मंगलवार, 12 सितंबर 2017

FREE SEX और सूअरों के साथ मल्लयुद्ध

(मात्र वयस्कों के लिये) 
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लेख क्यों?

एक आदरणीय व्यक्ति हैं। फेसबुक पर टैग न करने के अनुरोध पर भी लोग उन्हें टैग कर ही देते हैं। वह निजता विकल्पों का संयोजन ठीक नहीं करते, क्यों? पता नहीं।
एक मृत वामाचारिणी के एक लेख पर द्रवण के पश्चात उसको उचित सिद्ध करते हुये किसी ललगँड़िये ने लिखा और उन्हें टैग किया तो मुझे पता चला। उत्तर वहाँ देना अर्थात उसका प्रचार, इसलिये उत्तर यहाँ दे रहा हूँ। उत्तर नहीं, एक कथ्य भर है, मक्कारी का उत्तर नहीं होता।

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वामाचारिणी ने संघियों को यह कहते हुये बलात्कार की उपज बताया था कि उनकी माताओं ने बिना फ्री सेक्स के उन्हें जन्म दिया। 
ललगँड़िये का बचाव यह था कि 'फ्री' शब्द का अर्थ ही संघियों को नहीं पता इसलिये वे मूर्ख हल्ला काटते हुये एक मृतक की छीछालेदर कर रहे हैं।
उसकी मक्कारी स्पष्ट न हुई हो तो आगे हो जायेगी।
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बहुधा मैं 15/8/1947 को करियप्पा का अपने सैनिकों से यह कहना उद्धृत करता रहता हूँ कि आज से हम मुफत, तुम मुफत, सारा देश मुफत। Free का अर्थ उन्हें मुफत ही आता था। उन्होंने बहुत ही उत्साह में आत्मीयता जोड़ने के लिये हिंदी न जानते हुये भी मुफत कह कर सबसे अपने को जोड़ लिया था। ... 
... 70 वर्षों के पश्चात ये हरामखोर वामी, जनता को 'फ्री' का शब्दार्थ बता रहे हैं! 
शब्द मक्कारों द्वारा बलत्कृत होने के लिये अभिशप्त होते हैं, वे मक्कार कई रूपों में आ सकते हैं - दिल्ली का ठग, पूर्ण परचून बाजपाई, रबिश, दिग्गी ... कोई भी हो सकते हैं। इस बार एक नया मक्कार मिला है - कबीर नामधारी। 
Free Sex दुधारी तलवार है, इस अर्थ में कि नारा उछालने वाला देशवासियों के नाड़े ढीले कर 'संभोग' की दुहाई देते हुये उन्हें मैथुन कारोबार में लगाने की इच्छा रखता है ताकि उसके जैसों की लिप्सा पूरी होती रहे और इस अर्थ में भी कि एक उन्नत व्यवस्था की जड़ में मट्ठा डाल उसके स्थान पर ह्रासशील व्यवस्था को स्थापित करने की महत्वाकांक्षा भी रखता है। 
बात व्यवहार का द्वैध आरम्भ से ही दिखता है किंतु सेक्स है ही ऐसी चीज कि सबका मन ललचता है सो ध्यान नहीं जाता।
Free Sex में Free का अर्थ उन्मुक्त वर्जनाहीन मैथुन की स्वतंत्रता है। मनुष्य की स्त्री के साथ ऋतु चक्र मासिक है और पुरुष तो सर्वदा रेडी है। प्रकृति में ऐसी व्यवस्था इसलिये विकसित हुई होगी की सर्वश्रेष्ठ फले फूले, खूब उपजे। साथ ही सर्वश्रेष्ठ ने यह समझ भी लिया होगा कि इसका नियमन न किया गया तो फलना फूलना तो दूर, अस्तित्त्व तक के लाले पड़ जायेंगे। ऐसे में ही विवाह, मर्यादायें, विवाह पूर्व संभोग का निषेध आदि आदि विकसित हुये। 
वामी की लिप्सा में ये आड़े आते हैं, उन्हें काटने के लिये शब्द और तर्क तो ढूँढ़ने ही होंगे। Free से अच्छा कोई नहीं। वह उसे दो अर्थों के साथ उछाल देता है - 
भीतर वाला अर्थ वीभत्स और बाहर वाला मधुमय चॉकलेटी। 
दिखाने को कहा जायेगा कि Free का अर्थ consensual है, आपसी सहमति से, Free will से है। विवाह के भीतर भी यदि ये नहीं हैं तो सम्बंध बलात्कार ही है। बहुत लुभावना तर्क है न? 
इस लुभावने तर्क की पैकिंग में धीरे से पूरी विवाह संस्था को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है, उस संस्था को जिसके कारण मानव सभ्यता वर्तमान तक विकसित होती पहुँची है। 
क्यों? 
क्यों कि नियमन वाली काम ऊर्जा सृजन के नये आयाम ढूँढ़ कर मानव को संतुष्टि देती रही, उसे आगे बढ़ाती रही। 
... मृतका के लेख का बचाव करने वाला वह वामुल्ला यदि वस्तुनिष्ठ होता तो उसकी आलोचना में लिखता कि सबके शयन कक्षों में झाँक कर देखा है कि क्या तुम्हारी माँ के अतिरिक्त वे सभी महिलायें अपने पतियों द्वारा बलत्कृत हो रही थीं जिनकी संतानों को तुम ऐसा कह रही हो? 
तुम्हारे पास आँकड़े हैं क्या? 
उन महिलाओं ने बताये हैं क्या कि उनकी सन्तानें बलात्कार की संतानें हैं? 
सनसनी के लिये आप इतना बड़ा आधारहीन जुमला कैसे उछाल सकती हो? यह तो निकृष्टतम घृणा है। 
और तुम्हारी माँ तुम्हारे पिता द्वारा बलत्कृत नहीं हुईं, बलत्कृत होते हुये उसे गर्भ नहीं ठहर गया, इसका प्रमाण? 
इसके स्थान पर वह लोलुप उस लेख की रक्षा में यह तर्क देते हुये थूक रहा है कि लोगों की मानसिकता गंदी है, वे लोग सही अर्थ ले ही नहीं रहे! वह तो विवाह भीतर सहमति के आधार पर संभोग की बात कर रही थी! 
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दादा कोंड़के से किसी ने पूछा था कि तुम इतने द्विअर्थी संवाद क्यों लिखते हो? 
उसने पलट कर पूछा कि तुम दूसरा वाला ही क्यों 'पकड़ते' हो, पहला वाला क्यों नहीं? 
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वामपंथ के नाम पर कोंड़के छाप गलीज विदूषकों ने हमारे 'स्पेस' पर कब्जा कर लिया है। पुस्तकालय, समाचारपत्र, घर, चाय की दुकान, किटी पार्टियाँ, सिनेमा, टी वी, शिक्षा, सोशल मीडिया, विमर्श ... जो भी हमारे पास थे, वे सब अब उनके पास हैं और हमें पता तक नहीं! 
एक नया रोग दूसरा चल पड़ा है जिसे इधर वाले शास्त्रार्थ कहते हैं और उधर वाले बहस विमर्श। 
अरे! करने किससे हैं? सामने वाला पात्रता भी रखता है? जब मैं KoA, Kick on Ass(embly) कर लतिया देने को कहता हूँ तो मुझे स्पष्ट रहता है कि सामने वाला पात्र नहीं।
उस समय मैं इस लिजलिजी सज्जनता से किञ्चित भी विचलित नहीं होता कि बहस का उत्तर बहस से दो, तर्क रखो, शास्त्रार्थ करो। 
भैया! 
पता तो करो कि उसके मन में क्या है? उद्देश्य क्या है? पात्र है भी या नहीं? उसका एजेण्डा क्या है? 
यूँ ही सूअरों के कीचड़ में लोटने के बुलावे पर दौड़ न जाया करो। 
... 
अगली बार Free Sex पर, इस्लाम की अच्छाइयों पर, मानवाधिकारों पर ... सूअरों से मल्ल में मल मलवाने कब जा रहे हो? समाज सुधार तो तुम्हीं से होना है न! लग लो।

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