यात्राओं में और किसी के यहाँ जाने पर अक्सर मैं अनजान बच्चों से भी घुल मिल जाता हूँ। माता पिता भी थोड़ी देर के बाद उन्हें मेरे भरोसे छोड़ देते हैं। मैं थोड़ा चालाक हूँ कि शरारती बच्चों को एकदम भाव नहीं देता :) पिछले सप्ताह किसी सम्बन्धी के यहाँ गया तो एक प्यारी सी गुड़िया मिल गई। हम दोनों में ऐसी दोस्ती हुई कि स्वयं उसके माता पिता दंग रह गये। हम दोनों ने खूब बातें की। महज दो वर्ष की कन्या इतनी प्रतिभाशील थी कि पूछिये न! मैंने उसका वीडियो भी बनाया है। कभी पोस्ट करूँगा। फिलहाल उसके लिये रची मेरी बाल कविता पढ़िये। यह मेरी दूसरी बाल कविता है। पहली बहुत पहले रची थी जो यहाँ है।
माँ चिड़िया कैसी होती है?
बेटी! गुड़िया जैसी होती है।
खुली हवा में गाये चिड़िया
बुलाओ तो उड़ जाये चिड़िया
सरजू दादा की प्यारी चिड़िया
बरगद नाना की न्यारी चिड़िया।
गुड़िया की भी पाँखें जोड़ो
चिड़िया संग उड़ जायेगी
चन्दा से खरहा लायेगी
मैं खेलूँगी उसके साथ
करती तुमसे मीठी बात।
बेटी! चन्दा रातों को जागे
चिड़िया तो तब सोती लागे
गुड़िया अकेली डर जायेगी
सोचो ऊँचा क्या उड़ पायेगी?
इससे अच्छा पिंजड़ा डालो
खरहे को तुम खुद ही पालो।
माँ तुम अकल की कच्ची हो
इतनी बढ़ गइ पर बच्ची हो
खरहा चन्दा पर दौड़ा जाये
बढ़ता जब तब घटता जाये
ऐसे को पिंजरे में क्या रखना?
अच्छा है गुड़िया संग रहना।