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बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

.. यह सम्बन्ध भगवान ने सोच समझ कर तोड़ा है ? - एक सिपाही की गोली बिंधी डायरी..

मेरी प्यारी प्यारी लक्ष्मी!
मेरी प्यारी प्यारी मीठी पत्नी, आय लव यू।..
मैं जहाँ भी रहूँगा तुम्हें प्यार करता रहूँगा, सातो जनम तुम्हें प्यार करता रहूँगा, मर भी गया तो भी तुम्हें प्यार करता रहूँगा...
लक्ष्मी मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ..तुमने मुझे एक बेटा और एक बेटी दिया है। मेरे जीवन का सबसे सुखद समय था 15 दिसम्बर 1988, जब मुझसे तुम्हारी शादी हुई थी...
कॉंस्टेबल सूरज बहादुर थापा की गोली बिंधी डायरी : 
चित्र और सामग्री इंडियन एक्सप्रेस से साभार
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अगर मैं न रहूँ ..तुम बेटा बेटी दोनों की अच्छी तरह परवरिश करना ..मेरा हर समय यहाँ जान का खतरा रहता है, कभी कहीं कुछ भी हो सकता है.. ड्यूटी पे जान हाथ में लेके चलना पड़ता है। ...
माई डियर लक्स, मैं तुम्हारे बिना एक पल भी जी नहीं सकूँगा। तुमसे मेरा जो सम्बन्ध भगवान ने जोड़ा है, शायद कुछ सोच समझ के ही जोड़ा है...
संग-संग चलूँगा बन के तेरा साजन
आ तेरी माँग भर दूँ मेरी दुल्हन...
.. मैं जानता हूँ कि मैं परिवार के लिए कुछ खास नहीं कर सकता और तुम हो जिसे सभी जिम्मेदारियाँ निभानी हैं... मैं तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहता हूँ..जब मैं तुम्हें खुश देखता हूँ तो मुझे शांति मिलती है..जो प्यार तुमने दिया है लक्ष्मी, पैदा होने से अब तक किसी से नहीं मिला.. बहुत कम लोग ऐसे भाग्यशाली होते हैं जिन्हें तुम सी पत्नी मिलती है..
अभी देश का हाल खबर ठीक नहीं है .. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ लेकिन अपने देश को भी प्यार करता हूँ। अपने देश की स्थिति दिनों दिन खराब होती जा रही है। ..कुछ लोगों की पार्टी पॉलिटिक्स ने अपने देश के वजूद को ही खतरे में डाल दिया है। हम झेल रहे हैं।.... 
यह अंश है माओवादियों द्वारा मार दिए गए इस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स के जवान सूरज बहादुर थापा की डायरी से ..15 फरवरी को वह वीरगति को प्राप्त हुए।
..रोहन और ईशा थापा के साथ अब कौन फोटो खिंचाएगा ? लक्ष्मी की माँग अब कौन भरेगा ?  
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नरक के रस्ते से निकलना मेरे लिए कठिन है। ये फागुन, ये बसंती बयार ... मन हिलोर लेता है कि फिर वे रस्ते खींच लेते हैं अपनी तरफ ... ये दुनिया इतनी असंगत क्यों है? ...
आज सुबह से ही ...
माओवादियों के अपने तर्क हैं.. राज्य के अपने तर्क हैं.. सबकी अपनी अपनी लड़ाई है ... कोई लक्ष्मी कोई रोहन कोई ईशा क्यों इन लड़ाइयों की परिणति से ..? क्यों ??
मन सूख गया है। मैं कुछ नहीं लिख सकता। 'प्यासा' का गीत टुकड़ा टुकड़ा हो मेरे मस्तिष्क मेरे भाव सबको सुखा रहा है:
ये इंसा के दुश्मन समाजों की दुनिया
..एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनियां है या आलम-ए-बदहवासी
.. ये बस्ती है मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहां पर तो जीवन से मौत सस्ती
... ये दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है।