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रविवार, 21 जुलाई 2019

देवता : वीर भोग्या वसुंंधरा Prime Numbers

चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँचे एवं सहस्राब्दियों में पसरे सनातन वाङ्मय का देवता वैविध्य भौतिक एवं आध्यात्मिक, दोनों स्तरों पर समेकित चिंतन एवं अभिव्यक्ति का द्योतक है।
द्यौ, भू एवं आप: (जल), विराट परिवेश के इन तीन स्पष्ट क्षेत्रों में ग्यारह ग्यारह देवताओं की उद्भावना के साथ कुल ३३ देवता बताये गये - त्रयादेवाऽएकादश त्रयस्त्रिंसासुराधस
पाँच तत्त्वों का अभिज्ञान रहा ही। ऋग्वेद से ले कर उपनिषदों तक संख्याओं के बारे में बहुत कुछ है ही, उनके विविध विभाजनों को ले कर भी बहुत कुछ है। प्रतीत होता है कि अविभाज्यता उनकी चेतना में रही होगी। एक ब्रह्म, दो पुरुष प्रकृति, तीन लोक, पाँच तत्व (पञ्चजन भी)। यहाँ तक आते आते इन अभाज्य संख्याओं (Prime Numbers) का योग ग्यारह हो जाता है। पाँच एवं ग्यारह के बीच सप्तमात्रिकायें ही अभाज्य बचती हैं, जिनका अपना तन्‍त्रमार्ग है।
३३ देवताओं को आगे पाँच तत्त्वों के समूह में बाँटे गये द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, अष्ट वसु एवं भूत भूतेतर को दर्शाते प्रजापति-इन्‍द्र या दो अश्विनीकुमारों का युग्म।
आदित्य पृथ्वी पर जीवन के कारक हैं, बारह महीनों में सूर्य के विविध रूप। रुद्र सम्पूर्ण भूतों का समन्‍वित रूप है, मानव सहित सभी पशु कहे गये हैं जिनकी बलि सृष्टि का विराट यज्ञपुरुष लेता रहता है, एकीकृत रुद्र पशुपति है। याज्ञिक बलि की इस प्रतीकात्मकता को न समझ पाने के कारण या नितान्‍त स्थूल शब्दार्थ लेने के कारण बहुत से अनर्थ हुये। आठ वसु धरा की सम्पदायें हैं। ज्येष्ठराजा इन्‍द्र की वासव संज्ञा हो या वीर राजन्यों हेतु कहा गया वीर भोग्या वसुंंधरा ; वसुओं का रूप स्पष्ट होता है।
छंदों को देवताओं का छाजन कहा गया जिनमें 'मृत्यु के भय' से देवता शरण लेते हैं। ध्यान दें तो १२, ११ एवं ८ की संख्यायें क्रमश: जगती, त्रिष्टुप एवं गायत्री छंदों से जुड़ती हैं जो क्रमश: (उत्पादक) वैश्य, (रक्षक) क्षत्रिय एवं (मन्त्री) ब्राह्मण छन्‍द कहे गये हैं। 
इन्‍हें घेरे दो सीमान्‍त प्रतीक, सत एवं असत, ऋग्वेद के प्रसिद्ध नासदीय सूक्त से समझे जा सकते हैं। अश्विनों में नासत्य जहाँ दयालु एवं पोषक है, वहीं दस्र भयङ्कर एवं संहारक। प्रजापति एवं इन्‍द्र को भी ऐसे ही जाना जा सकता है। पूर्वी बौद्ध देशों की यिन-यान संकल्पना हो या ऊपर बताये पुरुष प्रकृति, चक्रीय क्रम में ऐसे समझे जाने चाहिये।
अंत में समस्त देवताओं के एक रूप विश्वेदेवा देवता को समर्पित एक मन्त्र का अंश देखें, वीरभोग्या वसुन्‍धरा का मर्म अधिक प्रतिभाषित हो जायेगा :
आहुतयो मे कामान्त्समर्धयन्‍तु भू: स्वाहा। 
आहुतियाँ मेरी समस्त कामनाओं को समृद्ध करें। भू मेरे लिये सु-वह हो। 
ःःःःःःःःःःःःःःःःः
(उद्धरण अंश शुक्ल यजुर्वेद से हैं।) 

(३३ करोड़ देवताओं का सम्बन्ध संवत्सर गणना के क्रमश: सूक्ष्म एवं परिशुद्ध होते जाने से है। उस पर कभी लिखेंगे।) 
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रविवार, 26 मई 2019

वैदिक छन्द : ब्राह्मण-शूद्र, क्षत्रिय-वैश्य | गायत्री-अनुष्टुभ, त्रिष्टुभ-जगती।

समस्त छन्दों के मूल में स्तुति (√स्तु - प्रशंसापरक उद्गार, गान आदिहै, छन्द देवताओं के छाजन हैं जिनमें वे मृत्यु के भय से शरण लेते हैं अर्थात स्तुति नहीं करेंगे तो आप के देवता मर जायेंगे अर्थात आप के भीतर से देवत्व समाप्त हो जायेगा।
स्तुति गुणगान मात्र नहीं है, देवता के ब्याज से अपनी शक्तियों का आह्वान है जिनसे जीवन का हर क्षण जुड़ा है।
मूल शब्द है - स्तुभ्। आह्लाद भरा गान। आह्लाद भी कोई साधारण शब्द नहीं।
गान से गायत्री हुई - स्तुति मूल। ८ वर्णों के तीन चरण। गायत्री ब्राह्मण है।
गायत्री में ८ का एक चरण जुड़ा तो अनुष्टुभ हुआ - ३२ का। अनुष्टुभ से आगे श्लोक हुआ।
त्रि+स्तुभ, प्रत्येक चरण में ३ वर्ण जोड़ दिये गये तो ११x४=४४ का हुआ त्रिष्टुभ। त्रिष्टुभ क्षत्रिय है।
क्षात्र धर्माख्यान रामायण एवम महाभारत श्लोक एवं त्रिष्टुभ में रचे गये।
जगत प्रजा है, विश् प्रजा है। विश् से वैश्य है। उसके लिये त्रिष्टुभ के चरणों में एक एक वर्ण जोड़ दिये गये तो ४८ का हुआ जगती छन्द।
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हाँ, आठ आठ के सात का ५६ वाला शक्वरी भी होता है! सात पग साथ चलना मित्रता का उत्स है।
५६ वाला मित्र है  यह महानाम्नी है, वसन्ततिलका जैसे छन्द का मूल ४x१४ =५६.

तो आगामी युग वासन्ती होगा या नहीं? भारत के भाल मधुमासी राम का तिलक लगेगा या नहीं?

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इतना लिखने के पश्चात यह सोचते हुये सो गया कि किसी भी छंद को शूद्र से क्यों नहीं जोड़ा गया? ऐसा तो नहीं हो सकता।
आज की विकृत शिक्षा पद्धति, जातिवादी द्वेष एवं श्रेष्ठता भाव, नारी-वाम-मूलनिवासी वादों एवं अनध्ययन-समासित-औचित्य-स्थापनाओं के कोलाहल में मेरी मति यदि सबकी उपेक्षा की रही है तो उसका कारण थोड़ा बहुत मूल ग्रंथों का अध्ययन है।
मुझे लग रहा था कि कुछ रह गया या कुछ भूल रहा हूँ क्यों कि वर्ण का मनोवैज्ञानिक विभाजन शूद्र हेतु शून्य नहीं रख सकता।
अर्द्धनारीश्वर हो या पुराणों की वह बात कि सृष्टि सत एवं असत दोनों से है या अन्य बौद्ध/प्राचीन एशियाई मतों में यिन यान का संतुलन; ब्राह्मण-शूद्र एवं क्षत्रिय-वैश्य के दो युग्म 'भारत' रूपी 'वर्ष' के दो अयनों की भाँति हैं। अस्तु।

प्रात:काल जगा तो जैसे चमत्कार हुआ। मन में युग्म था, जाने क्यों मिथुन राशि का अंग्रेजी नाम Gemini ध्यान में आया तो केवल ध्वनि साम्य से मैं जैमिनीय ब्राह्मण खोल बैठा और सत्य ने दर्शन दिये :
'...उसने इच्छा की कि मैं और आगे करूँ वृद्धि।
निज पाँवों रूपी प्रतिष्ठा से इक्कीस स्तोम किया प्रकट, 
अनुष्टुभ छन्द, यज्ञायज्ञीय साम, देवताओं में कोई न एक, 
मनुष्यों में शूद्र, पशुओं में भेड़। 
अत: अनुष्टुभ है शूद्र छंद तथा वेश्मपति है देव।' 
... 
गायत्री छंद ब्राह्मण में एक पाद और जोड़ कर बना छंद अनुष्टुभ शूद्र है। 
त्रिष्टुभ छंद राजन्य के प्रत्येक पाद में एक अक्षर जोड़ कर बना छंद जगती वैश्य है। 
ब्राह्मण-शूद्र एवं राजन्य-वैश्य का मनोवैज्ञानिक छंद शोध पूर्ण हुआ। इन स्थापनाओं को समझने की तर्क पद्धति जानने हेतु शतपथ पढ़ें। 
... 

গিরিজেশ রাও
ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी, धनिष्ठा, २०७६ परिधावी

रविवार, 30 सितंबर 2018

ऋग्वेद मण्डल गोत्रानुसार अध्ययन क्रम, सप्तर्षि, सप्तछन्द, सप्तसिन्धु : एक अनुमान

ऋग्वेद 10 मण्डलों में विभाजित है जिसमें 2 से ले कर 8 तक विशिष्ट ऋषिकुलों के मुख्यतया अपने सूक्त हैं, नवाँ सोम पवमान को समर्पित है एवं पहले तथा अंतिम दसवें मण्डलों में विविध ऋषि मंत्र हैं।
- अध्ययन गोत्र अनुसार करें। जो नाम दिये हैं वे मुख्य हैं। आप को आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि दो से ले कर आठ तक सात ऋषि हो जाते हैं - सप्तर्षि। यह प्राचीनतम बीज रहा होगा ।
- ऋग्वेद में प्रयुक्त मुख्य छंद भी सात ही हैं - गायत्री, उष्णिक्, अनुष्‍टुभ, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुभ, जगती जिनमें 4 की समान्तर श्रेणी से क्रमश: 24, 28, 32, 36, 40, 44 एवं 48 पूर्ण वर्ण होते हैं।
देखें तो इन्हें 4 x (6, 7, 8, 9, 10, 11, 12) की भाँति भी लिखा जा सकता है। मात्रा तो आप सब जानते ही होंगे, छ्न्दों को अंग्रेजी में meter कहा जाता है। आप को आश्चर्य होगा कि इन का प्रयोग मापन हेतु भी होता था । छ: ऋतुयें हों या बारह मास, चार के गुणक से संवत्सर मापन की दो सीमायें निर्धारित हैं। दिनों की गणना हो या चंद्र आधारित तिथियों की, उनकी संख्या को छन्दों की वर्ण संख्या से भी अभिव्यक्त किया जाता था।
छन्‍द वह छाजन थे जिनमें देवता शरण पाते थे। यह प्राचीन पद्धति एवं भाषा आधुनिक जन को कूटमय इस कारण लगते हैं कि अब प्रयोग में नहीं रहे।
- सप्तसिन्धु या सात नदियाँ जानते ही हैं।
मेरा अनुमान है कि त्रि षप्ता: का - सम्बंध सात ऋषियों, सात छंदों एवं सात नदियों से अवश्य रहा होगा।
...
आगे जो कहने जा रहा हूँ उसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं है, अनुमान मात्र है। मण्डल का एक अर्थ वृत्त होता है एवं यह शब्द भारतीय विद्याओं का एक बहुत ही प्रिय शब्द रहा है।
दिये गये चित्र में वृत्त की परिधि पर दस मण्डलों में से सात के ऋषिकुलों के नाम हैं। ऋग्वेद पढ़ते समय आरम्भ नवें से करें (सोम पवमान)।

नौ का अङ्क सबसे बड़ी एकल संख्या होने के साथ साथ गुणा का एक अद्भुत गुण लिये हुये है कि परिणाम के अंकों का योग भी 9 ही होता है।
सोम पवमान से अपने गोत्र (जिनके नहीं मिलते हों वे भी इन मूल गोत्रों से अपने गोत्र के सम्बंध जान सकते हैं) वाले मण्डल पर पहुँचें तथा दक्षिणावर्त दिशा में पढ़ते हुये आगे बढ़ें। अपने गोत्र से पूर्व वाले गोत्र के पश्चात पुन: वृत्त के केन्द्र से होते हुये उस मण्डल तक पहुँचें जो सबसे बायें हो वहाँ से दक्षिणावर्त घूमते हुये इस प्रकार अन्त करें कि अन्तिम दसवाँ मण्डल सबसे अंत में पढ़ा जाय एवं उससे ठीक पहले पहला।
उदाहरण हेतु यदि आप का गोत्र वसिष्ठ (सातवाँ मण्डल) या उनसे उद्भूत कोई अन्य गोत्र है तो आप का क्रम होगा :
9
7, 8
2, 3, 4, 5, 6
1, 10

यदि आप का गोत्र वामदेव गौतम (चौथा मण्डल) या उनसे उद्भूत कोई अन्य गोत्र है है तो क्रम होगा :
9
4, 5, 6, 7, 8
2, 3
1, 10
...
[दुहरा दूँ कि इसका शास्त्रीय आधार नहीं है, मुझे तो नहीं मिला, यदि है तो इसे सुखद संयोग मानूँगा। हाँ, सम्‍भवत: परम्परा में सोम पवमान से ही अध्ययन आरम्भ का विधान है जिसकी पुष्टि कोई ऋग्वेदीय आचार्य ही कर पायेंगे।]
ऋग्वेद की गढ़न मुझे चमत्कृत करती रही है, अनेक परिकल्पनायें मेरे मन में हैं, चलती रहती हैं, जिनमें से एक यह है।]