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गुरुवार, 20 मई 2010

पुरानी दुपहरी के कुछ बिम्ब - टिकिर टिक्क टिक्क टिक्क

रमी की दुपहर की अपनी सुन्दरता होती है। आज मुझे एक गुजरा दौर याद आ गया। गाँव में तब संयुक्त परिवार थे और लोग डट कर खेती करते कराते थे। सिंचाई के लिए धनिक पट्टिदारों ने पक्की नालियों का जाल बनवाया था जो जमीन से उपर थीं। जहाँ रास्ते क्रॉस होते थे वहाँ साइफन विधि से पानी इस पार से उस पार पहुँचाया जाता था। जब सिंचाई के लिए डीजल इंजन से बोरिंग चालू किया जाता तो हम लोग भाग कर सड़क किनारे चैम्बरों तक जाते थे और आँखें फाड़े पानी को इस पार एक चैम्बर में गिरते और उस पार दूसरे में उठते देखते थे। छापक छूपक और कागज की नावों के खेल होते थे। 
इंजन से धनकुट्टी भी चलती थी जिसके इक्झास्ट पर उल्टी कब्जेदार टिमकी लगी रहती थी। चालू होने पर जोर जोर से टिक्क टिक्क की आवाज़ आती, लोग जान जाते कि धनकुट्टी चालू हो गई है और धान कुटाने आ पहुँचते थे। एक तरफ पानी नालियों में चलता तो दूसरी तरफ कोठरी में धनकुट्टी से चावल गिरता। 
लोग पूरे सिस्टम को 'सइफन' के नाम से जानते थे। नन्दलाल मेरे यहाँ सेवक थे जिन्हें 'नन्नन' कह कर बुलाया जाता था। 
..तो संत जनों ! यह पुरनिया उसी जमाने की दुपहर के कुछ बिम्ब उकेर रहा है। 
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(1)  
सइफन बोले टिक्क टिक्क 
टिकिर टिक्क टिक्क टिक्क 
पानी के साथ साथ 
दाना भी झर रहा। 
खेत और थाली 
दोनों की फिकर है 
सइफन की टिकिर है। 
(2) 
खेत से लौटे काका
दुपहर में कुएँ नहाए 
गमछा लपेटे भोजन कर रहे। 
ग़जब गर्मी ! 
नंगे पिठासा पर पसीने की बूँदे 
यत्र तत्र टपक रहीं
काकी पंखा डोला रहीं 
भीग रहे दोनों 
जो नेह बदली बरस रही।
(3) 
हुई रड़हो पुतहो 
घर में सास पतोहू लड़ीं। 
भरी दुपहरी
मर्दों को अगोर रही
दुआरे खटिया खड़ी।
(4) 
ललमुनिया ** की थाली 
नन्नन भोजन कर रहे
घेर बैठे जो कुत्ते दुआरे 
नज़र बचा रोटी फेंक रहे ।
बड़की दुलहिन
परोस देती हैं कितना ! 
समा गईं अन्नपूर्णा 
दाल भात में - 
दुलार की हद है !!
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**अल्मुनियम