गुरुवार, 7 सितंबर 2017

पोंटहा जरदोह

नाक से बहने वाले स्राव को देसज में पोंटा कहते हैं। कुछ बालक बहुधा इसकी अधिकता से पीड़ित रहते हैं। नाक बहती रहेगी, भगई, कच्छा, बण्डी, हाथ आदि आदि में पोंछते रहते हैं। कभी कभी तो गाल पर ही पोत देते हैं। ऐसा पोंटा सूख जाने पर भेभन कहलाता है और बहुत फूहड़ लगता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जो उसका स्वाद पा लेते हैं। पोंटा बह कर ओठों तक आता है और झट से चट कर जाते हैं। ऐसे बालक पोंटहा कहे जाते हैं।  
जरदोह शब्द बड़ा गहन है। इसका संस्कृत मूल अभी तक नहीं मिल पाया है किंतु अभी के लिये यह मान लेते हैं कि जिद्दी का भोजपुरी रूप है, हालाँकि इसमें वह प्रभाव आ नहीं पा रहा।
कोई बालक यदि पोंटहा हो और जरदोह भी तो समस्या भीषण हो जाती है। ऐसे बालकों का रूदन परायों के लिये मनोरञ्जक और अपनों के लिये दु:ख का कारण होता है। जब रोना आरम्भ करेंगे तो घण्टों बिना आँसू बहाये भी रोते रहेंगे – ऊँ ऊँ ऊँ... आँखें भले सूखी रहें, नाक निरंतर प्रवाहमान रहती है और साथ ही स्थान स्थान पर पोंछने और चाटने की क्रिया भी सहज यांत्रिक भाव में चलती रहती है। बालहठ पकड़ लें तो संकट ही संकटकुछ भी कर लो, मार पीट लो, कोठरी में बंद कर दो, घर से निकाल बाहर पथ पर बैठा दो, सूखा रूदन चलता रहता है। घर वालों के पास एक ही विकल्प रहता है – छोड़ दो, कुछ समय पश्चात जब समझ में आयेगा कि पोंटा चाटने से पेट नहीं भरता तो चुप हो भोजन करने आ जायेगा। यह उपाय सदा सफल होता हो. ऐसा भी नहीं है।
यदि किसी बड़े की टोकारी से पोंटहा जरदोह बालक के मन में रूदन के समय ही कोई धुन उतर आई तो तब तक निस्तार नहीं होता जब तक थक कर सो न जाय। धुन रचना किसी भी प्रकार की हो सकती है यथा ऊँ ऊँ ऊँ ऊ काहे टोकलें, हम त रोवबे, हमार गइया बड़ी सुधइया आदि आदि। शब्द कभी कभी बड़े नवोन्मेषी और विचित्र हो जाते हैं।
एक बार ऐसा हुआ कि एक  पोंटहा जरदोह बालक ऐसे ही रो रहा था और उसके बाबा ने डाँट दिया – केतना पिन पिन लगवले बा? बड़ा पिनकाह बा रे, भागु इहाँ से! उसी समय बालक के ऊपर नवोन्मेष उतरा। उसने अपने बाबा को ही पिनकाह बता कर गायन आरम्भ किया – ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें, ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें … घर के सभी लोगों को लाज लगने लगी। लोगों ने समझाया, माँ ने चपत लगाई लेकिन धुन बंद नहीं हुई। क्रोध में आ कर माँ ने कहा कि आज इसका खाना पानी बंद्!
बाबा ने कहा, अरे बहू जाये द, लइका हे! बहू ने उत्तर दिया – लइका हे त का भइल? कुछहू कही, बिहने चौकी पर हग्गे लागी तब?
दिन भर
ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें गाने के पश्चात बालक थक कर भुँइया ही सो गया। समूचा वदन भेभन पुता था जिस पर मक्खियाँ भनभना रही थीं। उसकी माँ धीरे से उठा भीतर ले गयी।
 बुढ़ऊ बाबा को सीख मिली – पोंटहा जरदोह बालक कुछ नहीं समझता, एक बार जो धुन जीभ पर चढ़ गयी तो चढ़ गयी। उसके पश्चात पोंटा चाटते पोतते वह वही करता रहता है जो उसे करना होता है – सूखा गायन। बाबा ने एक और नाम दिया अटकल गरामोफोन - ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें, ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें, ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें ...

यदि आप समझते हैं कि अब वैसे बालक नहीं तो भ्रम में हैं। आस पास ढूँढ़िये, कोई न कोई मिल ही जायेगा, अवश्य मिलेगा। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. ही ही ही . मेरे आसपास तो बहुत सारे, आधुनिक राजनीतिबाज हैं, जो सोशल मीडिया पर भी हैं :)

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस २०१७ “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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