रविवार, 5 मार्च 2017

खोलिये, खोलवाइये और मोक्ष पाइये, खेलिये कालिदासी होली!

कवि तो वैसे कुल लण्ठ होते हैं लेकिन कालिदास लण्ठकुलशिरोमणि कहे जा सकते हैं। आज कल के गोतम राजऋषि कवि की तरह वह ‘लूसी’ के चित्र पर चुप्पी नहीं साध लेते, प्रगल्भ हो 'लैला लैला' कह उठते हैं, इतने प्रगल्भ हो जाते हैं कि खोलने की बातें खुलेआम करते हैं! 

'मुझे चाँद चाहिये' नामक उपन्यास में नीवि अर्थात नाड़ा खोलने के कालिदासी उपाय का बड़ा ही सुंदर प्रयोग हुआ है। साहित्त पढ़ने वाले बता सकते हैं।
नाड़े का सम्बन्ध बन्धन से है। बन्धन से बन्धु की स्मृति हो आई। 'बंधु' के मूल में बंधन है। उस बंधन का जिसका संबंध स्नेह और प्रेम से है।  भाई के लिये बंधु शब्द का हिन्दी में रूढ़ होना परवर्ती है जिसके पीछे संभवत: इस संबंध की प्रगाढ़ता रही होगी किन्तु संस्कृत और बंगला में बंधु शब्द के व्यापक अर्थ में ही प्रयोग हुये हैं। पति, प्रिया, मित्र और प्रेमी के लिये भी बंधु प्रयोग मिलेंगे।
बंधन कैसा भी हो, जब खुलता है तो क्रांतियाँ होती हैं। यह बात अलग है कि क्रान्ति के मायने भी अलग अलग होते हैं, जानू विषविधालय में बस भोग होता है जब कि अन्य स्थानों पर योग और मोक्ष भी।
यह कालिदास ही थे जिन्हों ने खोलने के महात्म्य का यूँ वर्णन किया:
अविदितसुखदु:खं निर्गुणं वस्तु किञ्चिज्जडमतिरिह कश्चिन्मोक्ष इत्याचचक्षे।
मम तु मतमनङ्गस्मेरतारुण्यघूर्णन्मदकलमदिराक्षीनीविमोक्षो हि मोक्ष:॥
‘जडमति हूँ, मुझे सुख दुःख से परे निर्गुण मोक्ष नहीं बुझाता। यौवन है, अनंग का जोर है, ऐसे में मदिरामय आँखों वाली को नाड़े से विमुक्त करना ही मोक्ष है!’

खुल गया तो कुछ ऐसा दिखा कि कवि ने अपनी आगामी यात्रा ही स्थगित कर दी! 
शेते शीतकराम्बुजे कुवलयद्वन्द्वाद्विनिर्गच्छति
स्वच्छा मौक्तिकसंहतिर्धवलिमा हैमी लतामञ्चति।  
स्पर्शात्पङ्कजकोशयोरभिनवा यास्ति स्रज क्लांतता
मेषोत्पातपरम्परा मम सखे यात्रास्पृहां कृंतति॥
‘चन्द्रमा (मुख) कमल (हाथ) पर सो रहा है, नीलकमल (आँखों) से मोती (आनन्दाश्रु) झर रहे हैं, स्वर्णिम लता (देह) (संतुष्टि के कारण) धवल सी हो रही है, कमलकोश (स्तनयुगल) के स्पर्श से पुष्पमालायें कुम्हला रही हैं (देह में इतनी ऊष्मा भर गयी है!)’

जब ऐसी स्थिति हो तो मोक्ष की किसे सूझती है? वह तो है ही! कहने का अर्थ यह है कि होली के वासंती पर्व में बन्धन खोलने और खोलवाने से भोग, योग और मोक्ष तीनों की प्राप्ति होती है। लग जाइये!    

गुरुवार, 2 मार्च 2017

सूर्य नमस्कार

ऋग्वेद का पहला मंत्र ‘अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य’ से प्रारम्भ होता है। जीवन अग्नि है। देह में जब तक 'अग्नि' है, वह जीवित है। मरने पर ताप की विशिष्टता समाप्त हो जाती है। जीवन 'यज्ञ' रूप है। अग्नि 'पुरोहित', समस्त हित साधन धारण करने वाले पुरनियों का प्रतिनिधि अगुवा, है और 'ईळ' उन्हें प्राप्त करने हेतु स्तुति एवं अनुसन्धान है।
त्रिकाल सन्ध्या अग्निहोत्र का विधान इसे ध्यान में रख कर किया गया। आधुनिक जीवन की आपाधापी में यदि सन्ध्या न हो पाती हो, पुरोहित मिले ही नहीं और जीवन यज्ञ अस्त व्यस्त हो तो सनातन अग्नि को अपना पुरोहित बनाइये। वह हैं ‘खग’ अर्थात ‘ख’ अंतरिक्ष में प्रतिदिन ‘ग’ गतिमान अग्नि स्वरूप मार्तण्ड सूर्य।
सूर्य नमस्कार’ के द्वादश आदित्य दिन में कम से कम एक बार आप को अपने हितकारी पुरोहित सूर्य से साक्षात्कार तो करायेंगे। सूर्यनमस्कार अपनाइये।

http://downloads.hssus.org/audio/other/surya_namaskar_mantra.mp3
30+ की आयु हो जाने पर किसी टेबलेट की आवश्यकता नहीं, सूर्य नमस्कार की है। करना तो बाल्यावस्था से ही चाहिये किन्तु यदि अब तक नहीं किये, तो अब नियमित रूप से अपना लीजिये। अब अस्थियाँ निर्बल होनी प्रारम्भ होंगी, मस्तिष्क सिकुड़ने लगेगा, पेशियाँ शिथिल होने लगेंगी। ऐसे में जीवन के सनातन देवता सविता आप के लिये उपलब्ध हैं।
प्रतिदिन सूर्योदय से पहले उठ कर पाव भर जल पी कर शौचालय में निवृत्त हो लें। प्राची की ओर मुख कर दर्शाये गये आसन समूह को बिना झटके दिये और धीरे धीरे लयबद्ध विधि से करें जैसे कि किसी सांद्र घोल में कलछी घूमा रहे हों।पहले दिन 3, दूसरे दिन 6, तीसरे दिन 9 और चौथे दिन 12 करने के पश्चात 12 दिनों तक मंत्र पाठ के साथ अभ्यास करें। तत्पश्चात 12 - 12 की श्रेणी में क्षमता और समयानुसार बढ़ा लें।
अस्वस्थ व्यक्ति चिकित्सकीय परामर्श के बिना न करें।
आसन अभ्यास का समय 'अति महत्त्वपूर्ण' है। इसे ऐसे नियोजित करें कि समाप्त होने तक सूर्योदय हो जाय।अरुणिम सविता देवता को जीवन हेतु धन्यवाद देते हुये और सबकी कल्याण कामना के साथ 12 बार मन में गायत्री मंत्र का पाठ करते हुये निहारते रहें। आप को उन्हें देखना है, अरुणिम अवस्था में देखना है। निहारते समय यह भाव रहे कि सूर्य किरणें आप के भीतर हर स्थान पर ऊर्जा, तेज, बल, अमृत भरती जा रही हैं।वर्षा हो तो घर में वायुप्रवाही स्थान पर करें और मानसिक रूप से दर्शन की प्रक्रिया पूरी करें। ध्यान रहे कि योगासन की प्रक्रिया कभी भी झटके के साथ नहीं करें और न ही शरीर की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुये करें।लयबद्धता और आंतरिक प्रसन्नता अनिवार्य हैं। देह धीरे धीरे स्वयं लचीली होती जायेगी।

‘येन बद्धो बली राजा ...’ वाले रक्षासूत्र मंत्र का एक अथर्ववेदी विकल्प भी है। रक्षासूत्र कौन बाँधते हैं? पुरोहित या पुजारी। उद्देश्य होता है आप की त्रिविध ताप से रक्षा। अथर्ववेदी मंत्र बहुत ही अर्थगहन है। 
 सरलार्थ यह है: 
(सुमनस्य माना: दाक्षायणा: )  शुभ मन वाले और बल की वृद्धि करने वाले श्रेष्ठ पुरुष (शत अनीकाय) बल के सौ विभागों के संचालक के लिये (यत् हिरण्यं अबध्नन्) जो सुवर्ण बाँधते रहे (तत्) वह सुवर्ण (आयुषे वर्चसे) जीवन, वर्चस् तेज (बलाय) बल और (शतशारदाय दीर्घायुत्वाय) सौ वर्ष की आयु के लिये (ते बध्नामि) तुम्हारे ऊपर बाँधता हूँ।  

इसमें देखिये कि पहले बाँधने वाले को शुभ मन और श्रेष्ठ होना आवश्यक है। आगे ‘हिरण्य’ का अर्थ भौतिक सुवर्ण भी है और उच्च स्तर पर वह सब कुछ है जो जीवन, वर्चस् तेज, बल और आयु में वृद्धि करे।
आप को एक पुरोहित सहज उपलब्ध है, वह दक्ष है और उसे दक्षिणा की भी आवश्यकता नहीं। शुभ और श्रेष्ठ तो है ही, ‘हिरण्यगर्भ’ भी है। कौन है वह?
 सविता देवता आप के सहज उपलब्ध पुरोहित हैं। उनसे स्वयं को बाँधिये, जोड़िये, जीवन यज्ञ हेतु ‘ईळ’ स्तुति अनुसन्धान को सहज ही पाइये। उनका ताप त्रिविध ताप से आप की रक्षा करेगा।