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रविवार, 5 मार्च 2017

खोलिये, खोलवाइये और मोक्ष पाइये, खेलिये कालिदासी होली!

कवि तो वैसे कुल लण्ठ होते हैं लेकिन कालिदास लण्ठकुलशिरोमणि कहे जा सकते हैं। हमारे काल में होते तो आज कल के गोतम कबीयों की भाँति वह ‘लूसी’ के चित्र पर चुप्पी नहीं साध लेते, प्रगल्भ हो 'लैला लैला' कह उठते! अपनी कविता के साथ वे इतने प्रगल्भ हो जाते हैं कि खोलने की बातें 'खुलेआम' करते हैं! 

'मुझे चाँद चाहिये' नामक उपन्यास में नीवि अर्थात नाड़ा खोलने के कालिदासी उपाय का बड़ा ही सुंदर प्रयोग हुआ है। साहित्त पढ़ने वाले बता सकते हैं।
नाड़े का सम्बन्ध बन्धन से है। बन्धन से बन्धु की स्मृति हो आई। 'बंधु' के मूल में बंधन है। उस बंधन का जिसका संबंध स्नेह और प्रेम से है।  भाई के लिये बंधु शब्द का हिन्दी में रूढ़ होना परवर्ती है जिसके पीछे संभवत: इस संबंध की प्रगाढ़ता रही होगी किन्तु संस्कृत और बंगला में बंधु शब्द के व्यापक अर्थ में ही प्रयोग हुये हैं। पति, प्रिया, मित्र और प्रेमी के लिये भी बंधु प्रयोग मिलेंगे।
बंधन कैसा भी हो, जब खुलता है तो क्रांतियाँ होती हैं। यह बात और है कि क्रान्ति के मायने भी विविध होते हैं, जानू विषविधालय में बस भोग होता है, जब कि अन्य स्थानों पर योग और मोक्ष भी।
यह कालिदास ही थे जिन्हों ने खोलने के महात्म्य का ऐसे वर्णन किया:
अविदितसुखदु:खं निर्गुणं वस्तु किञ्चिज्जडमतिरिह कश्चिन्मोक्ष इत्याचचक्षे।
मम तु मतमनङ्गस्मेरतारुण्यघूर्णन्मदकलमदिराक्षीनीविमोक्षो हि मोक्ष:॥
‘जड़मति हूँ, मुझे सुख दुःख से परे निर्गुण मोक्ष नहीं बुझाता। यौवन है, अनंग का जोर है, ऐसे में मदिरामय आँखों वाली को नाड़े से विमुक्त करना ही मोक्ष है!’

खुल गया तो कुछ ऐसा दिखा कि कवि ने अपनी आगामी यात्रा ही स्थगित कर दी! 
शेते शीतकराम्बुजे कुवलयद्वन्द्वाद्विनिर्गच्छति
स्वच्छा मौक्तिकसंहतिर्धवलिमा हैमी लतामञ्चति।  
स्पर्शात्पङ्कजकोशयोरभिनवा यास्ति स्रज क्लांतता
मेषोत्पातपरम्परा मम सखे यात्रास्पृहां कृंतति॥
‘चन्द्रमा (मुख) कमल (हाथ) पर सो रहा है, नीलकमल (आँखों) से मोती (आनन्दाश्रु) झर रहे हैं, स्वर्णिम लता (देह) (संतुष्टि के कारण) धवल सी हो रही है, कमलकोश (स्तनयुगल) के स्पर्श से पुष्पमालायें कुम्हला रही हैं (देह में इतनी ऊष्मा भर गयी है!)’

जब ऐसी स्थिति हो तो मोक्ष की किसे सूझती है? वह तो है ही! कहने का अर्थ यह है कि होली के वासंती पर्व में बन्धन खोलने और खोलवाने से भोग, योग और मोक्ष तीनों की प्राप्ति होती है। लग जाइये!    

रविवार, 20 मार्च 2016

रे छिनरो पँचगोंइठी दे ...

(1)
पसियाने में जंग छिड़ी, बोतल ठर्रा पानी मेल 
पंडिताइन के नसा चढ़ल, लाइन लगि के ठेलम ठेल 
केलि तजो जनि नासो भतार 
मतवा बुजरो गोंइठी दे 
पँचगोंइठी दे 
सर र र र र

(2)
ठकुराइन की मौज बड़ी, दूना जोबन दूना जोग
चमइन चाँपे सँइया बाहर, घर करती पंडित का भोग
अरे खोलs दुवार तनि झाँकs सिवान
छिनरो जल्दी गोंइठी दे
पँचगोंइठी दे
सर र र र र 

(3)
साहुन सब कर तेल निकालें, सँइया है तेली का बैल 

खुसकी मचती जब जब भीतर, जुगल किनारे जाते फैल
लहँगा सँभारs तनि नाचs दुवार 
तेलिन सोगहो गोंइठी दे 
पँचगोंइठी दे 
सर र र र र 

(4)
राम राम बोल तोर जोबना हराम

खोल दे दुवार तोर बलमा खराब
जरि जा जोगाड़ तोर जोबना पहाड़
तुरकिन छिनरो गोंइठी दे
पँचगोंइठी दे
सर र र र र 

(5)
नाम सुना जो बहुत बड़ा, नाम रहा तछसिल्ला 

बिकरम राजा बड़े बहादुर, उनकर बिकरमसिल्ला 
नालन्दा थी बहुत सयानी, बिद्या की रजधानी 
अब तो हैं जानू जनखा, गद्दारी चमकानी 
पहिर निरोधा भोगे बरखा, कान्ह तजो शैतानी
गाँड़ लगेंगे उमर खलीफा, नहीं मिलेगा पानी
राधारानी गोंइठी दे

बोल कबीरा सर र र र र

मंगलवार, 19 मार्च 2013

पिट्ठा, खाजा(खाझा), तिलकुट और पुआ(होली पकवान)

संस्कृत के 'पिष्' धातु से बना है पिसाना जैसे गेहूँ पिसाना (कुछ लोग आटा भी पिसाते हैं!)। 'आटा पिसाने वालों' से ही प्रेरणा ले कर शब्द बना 'पिष्टपेषण'। पिसा हुआ कहलाता है पिष्ट और उसे भी पिसाने की बात हुई पिष्टपेषण माने व्यर्थ का श्रम या दुहराव भरा निरर्थक काम। तर्क वितर्क में व्यर्थ के विवाद के लिये भी इसका प्रयोग होता है। 
पिसे हुये आटे को पानी या दूध में गूँथ कर गोल या चपटे आकार के उबले या तले खाद्य को 'पिष्टक' कहा गया। चावल के आटे से बनाये जाने पर पिष्टिक भी कहा जाता था। पूर्वी उत्तरप्रदेश और पश्चिमी बिहार का एक व्यंजन पिट्ठा इसी पिष्टक का अपभ्रंश है।
momoभरवा पिट्ठा आजकल 'युवाप्रिय' चीनी व्यंजन मोमो या नेपाली ममचा के तुल्य है। संस्कृतिकरण आर्थिक और औद्योगिक उन्नति एवं प्रभुता से भी निर्धारित होता है, पिट्ठा या ममचा की मोमो की तुलना में स्थिति इसे रेखांकित करती है।
मथने की क्रिया 'खज' कहलाती थी और दही को मथ कर निकलता है मक्खन। उससे बना घी कहलाता था 'खजपं'। विशिष्ट विधि से बेले हुये पिट्ठा को घी में तलने और शर्करा पाग में डुबोने के बाद बनाई गयी मिठाई के लिये जातक कथाओं में संज्ञा मिलती है - 
'पिट्ठखज्जक'।
बताते हैं कि बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र को पिट्ठखज्जक इतना प्रिय था कि उन्हों ने उसे न खाने की शपथ ले ली क्यों कि khajaवह उन्हें लालची बनाता था :) यह कुछ अपने जैसा मामला है। जो मुझे अधिक प्रिय होता है, उससे आगे चल कर सुरक्षित दूरी बना लेता हूँ ;)
यह 'पिट्ठखज्जक' ही आगे चल कर और घिस गया और लोग 'खाजा' या 'खाझा' कहने लगे। हजारो वर्षों पुरानी यह मिठाई आज भी मंगल कार्यों में देश के पूर्वी क्षेत्रों में बनती है। कन्या की बिदाई के समय लड्डू के साथ यह अनिवार्य है।
tilkutकूट पीस कर बनी तिल की मिठाई के लिये भी पिष्टक संज्ञा ही प्रयुक्त होती थी। आधे पिसे तिल से बनने वाली आज की मिठाई 'तिलकुट' इसी की परवर्ती संस्करण है। पाणिनी इसका नाम 'पलल' भी बताते हैं। यह भी उतना ही पुराना है।

ऋग्वेद में एक मिष्ठान्न चर्चित है 'अपूप'।  देवताओं के प्रिय इस व्यंजन की उन्हें आहुति दी जाती थी और लोकखाद्य तो था ही।
कई नव्यताओं के सर्जक विश्वामित्र पहली बार इसे भुने अन्न और सोम के साथ इन्द्र को अर्पित करते हुये गाते हैं (3.52.1):apoop_rv3_52_1ऋषि अपाला कहती हैं कि कन्यायें इन्द्र को अपूप अर्पित कर रोग मुक्त हो स्वस्थ और कांतिमयी यौवन सम्पन्ना होती हैं (8.91)।
ऋग्वेद में इन्द्र किसी एक अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है। यह बहुत ही व्यापक और बहुअर्थी शब्द है। इन ऋचाओं में इन्द्र का अर्थ देह की जीवनशक्ति से है जिसे उत्तम आहार द्वारा पुष्ट करना होता है। यह भी ध्यातव्य है कि एक स्त्री ऋषि ने कन्याओं के हित इसे प्रतिपादित किया है। इन्द्र को आहुति का अर्थ यज्ञकुंड में अपूप झोंकना नहीं है बल्कि सोमादि औषधीय वनस्पतियों के साथ प्रार्थना के पश्चात उसे स्वयं वैसे ही पाना है जैसे आजकल 'तुमहिं निवेदित भोजन करई' भावना के साथ आस्तिक जन भोजन ग्रहण करते हैं: apoop_apala_rv8_91 इस अपूप का जातक कथाओं में भी खूब वर्णन है। आज का पुआ यही 'अपूप' है। इसे बनाने की विधि हजारो वर्षों से यथावत रही है। आटे को दूध में घोल कर घी में छान लिया जाता है और शर्करा पाग में डुबो दिया जाता है। इसमें एक गुण यह भी होता है कि कई दिनों तक बिना दुर्गन्धित हुये खाने लायक बना रहता है। इस गुण की ओर भी ऋग्वेद में संकेत है।
रबड़ी, खोया या मलाई के साथ खाये जाने के कारण बाद में पुआ के साथ 'माल' जुड़ गया होगा जिसमें सम्पन्नता यानि आज की बोली में रिच कैलोरी का भाव है – 'मालपुआ'।
यह होली का प्रमुख पकवान है और युवा गृहिणी का देहराग रूपक भी। यौवन से भरी पुरी देह लिये सहज सुन्दरी आकर्षणगुण सम्पन्ना मधुरा की कामपर्व के दिन इससे अच्छी रसोई क्या हो सकती है? रसिया के लिये चुनौती भी है - शक्ति है लाला तो...मेरे पुये खा कर दिखाओ!
images 
(सभी चित्र सम्बन्धित साइटों से साभार)

गुरुवार, 8 मार्च 2012

लोक: भोजपुरी- 8: कस कसक मसक गई चोली(निराला) और सुतलऽ न सुत्ते दिहलऽ(लोक)

आज मदनोत्सव है - फागुन महीने की अंतिम तिथि। मदन जो कि अनंग है, जिसमें वह मद है जो मन को बहकाता है, जो देहाभाव की पूर्ति हर प्राणी के अंग अंग समा कर करता है और जिसके दमन हेतु समाज संहितायें गढ़ता रहा है। स्थान स्थान होली जला वसंत की बिगड़ी बयार शुद्ध कर दी गई है और हम नवरस का सन्देश ले एक पक्ष बाद आने वाले नवसंवत्सर का स्वागत करने को तैयार हैं। कल से चैत चढ़ रहा है, वही चैत जिसके बारे में कहा गया है – चुअत अन्हरवे अँजोर, देहियाँ टुटेले पोर पोर। वही चैत जिसमें हल बेच कर भी सजनी के लिये सजन हार गढ़वाता है। इस लास्य की भूमिका है फागुन माह की होली।
होली देहपर्व है, मनबढ़ई का पर्व है। निषेधों और वर्जनाओं की बरजन का पर्व है, बरजोरी का पर्व है। यह देह के भूगोल के अनुसन्धान का पर्व है, मिलन का पर्व है। समूची सृष्टि जैसे उन आदिम भावों के उफान लिये मचल उठती है जिनके चारो ओर शेष वर्ष घूमती रहती है। यह पर्व प्रकृति से पुरुष के, पर्जन्य से भूमा के, सूर्या से सोम के, यिन से यान के, प्रवाह से श्यान के, लाज से उघार के, संकोच से विस्तार के , नर से नार के मिलन का पर्व है।
साहित्य और लोक के रसिया जन ने इस बारे में बहुत कुछ लिखा-गाया-बजाया है। ऐसे ही एक रसिया थे हिन्दी के महाप्राण कवि निराला। उन्हों ने 22 मार्च 1932 को बनारस से प्रकाशित पाक्षिक जागरण में अपनी रचना ‘होली ’ को प्रकाशित करवाया। बनारस तो रसराज है जहाँ जयशंकर प्रसाद की छाँव में बैसवाड़ी निराला को उस समय ठाँव मिली थी जब वे गुप्तरोग से पीड़ित थे जिसका कारण पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ द्वारा बहकाने पर वेश्यागमन था।
रचना बहुत प्रसिद्ध हुई। उसमें बिना किसी छायावादी छिपाव के उद्दाम वासना का उन्मुक्त चित्रण था। उतरते वस्त्र थे, करस्पर्श से कठोर होते उरोजों के कारण कसकती मसकती चोली थी, अधरों पर दंतचिह्न थे, सुरत का श्रम था और रतजग्गे के कारण लाल लाल आँखें थी यानि सेज पर पिय के साथ रात भर खेली गई होली थी। अपनी लय योजना के कारण यह मुझे बहुत प्रिय रही है। इसे चौताल पर इस तरह से विस्तार देते हुये गाया जा सकता है (गा नहीं रहा क्यों कि चौताल न तो एकल गायन है और न इसे बिना वाद्यों के, बिना लिहो लिहो किये गाया जा सकता है)।
सखि, लाल गुलाल हो लाल गुलाल
नयनों के डोरे लाल गुलाल भर खेली होली
अरे होली, लाल गुलाल हो होली
जागी रात सेज प्रिय पति संग,
जागी रात सेज प्रिय पति संग
रति सनेह रँग घोली , हँस खोली
अरे होली, लाल गुलाल हो होली
मलि मुख चुम्बन रोली ....
बहुत दिनों के बाद पहली बार जब यहाँ प्रस्तुत नये जमाने के एक भोजपुरी गीत को सुना तो मस्त हो गया! निराला के गीत पर लोक का यह गीत भारी था। इसमें केवल दो जन की वयक्तिकता नहीं थी, इसमें परिवार का माहौल था, लोक के प्रवाद की छाया थी, प्रकृति का हस्तक्षेप था और उन सबके बीच उन्हीं को संकेतित कर अपनी बात कहती, बरजती रात भर के सुरत से थकी नायिका थी। इस स्वाभाविकता के आगे निराला की रचना सायास रची सी लगी।
निराला संकीर्ण से लगे, केवल रतिक्रीड़ा पर केन्द्रित लेकिन भोजपुरी गीत में परिवेश को जोड़ता लजाता उल्लास था, पूर्ण सम्भोग के चक्रों के पश्चात प्रिय के ऊपर उड़ेला जाता स्नेह था।

नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली !

जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,
दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली-
मली मुख-चुम्बन-रोली ।
 
प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक-वसन रह गई मन्द हँस अधर-दशन अनबोली-
कली-सी काँटे की तोली ।
 
मधु-ऋतु-रात,मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खोली,
खुले अलक, मुँद गए पलक-दल, श्रम-सुख की हद हो ली-
बनी रति की छवि भोली ।
 
बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,
उठी सँभाल बाल, मुख-लट,पट, दीप बुझा, हँस बोली
रही यह एक ठिठोली ।
छोड़ऽ छोड़ऽ कलइया सइयाँ भोर हो गइल
तनि ताक ना अँगनवाँऽ अँजोर हो गइल।
 
गते गते घरवाऽ के, लोग सब जागल
बोलेले चुचुहियाऽऽ, पह बाटे फाटल
सुनऽ कुकड़ू कू मुरगा के शोर हो गइल।
छोड़ऽ छोड़ऽ ....
 
सुतलऽ न सुत्ते दिहलऽ, बीतल रइनिया
हमरा त गोड़वा में, पऽरल झिझिनियाँ
थोरे थोरे दरद पोरे पोर हो गइल।
छोड़ऽ छोड़ऽ ....
 
अब जनि राजा जी तू करऽ सरहँगई
मन भरि कइ ले ले, बाड़ऽ दबंगई
बड़ा भारत पिरितिया ल शोर हो गइल।
छोड़ऽ छोड़ऽ ....
...सुरत के कई चक्रों के बाद भी मन तो है लेकिन नायिका समझदार है। वह भरे पुरे परिवार में आई नवब्याहता है जिसे मरजाद का भी खयाल है कि दिन उगने तक अगर सइयाँ घर में ही रहे तो लोग क्या कहेंगे? वह घर की नवेली लक्ष्मी है, स्वयं भी तो दिन उगने के बाद सोई नहीं रह सकती! साजन तो जबर है। उसे बरजते हुये भी अपनी चाह को बयाँ सी करती है कि अगली रात तक विराम लो, आँगन में अँजोर हो गया है, चहचहाने वाली छोटी चिड़िया शोर मचाने लगी है और इधर उधर घर के लोग जागने लगे हैं, अब तो मेरी कलाई छोड़ो!
इस भोजपुरी गीत में, निराला के विपरीत, कामांगों का विवरण नहीं है, केवल लक्षण बता कर ही रस सृजन किया गया है। लोक की स्वाभाविकता अपने पूर्ण रूप में प्रस्तुत है जिसमें प्रकृति का संगीत है – चुचुही बोल रही है, पौ फट रही है, मुर्गा बोलने लगा है। तुम न खुद सोये और न सोने दिये जब कि पूरी रैन बीत गई। सुरत थकान के कारण मेरे पैरों में झिनझिनी भर आई है, शरीर के पोर पोर में थोड़ा थोड़ा दरद, मीठी पीर भर गई है।
जिन लोगों ने ऐसे सुरत का आनन्द लिया है, बहुत आसानी से इससे स्वयं को जोड़ पाते हैं। यहाँ चुम्बन बताने के लिये रोली की आवश्यकता ही नहीं है! अंग विवरण अनावश्यक है कि केश खुल गये, आँख मुँद गई। निराला के यहाँ दीपक बुझता है जिसके साथ ही देह द्युति समाप्त हो जाती है जब कि लोकरचना में भोर का अँजोर है, नेह प्रकाश की सूक्ष्मता है और देह तो प्रिय के ऊपर मुग्धभाव में लुप्त है। सजनी को अपने बलम पर नाज़ है।
भोजपुरी के बस दो अनूठे शब्दों के प्रयोग से ही नायक के गुण उकेर दिये गये हैं जैसा कि हिन्दी में हो पाना कठिन है। सरहँग कहते हैं ऐसे पुरुष को जो अपने गुणों और कर्मों की लोक समाज द्वारा निरंतर सराहना और आदर किये जाने के कारण प्रभावशाली हो जाता है। नवेली अब अपने पति से यह तो सीधे कह नहीं सकती कि आप रतिक्रियानिपुण हैं और मुझे थकान के स्तर तक संतुष्ट कर दिये हैं! वह पति की लोकप्रचलित विशेषता सरहँगई को बयाँ करते हुये दो लक्ष्य साध लेती है – सराहना भी और वर्जना करते हुये लाज की छिपी अभिव्यक्ति भी। साथ ही याद भी दिला देती है कि तुम्हारा बाहर बहुत आदर है, इस तरह दिन उगने तक घर में घुसे रहोगे तो बदनामी होगी।
लेकिन फिर उसे लगता है कि बात अब भी अधूरी रह गई। मर्द मानुस तो संकेत समझने में मूर्ख होता है। आगे दबंगई की बात करती है – दबंग नकार भाव लिया हुआ गुण है, अपनी बात बरजोरी से मनवा लेने वाला दबंग कहलाता है। पिया की सरहँगई में दबंगई का जोग ऐसा ही है जैसे बढ़िया रसोई में नमक का स्वाद! उसके अहम को संतुष्ट भी कर देती है तुमने तो मनमानी कर ली अब तो छोड़ो!
और देखिये कैसे एक वाक्य से ही अपने पिया के प्रेम पर गर्व, उसके रसिया स्वभाव की प्रसिद्धि और अपनी संतुष्टि को कह जाती है – बड़ा भारत पिरितिया ल शोर हो गइल – सब ओर हमारे प्रेम का हल्ला मच गया है (तुम्हारा प्रेम इतना पूर्ण है!)। निराला की रचना इसके आगे वाकई ठिठोली सी लगती है।
सुनिये अब गीत:


(स्वर सम्भवत: मदन राय या भरत शर्मा व्यास का है और कॉपीराइट टी सीरीज। मेरी सी डी कहीं खो गई है नहीं तो पूरी सूचना देता)
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रंगपर्व की नंगानंग शुभकामनायें!
________________________
हमारे घर होली की शुरुआत! श्रीमती जी नहा धोकर पूजोपरांत मेरे मुँह मालपुआ बनाने के लिये फेंटा गया मलाई मैदा और अबीर पोत गईं, तब जब कि मैं ब्लॉग लेख फाइनल कर रहा था! बहुत नाइंसाफी है! सजा जरूर मिलेगी।

बुधवार, 7 मार्च 2012

जोगीरा, कबीरा -सम्हति इसपेसल - बरसाने वाले किनार रहें


नदी किनारे धुँआ उठत है, मैं समझूँ कछु सोय
जिन पिछवाड़े दिया लुकाठा, वही न जलता होय
बोल कबीरा सर र र र र

सेजिया आवs हमरे पियवा, ई अँखिया अलसानीs
आँखि में तोरे लवना लागे, सुत्तल बाड़ी नानीs
तरस जोगीरा सर र र र र

नदिया नारे कक्का बइठें, लेवे के अचमन्नी
खोलि के पोछिटा कुदलें दन से , लउकल जब चवन्नी
तरे कबीरा सर र र र र

बड़ी सयाना हमरो पड़वा, कहलावे युवराज
दाढ़ी बढ़ि गे बोका होइ गे, लउके उमिरदराज
छील जोगीरा सर र र र र

बाप के देखs, बेटा देखs, अँइठल मोछि कक्का देखs
गाड फादर फिलिम पँचबरसा, ऊ पी हक्का बक्का देखs
देख कबीरा सर र र र र र

फगुआ हिया समाइल, फगुआ हिया समाइल
हम कहनी आ जा रनिया, ऊ दउरल चलि आइल
हम कहनी आ जा कर लें जो करते हैं कप्पल
चुम्मा लेवे आँखि जो मुनलीं, मरलसि गाले चप्पल
मार जोगीरा सर र र र र।
___________________

पिता उवाच पुत्रं :
"का बे! तुम तो कह रहे थे कि 5 दिन की छुट्टी थी?
सुना है आज छोटी पिचकारी से छोटी होली मनाने वाले थे? होली तो एक दिन की कल है।
लच्छ्न ठीक नहीं तुम्हारे! उल्लू के पठ्ठे! उठाओ बस्ता और परीक्षा देने जाओ।"...


:) बेटा एकदम बाप पर गया है!

रविवार, 4 मार्च 2012

जोगीरा:'परम' श्रेणी परहेज से रहे...बोलs हमरो जिन्दाबाद!...


(1)
के पीये हर घाट के पानी, के बा परम सयानी
केकर चुनरी दागा लागल, के धोयेला पानी

रानी पीये हर घाट के पानी, राजा परम सयानी
पबलिक चुनरी दागा लागल, कोइ न धोये पानी।

वा वा! जोगीरा सर र र र।

(2)

हम बिछवलीं गली गलइचा, आवs राजा जिन्दाबाद
हम लगवलीं बाग बगइचा, चाभs रानी जिन्दाबाद

हम बनववलीं पाल पलंगरी, सूतs बबुना जिन्दाबाद
हम सिरजवलीं रंगी चुनरी, पहिरs बबुनी जिन्दाबाद

पहिले के तरसे फेरसे, खइबे हम सिधरी जिन्दाबाद
काँटा काँटा खून कचरबे, टुटही पनही जिन्दाबाद

कहs जोगीरा सर र र र।


(3)
के आइल हो राज हमारे, मुल्ला राजा जिन्दाबाद
के आइल हो काज हमारे, माया रानी जिन्दाबाद
के आइल हो साज हमारे, कइलड़ पार्टी जिन्दाबाद
के आइल हो साँझ सकारे, करांती पार्टी जिन्दाबाद
के आइल हो जाल हमारे, दूजी तीजी जिन्दाबाद
जियते जियते हम मरि गइलीं, बोलs हमरो जिन्दाबाद।
 जगे जोगीरा सर र र र।


(4)

हमहूँ राजा लोकातन्तर
तूहूँ राजा लोकातन्तर
सबहूँ राजा लोकातंतर।
बड़का सड़का लोकातंतर
घपला तड़का लोकातंतर
मिरिच मसाला लोकातंतर।
रिन्हले खिंचड़ी लोकातन्तर
फेंकलें हड्डी लोकातंतर
चूसs हड्डी लोकातंतर।
टूटलs दँतवा लोकातंतर
लटकल लवड़ा लोकातंतर
लोके भड़वा लोकातंतर।
उतरल चेहरा लोकातंतर
घरेs चलs लोकातंतर
मारs मंतर लोकातंतर।
सुतs रजाई लोकातंतर
कार कमाई लोकातंतर
बड़ी बड़ाई लोकातंतर।
हमहूँ राजा लोकातंतर
तूहूँ राजा लोकातंतर
सबहूँ राजा लोकातंतर।

सर र रs सरकs लोकातंतर
सुते कबीरा लोकातंतर
जगे जोगीरा लोकातंतर।


रविवार, 20 मार्च 2011

अस्सी कवि सम्मेलन एडवांस बुकिंग के लिये सम्पर्क करें

विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि होली के अवसर पर प्रति वर्ष काशी के अस्सी घाट पर होने वाले कवि सम्मेलन में श्रोतारूप में अगले साल जाने के लिए ब्लॉग जगत के कुछ लंठो ने प्रोग्राम बनाया है। एडवांस बुकिंग के लिये पुरुष ब्लॉगर (केवल अनाड़ीवादी) सम्पर्क करें (चेतावनी -  नाड़ी का नाड़ा से कोई सम्बन्ध नहीं है।) 
यह पाया गया है कि ब्लॉग जगत से कोई भी 'कवि' के रूप में क़्वालिफाई नहीं कर पाया है। क़्वालिफाई करने के लिये अंत में दी गई 'समस्या पूर्ति' हर हर महादेव! टेक के साथ करनी है।

अब तक का प्रोग्रेस: 

तिरपाल और जाजिम की बेवस्था वैज्ञानिक मुखारविन्द के जिम्मे है। तिरपाल पर पड़े चूतड़ चिह्नों के निरीक्षण से उन्हें अपने 'नायक नायिका' नख शिख वर्णन में रह गई कसर पूरी करने में मदद मिलेगी।
सचाई की शरण वाले माट्साब सौन्दर्य लहरी की परम्परा में अस्सी के योगदान पर एक विशद लेख लिखेंगे।
कवि हृदय ऋजु प्रकृति कुँवारे बालक पूरे सम्मेलन की कविताओं को लिपिबद्ध करेंगे।
चूँकि सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व का है, इसलिये अंग्रेजी और जापानी भाषाओं में अनुवाद के लिये मूल रचनाओं को समझने हेतु चतुर भारतीय संत पिटासवर्ग से आयेंगे। उन्हों ने अश्लील शब्दों को निकाल कर सभ्य भाषा में उतने ही प्रभावकारी अनुवाद की बात कही है। 
उनका यह कारनामा किसी चमत्कार से कम नहीं होगा, इसलिये नाड़ा नाम विख्यात देश से ऊड़न लाल भी पधार रहे हैं। उन्हें आज कल ऐसइच उपन्यासिका लिख लिख फोकट में बाँटने का शौक चर्राया है।   
इस पर प्रथम आचार्य नाम विख्यात विवाहितादिललपकू कुमार ने कहा है कि न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी। वैसे उन्हों ने उन दिव्य कवित्तों में लोक सम्वेदना के स्वर पाये जाने की बात कही है जिनके कारण कभी भी क्रांति हो सकती है। 
पलटकुमार ने राधा और तेल के मेल का खेल देखने के लिये अभी से दालमंडी गली में कमरा ढूँढ़ लिया है। 
आलसी नाम विख्यात ने आलस तजते हुये अगुवाई की जिम्मेदारी स्वीकार की है। झूठा ज्ञान बघार कर आतंक फैलाने वाले इस शख्स ने यह सिद्ध करने की ठान ली है कि अश्लीलता ही भाषा की प्राण है।
शातिर कली ने हामी भरते हुये 'बात में वजन' की अपनी अवधारणा की प्रस्तुति का प्रोग्राम बनाया है।
यह और बात है कि वहाँ संगठन, संघटन वालों की गठन ठन ठन कर देने का बन्दोबश्त  एक भटकती आत्मा ने कर रखा है। आज कल उन्हें विश्वनाथ मन्दिर में हक्का बक्का मंत्र पढ़ते पाया जाता है। कुछ का कहना है कि असल में शकीरा का वक्का वक्का वो वो सुनने देखने के बाद से ही उनका दिमाग ठरक गया है।   
हर सफेद दीवार में श्वेत प्रदर के चिह्न तलाशने वाले व्हाइट हाउस के मालिक बम-बई से सिर्फ इसलिये पहुँचने का पिरोगराम बनाये हैं कि चिलगोंजई के ओरिजिन को तलाशा जा सके। पलटकुमार दालमंडी से रोज उनसे बातें करते हैं और लत्ता बीनने के गुन सीखते हैं।   
ग़लती से पच्छिम में पैदा हो गये दपक बाबा भी आ रहे हैं। खैनी खा खा कर उन्हें कुछ हो गया है और उनके दोस्त परबिये ने उन्हें यह झाँसा दिया है कि जब दिब्य कबित्त अवतरित होंगे तो उनकी आँच से उस कुछ की वो सिंकाई होगी कि वह कल को सर्व करने चला जायेगा। 
आली भी आ रहे हैं। उन्हें उकसाने में अपून कुस्सुल का हाथ है। आली मुखारविन्द की दोस्ती और अपून की नूर दुश्मनी में दुरभिसन्धियों को समझने के लिये पधार रहे हैं। ये बात अलग है कि इसी बहाने दोनों उनके नाड़ी ज्ञान की ऐसी तैसी करने वाले हैं। आली ने कहा है कि अगर वे हार गये तो नाड़ी ब्लॉगों पर लम्बी अज्ञानी/अगमजानी/हैरानी टाइप की बड़ी बड़ी टिप्पणियाँ करना छोड़ देंगे। 
कवि सम्मेलन से एकदम असम्बद्ध इस प्रस्ताव पर बलापाल ने एक नये ब्लॉग का शुभारंभ अगली होली के दिन से करने को कहा है। प्रथम आचार्य ने मेल कर उनसे पूछा है कि क्यों खाली पीली पादते रहते हैं? हाल लिखने तक दोनों नेट पर बज़बज़ाते हुये गुथ्थमगुत्था थे।   
बात बात में झेलाऊ कार्टून बनाने वाले काजलमार ने 'ब्लॉग क्राइम्स' में एक कार्टून स्ट्रिप अभी से छापने की बात बताई है। 
इस पर आत्ममुग्ध महजूफ कली का कहना है कि बात कुछ हजम नहीं हुई। मेरे जैसे स्मार्ट पर कार्टून क्यों नहीं बनाया जा रहा?
 परम सभ्य सैनिक उभयराजारिसि ने जलजला लिख कर उन्हें समझाया है कि तुम ऐसे ही कार्टून हो, बनाने की क्या जरूरत? दोनों ने अस्सी कवि सम्मेलन में एक दूसरे को देख लेने की धमकी दी है। 
घोषित अद्वितीय कुटिल-खल-कामी अपने नाम के तीसरे भाग को चरित्र में उतारने की सीख के लिये पधारेंगे। वैसे उन्हें सीख से नफरत है और बेफालतू फिल्मी गानों के बघार पोस्टों में देने की फितरत है। फिर भी देखी जायेगी। 
शिवज्ञान लाहाबाद से बनारस पहुँचेंगे। बनारस से शिवगंगा एक्सप्रेस पकड़ कर दिल्ली जायेंगे और दिल्ली से जयझा जैसे नमूने ब्लॉगरों को इकठ्ठा कर लायेंगे। ऐसा सिर्फ इसलिये कि शिवज्ञान के रहते किसी को भी रेल टिकट नहीं लगेगा। खुद उन्हें तो कभी लगता ही नहीं है। वे इसे गंगा जी की कृपा बताते हैं और उनका बिरोधी खेमा रैंकिंग बढ़ाने की चाल कहता है। 
कुदर्शन मिसिर ने किसी के चाल चलन पर सवाल उठाने से इनकार करते हुये कहा है कि वे कवि सम्मेलन में सिर्फ इसलिये श्रोतारूप भाग लेंगे कि कुछ और एनीमेशन के लायक कैरेक्टर मिलेंगे। उनका ब्लॉग अव्वल तो लोग पढ़ते ही नहीं, जो जाते भी हैं वे एनीमेशन के चक्कर में टिपियाना ही भूल जाते हैं। आलसी ने उन्हें एनीमेशन के बजाय असल चीज परोसने की सलाह दी है। दोनों इस मुद्दे पर भदैनी कुटी में डिछ्क्स करेंगे।     
चारशून्य टाइप पोस्टें लिखने वाले ब्लॉगर ने बड़ा वाजिब सवाल उठाया है कि सरकारी अधिकारियों द्वारा सोविधा का दुरुपयोग सिरफ भड़ैती सुनने सुनवाने के लिए क्यों किया जा रहा है? 
इस पर भाऊ बैडनिक्कर ने ऑब्जेक्शन लिया है कि इस सन्दर्भ में 'भड़ैती' शब्द का प्रयोग ग़लत है। चारशून्य टाइपो ने उनसे चुप चाप रह कर कविता सुनने लायक दिमाग विकसित करने की नसीहत दी है। उनकी एक और सिखावन 'बिना वाक्य के शब्द देह नहीं कसाईखाने की बोटियाँ हैं' को समझने की कोशिश में वे कहीं एक और पुरस्कार न झटके लें! 
सुना गया है कि इसी बात पर मलमल नन्द और कुकवि कास में जबरदस्त झगड़ा हो गयेला है। अब बैडनिक्कर उन्हें दस्त के अर्थ समझाने में लगे हैं। यह पक्का है कि कोई आये न आये ये चारो अस्सी जरूर पहुचेंगे।
बरधा के साँड़ों से घबरा कर धत्तार्थ प्रिताठी नखलौ आ धमके हैं और पुरस्कारी लाल के साथ अस्सी पहुँचने की योजना बना रहे हैं। दोनों इस गुंताड़ में लगे हैं कि कैसे वहाँ के कवियों को पुरस्कार दिया जाय? वैसे उन कवियों की हर चीज में बाँस कर देने की आदत के बारे में सुन सुन कर दोनों सहमे भी हैं। उनके निर्णय की उत्सुकता से प्रतीक्षा है। 
हैट लगा कर काला पैसा इधर उधर करने वाले बोझा से कम ही बात हो पाई है। उनका मोबाइल डिस्चार्ज है और वलिया में डॉलर न चलने कारण जनरेटर नहीं खरीद पा रहे जिससे कि मोबाइल चार्ज हो सके। फिर भी उन्हों ने पहुँचने के लिये अभी से छुट्टी का ऐप्लीकेशन लगा दिया है। जिस समय उनसे बात हुई, वह आम के पेंड़ से सेम तोड़ने के बहाने ऊँचाई से लाइन मार रहे थे। आलसी ने उन्हें समझाया है कि बबुआ इतना जल्दी न भूलो, पेंड़ हवाई जहाज नहीं कि अव्वल तो टपकोगे नहीं और अगर टपक गये तो सीधे सू sssssss। पेंड़ से टपके तो इतनी पूजा होगी कि बस्स बरफ सेंकने से ही लगी आग बुझेगी। .... 

अभी तक इतना ही। 

समस्या पूर्ति की पंक्तियाँ:

लाँड़ उठे न गाँड़ में दम 
हम बानी केसे कम? 
...........
.......... .
...........
...........

बोल जोगीरा, हर हर महादेव!
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नोट - इस लेख और ब्लॉग का अश्लीलता से दूर दूर तक नाता नहीं है। अश्लील या व्यक्तिपरक टिप्पणियाँ प्रकाशित नहीं की जायेंगी। कृपया अश्लील भाषा का प्रयोग न करें। लेख जैसी सभ्य भाषा का प्रयोग करें।   
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बुरा न मानो होली है। लिहो लकारा लिहो लिहो ...होली है.. हर हर महादेव! 

       

गुरुवार, 17 मार्च 2011

जोबना हमार गोल गोल अरे बकलोल!

फागुन गीतों में अभिधा, लक्षणा और व्यञ्जना तीनों शब्द शक्तियाँ मिलती हैं। हमारे गाँव के पास के एक गाँव चितामन चक (चक चिंतामणि) के रामबली मास्टर साहब फगुआ और नौटंकियों के बहाने ज्वलंत मुद्दे उठाने के लिये जाने जाते थे। बचपन में उन्हें सुना था। आज सोचा कि भोजपुरी में स्वयं प्रयास करूँ।
कुछ संकेत दे दे रहा हूँ। पहला अंतरा 'नरेगा' के भ्रष्टाचार और किसानी के चौपट होने से सम्बन्धित है। दूसरा अंतरा चौपट होती ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था से, तीसरा सत्तासीन प्रभु वर्ग द्वारा जनता को लूट कर विदेशी बैंकों में धन जमा करने से, चौथा जो कि बाकियों से दुगुना है, मनुष्य द्वारा प्रकृति के दोहन और आपदाओं (जापानी भूकम्प) से, पाँचवाँ आप समझ ही गये होंगे ;) और छ्ठा क्रिकेट में व्याप्त भ्रष्टाचार और जनता की आँखमूँदू दीवानगी से सम्बन्धित है।
'जोबना' उरूज के लिये प्रयुक्त हुआ है, 'उरोज' के लिये नहीं ;)। 'ताक न रे!' की टेक आँख खोलने की चेतावनी है। 'बकलोल' देसज शब्द है जिसका हिन्दी अर्थ देसभाषा और हिन्दी दोनों में निष्णात 'आचारज जी' ही बता पायेंगे :) मैं तो एक अदना सा विद्यार्थी हूँ। 'गोल' शब्द आकार के लिये नहीं बल्कि व्यवस्था की प्रकृति को दर्शाने के लिये प्रयुक्त हुआ है - चाहे जितना घूम लो, वापस पहुँचोगे उसी दर पर।
चित्र जहाँ से लिया है, वहाँ इसे पाकिस्तानी होली का चित्र बताया गया है। राम जाने क्या सच है? इतनी हिन्दू लड़कियाँ एक साथ इतनी उन्मुक्त होकर वहाँ होली खेल सकती हैं? पता नहीं। वहाँ इतनी बची भी हैं? फोटो प्यारा लगा, लगा दिया। आप आँख मूँद सकते हैं या बिना देखे जा सकते हैं। :) 
कुछ ईश्वरभीरु धर्मप्राण पवित्र संस्कारी जन को मेरे ब्लॉग के चित्रों से कष्ट पहुँचता है, इसके लिये उनसे क्षमा। एक पुरुष का अस्तित्त्व और पूर्णता, स्त्री के जननी, भगिनी, पुत्री, सखी,अंकिनी और पत्नी आदि सभी रूपों से है। स्त्रियाँ इस मामले में क्या सोचती हैं, मुझे नहीं पता। पता लगाने के प्रयास कर पिटने की कोई इच्छा नहीं है :) .... शुचिता और अश्लीलता दोनों के अतिरेक मुझे अप्राकृतिक और त्याज्य लगते हैं... अपनी अपनी दृष्टि है...सब केहू काकी त केकरे ओर ताकीं?... बुरा न मानो होली है! .... सर र र र sssss    
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जोबना हमार गोल गोल, अरे बकलोल, ताक न रे!
माया से हमरे लोग बउराइल
छूटल गरीबी अमीरी आइल
मुरगा छटके थरिया, रोटी बड़ी पनछोर
अरे बकलोल, ताक न रे!         ~1~


इसकूले के खिचड़ी में मूस मलाई
पंडीजी खाईं हरिजन जी खाईं
लइका कुल खाई लइकी कुल खाई
लाँणे के दक्खिन पढ़इया, उत्तर में पोल
अरे बकलोल, ताक न रे!        ~2~


तोहरे पसीना फसल इतराये
लूटें बहिन जी मैडम जी भाये
साहब मिलावें फोन, धन घन इटलिया शोर
अरे बकलोल, ताक न रे!        ~3~


जोबना में हमरे बहुते गरमी
लुग्गा हटावें सइयाँ बेशरमी
धधकल करेजवा जालिम, उठल लहरिया जोर
अरे बकलोल, ताक न रे!
पोछिटा खुलल जो सइयाँ जी भगलें
गरमी के डर से दुख सब जगलें
नोचे कपार बड़ि जोर, आइल जबर भुँइडोल
अरे बकलोल, ताक न रे!       ~4~
 
बड़की ईमानी बड़ी परधानी
पोसे पगड़िया सगर बैमानी
नाचें उघारे भड़ुआ, फाइल घुमे गोल गोल
अरे बकलोल, ताक न रे!       ~5~ 
 
हमरे जोबन के एगारे दीवाने
करोड़ीदेई जनता बहुते सयाने
फर्जी घुमावें बल्ला, गेना चले चोर चोर
अरे बकलोल, ताक न रे !       ~6~






आचारज जी - दुबारा :)

पूर्वी उत्तरप्रदेश में गाई जाने वाली फाग धुन पर आधारित यह भोजपुरी रचना एक पुनर्प्रस्तुति है। पछाहीं खड़ी बोली का प्रभाव भी है। यह रचना किसी दूजे के ऊपर तंज न होकर, स्वयं पर है। ब्लॉग जगत के कुछ लंठ मुझे 'आचार्य' कहने लगे हैं। 'आचार्य' ही लोक में 'आचारज' या 'अचारज' हो जाता है। 
... हाँ, पिछली बार जिन 'आचार्यों' को लक्ष्य कर यह रचना लिखी गई थी, वे स्वयं 'सारे सरदार मर गये क्या जो दूसरों पर चुटकुले सुना रहे हो' की तर्ज पर आपत्ति जतायें तो और बात है   
... टिप्पणी विकल्प खोल रहा हूँ। होली है sssss 
      



फागुन आइल आचारज जी
लागे पहेली सोझ बतियाँ आचारज जी
अरे, आचारज जी।

नेहिया ले फन्दा मदन बौराया
मदन बौराया मदन बौराया
तेल पोतलें देहियाँ आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी
आइल फागुन लखेरा आचारज जी।

बिछली दुअरवा लगन लग घूमे
लगन लग घूमे लगन लग घूमे
ताकें हमरी रसोइया आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।

मकुनी औ मेवा रोटी पकवलीं
चटनी पोत बिजना परोसलीं
बरजोरी से आए आचारज जी
अरे, आचारज जी।
चटकारा ले खाएँ आचारज जी
जो देखे कोई थूकें आचारज जी।


लागल करेजा फागुन के बतियाँ
अरे भइलें अकारन चारज
हमरे अचारज जी ।
नजर बौराया नजर बौराया
अरे कहें अखियाँ अकारज
चारज भइलें अचारज जी।

 
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।

अरे आचारज जी। 


शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

हे देश शंकर !

चित्र - सम्बन्धित इंटरनेट साइटों से साभार

हे देश शंकर! 
फागुन माह होलिका, भूत भयंकर -
प्रज्वलित, हों भस्म कुराग दूषण अरि सर -
मल खल दल बल। पोत भभूत बम बम हर हर ।
हे देश शंकर।
स्वर्ण कपूत सज कर 
कर रहे अनर्थ, कार्यस्थल, पथ घर बिस्तर पर ।
लो लूट भ्रष्ट पुर, सजे दहन हर, हर चौराहे वीथि पर 
जगे जोगीरा सरर सरर, हर गले कह कह गाली से रुचिकर।
हे देश शंकर।
हर हर बह रहा रुधिर 
है प्रगति क्षुधित बेकल हर गाँव शहर 
खोल हिमालय जटा जूट, जूँ पीते शोणित त्रस्त प्रकर 
तांडव हुहकार, रँग उमंग धार, बह चले सुमति गंगा निर्झर 
हे देश शंकर।
पाक चीन उद्धत बर्बर 
चीर देह शोणित भर खप्पर नृत्य प्रखर 
डमरू डम घोष गहन, हिल उठें दुर्ग अरि, छल कट्टर ।
शक्ति मिलन त्रिनेत्र दृष्टि, आतंक धाम हों भस्म भूत, ढाह कहर 
हे देश शंकर।
~~~~~~~~~~~~~~~~~

- गिरिजेश राव

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

ब्लॉगर की अम्माँ गोंइठी दे।

फाग महोत्सव में अब तक:
(1) बसन तन पियर सजल हर छन
(2) आचारज जी
(3) युगनद्ध-3: आ रही होली
(4) जोगीरा सरssरsर – 1

(5) पुरानी डायरी से - 14: मस्ती के बोल अबोल ही रह गए
(6) आभासी संसार का होलिका दहन 
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 होलिका दहन के सामान जुटाने हेतु दूसरों के मचान, झोंपड़ी, चौकी, दरवाजे पर पड़ी लकड़ी, पतहर, यहाँ तक कि फर्नीचर भी सहेज देने की पुरानी परिपाटी अब समाप्तप्राय हो रही है। लोग इस अवसर पर वैमनस्य भी साधते रहे हैं। 
इसके साथ ही एक परम्परा रही है - गोंइठी जुटाने के लिए भिक्षाटन जैसी। गोंइठी कहते हैं छोटे उपले को। पूर्वी उत्तरप्रदेश के कुछ भागों में इसे चिपरी भी कहते हैं। 
नवयुवक गोलबन्दी कर हर दरवाजे पर जा जा कर कबीरा के साथ एक विशिष्ट शैली का गान भी करते थे जिसमें गृहिणियों से होलिका दहन के ईंधन हेतु गोइंठी की माँग की जाती थी। इस गान में 'गोंइठी दे' टेक का प्रयोग होता था। लयात्मक होते हुए भी कई लोगों द्वारा समूह गायन होने के कारण इसमें बहुत छूट भी ले ली जाती थी। जाति और समाज बहिष्कृत लोगों के यहाँ इस 'भिक्षा' के लिए नहीं जाया जाता था। किसी का घर छूट जाता था तो वह बुरा मान जाता था। 
.. समय ने करवट बदली और कई कारणों से, जिसमें अश्लीलता सम्भवत: मुख्य कारण रही होगी, यह माँगना धीरे धीरे कम होता गया। आज यह प्रथा लुप्त प्राय हो चली है। 
 लेकिन कभी इस अवसर का उपयोग पढ़े लिखे 'सुसंस्कृत ग्रामीण लंठ जन' लोगों के मनोरंजन के लिए भी करते थे। गाँव समाज से जुड़ी बहुत सी समस्याओं और बातों को जोड़ कर गान बनाते और घर घर सुनाते। इन गीतों  में बहुत चुटीला व्यंग्य़ होता था। 
मेरे क्षेत्र के एक गाँव चितामन चक (चक चिंतामणि) में एक अध्यापक ऐसे ही थे जिनके मुँह से कभी कुछ बन्दिशें मैंने सुनी थीं। आभासी संसार के इस फाग महोत्सव में आज की मेरी प्रस्तुति उन्हें श्रद्धांजलि है, एक प्रयत्न है कि आप  को उसकी झलक दिखा सकूँ और यह भी बता सकूँ कि होलिकोत्सव बस लुहेड़ों का उच्छृंखल प्रदर्शन नहीं था, उसमें लोकरंजन और लोक-अभिव्यक्ति के तत्त्व भी थे।  क्या पता किसी गाँव गिराम में आज भी हों !
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 तुमको लगाएँ दाल का गुलाल
जल गइ बजरिया फागुन की आग
महँगा बुखार महँगा इलाज
अब की हम फूँके शरदी बखार 
राउल की अम्माँ गोंइठी दे।

आज नहिं जाना पास नहिं जाना
कोठरी के भीतर बड़ा मेहमाना
घट गइ आग सीने में
अरे सीने में भठ्ठी में
हमको चिकन तन्दूरी बनाना
चिद्दू की चाची गोंइठी दे।

बोले मराठी हिन्दी न(?) आती
जल गई जुबाँ अँगरेजी में
अँगरेजी में गाली मराठी में गाली
हिन्दी हो गइ ग़रीब की लाली
आँसू चढ़े बटलोई में
मनमोहना अब गोंइठी दे।

दो कदम आए एक कदम जाए
करांति की खातिर कौमनिस्ट बुलाए
अरुणाँचल भी आए लद्दाख भी आए
ग़ायब मिठाई चीनी में ।
हुजूर की कमाई जी जी में
सुलगे सिपहिया बरफीली में
एंटी की लुंगी में गोंइठी दे।

बिस्तर पे खाना बिस्तर पे पाना
सारा अखबार बस कूड़े में जाना
गैस है खत्तम और खाना बनाना
खाना चढ़ाया चूल्हे पे ।
लकड़ी न लाए बस टिपियाए
झोंक दूँ कम्पू चूल्हे में
ब्लॉगर की अम्माँ गोंइठी दे। 

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लद्दाख और अरुणांचल में  रोज़मर्रा सी हो चुकी घुसपैठों के मद्देनज़र पसरा हुआ सन्नाटा डराता है। . . .
इस पोस्ट को लिखते समय मुझे भारत के रक्षा मंत्री  का नाम नेट पर ढूँढना पड़ा :(  
जब मैं मराठी और हिन्दी की गुथ्थी सुलझाने के लिए अंग्रेजी का अखबार पढ़ रहा होता हूँ , उस समय  मेरे कान सन्नाटे में  सीमा से आती मंडारिन की फुसफुसाहट सुनते हैं । अपने बच्चे की साथ खेलने की माँग पर मैं मुँह बा देता हूँ - आवाज़ नहीं निकलती ।  भाषाओं ने मुझे मूक बना दिया है ..  

 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को कृषि मंत्री तक पहुँचा दे? - चूल्हे जलाने हैं। 
 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को गृहमंत्री तक पहुँचा दे ? - क़ानूनी रवायतों के चिथड़े जलाने हैं।
 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को प्रधानमंत्री तक पहुँचा दे ? - भारत माता की सूज गई आँखों को सेंकना है।
 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को रक्षामंत्री तक पहुँचा दे ? -भारत की सीमाओं पर होलिकाएँ सजानी हैं। 
 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को ब्लॉगर तक पहुँचा दे ? - टिप्पणियों के भर्ते के लिए पोस्ट का 'बेगुन' भूनना है।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

आभासी संसार का होलिका दहन

जो आ रही है वह ब्लॉगरी प्रारम्भ करने के बाद की मेरी पहली होली होगी। छोटे समयांतराल में ही मैंने हिन्दी ब्लॉगरी को समृद्ध होते देखा है - एक से बढ़ कर एक नगीने जुड़ते रहे हैं। इस आभासी संसार में उत्सव भी तो होने चाहिए। होली आ रही है, क्यों न यहाँ भी मनाएँ ?
आप को पता ही होगा कि होलिका दहन के दिन शरीर में उबटन लगा कर उसकी झिल्ली (छुड़ाया हुआ भाग) होलिका के साथ जला दी जाती है।मंगल कामना रहती है कि घर के हर सदस्य के सारे दु:ख दर्द भस्म हो जाँय।
.. ब्लॉगरी को घर परिवार मानने से कई वस्तुनिष्ठ लोगों को आपत्ति हो सकती है लेकिन फागुन बयार शास्त्रीयता की परवाह ही कहाँ करती है ! जैसे घर के सदस्यों में होता है, मन में ढेर सारा अवसाद का कूड़ा इकठ्ठा हो गया है। कतिपय चर्चाएँ,टिप्पणियाँ और लेख आप के लिए कष्टकारी रहे होंगे। दिख ही रहा है कि बात अब न्यायालय के द्वार पहुँचाने की हो रही है। ऐसे में एक निवेदन है - उन लोगों से जो स्वार्थ वश भद्दी चर्चाएँ, लेख और टिप्पणियाँ करते, लिखते रहे हैं और उनसे भी जो इन सबसे सुलगते रहे हैं, कष्ट पाते रहे हैं - सारे छ्ल, अमंगल, दुर्वाद, कष्ट, क्रोध, आभासी संसार की होलिका में जला दें। उल्लास की नई हवा बह चले। 
पुन: आपसी संवाद की बसंती बयार बह चले।
इस पुनीत कर्म के लिए एक ई मेल पता सृजित किया गया है:
स्पैम से बचने के लिए चित्र में दिखाया गया है। आप को टाइप करना पड़ेगा। 
अपने सारे छ्ल, अमंगल, दुर्वाद, कष्ट, क्रोध इस पते पर भेज दें। उन्हें भेजने के साथ ही उनसे मुक्त हो जाँय। बढ़िया हो  कि जिनसे कष्ट है और जिन्हें कष्ट दिया है, उन्हें मेल, फोन द्वारा - "बुरा न मानो" कह कर हँस हँसा लें।
होलिका दहन के दिन इस आभासी संसार की आभासी होली जलेगी जिसमें सारी नकारात्मक बातों, भावनाओं को भस्म कर दिया जाएगा। कृपया गालियों को होलिका दहन  के दिन चौराहे पर गाने के लिए बचा कर रखें, उन्हें मेल न करें।
मेरे कविता ब्लॉग पर फाग महोत्सव जारी है। शुरुआत यहाँ से है, आगे भी रचनाएँ हैं और जारी भी रहेंगीं  आनन्द उठाते रहें - लेख, कविता, फाग गीत, बन्दिशों का भी और टिप्पणियों का भी।