब भी एक नंबर चल रही थी। पता नहीं क्यों एक्टिविस्ट बन बुद्धिजीवियों के अपशब्द, और कांग्रेस के डंडे और अपमान झेल रहा है? बाबा पागल लगता है मुझे तो

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