रविवार, 26 मई 2019

वैदिक छन्द : ब्राह्मण-शूद्र, क्षत्रिय-वैश्य | गायत्री-अनुष्टुभ, त्रिष्टुभ-जगती।

समस्त छन्दों के मूल में स्तुति (√स्तु - प्रशंसापरक उद्गार, गान आदिहै, छन्द देवताओं के छाजन हैं जिनमें वे मृत्यु के भय से शरण लेते हैं अर्थात स्तुति नहीं करेंगे तो आप के देवता मर जायेंगे अर्थात आप के भीतर से देवत्व समाप्त हो जायेगा।
स्तुति गुणगान मात्र नहीं है, देवता के ब्याज से अपनी शक्तियों का आह्वान है जिनसे जीवन का हर क्षण जुड़ा है।
मूल शब्द है - स्तुभ्। आह्लाद भरा गान। आह्लाद भी कोई साधारण शब्द नहीं।
गान से गायत्री हुई - स्तुति मूल। ८ वर्णों के तीन चरण। गायत्री ब्राह्मण है।
गायत्री में ८ का एक चरण जुड़ा तो अनुष्टुभ हुआ - ३२ का। अनुष्टुभ से आगे श्लोक हुआ।
त्रि+स्तुभ, प्रत्येक चरण में ३ वर्ण जोड़ दिये गये तो ११x४=४४ का हुआ त्रिष्टुभ। त्रिष्टुभ क्षत्रिय है।
क्षात्र धर्माख्यान रामायण एवम महाभारत श्लोक एवं त्रिष्टुभ में रचे गये।
जगत प्रजा है, विश् प्रजा है। विश् से वैश्य है। उसके लिये त्रिष्टुभ के चरणों में एक एक वर्ण जोड़ दिये गये तो ४८ का हुआ जगती छन्द।
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हाँ, आठ आठ के सात का ५६ वाला शक्वरी भी होता है! सात पग साथ चलना मित्रता का उत्स है।
५६ वाला मित्र है  यह महानाम्नी है, वसन्ततिलका जैसे छन्द का मूल ४x१४ =५६.

तो आगामी युग वासन्ती होगा या नहीं? भारत के भाल मधुमासी राम का तिलक लगेगा या नहीं?

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इतना लिखने के पश्चात यह सोचते हुये सो गया कि किसी भी छंद को शूद्र से क्यों नहीं जोड़ा गया? ऐसा तो नहीं हो सकता।
आज की विकृत शिक्षा पद्धति, जातिवादी द्वेष एवं श्रेष्ठता भाव, नारी-वाम-मूलनिवासी वादों एवं अनध्ययन-समासित-औचित्य-स्थापनाओं के कोलाहल में मेरी मति यदि सबकी उपेक्षा की रही है तो उसका कारण थोड़ा बहुत मूल ग्रंथों का अध्ययन है।
मुझे लग रहा था कि कुछ रह गया या कुछ भूल रहा हूँ क्यों कि वर्ण का मनोवैज्ञानिक विभाजन शूद्र हेतु शून्य नहीं रख सकता।
अर्द्धनारीश्वर हो या पुराणों की वह बात कि सृष्टि सत एवं असत दोनों से है या अन्य बौद्ध/प्राचीन एशियाई मतों में यिन यान का संतुलन; ब्राह्मण-शूद्र एवं क्षत्रिय-वैश्य के दो युग्म 'भारत' रूपी 'वर्ष' के दो अयनों की भाँति हैं। अस्तु।

प्रात:काल जगा तो जैसे चमत्कार हुआ। मन में युग्म था, जाने क्यों मिथुन राशि का अंग्रेजी नाम Gemini ध्यान में आया तो केवल ध्वनि साम्य से मैं जैमिनीय ब्राह्मण खोल बैठा और सत्य ने दर्शन दिये :
'...उसने इच्छा की कि मैं और आगे करूँ वृद्धि।
निज पाँवों रूपी प्रतिष्ठा से इक्कीस स्तोम किया प्रकट, 
अनुष्टुभ छन्द, यज्ञायज्ञीय साम, देवताओं में कोई न एक, 
मनुष्यों में शूद्र, पशुओं में भेड़। 
अत: अनुष्टुभ है शूद्र छंद तथा वेश्मपति है देव।' 
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गायत्री छंद ब्राह्मण में एक पाद और जोड़ कर बना छंद अनुष्टुभ शूद्र है। 
त्रिष्टुभ छंद राजन्य के प्रत्येक पाद में एक अक्षर जोड़ कर बना छंद जगती वैश्य है। 
ब्राह्मण-शूद्र एवं राजन्य-वैश्य का मनोवैज्ञानिक छंद शोध पूर्ण हुआ। इन स्थापनाओं को समझने की तर्क पद्धति जानने हेतु शतपथ पढ़ें। 
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গিরিজেশ রাও
ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी, धनिष्ठा, २०७६ परिधावी

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