वास्तु लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
वास्तु लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

खम्भे जैसी खड़ी है ...


.
.
.



उस समय जब कि महीने के अंतिम सप्ताह पर्स वेतन का चेक अगोरता था - तुम थी और तुम्हारी पायलों की खनक  सिक्कों सी थी। 
 सामने तो तुम खनकती रहती थी लेकिन अकेलेपन के उन क्षणों में तुम्हारी उदास आँखें सूनी दीवार तकती थीं, शायद तुम्हें उदासी का भान भी नहीं था - सैंया नादान, बेटी तो थी ही। दीवार पर कोई चित्र न सही उससे लग कर एक टी वी तो आ ही सकता था। तुमने कभी कुछ नहीं कहा। 
फर्श पर सोना ठीक था कि टी वी न देखना ? विकल्प विकल्पहीन, दोनों ठीक थे। 
तुमने अपने योगी पति से कुछ नहीं कहा - जोगिया रंग की चादर बिछा हम फर्श पर सोते रहे।    
बी पी एल वन्दे मातरम सीरीज का 14" टी वी बॉस की बाइक पर सवार होकर घर आया - उस दिन समझ नहीं पाया कि तुम खुश हुई या नहीं? लेकिन सूनी दीवार के दोनो तरफ के आर सी सी खम्भे इंजीनियर की दृष्टि में पहली बार आए थे। देख कर भी न देखना और देखने देखने में अंतर होना - तड़ित द्युति सा आलोकित हो गया था मन। 
तुम्हारी साँस सहारे दो और जीवन जीते रहे। ..और वह दिन जब नन्हीं सी बेटी के साथ बाज़ार गया था। सौ की नोट को सब्जी वाले ने लेने के बाद पचास का बताया था, खूब कहासुनी हुई - उस समय पचास रुपए बड़ी सम्पति थे। घर आने पर बताने की गलती कर बैठा और तुमने योगी का सब्जी लाना बन्द करा दिया। ...उस दौरान योगी ज़मीन में कांक्रीट के खम्भे ढलवा रहा था - उसे शक्ति देने के लिए ...
..दूसरी संतान के समय और बाद में भी कुछेक दिनों को छोड़ तुम अकेली रही। अब आर्थिक तंगी जैसी बात नहीं लेकिन समय की तंगी थी। योगी दौरे पर था - सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के लिए पाइपलाइनों में ईंधन बहाना था लेकिन मन की नेह नहर सूखी ही रही, कभी सोचा ही नहीं कि ऊर्जा और ऊष्मा की आवश्यकता उस समय घर में अधिक थी। तुम चुप रही - घर आने पर नेह नीर चेहरे पर छलकता था, आँखों में नहीं ...उस मकान में खम्भे नहीं बस दीवारें थीं, क्या सचमुच ?   
.. याद आता है दिल्ली में भतीजे के जन्म के बाद हिजड़ों के आगे दीवार बन कर तुम्हारा खड़ा हो जाना। मेरी  सारी क़ानूनी करामातों को धता बताते हुए कितनी गरिमा और औदार्य से तुमने उनको संतुष्ट कर विदा किया था !  उल्लास की बेला का तुमने मान रखा था ... दिल्ली पुलिस आधे घंटे बाद आई थी।
... लखनऊ की डेढ़ साल की भटकन - एक अदद 'अपने घर' की तलाश और सैंया ग़जब का सनकी। उसे तो सिविल इंजीनियरिंग और वास्तुविद्या की सारी मान्यताएँ बस एक घर में ही चाहिए थीं - जेब में बस कौड़ियाँ खड़कती थीं और मन में मिस्री मन्दिरों जैसे विशाल खम्भे आकार लेते थे! 
... हुँह .. याद नहीं आता कभी तुमने ये कहा हो। छ्ल क्षद्म झेल, काले धन का खेल देख और शुभचिंतकों की मिट्टी पलीद कर जब झुके मन निराश आता तो तुम्हारे आस जगाते एक दो बोल सुनता और तन जाता एक खम्भा - झुका मन खुल कर आकाश हो जाता। 
.. आज 'अपना घर' है जिसमें सिविल इंजीनियरिंग और वास्तुविद्या की मान्यताएँ नहीं के बराबर हैं - अनगढ़ घर लेकिन अनेकों आर सी सी के खम्भों के बीच एक घूमता खम्भा है, वह इस 'अनगढ़' को 'गढ़' बनाता है - वह तुम हो।  
तुम्हारे सहारे ढेरों भंगिमाएँ बना सकता हूँ, निभा सकता हूँ। हाँ, पीछे झुकता जा सकता हूँ - पता जो है कि गतिशील खम्भा सम्हाल लेगा। आवश्यकता पड़ने पर आगे भी खड़ा हो जाएगा - मैं चुपचाप ओट ले सकूँगा। ..तुम हो तो सब हैं - घर, दीवार, बच्चेरसोई, सेमिनार, ट्रेनिंग, प्रोजेक्ट, फाइनेंस, निगोसिएसन, ब्लॉगरी ... तुम हो सब है..