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गुरुवार, 19 नवंबर 2009

पाठक मेरे !


पाठक मेरे! 
हाँ मैंने पढ़ी है तुम्हारी हर टिप्पणी
अक्षर, अक्षर , मात्रा , मात्रा
मैंने उनमें लय ढूढ़ने के जतन किए हैं
अपने लिए सम्मान प्यार तिरस्कार सब ढूढ़ा है
पाया है। 
वह बेचैनी भी ढूढ़ी है - 
काश ! थोड़ा ऐसे लिख दिया होता  
क्या बात होती ! 
कम्बख्त ने कबाड़ा कर दिया।
मैंने पाया है कई बार
स्तब्ध मौन - जब तुम बिना कुछ कहे चले गए।
वह स्पष्ट निन्दा बघार 
मेरे स्वर व्यंजन - व्यंजन स्वाद।
सब सवादा है।.... 
पाठक मेरे !
मैं मानता हूँ 
तुम भी पढ़ते होगे मुझे इसी तरह।