पाठक मेरे!
हाँ मैंने पढ़ी है तुम्हारी हर टिप्पणी
अक्षर, अक्षर , मात्रा , मात्रा
मैंने उनमें लय ढूढ़ने के जतन किए हैं
अपने लिए सम्मान प्यार तिरस्कार सब ढूढ़ा है
पाया है।
वह बेचैनी भी ढूढ़ी है -
काश ! थोड़ा ऐसे लिख दिया होता
क्या बात होती !
कम्बख्त ने कबाड़ा कर दिया।
मैंने पाया है कई बार
स्तब्ध मौन - जब तुम बिना कुछ कहे चले गए।
वह स्पष्ट निन्दा बघार
मेरे स्वर व्यंजन - व्यंजन स्वाद।
सब सवादा है।....
पाठक मेरे !
मैं मानता हूँ
तुम भी पढ़ते होगे मुझे इसी तरह।
